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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

भूमिका ५१

शूरोऽहम् ।” ( पृ० ७२ ) प्रथम अंक में जब विदूषक से क्षमा मांग कर विट चला जाता है। तब यह भी भय-वश जाने लगता है—“तच्छीत्र-मपक्रमावः ।” ( पृ० १३३ )

अष्टम अंक के प्रारम्भ में यह बौद्ध भिक्षु को पीटता हैं। इससे बौद्ध धर्म में इसकी अनास्था प्रतीत होती है ।

यह सुरीले कण्ठ का गायक नहीं है किन्तु अपने मधुर कण्ठ की खूब प्रशंसा करता है । ( देखिये श्लोक—८।१३-१४ )

इसके मूर्खतापूर्ण आचरण का एक अच्छा उदाहरण अष्टम अंक में है। जब स्थावरक चेट गाड़ी ले आने की सूचना देता है तब यह चहारदीवारी को पार कर ही गाड़ी ले आने की जिद करता है । ( पृ० ४५३ ) इसे गाड़ी टूटने, बैल मरने और स्थावरक के मरने की कोई चिन्ता नहीं होती है ।

जब वसन्तसेना के आने का ज्ञान होता है तो अपनी प्रशंसा करने लगता है—“'भाव, भाव ! मां प्रवरपुरुषं मनुष्यं वासुदेवकम् । ... ... तेन ह्यपूर्वा श्रीः समासादिता । तस्मिन् काले मया रोषिता साम्प्रतं पादयोः पतित्वा प्रसादयामि ।” ( पृ० ४५३ )

किन्तु वसन्तसेना इसकी प्रार्थना नहीं सुनती है और प्रसन्न होने की अपेक्षा इसे पैर से मार देती है। तब यह क्रुद्ध होकर उसको मार डालने की धमकी देता है। पहले तो विट और चेट से मारने के लिये कहता है किन्तु उनके इनकार कर देने पर स्वयं गला दबाकर मार डालता है। विट द्वारा पूछे जाने पर अपने इस पाप कृत्य की प्रशंसा करने लगता है। और इसी सन्दर्भ में स्वयं ले जाकर मृत वसन्त-सेना को दिखाता है। जब इस पाप कर्म को विट पर मढ़ना चाहता है तब विट अपनी तलवार खींच लेता है। जिससे यह डर जाता है और बहाना करने लगता है।

इसको स्वर्ग, नरक की चिन्ता नहीं है। मूर्ख होने पर भी इसने बड़ी चतुराई के साथ वसन्तसेना की हत्या का आरोप चारुदत्त पर लगाने में सफलता प्राप्त की। वसन्तसेना द्वारा की गयी उपेक्षा के कारण इसने उसकी हत्या करने में संकोच नहीं किया। साथ ही, उसके प्रेमी चारुदत्त को भी मृत्युदण्ड दिलवा दिया। इसकी निर्दयता असीम है। जब चारुदत्त को मृत्युदण्ड के लिये ले जाया जा रहा था उस समय में उसका पुत्र रोहसेन विदूषक के साथ वहाँ आया था। यह उस पुत्र के साथ ही चारुदत्त के मृत्युदण्ड का आदेश दे देता है—“सपुत्रमेवैतं मारय ।”

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(पृ० ६०६) अपने षड्यन्त्र में सफल होने से प्रसन्न होता है और अपने सामने ही चारुदत्त का वध देखना चाहता है। “तत् प्रेक्षिष्ये, शत्रुविनाशो नाम मम महान् हृदयस्य परितोषो भवति । श्रुतं च मया, यो हि किल शत्रुं व्यापाद्यमानं पश्यति तस्य अन्यस्मिन् जन्मान्तरे अक्षिरोगो न भवति ।” (पृ० ६०१)

अपने पद के दुरुपयोग में यह कभी नहीं चूकता है। नवम अंक में इसके मुकदमा की सुनवाई के लिये न्यायाधिकारी आनाकानी करते हैं तब यह उनके स्थानान्तरण की धमकी देता है जिससे डर कर वे लोग उसी दिन इसका मुकदमा विचार के लिए ले लेते हैं। इससे यह मन में बहुत प्रसन्न होता है कि अब भयभीत न्यायाधिकारियों से अपनी हर बात मनवा लूंगा । “ही, प्रथमं भणन्ति न दृश्यते, सांप्रतं दृश्यते इति । तन्नामा भीतभीता अधिकरणभोजकाः, यद्यदहं भणिष्यामि तत्तत्प्रत्याययिष्यामि ।” (पृ० ५१४)

यह चारुदत्त का अपमान करने का निश्चय कर चुका है। न्यायालय में उसको दिये गये आसन का विरोध करता है। और उसे आसन से उतरवा कर जमीन पर बैठवा देता है ।

यह बड़ा कायर है । दशम अंक में जब वसन्तसेना आ जाती है। सारी सत्यता प्रकट हो जाती है। लोग शकार को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं तब यह भाग जाता है। उसी बीच राजपरिवर्तन हो जाता है। और यह पकड़ लिया जाता है। शर्विलक इसको दण्डित करने के लिये कहता है। वहाँ यह अपनी मूर्खता प्रकट करता हुआ वसन्तसेना से कहता है—“गर्भदासि ! प्रसीद प्रसीद, न पुनर्मार-यिष्यामि ।” (पृ० ६३८) किन्तु अपने को असहाय देखकर यह चारुदत्त की ही शरण में जाना उचित समझता है और तत्काल चारुदत्त की शरण में चला जाता है और अपने प्राणों की रक्षा की प्रार्थना करता है। (पृ० ६३७)

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि शकार एक दुष्ट, धूर्त, मूर्ख और घमण्डी पात्र है। यह मूर्खता और कुटिलता की मूर्ति है। किन्तु यह अपने इन व्यवहारों से दर्शकों को प्रभावित कर लेता है। आज के खलनायक के दृष्टिकोण से इसका चरित्र उत्कृष्ट कोटि का माना जा सकता है।

विदूषक

मृच्छकटिक में विदूषक का नाम मैत्रेय है। यह निकृष्ट ब्राह्मणकुल का है। द्वितीय अंक में रात में पैर धोने के प्रसंग में यह अपना परिचय देता है—“यथा नागानां मध्ये डडुभस्तथा सर्वब्राह्मणानां मध्येऽहं ब्राह्मणः ।” (पृ० १६१) यह

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पेटू है। हर समय खान-पान की चिन्ता करता है। चारुदत्त की सम्पन्नता में यह विविध व्यंजनों का आनन्द लिया करता था। उनकी याद करके दुखी हो जाता है। (पृ० ३६) चतुर्थ अंक में वसन्तसेना का वैभव देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है। किन्तु उसके द्वारा किये गये केवल मौखिक सत्कार से सन्तुष्ट नहीं होता है। यह चारुदत्त से शिकायत करता है—"एतावर्त्या ऋद्धया न तयाऽहं भणितः—आर्य मैत्रेय ! विश्रम्यताम्, मल्लकेन पानीयमपि पीत्वा गम्यताम् ।" (पृ० ३०६)

यह भीतर से बड़ा डरपोक है। जब चारुदत्त इसे चौराहे पर बलिसमर्पण के लिये जाने को कहता है तब सायंकाल अकेले जाने में डरता है और इसी लिये इन्कार कर देता है। फिर रदनिका को साथ लेकर जाना स्वीकार करता है। प्रथम अंक में ही जब चारुदत्त वसन्तसेना के साथ जाने के लिये कहता है तब भी यह अस्वीकार कर देता है। (पृ० १३३) जब चारुदत्त चलने लगता है तब यह उसका साथ देता है।

तृतीय अंक में वसन्तसेना के स्वर्णाभूषणों का भाण्ड रखने में यह डरता है किन्तु विवश होकर रखता है।

इसे धर्माचारण में रुचि नहीं है। यह देवी-देवताओं की पूजा आदि में विश्वास नहीं करता है। यह ऐसा मानता है कि इस पूजा पाठ का कोई फल नहीं है। क्योंकि नियमपूर्वक पूजा पाठ करने वाला चारुदत्त क्यों विपत्ति में पड़ जाता है। (पृ० ५२)

