मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
३२ मृच्छकटिक
मृत्यु के समय चारुदत्त अपने पास केवल जनेऊ देखकर उसे ही पुत्र को देना चाहता है। विदूषक और चारुदत्त का पुत्र रोहसेन चारुदत्त को छोड़ने की और उसके बदले में अपने अपने वध करने की प्रार्थना करते हैं। इसी समय शकार द्वारा अपने ऊपरी महल में कैद किया गया स्थावरक चेट दिखाई देता है। वह चाण्डालों की घोषणा सुनकर चारुदत्त का वध जानकर अति दुखी है। वह चिल्ला चिल्ला कर कहता कि चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है किन्तु दूरी के कारण कोई उसकी आवाज नहीं सुन पाता है। वह अपने जीवन की अपेक्षा चारुदत्त का जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है। अतः वह झरोखे से नीचे कूद पड़ता है। उसकी बेड़ियाँ खुल जाती हैं। वह सभी के सामने चाण्डालों से कहता है कि इस चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है अपितु मेरे स्वामी शकार ने ही किया है। और मुझे बांधकर कैद कर रखा था जिससे मैं किसी से न कह सकूं। इसी बीच कोलाहल सुनकर अपने महल में बन्दी स्थावरक चेट को न देखकर उसको खोजता हुआ शकार भीड़ में पहुँच जाता है। वह सबके सामने स्थावरक को झूठा सिद्ध करके उसे वापस ले जाता है। निराश स्थावरक चेट चारुदत्त के पैरों पर गिर पड़ता है। चाण्डाल शकार की बात सच मानकर स्थावरक को पीट कर बाहर कर देते हैं। शकार चाण्डालों से चारुदत्त को शीघ्र ही मारने के लिये कहता है। वह उसे पुत्र-सहित मारने को कहता है। किन्तु चाण्डाल उसकी बात अस्वीकार कर देते हैं। मित्रशोक में मरने के इच्छुक विदूषक को चारुदत्त मना करता है और पुत्र रोहसेन को उसकी माता के पास ले जाने के लिये कहता है। इसी बीच वे दोनों चाण्डाल, वध करने की किसकी पारी है, इसका निर्णय करने लगते हैं। और चारुदत्त को दक्षिण श्मशान का भीषण दृश्य दिखाते हैं।
दशम अङ्क के द्वितीय दृश्य में घबड़ायी हुई वसन्तसेना और भिक्षु चारुदत्त के घर की ओर जाते हुये दिखाई देते हैं। मार्ग में भारी भीड़ देखकर वसन्तसेना भिक्षु से उस भीड़ का कारण जानने के लिये कहती है। इतने में चाण्डालों की आखिरी घोषणा सुनाई देती है।
वे चारुदत्त को अतिशीघ्र ही मारने वाले प्रतीत होते हैं। यह सुनकर भिक्षु घबड़ा जाता है। और वसन्तसेना से जल्दी ही चलने को कहता है। वे दोनों अपनी पूरी शक्ति से चलकर वहाँ अति शीघ्र पहुँचने का प्रयास करते हैं। इसी बीच एक चाण्डाल चारुदत्त पर तलवार से प्रहार करता है किन्तु तलवार उसके हाथ से गिर जाती है। वह इसे अच्छा शकुन मानकर अपनी कुल देवी सह्यवासिनी से चारुदत्त की रक्षा करने की प्रार्थना करता है। दूसरा चाण्डाल राजाज्ञा का पालन
भूमिका ३३
करने को कहता है। वे दोनों चारुदत्त को शूली पर चढ़ाना चाहते हैं। यह देख कर भिक्षु और वसन्तसेना उन्हें ऐसा करने से मना करते हैं। वसन्तसेना कहती है कि मैं ही वह अभागिनी हूँ जिसके कारण आर्य चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया गया है। यह सुनकर उधर देखकर चाण्डाल सोंचने लगते हैं। इसी बीच में दौड़ती हुई वसन्तसेना चारुदत्त के वक्षस्थल पर गिर जाती है। और भिक्षु पैरों पर गिर जाता है। चाण्डाल हट जाते हैं। और चारुदत्त का वध न करने से प्रसन्न दिखाई देते हैं। वे राजा पालक को वसन्तसेना के जीवित होने की सूचना देने के लिए चले जाते हैं। वहाँ वसन्तसेना को जीवित देखकर शकार घबड़ा जाता है और वहाँ से भागता है। चारुदत्त वसन्तसेना को पहचान कर आनन्दमग्न हो जाता है। अचानक आयी हुई वसन्तसेना को पाकर चारुदत्त अपनी वध्य वेशभूषा को और चाण्डालों के साथ बजाये जाते हुए वाद्यों को विवाह की वेषभूषा और वाद्यों के समान समझने लगता है। भिक्षु का परिचय जान कर चारुदत्त बहुत खुश होता है।
दशम अंक के तृतीय दृश्य में शर्विलक प्रवेश करता है। वह सूचना देता है कि आभीरपुत्र 'आर्यक' ने राजा 'पालक' का वध कर दिया है। वह चारुदत्त को वसन्तसेना के साथ देखकर बहुत प्रसन्न हो जाता है। वह आर्यक का और अपना परिचय देता है। वह चारुदत्त से प्रार्थना करता है कि 'कुशवती' नगरी का राज्य स्वीकार कर लें। वह शकार को पकड़ने का आदेश देता है। सब लोग शकार को पकड़ कर लाते हैं। शर्विलक उसे मृत्युदण्ड देना चाहता है, किन्तु वह चारुदत्त की शरण में आ जाता है और उदार चारुदत्त उसे क्षमा कर देता है।
