भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४६ | मृच्छकटिक

तो वह बिना धन के सभी को मुक्त कर दें—‘‘यदि मम छन्दस्तदा विनाऽर्थं सर्वं परिजनमभुजिष्यं करिष्यामि।’’ (पृ० २४१-४२)

उसकी निर्लोभता और वात्सल्य पर ही इस नाटक (प्रकरण) की आधार-शिला है। षष्ठ अंक में जब दासी चारुदत्त के पुत्र को मिट्टी की गाड़ी से खिलाना चाहती है किन्तु वह पड़ोसी के लड़के की सोने की गाड़ी से ही खेलने की जिद करता है। तब वसन्तसेना उसे देख कर अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं कर पाती है। वह उस बच्चे की मार्मिक बातें सुन कर तत्काल अपने गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इन गहनों से अपनी गाड़ी बनवा कर खेलो। (पृ० ३७३)

(५) अतिप्रतिभाशाली

वसन्तसेना एक अति प्रतिभासम्पन्न गणिका है। उसे विविध कलाओं का अच्छा ज्ञान है। वह किसी बात का तात्पर्य समझने में अति कुशल है। प्रथम अंक में जब शकारादि से घिर जाती है और विट रहस्यमय ढंग से कुछ कहता है तो वह उसका आशय समझ कर तदनुसार आचरण करती है। अपनी माला और पैर के नूपुर हटा देती है। चारुदत्त के पास गहने धरोहर रखने के लिये भी वह अकाट्य तर्क देती है ‘‘पुरुषेषु न्यासा निक्षिप्यन्ते न पुनर्गेहेषु।’’ (पृ० १२१) द्वितीय अंक में मदनिका के साथ चारुदत्त के विषय में बातचीत करती हुई भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाती है। चतुर्थ अंक में शर्विलक और मदनिका की गुप्त बातें सुनकर वह तत्काल उसका आशय समझ लेती है। और इसीलिये शर्विलक द्वारा गहने दिये जाने पर वह उसे उसके बदले में मदनिका देती हुई अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करती है—‘‘अहमार्यचारुदत्तेन भणिता य इममलङ्कारकं समर्पयिष्यति तस्य त्वया मदनिका दातव्या। तत् स एवैतां ते ददातीत्यार्येणावगन्तव्यम्।’’ (पृ० २६३-६४) पंचम अंक में जब चारुदत्त के पास अभिसार के लिये जाती है तो मार्ग में विट द्वारा मेघों का वर्णन सुनकर स्वयं भी उसी स्तर का वर्णन करने लगती है। वहाँ का वर्णन गंभीर और प्रभावोत्पादक है। संस्कृतभाषा का प्रयोग करती है। (द्र० ५।१५, १६, १८, २०) चारुदत्त से अकेले मिलने के लिये बड़ी चतुरता से छत्रधारिणी को विट के पास ही रहने देती है, जिससे विट कहने लगता है—‘‘अनेनोपायेन निपुणं प्रेषितोस्मि।’’ (पृ० ३४५) षष्ठ अंक में जब चारुदत्त के भवन के भीतर अपने को देखती है तब अपने को गणिका होने से वह प्रवेश की अपराधिनी समझ कर कहती है कि क्या मेरे आने से चारुदत्त के परिजनों को सन्ताप हो रहा है? (पृ० ३६६) आगे रदनिका के साथ लाये गये चारुदत्त के पुत्र के साथ बातचीत करते समय बालक की मार्मिक बातें सुनकर उनका आशय समझ कर तत्काल अपने गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इनसे गाड़ी बनवाकर खेलो। (पृ० ३७३)

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