यह कभी-कभी बड़ी मूर्खता दिखाता है। जब वसन्तसेना के आगमन के समय विट इसे कुछ प्रश्न देता है तो यह उनका उत्तर नहीं कह पाता है और बार-बार चारुदत्त की सहायता लेता है। (पृ० ३१६) यह मजाकिया स्वभाव का है। प्रथम अंक में जब वसन्तसेना चारुदत्त के घर में अपने प्रवेश के लिए क्षमायाचना करती है, दूसरी ओर उसके साथ दासी के समान व्यवहार करने के कारण चारुदत्त भी क्षमायाचना करता है। इस विचित्र स्थिति में यह विदूषक दोनों के सामने हाथ जोड़कर दोनों से क्षमायाचना का सुन्दर अभिनय करता है। (पृ० १२१)

इसे वेश्यासम्पर्क अच्छा नहीं लगता है। इसी कारण यह चारुदत्त से भी वेश्या का सम्पर्क तोड़ने का आग्रह करता है। (पृ० ३०६) यह वेश्यासम्पर्क को बहुत बड़ा प्रत्यवाय मानता है। इसकी दृष्टि में वेश्यामात्र कुटिल होती है। यह वसन्तसेना को भी एक साधारण वेश्या ही समझता है—"सुष्ठूपलक्षितं दुष्टविलासिन्या।" (पृ० २९६) जब वसन्तसेना के भवन में बन्धुलों [जारजसन्तानों] को बहुत

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सुखी देखता है तब इसके मन में भी लालच आता है किन्तु तत्काल ही यह उसकी निन्दा करने लगता है—

“मा तावद् यद्यप्येष उज्ज्वलः स्निग्धश्च ।
तथापि श्मशानवीथ्यां जात इव चम्पक वृक्षोऽनभिगमनीयो जनस्य ।। (४।२९)

यह कभी-कभी जानकर भी अनजान बनने का प्रयास करता है। जब पंचम अंक में वसन्तसेना चारुदत्त के पास दुर्दिन में अभिसार के लिये आयी है तब यह जानता हुआ भी, उससे आगमन का कारण पूछता है। (पृ० ३५० )

इसको संगीत आदि कलाओं में कोई रुचि नहीं है । रेभिल के सुन्दर गाने की यह आलोचना कर देता है । (पृ० १८४ )

विदूषक के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है चारुदत्त के साथ अटूट मैत्री । यह अपनी मित्रता की कसौटी पर सदैव खरा रहा है। इसने कभी भी कोई ऐसा व्यवहार नहीं किया है जिससे मित्रता पर कोई दोष लगे । यह चारुदत्त की सम्पन्नता के समय उसके घर पर अनेक प्रकार के व्यंजनों का सुखोपभोग किया करता था किन्तु बाद में चारुदत्त के अतिनिर्धन हो जाने पर भी यह उसका साथ नहीं छोड़ता है। इधर-उधर से अपने भोजन की व्यवस्था करके रात में विश्राम के लिये चारुदत्त के घर पर ही आता है “अथवा मयाऽपि मैत्रेयेण परस्यामन्त्रणकानि समीहितव्यानि ।... गृहपारावत इव आवासनिमित्तमत्रागच्छामि ।” ( पृ० ३६ )

प्रथम अंक में जब सबसे पहले चारुदत्त इसे देखता है तो प्रसन्न होकर कहता है “अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः प्राप्तः ।” (पृ० ४१) आगे तृतीय अंक में गहनों की चोरी से यह बहुत दुखी हो जाता है। गहनों के बदले में चारुदत्त की पत्नी धूता जब अपनी रत्नावली चारुदत्त के पास इसके हाथों से भिजवाती है । तब चारुदत्त कहता है—

“विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद् भवान् । (३।२८)

दशम अंक में चारुदत्त का मृत्युदण्ड सुनकर उसके द्वारा पुत्र को वापस ले जाने का अनुरोध करने पर यह उससे कहता है —“भो वयस्य ! एवं त्वया ज्ञातं त्वया विनाऽहं प्राणान् धारयिष्यामि ?” ( पृ० ६०७ ) आगे भी यह चारुदत्त के बिना अपना जीवन रखना नहीं चाहता है। यही नहीं, जब चारुदत्त की मृत्यु का समाचार सुनकर उसकी पत्नी अग्नि में प्रवेश करना चाहती है तब भी यह उससे पहले अपने प्राण छोड़ने का अनुरोध करता है—“समीहितसिद्धयै प्रवृत्तेन ब्राह्मणोऽग्रे कर्तव्यः । अतो भवत्या अहमग्रणीर्भवामि ।” ( पृ० ६४४ )

यह चारुदत्त की निर्धनता से बहुत दुखी है। अतः यह उसे सदैव सान्त्वना देता रहता है कि आपकी निर्धनता भी एक प्रकार की शोभा है—"भो वयस्य !

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अलं सन्तप्तेन, प्रणयिजनसंक्रामितविभवस्य, सुरजनपीतशेषस्य प्रतिपच्चन्द्रस्येव परिक्षयोऽपि तेऽधिकतरं रमणीयः ।” (पृ० ४४)

चारुदत्त की मानप्रतिष्ठा की रक्षा के लिये यह झूठ बोलने से भी नहीं डरता है। वसन्तसेना के गहनों के चोरी चले जाने के बाद चारुदत्त को अतिखिन्न देखकर यह कहता है—"अहं खलु अपलपिष्यामि –केन दत्तम् ? केन गृहीतम् ? को वा साक्षी ? इति।” (पृ० २२३) चारुदत्त की आज्ञा से यह वसन्तसेना के पास जाकर झूठ बोल देता है कि चारुदत्त उसके गहनों को जुआ में हार गया है। (पृ० २६६)

यह चारुदत्त के समान ही उसके पुत्र और पत्नी से भी सच्चा अनुराग रखता है। उनके सुख दुख के विषय में सावधान रहता है।

संक्षेप में, यहाँ विदूषक एक सच्चा मित्र, बुद्धिमान साथी और हर परिस्थिति में साथ निभाने वाला सहयोगी दिखाई देता है। यह केवल हंसी या मजाक का पात्र नहीं है। इसने नाटक के कथानक-संयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

शर्विलक

यह ब्राह्मणकुलोत्पन्न किन्तु भ्रष्ट संस्कारवाला है। इसके पूर्वज चारों वेदों के ज्ञाता और दान न लेने वाले उत्कृष्ट ब्राह्मण थे। (पृ० २१०) कुसंगति से अथवा परिस्थितिवश यह चोरी की शिक्षा लेकर उसमें अपने को निष्णात मानने लगता है। यह बहुत बुद्धिमान है। किन्तु अपनी बुद्धि का दुरुपयोग भी करता है। वेश्यासंसर्ग के फलस्वरूप वसन्तसेना की परिचारिका मदनिका पर आसक्त हो जाता हैं। यह हर कीमत पर उसे प्राप्त करना चाहता है। शर्त के अनुसार भारी धनराशि देकर मदनिका को मुक्त करा कर पाया जा सकता है। इस काम के लिये यह चोरी करने लगता है। यह सम्भवतः उज्जैन का मूल निवासी नहीं है। कहीं बाहर से आकर रेभिल के घर पर रुका हुआ है। इसी लिये चारुदत्त की निर्धनता से परिचित नहीं है। काफी परिश्रम करके उसके घर सेंध लगाता है। यह चोरी को वास्तव में अच्छा काम नहीं समझता है। फिर भी नौकरी आदि से धनार्जन की अपेक्षा चोरी ही अच्छी मानता है। (३।११)

यह बुद्धिमान है। चोरी करते समय जब सांप ने इसकी अंगुली डँस ली है तब तत्काल अपने जनेऊ का उपयोग करता है और बांध कर विष का प्रभाव रोक लेता है। (पृ० २०५) पुराना किवाड़ खोलने पर आवाज न करें इसके लिये नीचे पानी छिड़क लेता है। घर में स्वयं घुसने के पहले एक पुतला को प्रवेश करा कर निरापद स्थिति जान लेता है तब स्वयं प्रवेश करता है। (पृ० २०६)

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चोरी में भी इसके अपने कुछ सिद्धान्त हैं। बलपूर्वक चोरी करना ठीक नहीं मानता है। जहाँ केवल स्त्री है वहाँ चोरी करना या स्त्री पर प्रहार करना अच्छा नहीं समझता है। मदनिका के सामने अपने चोर्यकार्य की भी विशेषता प्रकट करता हुआ कहता है —

