मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ मृच्छकटिक
चारुदत्त से स्वयं मिलने के लिये आई हुई वसन्तसेना के विषय में विट का यह कहना महत्त्वपूर्ण है—
अपद्मा श्रीरेषा प्रहरणमनङ्गस्य ललितं,
कुलस्त्रीणां शोको, मदनवरवृक्षस्य कुसुमम्।
सलीलं गच्छन्ती, रतिसमयसज्जा-प्रणयिनी,
रतिक्षेत्रे रङ्गे प्रियपथिक-सार्थैरनुगता ॥ ५।२२
अष्टम अंक में शकार द्वारा वसन्तसेना का गला दबा दिये जाने पर उसकी मृत्यु से दुखी विट कहता है—
दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता याता स्वदेशं रति-
र्हा हालङ्कृतभूषणे सुवदने क्रीडारसोद्भासिनि।
हा सौजन्यनदि प्रहासपुलिने हा मावृशामाश्रये
हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ८।३८
वह आगे शकार से कहता है—
अपापा पापकल्पेन नगरश्रीनिरपातिता । ८।३६
(२) वेश्या की अपेक्षा गणिका का वैशिष्ट्य
वेश्या शब्द सामान्यतया प्रयुक्त होता है परन्तु गणिका शब्द का प्रयोग सम्मानित तथा उच्चस्तरीय वेश्या के लिये होता है। यहाँ वसन्तसेना को गणिका के रूप में चित्रित किया गया है।
(३) अतुल वैभवशाली
वसन्तसेना उज्जायिनी की एक अतुल वैभव-सम्पन्न गणिका है। चतुर्थ अंक में विदूषक ने उसके भवनों और उनमें विद्यमान पदार्थों का वर्णन करते हुए उसे कुबेर भवन का अंश कहा है। (द्र० यत्सत्यं स्वर्गायत इदं गेहम्। ... यत्सत्यं खलु नन्दनवनमिव मे गणिकागृहं भासते। ......... किं तावद् गणिकागृहम्, अथवा कुवेरभवनपरिच्छेद इति ।) (पृ० २५२)
उसे धन की लिप्सा नहीं है। जब शकार द्वारा भेजी गयीं दश सहस्र मुद्राओं के कारण उसकी माता उसे शकार के पास जाने के लिये आदेश देती है तो वह तत्काल अस्वीकार कर देती है।
“यदि मां जीवन्तीमिच्छसि, तदैवं पुनरहं न मात्राऽऽज्ञापयितव्या ।” (पृ० २३५)