भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका

४५

प्रथम अंक में जब विट उसे वेश्या होने के कारण सभी की सेवा में उपस्थित होने का परामर्श देता है तो वह शकार को ठुकराती हुई कहती है—

"गुणः खल्वनुरागस्य कारणम्, न पुनर्बलात्कारः।" (पृ० ८०)

अष्टम अंक में जब गाड़ी बदल जाने के कारण वह शकार के उद्यान में पहुँच जाती है तब उसे देखकर विट कहता है—

'पूर्वं मानाववज्ञाय द्रव्यार्थे जननन्तेवशात्।' (८।१७)

यह सुनकर वह तुरन्त सिर हिलाकर निषेध करती है—"न"।

(४) निर्लोभता

गणिका होने पर भी वसन्तसेना में लोभ नहीं है। वह धन की चिन्ता नहीं करती है। द्वितीय अंक में जब मदनिका चारुदत्त के साथ उसका प्रेम जानती है तब वह कहती है—"दरिद्रः खलु सः श्रूयते।" इस पर वसन्तसेना तत्काल उत्तर देती है—

"अत एव काम्यते। दरिद्रपुरुषसंक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति। (पृ० १३३)

चतुर्थ अंक में विदूषक के मुख से चारुदत्त द्वारा गहनों का जुए में हारना मालूम होता है। इसके बदले में उसे रत्नावली प्राप्त होती है। परन्तु इसके पूर्व वह शर्विलक के हाथ से चुराये गये अपने आभूषण प्राप्त कर चुकी है। अतः वह उदारता देख कर चारुदत्त पर और अधिक आकृष्ट हो जाती है "कथं चौरैरपहृतमपि शौण्डीरतया द्यूते हारितमिति भणति। अत एव काम्यते।" (पृ० २६५) शकार द्वारा भेजी गयी दश हजार मुद्राओं को वह बिना किसी सोच-विचार के ठुकरा देती है। वह गहनों के बदले में पाई हुई रत्नावली को वापस देने के लिए स्वयं जाती है। और चारुदत्त की धर्मपत्नी धूता के पास विनयपूर्वक भेजती है कि उसे लेकर उस पर अनुग्रह करें।

द्वितीय अंक में जुआ में कर्ज लेकर हारा हुआ संवाहक जब उसके पास पहुँचता है और पीछे-पीछे कर्जदार। वह संवाहक को चारुदत्त का सेवक जानकर तत्काल सोने के कड़े भिजवा कर उसे ऋणमुक्त करा देती है।

शर्विलक चोरी करने के बाद जब मदनिका को प्राप्त करने की इच्छा से वसन्तसेना के पास जाता है। वह मदनिका से पूछता है कि क्या तुम्हारी स्वामिनी धन लेकर तुम्हें मुक्त कर देगी। तब वह जवाब देती है कि स्वामिनी का वश चले

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