“कार्याकार्यविचारिणी मम मतिश्चौर्येऽपि नित्यं स्थिता।” ४।६

यह परिस्थितिवश चोर बना है। अतः जब चारुदत्त के यहाँ घुसकर दयनीय दशा देखता है तो उसके घर चोरी करने का विचार छोड़ देता है— “अथवा न युक्तं तुल्यावस्थं कुलपुत्रजनं पीडयितुम्, तद् गच्छामि।” (पृ० २०९) किन्तु विदूषक द्वारा शपथ दिलाने पर ही स्वर्णभाण्ड ले लेता है। (पृ० २१०)

यह यद्यपि मदनिका पर आसक्त है तथापि अपनी प्रतिष्ठा की हानि नहीं सहना चाहता है। यह वेश्याओं की सारी गतिविधियों से भली भाँति परिचित है। यह उन पर विश्वास करने के पक्ष में नहीं है। (४।१०-१६)

चोरी करके उन गहनों से मदनिका को छुड़वाने के लिये वसन्तसेना के घर पहुँचता है। वहाँ मदनिका के आचरण पर कुछ शंका होते ही यह उत्तेजित होकर चारुदत्त का वध करने को तैयार हो जाता है। किन्तु जब वस्तुस्थिति का ज्ञान होता है। तब अपने कर्म का पश्चात्ताप करता है। (४।१८) मदनिका द्वारा बहुत समझाये जाने पर यह उन गहनों को लेकर वसन्तसेना के पास जाकर गहने देकर झटपट चला जाना पसन्द करता है। परन्तु वसन्तसेना को सारी घटना का ज्ञान हो चुका है अतः वह मदनिका को वधू बनाकर गाड़ी पर बैठा कर इसके साथ विदा कर देती है। इससे यह बहुत प्रसन्न हो कर कृतज्ञता प्रकट करता है। (पृ० २६६)

यह एक सच्चा मित्र है। यह मित्रता को उच्चकोटि का मानता है। (४।२५) जब नयी पत्नी मदनिका को लेकर जाता है, मार्ग में अपने प्रिय मित्र गोपालपुत्र आर्यक के बन्दी होने का समाचार मिलता है तो बेचैन हो जाता है। यह उसे छुड़ाने की सोचता है। मदनिका उसमें सहयोगिनी बनती है। और अकेले घर जाना चाहती है। इससे यह बहुत खुश हो जाता है। और गाड़ीवान द्वारा मदनिका को घर भेजकर आर्यक को छुड़ाने की योजना में निकल जाता है। (पृ० २७१)

तीव्रबुद्धि वाला होने के कारण यह तत्कालीन राजा पालक के विरुद्ध षड्यन्त्र करने में सफल हो जाता है। यह यज्ञशाला में स्थित राजा पालक पर आक्रमण करके पशु के समान वध कराने में सफल हो जाता है। (१०।५१)

आर्यक के राजा बनते ही यह सर्वप्रथम चारुदत्त को मृत्युदण्ड से मुक्त कराना चाहता है क्योंकि आर्यक के प्राणों की रक्षा चारुदत्त की गाड़ी में छिप कर बैठने

भूमिका ५७

के कारण हुई थी। पहले तो अपने पूर्वकृत्य के कारण यह चारुदत्त के सामने जाने में संकोच करता है किन्तु चारुदत्त की उदारता जानकर उसके सामने पहुँच कर सारे नये समाचार सुनाता है। अपना परिचय तत्काल कराने के लिये चारुदत्त के घर की गयी चोरी का स्मरण कराता है। (पृ० ६३२) चारुदत्त उस घटना को बुरा नहीं मानता है और इसका आलिंगन कर लेता है।

चारुदत्त के प्राणों की रक्षा के साथ साथ उसकी पत्नी की भी पूरी चिन्ता रखता है। उसके अग्निप्रवेश की खबर से यह व्याकुल है (पृ० ६४२) और चारुदत्त से अति शीघ्र वहाँ पहुँचकर पत्नी के प्राणों की रक्षा करने को कहता है और इसमें सफल भी होता है।

यह 'शठे शाठ्यं समाचरेत्' इस सिद्धान्त को मानता है। जब चारुदत्त मृत्युदण्ड से मुक्त हो जाता है तब यह षड्यन्त्रकारी शकार को प्राणदण्ड देने का आग्रह करता है। परन्तु चारुदत्त की सदाशयता के आगे इसको झुकना पड़ता है और शकार को छोड़ दिया जाता है।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शर्विलक के व्यक्तित्व में सद्गुणों और दुर्गुणों का अच्छा सामञ्जस्य है। समय-समय पर इसे अपनी कुलीनता का स्मरण होता रहता है। यह सच्चा मित्र और अन्याय का विरोधी है।

धूता

यह चारुदत्त की विवाहिता पत्नी है। इसके सौन्दर्य आदि की कोई चर्चा नहीं की गयी है। अतः यह सामान्य रूपवाली ही प्रतीत होती है। किन्तु इसमें गुणों की कमी नहीं है। यह अपने पति चारुदत्त के सम्मान, सुख और दुःख की पूरी चिन्ता करती है। (पृ० २२४) इसे अपने पति के चरित्र की दुर्बलता का ज्ञान है कि वह गणिका वसन्तसेना से प्रेम करता है किन्तु इसके कारण यह उससे नाराज नहीं होती है। प्रत्युत वसन्तसेना को समुचित आदर देती है। बसन्तसेना के कारण इसके पति को मृत्युदण्ड मिल रहा है, इस पर भी यह वसन्तसेना के लिये अपशब्द नहीं कहती है। दशम अंक में जब वसन्तसेना चारुदत्त के साथ सामने आती है तब यह प्रसन्न होकर उसका आलिंगन करती है। (पृ० ६४७)

वसन्तसेना के गहने इसके पति के पास धरोहर रखे थे। उनकी चोरी हो गयी। यह समाचार पाकर यह बहुत खिन्न हो जाती है। यह समाज में अपने पति की अप्रतिष्ठा नहीं सहन कर सकती है। वसन्तसेना का मुंह बन्द करने के लिये यह अपने मातृगृह से प्राप्त बहुमूल्य रत्नावली विदूषक को दान में देती है।

५८ मृच्छकटिक

(पृ० २२५) इसका उद्देश्य स्पष्ट था कि विदूषक उसे चारुदत्त को देकर वसन्तसेना के पास भिजवा दें। इस कारण चारुदत्त की प्रतिष्ठा सुरक्षित रह जाती है।

यह चारुदत्त का अनिष्ट सुनना भी पसन्द नहीं करती है। दशम अंक में यह स्पष्ट शब्दों में कहती है कि आर्यपुत्र के अमंगल [ मृत्यु ] सुनने की अपेक्षा अपने प्राण छोड़ना पसन्द करती है। यह अपने प्रिय पुत्र से कहती है 'जात ! मुञ्च माम्, मा विघ्नं कुरुष्व । बिभेमि आर्यपुत्रस्यामङ्गल.कर्णात् ।" (पृ० ६४३)

यह अपने पति को ही सबसे बड़ा आभूषण मानती है। इसीलिये जब वसन्त-सेना इसके घर आकर दासी के द्वारा रत्नावली वापस भिजवाती है तब यह लेने से इन्कार करती हुई कहती है कि आर्यपुत्र ने प्रसन्न होकर आपको भेंट की है अतः यह आपके ही पास रहे। 'मेरे तो आर्यपुत्र ही सबसे बड़े आभूषण हैं--

"आर्यपुत्रेण युष्माकं प्रसादीकृता, न युक्तं ममैतां ग्रहीतुम् । आर्यपुत्र एव ममाभरण-विशेष इति जानातु भवती ।" ( पृ० ३७० )

मृच्छकटिक में दो नायिकायें हैं-(१) निर्धन तथापि कुलीन और विवेकी धर्म-पत्नी धूता, (२) अतिसम्पन्न रूपवती गणिका वसन्तसेना। ग्रन्थकार ने वसन्तसेना की तुलना में धूता को अपने चरित्र-सम्बन्धी वैशिष्ट्य को प्रदर्शित करने का अवसर कम दिया है। फिर भी यह स्पष्ट है कि इसका व्यक्तित्व वसन्तसेना से कम नहीं है। यह अपनी निर्धनता को पूरी तरह जानती हुई भी बिना संकोच के बहुमूल्य रत्नावली वसन्तसेना को दिलवा देती है। उसके द्वारा वापस किये जाने पर भी नहीं लेती है। दूसरी बात, वेश्यासंसर्गी पति और वेश्या दोनों को स्वाभा-विक रीति से महत्त्व देती है। निर्लोभता और पति का अन्य स्त्रीसम्पर्क सहन कर लेना-इन दोनों विशेषताओं के कारण धूता एक आदर्श सहनशील भारतीय नारी के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है।

