मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३३
करने को कहता है। वे दोनों चारुदत्त को शूली पर चढ़ाना चाहते हैं। यह देख कर भिक्षु और वसन्तसेना उन्हें ऐसा करने से मना करते हैं। वसन्तसेना कहती है कि मैं ही वह अभागिनी हूँ जिसके कारण आर्य चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया गया है। यह सुनकर उधर देखकर चाण्डाल सोंचने लगते हैं। इसी बीच में दौड़ती हुई वसन्तसेना चारुदत्त के वक्षस्थल पर गिर जाती है। और भिक्षु पैरों पर गिर जाता है। चाण्डाल हट जाते हैं। और चारुदत्त का वध न करने से प्रसन्न दिखाई देते हैं। वे राजा पालक को वसन्तसेना के जीवित होने की सूचना देने के लिए चले जाते हैं। वहाँ वसन्तसेना को जीवित देखकर शकार घबड़ा जाता है और वहाँ से भागता है। चारुदत्त वसन्तसेना को पहचान कर आनन्दमग्न हो जाता है। अचानक आयी हुई वसन्तसेना को पाकर चारुदत्त अपनी वध्य वेशभूषा को और चाण्डालों के साथ बजाये जाते हुए वाद्यों को विवाह की वेषभूषा और वाद्यों के समान समझने लगता है। भिक्षु का परिचय जान कर चारुदत्त बहुत खुश होता है।
दशम अंक के तृतीय दृश्य में शर्विलक प्रवेश करता है। वह सूचना देता है कि आभीरपुत्र 'आर्यक' ने राजा 'पालक' का वध कर दिया है। वह चारुदत्त को वसन्तसेना के साथ देखकर बहुत प्रसन्न हो जाता है। वह आर्यक का और अपना परिचय देता है। वह चारुदत्त से प्रार्थना करता है कि 'कुशवती' नगरी का राज्य स्वीकार कर लें। वह शकार को पकड़ने का आदेश देता है। सब लोग शकार को पकड़ कर लाते हैं। शर्विलक उसे मृत्युदण्ड देना चाहता है, किन्तु वह चारुदत्त की शरण में आ जाता है और उदार चारुदत्त उसे क्षमा कर देता है।
दशम अंक के चतुर्थ दृश्य में चन्दनक यह सूचना देता है कि अपने पति के मृत्युदण्ड से दुखी होकर उसकी धर्मपत्नी धूता आग में कूद कर अपना प्राण-परित्याग करने जा रही है। यह सुनते ही चारुदत्त मूर्छित हो जाता है। वसन्तसेना उसे होश में लाती है। सभी लोग धूता के पास पहुँचते हैं। वहाँ सभी के रोकने पर भी धूता आग में प्रवेश करने का प्रयास करती है। इधर शर्विलक चारुदत्त से जल्दी-जल्दी चलने को कहता है। धूता अपने पुत्र रोहसेन को समझा रही है। उसी समय चारुदत्त आकर बोलता है। उसकी आवाज पहचान कर धूता प्रसन्न हो जाती है। पुत्र अपने पिता चारुदत्त का आलिंगन करता है। विदूषक सती की महिमा का वर्णन करता है और चारुदत्त का आलिंगन करता है। धूता और वसन्तसेना भी परस्पर आलिंगन करतीं हैं। शर्विलक वसन्तसेना से कहता है कि प्रसन्न राजा आर्यक आपको 'वधू' शब्द से अलंकृत करते हैं। वसन्तसेना इस अनुग्रह से अपने
मृ० भू०-३