मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ मृच्छकटिक
मृत्यु के समय चारुदत्त अपने पास केवल जनेऊ देखकर उसे ही पुत्र को देना चाहता है। विदूषक और चारुदत्त का पुत्र रोहसेन चारुदत्त को छोड़ने की और उसके बदले में अपने अपने वध करने की प्रार्थना करते हैं। इसी समय शकार द्वारा अपने ऊपरी महल में कैद किया गया स्थावरक चेट दिखाई देता है। वह चाण्डालों की घोषणा सुनकर चारुदत्त का वध जानकर अति दुखी है। वह चिल्ला चिल्ला कर कहता कि चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है किन्तु दूरी के कारण कोई उसकी आवाज नहीं सुन पाता है। वह अपने जीवन की अपेक्षा चारुदत्त का जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है। अतः वह झरोखे से नीचे कूद पड़ता है। उसकी बेड़ियाँ खुल जाती हैं। वह सभी के सामने चाण्डालों से कहता है कि इस चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है अपितु मेरे स्वामी शकार ने ही किया है। और मुझे बांधकर कैद कर रखा था जिससे मैं किसी से न कह सकूं। इसी बीच कोलाहल सुनकर अपने महल में बन्दी स्थावरक चेट को न देखकर उसको खोजता हुआ शकार भीड़ में पहुँच जाता है। वह सबके सामने स्थावरक को झूठा सिद्ध करके उसे वापस ले जाता है। निराश स्थावरक चेट चारुदत्त के पैरों पर गिर पड़ता है। चाण्डाल शकार की बात सच मानकर स्थावरक को पीट कर बाहर कर देते हैं। शकार चाण्डालों से चारुदत्त को शीघ्र ही मारने के लिये कहता है। वह उसे पुत्र-सहित मारने को कहता है। किन्तु चाण्डाल उसकी बात अस्वीकार कर देते हैं। मित्रशोक में मरने के इच्छुक विदूषक को चारुदत्त मना करता है और पुत्र रोहसेन को उसकी माता के पास ले जाने के लिये कहता है। इसी बीच वे दोनों चाण्डाल, वध करने की किसकी पारी है, इसका निर्णय करने लगते हैं। और चारुदत्त को दक्षिण श्मशान का भीषण दृश्य दिखाते हैं।
दशम अङ्क के द्वितीय दृश्य में घबड़ायी हुई वसन्तसेना और भिक्षु चारुदत्त के घर की ओर जाते हुये दिखाई देते हैं। मार्ग में भारी भीड़ देखकर वसन्तसेना भिक्षु से उस भीड़ का कारण जानने के लिये कहती है। इतने में चाण्डालों की आखिरी घोषणा सुनाई देती है।
वे चारुदत्त को अतिशीघ्र ही मारने वाले प्रतीत होते हैं। यह सुनकर भिक्षु घबड़ा जाता है। और वसन्तसेना से जल्दी ही चलने को कहता है। वे दोनों अपनी पूरी शक्ति से चलकर वहाँ अति शीघ्र पहुँचने का प्रयास करते हैं। इसी बीच एक चाण्डाल चारुदत्त पर तलवार से प्रहार करता है किन्तु तलवार उसके हाथ से गिर जाती है। वह इसे अच्छा शकुन मानकर अपनी कुल देवी सह्यवासिनी से चारुदत्त की रक्षा करने की प्रार्थना करता है। दूसरा चाण्डाल राजाज्ञा का पालन