मदनिका

यह वसन्तसेना की दासी है। इस पर वसन्तसेना को बहुत अधिक विश्वास है। इसी लिये वसन्तसेना अपने और चारुदत्त के प्रेम की बात सबसे पहले इसे ही बताती है। मदनिका पूरी कोशिश करती है कि इसकी सखी को अधिक से अधिक सुख प्राप्त हो। यह दासी होने पर भी अच्छे स्वभाववाली है। इसका प्रेमी शर्विलक चतुर्थ अंक में जब इससे मिलता है और चारुदत्त के घर चोरी करने की बात कहता है तो यह चारुदत्त के किसी भी अनिष्ट की सम्भावना से घबड़ा जाती है। ( पृ० २४७) बाद में वस्तुस्थिति जानने पर समाश्वस्त होती है। यह वसन्तसेना के गहनें देने का सत्यपरामर्श देती है। शर्विलक इससे बहुत प्रभावित

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शकार की उक्ति है—“भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता ।” (पृ० ८०) यह इसका ‘बीज’ है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेवायतन उद्यान में किसी उत्सव में वसन्तसेना ने चारुदत्त को देखा और उस पर आसक्त हो गई। जब किसी अवान्तर घटना के कारण मूल कथा विच्छिन्न सी प्रतीत होने लगती है तो उसको जोड़ने वाला वृत्त “बिन्दु” कहा जाता है। द्वितीय अंक में जुआरियों की कथा से मूल कथा विच्छिन्न-सी होने लगती है तभी कर्णपूरक की घटना आती है। कर्णपूरक चारुदत्त से प्राप्त सुगन्धित दुपट्टा वसन्तसेना को देता है। उसे पाकर वह पुनः प्रसन्न होकर उसे ओढ़ लेती है। (पृ० १७६) इस प्रकार टूटी हुई कथा फिर जुड़ जाती है। अतः कर्णपूरक की कथा ‘बिन्दु’ है।

शर्विलक का चरित्र तृतीय अंक से प्रारम्भ होता है। शर्विलक को मदनिका की प्राप्ति चतुर्थ अंक में ही यद्यपि हो जाती है किन्तु उसका अभिनय अन्त तक चलता रहता है। वह अन्त में यह घोषणा करता है कि राजा आर्यक ने वसन्तसेना को चारुदत्त की ‘वधू’ के रूप में माना है। यह लम्बी कथा होने से ‘पताका’ है।

द्वितीय अंक में बना हुआ भिक्षुक अष्टम अंक से आगे दशम अंक तक अभिनय करता है। उसकी कथा ‘प्रकरी’ समझनी चाहिये।

पञ्चम अर्थप्रकृति है—‘कार्य’। इस प्रकरण में वसन्तसेना और चारुदत्त का मिलन रूप फल ‘कार्य’ है, ऐसा सामान्यतः माना जाता है। परन्तु इस सन्दर्भ में पूज्य श्री कान्तानाथ शास्त्री का यह वक्तव्य ध्यान देने योग्य है कि 'वसन्तसेना के मन में चारुदत्त की वधू बनने की उत्कट अभिलाषा थी, वह दशम अंक में नये राजा आर्यक की घोषणा के साथ पूरी होती है—“शर्विलकः—आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।” (पृ० ६४७)

‘वधू’ बनना ही फल मानना तर्कसंगत है क्योंकि वसन्तसेना एक धनी गणिका है। वह किसी से भी मिलने के लिये स्वतन्त्र है। वह चारुदत्त से कई बार मिल भी चुकी है। परन्तु वह समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान चाहती है। वह एक पत्नी का पद प्राप्त करना चाहती है। अतः उपर्युक्त फल ही ‘कार्य’ समझना चाहिये।

कार्य की पाँच अवस्थायें :

कथावस्तु में जो ‘कार्य’ [ मुख्यफल ] होता है उसके लिये पाँच अवस्थायें मानी हैं—१. आरंभ, २. यत्न, ३. प्राप्त्याशा, ४. नियताप्ति, ५. फलागम।

जहाँ फल की प्राप्ति के लिये उत्सुकता दिखाई दे, वहाँ ‘प्रारम्भ’ माना जाता है। प्रथम अंक में शकार आदि के द्वारा पीछा की जाती हुई वसन्तसेना जब

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मौका पाकर अंधेरे में चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है । तब उसे अपनी दासी समझ कर चारुदत्त अपने पुत्र को ओढ़ाने के लिये उस पर सुगन्धवासित दुपट्टा डाल देता है। उसे सूंघकर वसन्तसेना मन ही मन उसके अनुदासीन यौवन का का ज्ञान करके खुश हो जाती है। वहीं चारुदत्त उससे कही गयीं बातें याद करके उत्सुकता प्रकट करता है। जब वस्तुस्थिति प्रकट होती है तब एक दूसरे से औपचारिता के लिये क्षमायाचना करने लगते हैं और चारुदत्त कहता है—"तिष्ठतु प्रणयः ।” (पृ० १२१) वहाँ का दोनों का वार्तालाप परस्पर में उत्सुकताजनक है।

फल की प्राप्ति के लिये शीघ्रतापूर्वक जो उपाय किये जाते हैं उन्हें 'यत्न' कहते हैं। प्रथम अंक में वसन्तसेना चारुदत्त की प्रणयप्रार्थना यद्यपि नहीं स्वीकार करती है तथापि वह लगातार मिलने जुलने के लिये अपने गहने उसके घर पर धरोहर के रूप में रख देती है। द्वितीय अंक में मदनिका के साथ बातचीत में वसन्तसेना इसी रहस्य को प्रकट भी कर देती है। इस अलङ्कारन्यास की घटना से लेकर पञ्चम अङ्क तक यही स्थिति चलती रहती है। पञ्चम अंक में चारुदत्त के बहाना के समान बहाना बनाकर वह अपनी चेटी से कहलवाती है कि आपकी भेजी हुई रत्नावली जुये में हार गयीं हैं। अतः उसके बदले में यह अलङ्कारभाण्ड ले लीजिये। इससे चारुदत्त से मिलते रहने का अवसर पुनः सुलभ हो जाता है।

उपाय और विघ्नों की आशंका होते-होते जब फलप्राप्ति की सम्भावना हो जाती है तब 'प्राप्त्याशा' होती है। षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में जहाँ चारुदत्त का वध करते समय चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिर जाती है और उसी समय वसन्तसेना आकर कहती है "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी यस्याः कारणादेष व्यापाद्यते ।” (पृ० ६१९ ) इस उक्ति तक 'प्राप्त्याशा' है। षष्ठ अंक में चेटी के मुख से वसन्तसेना को यह मालूम होता है कि उद्यान में मिलने के लिए उसे जाना है। उसकी मिलने की आशा बन जाती है। परन्तु संयोगवश गाड़ियों का विपर्यय हो जाने से वह शकार के पास पहुँच जाती है। इससे उसकी आशा पुनः निराशा में परिणत हो जाती है। इसी प्रकार चारुदत्त भी गाड़ी में वसन्तसेना के आने की आशा करता है किन्तु गोपालपुत्र 'आर्यक' को देखकर उसकी आशा भी निराशा में बदल जाती है। न्यायालय में उसे वसन्तसेना की हत्या के आरोप में मृत्युदण्ड दिया जाता है तब तो उसकी आशा पूर्णतया समाप्त होने लगती है। किन्तु चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिरती है और उसी समय भिक्षुक के साथ वसन्तसेना वहाँ अचानक आ जाती है इससे उन दोनों का मिलन हो जाता है।

भूमिका ६३


विघ्नों के दूर हो जाने पर जब फलप्राप्ति का पूर्णनिश्चय हो जाता है तब 'नियताप्ति' कही जाती है। दशम अंक में चाण्डाल की इस उक्ति "त्वरितं का पुनरेषांसपतता चिकुरभारेण।" (१०।३८) के आगे चारुदत्त के प्राणों की रक्षा होती है। उसके बाद राजा पालक के मारे जाने पर असहाय शकार चारुदत्त की शरण में आ जाता है। सभी विघ्न बाधायें दूर हो जाती हैं और फलप्राप्ति का निश्चय हो जाता है।

