भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ४१

पुत्र को शीघ्र ही घर जाने के लिये कहता हुआ सावधान करता है—

आश्रमं वत्स गन्तव्यं गृहीत्वार्यांच मातरम् । मा त्वयि पितृदोषेण त्वमप्येवं गमिष्यसि ॥ १०।३२

(१२) आदर्श मित्र

चारुदत्त एक आदर्श मित्र है । वह अपने हर मित्र के हर सुख-दुःख में साथ देने को तैयार रहता है । वह मित्रता की कसौटी को जानता है ! वह किसी की विपन्नता में मित्रता छोड़ने की निन्दा करता है ।

सत्यं न मे विभवनाशकृतास्ति चिन्ता भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति । एतत्तु मां दहति नष्टधनाश्रयस्य यत्सौहृदादपि जनाः शिथिलीभवन्ति ॥ १।१६

यदा तु भाग्यक्षयपीडितां दशां नरः कृतान्तोपहितां प्रपद्यते । तदास्य मित्राण्यपि यान्त्यमित्रतां चिरानुरक्तोऽपि विरज्यते जनः ॥ १।५३

वह अच्छे मित्र की प्रशंसा करता है । विदूषक को वह एक अच्छा मित्र समझता है । वह कहता है—

'अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः !' ( पृ० ४१ ) ... ...... ...... सुख-दुःख-सुहृद्भवान् ॥ ३।२८

अपने शोक में विदूषक को प्राण छोड़ने से मना करता है ।

(१३) चारुदत्त की निर्धनता

एक अतिसम्पन्न परिवार में जन्म लेने पर भी अनवरत दान करने के कारण चारुदत्त बहुत अधिक निर्धन हो चुका है । अपनी निर्धनता से उसे कभी-कभी बहुत अधिक मानसिक क्लेश होता है । उसने अपनी निर्धनता में जो अनुभव किये हैं उन्हें सभी को बताना चाहता है । इस सम्बन्ध में प्रथम अंक के ९, १०, ११, १२, १३, १५, और ५३, पंचम अंक के ४०, ४१, ४२, श्लोक ध्यान देने योग्य हैं ।

(१४) भाग्यवादी

चारुदत्त कर्म की अपेक्षा भाग्य पर अधिक विश्वास करता है । इसीलिये सम्भवतः वह निर्धन होता चला जाता है । वह धनादि की प्राप्ति और हानि को भाग्याधीन ही मानता है ।

"भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति ।" १।१३