मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ मृच्छकटिक
"अलं सुप्तजनं प्रबोधयितुम् ।" (पृ० १९१) ऊपर आराम से बैठे हुये कपोतदम्पती को विदूषक जब मारने के लिये दौड़ता है तो वह रोकता हुआ कहता है "वयस्य ! उपविश, किमनेन, तिष्ठतु दयितासहितस्तपस्वी ।" (पृ० ३१४) दूसरी परम दयालुता उस समय देखने योग्य है जब वह अपनी मृत्यु का जाल रचने वाले शकार को भी मुक्त करा देता है। (पृ० ६४०)
(४) शरणागतरक्षक--
चारुदत्त शरण में आये हुये की रक्षा करने में अपने प्राणों को भी न्यौछावर करने से नहीं डरता है। जब कारागार से भागा हुआ आर्यक छिपा हुआ उसी की गाड़ी से आकर उसके सामने आता है और कहता है--"शरणागतो गोपालप्रकृतिः आर्यकोऽस्मि" यह सुनकर चारुदत्त प्रसन्न होकर उत्तर देता है--
विधिनैवोपनीतस्त्वं चक्षुर्विषयमागतः । अपि प्राणानहं जह्यां न तु त्वां शरणागतम् ॥ ७।६ ॥
शरणागतरक्षण की पराकाष्ठा तब होती है जब षड्यन्त्र रचा कर हत्या के अभियोग में चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिलाने वाला शकार भी उसकी शरण में आकर प्राणरक्षा की भीख मांगता है "तत्कमिदानीमशरणः शरणं व्रजामि ? भवतु तमेवाभ्युपपन्नवत्सलं गच्छामि । आर्य चारुदत्त ! परित्रायस्व, परित्रायस्य ।" चारुदत्त शकार के महापराध को भुला कर कहता है "अहह ! अभयमभयं शरणागतस्य ।" (पृ० ६३६) शर्विलक आदि उस दुष्ट शकार का वध करना चाहते हैं किन्तु चारुदत्त अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। वह कहता है--
शत्रुः कृतापराधः शरणमुपेत्य पादयोः पतितः । शरेण न हन्तव्यः उपकारहस्तस्तु कर्तव्यः ॥१०।५५
वह शकार को मुक्त करा देता है।
(५) सत्यवक्ता
चारुदत्त सत्यभाषण का प्रेमी है। वह हर परिस्थिति में सत्य ही बोलना चाहता है। जब वसन्तसेना के आभूषणों की चोरी हो जाती है और चारुदत्त को इसकी सूचना दी जाती है तब चिन्तित चारुदत्त से विदूषक यह कहता है कि थोड़ा झूठ बोलकर इस कष्ट से बचा जा सकता है। इस पर चारुदत्त उत्तर देता है--"अहमिदानीमनृतमभिधास्ये।"
भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि पुनर्न्यास-प्रतिक्रियाम् । अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारकम् ॥३।२६