जहाँ कार्य का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है वहाँ 'फलागम' होता है। दशम अंक में चारुदत्त उचित समय पर पहुँच कर अपनी पत्नी धूता को अग्निदाह से बचा लेता है और उसी समय वसन्तसेना को लक्षित करके शर्विलक यह कहता है— "आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।" ( पृ० ६४७ )

पाँच सन्धियाँ :

नाटकीय कथावस्तु की उपर्युक्त पाँच अर्थप्रकृतियाँ तथा कार्यावस्थायें मिलने पर जो भाग बनते हैं उन्हें "पञ्चसन्धि" कहा जाता है—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण । बीज + आरम्भ = मुख । बिन्दु + यत्न = प्रतिमुख । पताका + प्राप्त्याशा = गर्भ । [ इसमें पताका होना सर्वत्र अनिवार्य नहीं माना गया है । ] प्रकरी + नियताप्ति = विमर्श । [ इसमें प्रकरी होना अनिवार्य नहीं है । ] कार्य + फलागम = निर्वहण ।

(१) जहाँ 'बीज' नाना रसों की अभिव्यञ्जना के साथ उदित होता है वहाँ 'मुखसन्धि' होती है। प्रथम अंक में "चतुरो मधुरश्चायमुपन्यासः" । (पृ० १२१) इस वसन्तसेना के स्वगत कथन तक 'मुखसन्धि' है।

(२) जहाँ बीज का उद्भेद इस प्रकार हो कि वह कहीं प्रतीत हो और कहीं नहीं, वहाँ 'प्रतिमुखसन्धि' होती है । प्रथम अंक में वसन्तसेना के इस कथन से "आर्ये ! यद्येवमहमार्थस्य अनुग्राह्या" ( पृ० १२२ ) से लेकर पञ्चम अंक के अन्त तक यह 'प्रतिमुख सन्धि' चलती है । इसमें पताका होना अनिवार्य नहीं है केवल 'प्राप्त्याशा' से भी यह होती है ।

(३) दिखलाई देकर नष्ट हो जाने वाले 'बीज' का बार-बार अन्वेषण 'गर्भसन्धि' है । षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में चाण्डाल के हाथ से अचानक छटक कर तलवार के गिर जाने पर भाग कर आती हुई वसन्तसेना की इस उक्ति "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी, यस्याः कारणादेष व्यापायते ।" ( पृ० ६१९ ) तक 'गर्भसन्धि' है ।

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मृच्छकटिक

(४) गर्भसन्धि की अपेक्षा ‘बीज’ अधिक विकसित हो जाता है और शापादि के कारण विघ्नयुक्त भी दिखाई देता है, वहाँ ‘विमर्शसन्धि’ होती है। इसे ‘अवमर्श’ भी कहा जाता है। इसमें ‘प्रकरी’ होना अनिवार्य नहीं है। दशम अंक में चाण्डाल की इस उक्ति “त्वरितं का पुनरेषांसपतता चिकुरभारेण।” (१०।३८) से लेकर “आश्चर्यं पुनरुज्जीवितोऽस्मि” (पृ० ६४०) इस शकार की उक्ति तक यह ‘विमर्श’ सन्धि है।

(५) जहाँ इधर उधर बिखरे हुये अर्थों का एक प्रधान फल में उपसंहार कर दिया जाता है वहाँ ‘निर्वहण’ सन्धि होती है। दशम अंक में ‘नेपथ्ये कलकलः’ (पृ० ६४०) से लेकर समाप्ति तक यह ‘सन्धि’ चलती है।

पाश्चात्त्य समीक्षकों के अनुसार नाटक की कथावस्तु पाँच भागों में विभक्त की जाती है—आरम्भ, आरोह, केन्द्र, अवरोह, परिणाम। मृच्छकटिक में इसका सुन्दर समन्वय होता है।

मृच्छकटिक में रस

भारतीय समीक्षकों ने काव्य में रस को अत्यधिक महत्त्व दिया है। साहित्यदर्पणकार ने तो “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ यहाँ तक कह डाला। ‘‘एक एव भवे-दर्द्धी शृङ्गारो वीर एव वा’’ इस उक्ति के अनुसार शृङ्गार की मुख्यता स्पष्ट है। अन्य रस गौणरूप से होते हैं। विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के योग से सहृदयों के मन में एक लोकोत्तर आनन्द की अनुभूति होती है वही ‘रस’ है। इसी का अनुभव कराना काव्यों के अध्ययन का प्रयोजन है।

मृच्छकटिक एक ‘प्रकरण’ है। इसमें अङ्गी रस शृङ्गार है। इसके दो भेद होते हैं—(१) संभोग, (२) विप्रलम्भ। इस प्रकरण में सम्भोग शृङ्गार अंगी है। इसके अतिरिक्त विप्रलम्भ शृङ्गार, हास्य, करुण, बीभत्स, वीर तथा शान्त आदि रस अंगरूप से आये हैं।

संभोग शृङ्गार

मृच्छकटिक में चारुदत्त तथा वसन्तसेना के प्रगाढ़ प्रेम का सुन्दर सजीव चित्रण है। इसमें गणिका वसन्तसेना नायिका है। यह ‘सामान्या’ है। अतः इसका प्रेम ‘रस’ की कोटि में नहीं आना चाहिये, रसाभास होना चाहिये तथापि इसे एक कुलनारी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इसका प्रेम एकमात्र चारुदत्त में है। इसी लिये यह सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप ‘वधू’ बनने की इच्छा रखती है जो अन्त में राजा के आदेश से पूरी हो जाती है।

भूमिका ६५

प्रथम अंक में ऐसा ज्ञात होता है कि कामदेवायतन उद्यान में चारुदत्त को देखने के बाद यह उस पर पूर्णतया आसक्त हो जाती है। जब प्रथम बार इन दोनों का मिलन होता है तब चारुदत्त के मन में भी, सोया हुआ अनुराग जाग उठता है। द्वितीय तथा चतुर्थ अंक में विप्रलम्भ रहता है। इससे संभोग शृंगार और पुष्ट होता है। इसके बाद पञ्चम अंक में वसन्तसेना अभिसारिका बन कर मिलने के लिये आती है। यहाँ मेघों का गर्जन और वर्षा तथा बिजली की चमक उद्दीपन करते हैं। उन्हें देखकर चारुदत्त अति प्रसन्न होने लगता है और उनकी निन्दा करने वाले विदूषक को मना करता है। वर्षा तेज होने पर वे दोनों घर के भीतर चले जाते हैं वहाँ वसन्तसेना का आलिङ्गन करता हुआ चारुदत्त अपने सुन्दर मनोभाव व्यक्त करता है।

षष्ठ अंक में वसन्तसेना पुनर्मिलन के लिये अत्युत्सुक दिखाई देती है। सप्तम अंक में चारुदत्त वसन्तसेना से मिलने के लिये अत्यधिक आतुर दिखाई देता है।

चारुदत्त जिस वसन्तसेना को अपना जीवन मानकर बैठा है उसी की हत्या का आरोप उस पर लगता है और मृत्युदण्ड की स्थिति आ जाती है। वह वसन्तसेना से रहित अपने जीवन को व्यर्थ समझकर मृत्यु ही अच्छी मानने लगता है। परन्तु करुण विप्रलम्भ की स्थिति से पहले ही अचानक वसन्तसेना आ जाती है और चारुदत्त का आलिङ्गन (वक्षस्थल पर गिरना) करती है। भावाकुल चारुदत्त प्रियसंगम के प्रभाव को कह उठता है। इसके बाद राजा के आदेश से 'वधू' बनाकर वसन्तसेना सदा के लिये उसे प्राप्त हो जाती है।

यहाँ संभोग शृङ्गार के बीच-बीच में विप्रलम्भ के कारण उसका अति सुन्दर परिपाक होता है। अतः यही अङ्गी रस है।

शकार भी वसन्तसेना से प्रेम करता है। इसके लिये वह सभी सम्भव उपायों का सहारा लेता है। परन्तु एकपक्षीय तथा अनुचित ढंग के कारण यह शृङ्गारा-भास है।

विप्रलम्भ शृङ्गार

संभोग शृङ्गार के परिपाक के लिए मृच्छकटिक में विप्रलम्भ के अति सुन्दर स्थल हैं क्योंकि विप्रलम्भ के बिना सम्भोग की परिपुष्टि नहीं मानी जाती है।

विप्रलम्भ की सर्वप्रथम प्रतीति द्वितीय अंक में होती है। वसन्तसेना उत्कण्ठित होकर मन में कुछ सोचती है। वह इतनी व्याकुल है कि अपनी माता के स्नानादि के आदेश को भी नहीं मानती है। उसकी इस अवस्था से उसकी सखी प्रसन्न है। क्योंकि अब उसे प्रेमभावयुक्त देखकर उसके भावी सुख की कल्पना करने लगती है। द्वितीय अंक के अन्त में भी कर्णपूरक की सूचना के अनुसार वह चारुदत्त को देखने के लिये अपने भवन के ऊपर चढ़ जाती है।

मृ० भू० ५

६६ मृच्छकटिक

चतुर्थ अंक के प्रारम्भ में अपनी व्याकुलता दूर करने के लिये वसन्तसेना चारुदत्त का चित्र बनाती है। और मदनिका की सम्मति के लिए उसे दिखाती है। चतुर्थ अंक के अन्त में वह चारुदत्त के पास जाने के लिये निकलना चाहती है।

पञ्चम अंक में जब वसन्तसेना के व्यवहार से क्षुब्ध होकर विदूषक वापस आता है और चारुदत्त से वेश्या का संसर्ग छोड़ने को कहता है तब वह अपनी उत्कण्ठा नहीं छिपा पाता है और कह देता है—"गुणहार्यो ह्यसौ जनः"। (५।६) अपनी दरिद्रता को देखकर विरहवेदना भी व्यक्त करने लगता है।

षष्ठ और सप्तम अंक में विप्रलम्भ का उभयपक्षीय चित्रण है। दोनों एक दूसरे से मिलने को आतुर हैं। इस प्रकार विप्रलम्भ के साथ सम्भोग शृङ्गार का सुन्दर परिपाक दिखाया गया है।

हास्य रस

संस्कृत-रूपकों में हास्य रस की अभिव्यक्ति की ओर ग्रन्थकारों का विशेष ध्यान नहीं रहा है। परन्तु मृच्छकटिक इस आरोप का अपवाद है। दूसरे शब्दों में, हास्य रस की दृष्टि से मृच्छकटिक बेजोड़ है। ग्रन्थकार ने विभिन्न माध्यमों से हास्य रस की अभिव्यंजना का स्तुत्य प्रयास किया है। इसमें 'शकार' तो सम्भवतः इसी उद्देश्य से कल्पित किया गया है। विदूषक ने भी कहीं-कहीं हास्य के अच्छे उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है।

शकार यह राजा 'पालक' की रखैल स्त्री का भाई है। राजश्यालक होने का इसको घमण्ड है। अपनी योग्यता दिखाने के लिये यह प्रायः उल्टी सीधी बातें बोला करता है जिससे सामाजिकों का अच्छा मनोरंजन होता है। इस विषय में प्रथम अंक के श्लोक—१८, १६, २१, २२, २५, २८, २६, ३०, ३९, ४१, ४७, ५२, अष्टम अंक में—भिक्षुक के साथ वार्तालाप, अपने कण्ठस्वर की प्रशंसा, गाड़ीवान स्थावरक चेट के साथ बातचीत, वसन्तसेना के साथ वार्तालाप में श्लोक १८, १९, २०, २२, ३४, ३५, ३६, ३७, ४०, ४५, नवम अंक में—न्यायालय के अधिकारियों के साथ वादविवाद, वसन्तसेना की माता को डांटने और विदूषक के साथ झगड़ने में हास्य रस की सुन्दर अभिव्यंजना है। दशम अंक में २९वे श्लोक में और आगे के वक्तव्य में, चारुदत्त को अपने समक्ष दण्ड देने के आदेश मे, राज-परिवर्तन हो जाने पर कर्मचारियों द्वारा बांध कर लाये जाने पर श्लोक ५३ में और अन्त में वसन्तसेना से रक्षा की प्रार्थना करने में "गर्भदासीपुत्रि ! प्रसीद, प्रसीद, न पुनर्मारयिष्यामि। तत् परित्रायस्व।" (पृ० ६३८) हास्य रस की अभिव्यंजना दर्शनीय है।

हास्य रस की अभिव्यक्ति में विदूषक का भी योगदान है। प्रथम अंक में विट आदि से बात करते समय, वसन्तसेना के साथ जाने से इन्कार करते समय

भूमिका | ६७

(पृ० १२३), तृतीय अंक में चारुदत्त के घर सेंध कट जाने पर सोते समय बड़बड़ाते हुये (पृ० २०८-१०), रदनिका तथा चारुदत्त से बात करते समय (पृ० २१५), चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों में परिचारिकाओं के साथ चलते समय (पृ० २७२), बन्धुलों को देखते हुये, वसन्तसेना की माता को देखते हुये, जो कहा है (पृ० ४३०) उससे हास्य रस की अनुभूति होती है। पंचम अंक में वसन्तसेना के विट के साथ प्रश्नोत्तरकाल में (पृ० ३१५), वसन्तसेना के आ जाने पर भोली-भाली बातें करते समय भी हास्य है।

द्वितीय अंक में जुआरियों का दृश्य और षष्ठ अंक में वीरक तथा चन्दनक का विवाद भी हास्य-रसजनक है।

शृङ्गार तथा हास्य के अतिरिक्त करुण रस का भी सुन्दर परिपाक दिखाई देता है।

अलङ्कार-योजना मृच्छकटिक में स्वाभाविक रूप से अर्थालंकारों का प्रयोग है। कहीं भी अनावश्यक रूप से अलंकार प्रयुक्त नहीं है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अप्रस्तुत-प्रशंसा, काव्यलिङ्ग, विशेषोक्ति, समासोक्ति तथा अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है।

छन्दोयोजना मृच्छकटिक जैसे विशाल रूपक में सैकड़ों श्लोकों में विभिन्न छोटे-बड़े छन्दों का प्रसङ्गानुसार सुन्दर प्रयोग है। इन्हें पीछे परिशिष्ट में देखा जा सकता है। संस्कृत के अतिरिक्त प्राकृत के विविध छन्दों का भी प्रयोग है।

भाषा-शैली मृच्छकटिक में संस्कृत तथा विभिन्न प्राकृत भाषाओं और विभाषाओं का सरल रूप में प्रयोग है। इसमें इनका परिष्कृत रूप कम दिखाई देता है। समास का प्रयोग कम किया गया है। वाक्य छोटे-छोटे हैं। इसी लिये इसमें सैकड़ों सूक्तियाँ बन गयीं हैं। इसकी संस्कृत कहीं-कहीं पाणिनीय व्याकरण से पूर्णतया नियन्त्रित नहीं है। कहीं-कहीं अप्रचलित शब्दों का भी प्रयोग है। श्लोकों में पादपूर्ति के लिए अनावश्यक अव्ययों का भी प्रयोग है।

एक ओर इसकी भाषा नाटक के सर्वथा योग्य है वहीं चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों के वर्णन में कृत्रिमता की बहुलता है। उसे पढ़ने से यह लगता ही नहीं कि यह नाटक की भाषा है। वहां का वर्णन प्रवाह का बाधक और उबाऊ है।

प्राकृत भाषाओं के प्रयोग में मृच्छकटिक अपनी समानता नहीं रखता है। इसमें विविध प्राकृतों का प्रयोग है। प्राकृतों के विषय में प्राचीन व्याख्याकार पृथ्वीधर का कथन प्रामाणिक प्रतीत होता है। यहाँ सात भाषा तथा विभाषाओं

६८मृच्छकटिक

का प्रयोग है—(१) शौरसेनी, (२) अवन्तिजा, (३) प्राच्या, (४) मागधी, (५) शकारी, (६) चाण्डाली, (७) ढक्की। पृथ्वीधर ने अपनी व्याख्या के प्रारम्भ में प्राकृत तथा इनके प्रयोक्ताओं के विषय में निम्न विचार व्यक्त किये हैं :—

शौरसेनी—इसको बोलने वालों में—सूत्रधार, नटी, रदनिका, मदनिका, बसन्तसेना और इसकी माता, चेटी, कर्णपूरक, चारुदत्त की पत्नी धूता, शोधनक, तथा श्रेष्ठी—ये ग्यारह पात्र हैं। संस्कृत के तीन ष, श, स, के स्थान पर इसमें केवल 'स' ही होता है।

अवन्तिजा—इसको बोलने वाले दो पात्र हैं—वीरक तथा चन्दनक। इसमें एक मात्र 'स' है।

प्राच्या—इसको बोलने वाला विदूषक है। इसमें भी केवल 'स' मिलता है।

मागधी—(१) संवाहक और (२) चारुदत्त, वसन्तसेना तथा शकार—इन तीनों के ३ चेट लोग—वर्धमानक, कुम्भीलक, स्थावरक, (३) भिक्षु, (४) चारुदत्त का पुत्र रोहसेन—ये मागधी बोलते हैं। इसमें तीनों श, ष, स, के स्थान पर केवल 'श' होता है।

शकारी—इस अपभ्रंश को बोलने वाला अकेला राष्ट्रिय राजश्यालक शकार है। इसमें 'श' का बाहुल्य है। और रेफ का 'ल' होता है।

चाण्डाली—दोनों चाण्डाल इसे बोलते हैं। इसमें भी केवल 'श' है। रेफ का 'ल' होता है।

ढक्की—इसको बोलने वाले माथुर तथा द्यूतकर हैं। इसमें 'व' की प्रचुरता है और 'स' 'श' दोनों हैं।¹

मृच्छकटिक की घटनाओं का स्थान

प्रस्तावना के छठे श्लोक से यह स्पष्ट है कि प्रस्तुत 'प्रकरण' के नायक चारुदत्त और नायिका वसन्तसेना अवन्तिपुरी (उज्जैन) में रहते थे। अतः इसकी कथा का स्थान उज्जयिनी नगरी है।

प्रथम अंक की कथा का स्थान पहले राजमार्ग है और बाद में चारुदत्त का भवन। द्वितीय अङ्क की घटनायें पहले राजमार्ग पर और बाद में बसन्तसेना के भवन में घटती हैं। तृतीय अंक की सारी कथा चारुदत्त के घर पर ही घटती है। चतुर्थ अंक की घटनाओं का स्थल वसन्तसेना का विशाल भवन है। पंचम अंक की घटनायें राजमार्ग पर और बाद में चारुदत्त के घर पर होती हैं। षष्ठ अंक की


१. शौरसेन्यवन्तिजाप्राच्या—एतासु दन्त्यसकारता। तत्रावन्तिजा लोकोक्तिबहुला। प्राच्या स्वार्थिकककारप्राया। मागधी तालव्यशकारवती। शकारीचाण्डाल्योस्तालव्यशकारता। रेफस्य च लकारता। वकारप्राया ढक्काविभाषा। संस्कृतप्रायत्वे दन्त्यतालव्य-स-श-कार-द्वययुक्ता च। पृथ्वीधर पृ० ७-८

भूमिका ६६

घटनायें प्रारम्भ में चारुदत्त के घर पर और आगे राजमार्ग पर होती हैं । सप्तम तथा अष्टम इन दोनों अंकों की घटनायें जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान में ही घटित होती हैं । नवम अंक की घटनाओं का स्थान न्यायालय है । दशम अंक की घटनाओं का स्थान राजमार्ग, वधस्थान और ( अग्निप्रवेश के लिये ) राजप्रासाद के दाहिनी ओर का मैदान है ।

मृच्छकटिक की घटनाओं का समय

मृच्छकटिक की घटनाओं के घटित होने में बहुत अधिक समय नहीं प्रतीत होता है । प्रस्तावना में सूत्रधार का संगीताभ्यास के कारण अति क्षुधार्त्त होना और घर जाकर कुछ भोजन प्राप्त करना वर्णित है । यह सम्भवतः प्रातः आठ बजे के लगभग होना चाहिये । वहाँ सूत्रधार की नटी कहती है कि उसने 'अभिरूपपति' नामक व्रत रखा है । आगे तृतीय अंक में चारुदत्त की पत्नी धूता के 'रत्नषष्ठी' व्रत का उल्लेख । किन्तु इनके विषय में कहीं कोई शास्त्रीय या लौकिक उल्लेख नहीं मिलता है । अतः इनसे समय के निर्धारण में कोई सहायता नहीं मिल सकती ।

प्रस्तावना में यह कहा गया कि सूत्रधार के निमन्त्रण को विदूषक अस्वीकार कर देता है। और जूर्णवृद्ध द्वारा प्रदत्त जातीकुसुमवासित प्रावारक (दुपट्टा) चारुदत्त को देने के लिये जाता है। (पृ० ३७) जब चारुदत्त के पास पहुँचता है तब वह सायं समाधि से निवृत्त हुआ रहता है। यह समय सायं ६ या ७ के पास होना चाहिये । अब तिथि पर भी विचार करना आवश्यक है । प्रथम अंक में शकार वसन्तसेना का पीछा करता हुआ कहता है—‘‘भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता न मां कामयते ।’’ (पृ० ८०) यह कामदेव का महोत्सव वही है जिसका अन्य ग्रन्थों में ‘वसन्तमहोत्सव’ ‘मदनमहोत्सव’ नाम है। यह माघशुक्ल पञ्चमी=‘वसन्तपञ्चमी’ को होता है । इस दिन वसन्तसेना ने चारुदत्त को देखा । उस पर आसक्त हुई । उसके प्रेम को परिपक्व होने के लिये लगभग पन्द्रह दिन का समय आवश्यक है । अतः फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के लगभग इस रूपक की घटना प्रारम्भ होती है । यद्यपि ‘न स्याज्जाती वसन्ते’ इस परम्परा के अनुसार जातीकुसुमवासित दुपट्टा की बात ठीक नहीं लगती है, ऐसा कहा जा सकता है । परन्तु इसका एक उत्तर यह भी है कि दुर्लभ जातीकुसुम चारुदत्त की सेवा में प्रस्तुत करना एक विशेष बात भी हो सकती है । प्रथम अंक में ही जब वसन्तसेना चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है । और अंधेरे के कारण पहचान में नहीं आती है तब चारुदत्त कहता है—‘‘मारुताभिलाषी प्रदोषसमय-शीतार्तो रोहसेनः ।’’ (पृ० ११५) यह स्थिति भी फाल्गुन में होती है । आभूषणों के बदले रत्नमाला देने के लिये विदूषक वसन्तसेना के भवन में जाता है और वहाँ अशोक वृक्ष का वर्णन करता है—‘‘एषोऽशोकवृक्षो नवनिर्गमकुसुमपल्लवो भाति ।’’ (४।३१)

७० मृच्छकटिक

अशोक वसन्त में विकसित होता है, इस लिये यह मानना उचित है कि इस नाटक की घटनाओं का आरम्भ फाल्गुन कृष्ण-षष्ठी से है। कुछ विद्वान वैशाख से मानते हैं, वह तर्कसंगत नहीं है। जैसा कि लिखा जा चुका है चारुदत्त देवपूजा कर चुके तब उसे जातीकुसुमवासित दुपट्टा देना है। इसमें 'सिद्धीकृतदेवकार्यस्य' के स्थान पर "षष्ठीव्रतकृतदेवकार्यस्य" यह पाठ भी है। अतः फाल्गुन कृष्ण षष्ठी ही प्रारम्भिक तिथि उचित है। वसन्तसेना का पीछा किये जाते समय प्रदोष वेला है। और उसको घर वापस पहुँचाते समय चारुदत्त चन्द्रोदय का वर्णन करता है। यह लगभग ११ बजे रात का समय होना चाहिये। इस प्रकार सायं ६ बजे से ११ बजे रात्रि तक प्रथम अंक की कथा घटित हो जाती है।

द्वितीय अंक की घटना का काल प्रथम अंक के द्वितीय दिन का है। कारण यह है कि चारुदत्त को जो सुगन्धित दुपट्टा दिया गया था, जिसे वसन्तसेना भी देख चुकी थी, वही भिक्षु की रक्षा करने और दुष्ट हाथी का वध करने में पुरस्कार रूप में चारुदत्त ने कर्णपूरक को दिया था। वह उसी दुपट्टे को वसन्तसेना को देने आया था। उससे पूर्व एक चेटी वसन्तसेना से स्नान करके पूजनादि के लिये कहती है। अतः यहाँ प्रातः काल का समय है। जुये में हारे हुये संवाहक का आना, भिक्षुकरूप धारण करना, कर्णपूरक द्वारा हाथी से उसकी प्राणरक्षा करना--इनमें लगभग चार घण्टे का समय चाहिये। वसन्तसेना का कर्णपूरक से चारुदत्त के गमन का ज्ञान करके ऊपर छत पर चढ़ कर देखना--यह सब प्रातः से दोपहर १२ बजे तक घटित हो जाता है।

तृतीय अंक की घटना लगभग १५ दिनों बाद की प्रतीत होती है। आधी रात के समय चारुदत्त संगीत-कार्यक्रम सुनकर घर वापस आता है। चन्द्रमा अस्त होने जा रहा है। इससे शुक्ल पक्ष अष्टमी की रात लगती है। वह और विदूषक सो जाते हैं। मध्यरात्रि के बाद शर्विलक का सेंध काट कर घुसना और स्वर्णभाण्ड लेकर निकलना, रदनिका के जागने और विदूषक को जगाने तथा चारुदत्त द्वारा सेंध को बन्द करने की आज्ञा में और सन्ध्यावन्दनादि के लिये जाने में प्रातः ४ बजे का समय हो गया होगा। अतः इसमें मध्य रात्रि से प्रातः ४ बजे तक की घटनायें हैं।

चतुर्थ अंक की घटनाओं का काल तृतीय अंक के दूसरे दिन अर्थात् फाल्गुन शुक्ल नवमी है। क्योंकि प्रातः ६ बजे के लगभग शर्विलक मदनिका से मिलकर कहता है-- "अद्य रात्रौ मया भीरु त्वदर्थे साहसं कृतम्" 'अयि, प्रभाते श्रुतं मया'। वसन्तसेना शर्विलक से बातचीत करके मदनिका को उसे दे देती है और वह चल देता है। इसमें लगभग दो तीन घंटे अर्थात् दोपहर तक का समय लगा होगा। उधर विदूषक के आने और वसन्तसेना द्वारा रत्नमाला प्राप्त करके उसी सायं चारुदत्त से मिलने का वादा करने में अपराह्न का समय लगा होगा।

भूमिका ७१

पंचम अंक की घटनायें चतुर्थ अंक के दिन ही घटती हैं। सायं से लेकर मध्य-रात्रि के लगभग की हैं। क्योंकि वसन्तसेना प्रदोष काल में चारुदत्त के घर पहुँच कर वह रात वहीं बिताती है।

छठे अंक की घटनायें पञ्चम अंक की घटनाओं के दूसरे दिन (फाल्गुन शुक्ल दशमी) की हैं। प्रातः काल बसन्तसेना जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान जाने को तैयार होती है। वह कहती है "सुष्ठु न निष्ध्यातो रात्रौ, तदद्य प्रत्यक्षं प्रेक्षिष्ये।" (पृ० २६८) गाड़ियों का बदलना, वीरक तथा चन्दनक का झगड़ा और आर्यक का आगे पहुँचना आदि में पूर्वाह्न दश बजे तक का समय बीता होगा।

छठे अंक की घटनाओं के बाद दोपहर से पूर्व सप्तम अंक की घटनाये प्रारम्भ होती हैं। चारुदत्त के गाड़ीवान वर्धमानक का आर्यक को लेकर चारुदत्त के पास जाना वहाँ बातचीत के बाद हथकड़ी बेड़ियों से मुक्त कराना और सभी का चला जाना—इसमें दोपहर ११ बजे तक का समय होना चाहिये।

छठे अंक के दिन ही सप्तम अंक की घटनाओं के बाद चारुदत्त उद्यान से चला जाता है। दोपहर की धूप तेज हो जाती है। अष्टम अंक में एक भिक्षु चीवर सुखाने के लिये पुष्पकरण्डक उद्यान में आता है। शकार उसे पीटकर वहाँ से भगा देता है। वह अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगता है। भूख से व्याकुल है। वह कहता है “नभो मध्यगतः सूर्यः” (८।१०) "माध्याह्निकः सूर्यः ।” (पृ० ४४४) शकार की गाड़ी आना, वसन्तसेना को गाड़ी से उतारना, मनाना, अपने विट, चेट से कहना और अन्त में स्वयं वसन्तसेना का गला दबाकर मारना, विट का विलाप—इनमें तीन घण्टे का समय लगा होगा। उसी समय बौद्ध भिक्षुक का आना, चीवर सुखाने के लिये स्थान खोजना, वसन्तसेना को पहचानना, होश में करके ले चलने में कम से कम १ घण्टे का समय लगा होगा। अतः सायं चार बजे तक इस अंक की घटनायें समाप्त हो जाती हैं।

षष्ठ, सप्तम और अष्टम इन तीन अंकों की घटनायें एक ही दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष दशमी की हैं।

नवम अंक की घटनायें अगले दिन (फाल्गुन शुक्ल एकादशी) की हैं। कारण यह है कि शकार और वीरक दोनों ने किसी तरह रात बिता कर प्रातः होते ही न्यायालय में प्रवेश किया है। प्रातः ६ बजे के लगभग इस अंक की घटनायें प्रारम्भ होती हैं। साक्ष्य के लिये वसन्तसेना की माता को बुलाकर गवाही लेना, वीरक का उद्यान में जाकर मरी स्त्री को देखना, विदूषक का आना तथा शकार के साथ झगड़ा करना, विदूषक के पास से गहने गिरना, उनकी पहचान करना,

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मृच्छकटिक

चारुदत्त का अपराधी सिद्ध होना और राजा के पास दण्डनिर्णय के लिये जाना तथा मृत्युदण्ड की घोषणा—इन सभी में कम से कम ५ घण्टे का समय लगा होगा। अतः इस अंक की घटनायें प्रातः ९ से दोपहर २, ३ बजे तक की हैं।

नवम अंक के दिन ( फाल्गुन शुक्ल एकादशी को ) ही दशम अंक की घटनायें होती हैं। मृत्युदण्ड के लिये चारुदत्त को ले जाया जाना, इस अशुभ समाचार का पूरे उज्जैन में फैलना, धूता का अग्निप्रवेश का आग्रह करना, भिक्षुक के साथ वसन्तसेना का अचानक आ जाना, यज्ञ करते हुये राजा 'पालक' का वध करके 'आर्यक' का राजा बनना, वधस्थान पर शर्विलक का आना और सबको यथोचित आदेश सुनाना—इन सभी में कई घण्टे का समय लगना चाहिये। अतः दोपहर बाद से लेकर सायं काल तक इस अंक की घटनाओं का समय है, इससे कम समय में इतनी घटनायें असम्भव हैं।

इस प्रकार यह कहा जा सकता हैं कि मृच्छकटिक की घटनाये माघ शुक्ल षष्ठी से प्रारम्भ होकर फाल्गुन कृष्ण एकादशी तक लगभग २१ दिन में घटित हो जाती हैं। प्रथम अंक और तृतीय अंक की घटनाओं के बीच में करीब १५ दिन का व्यवधान है। तृतीय अंक फाल्गुन कृष्ण अष्टमी का है। नवमी को चतुर्थ तथा पञ्चम अंकों की और दशमी को षष्ठ, सप्तम, अष्टम अंकों की ओर नवम तथा दशम अंकों की घटनायें एकादशी को घटित होती हैं।

मृच्छकटिक कालीन समाज-व्यवस्था

'साहित्य समाज का दर्पण हैं' यह उक्ति बहुत अंशों में मृच्छकटिक में चरितार्थ है। स्वकालीन सत्यता व्यक्त करने में कवि ने क्रान्तिकारी कदम उठाये हैं। उसने किसी की आलोचना की चिन्ता के बिना कटु सत्य सामने रखने का प्रयास किया हैं। इस तथ्य को प्रायः सभी समीक्षक स्वीकार करते हैं। कुछ प्रमुख बातें यहाँ प्रस्तुत हैं-

सामाजिक स्थिति—

मृच्छकटिक एक 'प्रकरण' है। इसमें तत्कालीन समाज के उच्च मध्यमश्रेणी के व्यक्तियों का चित्रण प्रमुखरूप से और निम्न श्रेणी के व्यक्तियों का चित्रण गौण रूप से किया गया है। चूंकि इसका कथानक लोकाश्रित है, अतः ऐसा करना आवश्यक था।

तत्कालीन समाज में जातिप्रथा थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—यह विभाजन था। उच्चजाति के लोग अपनी जाति का गर्व करते थे। ब्राह्मण का स्थान सर्वोपरि था। शास्त्रानुसार उसे कुछ विशेष सुविधायें प्राप्त थीं। जाति-