दशम अंक के चतुर्थ दृश्य में चन्दनक यह सूचना देता है कि अपने पति के मृत्युदण्ड से दुखी होकर उसकी धर्मपत्नी धूता आग में कूद कर अपना प्राण-परित्याग करने जा रही है। यह सुनते ही चारुदत्त मूर्छित हो जाता है। वसन्तसेना उसे होश में लाती है। सभी लोग धूता के पास पहुँचते हैं। वहाँ सभी के रोकने पर भी धूता आग में प्रवेश करने का प्रयास करती है। इधर शर्विलक चारुदत्त से जल्दी-जल्दी चलने को कहता है। धूता अपने पुत्र रोहसेन को समझा रही है। उसी समय चारुदत्त आकर बोलता है। उसकी आवाज पहचान कर धूता प्रसन्न हो जाती है। पुत्र अपने पिता चारुदत्त का आलिंगन करता है। विदूषक सती की महिमा का वर्णन करता है और चारुदत्त का आलिंगन करता है। धूता और वसन्तसेना भी परस्पर आलिंगन करतीं हैं। शर्विलक वसन्तसेना से कहता है कि प्रसन्न राजा आर्यक आपको 'वधू' शब्द से अलंकृत करते हैं। वसन्तसेना इस अनुग्रह से अपने
मृ० भू०-३
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को अनुगृहीत मानती है। भिक्षु को सभी विहारों का कुलपति बना दिया जाता है। स्थावरक को शकार की दासता से मुक्त करा कर स्वतन्त्र नागरिक बना दिया जाता है। दोनों चाण्डालों को सभी चाण्डालों का प्रधान बना दिया जाता है। चन्दनक को 'पृथ्वीदण्डपालक' का पद दे दिया जाता है। शकार को उसी प्रकार स्वच्छन्द विचरण करने के लिए छोड़ दिया जाता है।
भारत-वाक्य के साथ नाटक (प्रकरण) का दशम अङ्क समाप्त हो जाता है।
पात्रों का चरित्र-चित्रण
मृच्छकटिक एक जीते जागते पात्रों का सजीव चित्रण है। प्रायः प्रत्येक पात्र अपनी कुछ विशेषताओं के साथ दिखाई देता है। वह सामाजिक को भली-भाँति प्रभावित करने में पूर्णतया सफल है। इसमें पुरुष पात्रों में चारुदत्त, शकार, शर्विलक और विदूषक के अतिरिक्त विट, चेट, भिक्षुक तथा आर्यक आदि प्रधान हैं। स्त्रीपात्रों में वसन्तसेना, धूता, मदनिका तथा रदनिका प्रधान हैं। इन पात्रों की चरित्र-सम्बन्धी विशेषताओं का विवेचन यहाँ किया जा रहा है।
चारुदत्त
मृच्छकटिक में चारुदत्त को सुन्दर, युवक, परोपकारी, गुणग्राही, उदार, भावुक, पवित्रप्रेमी, सत्यवक्ता, शरणागतवत्सल, परम क्षमाशील आदि रूपों में चित्रित किया गया है। यह इस 'प्रकरण' का धीरप्रशान्त नायक है।
(१) व्यक्तित्व
उज्जयिनी नगरी के अति सम्पन्न वंश में चारुदत्त ने जन्म लिया है। उसके वंशज यद्यपि ब्राह्मण थे तथापि व्यापार के माध्यम से उन्होंने प्रचुर सम्पत्ति अर्जित की थी। अतः वे धनिकों में प्रतिष्ठित थे। परन्तु चारुदत्त एक निर्लोभ और अतिशय उदारवृत्ति का है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता। अतः दान देना उसका स्वाभाविक गुण बन गया है। उसका व्यक्तित्व आकर्षक है। वह जितना गुणी है उतना ही सुन्दर। द्वितीय अङ्क में संवाहक वसन्तसेना को जब चारुदत्त का परिचय देता है तो वह कहता है "यस्तादृशः प्रियदर्शनः...... (पृ० १६२)। इसी प्रकार जेल से भागा हुआ आर्यक छिपकर चारुदत्त की गाड़ी में बैठा हुआ उसके सामने पहुँच कर उसको देखता है तो उसके मुख से चारुदत्त की प्रशंसा अचानक निकल पड़ती है—"न केवलं श्रुतिरमणीयो दृष्टिरमणीयोऽपि।" (पृ० ४१८) वसन्तसेना की हत्या के आरोप में जब उसे न्यायालय में बुलाया जाता है तो न्यायाधिकारी उसकी दिव्य आकृति देखकर
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उसके द्वारा हत्यारूपी पाप कर्म होने की सम्भावना ही नहीं करते हैं—‘‘घोणोन्नतं मुखमपाङ्गविशालनेत्रम्’’। (९।१६) वहीं मुकदमें के सन्दर्भ में बुलायी गयी वसन्तसेना की माता जब चारुदत्त को देखती है तो अपनी बेटी के प्रेमसमर्पण से सन्तुष्ट हो जाती है—‘‘अयं स चारुदत्तः। सुनिक्षिप्तं खलु दारिकया यौवनम् । (पृ० ५३३ )
वह अभी यौवनसम्पन्न है। प्रथम अंक में चारुदत्त भ्रमवश जब वसन्तसेना पर चादर फेंक देता है तो वह सुगन्धित चादर सूंघकर कहती है ‘‘अनुदासीनमस्य यौवनं प्रतिभासते।’’ (पृ० ११६) आगे चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को देखकर कहती है ‘‘अनुकृतमनेन पितू रूपम्।’’ (पृ०३७१) उसका शरीर सुकोमल भी है। न्यायालय में सत्य बोलने के लिये न्यायाधिकारी कहते हैं—
‘‘इदानीं सुकुमारेऽस्मिन् निःशंकं कर्कशाः कशाः ।। ९।३६
(२) परम उदार
वह परम उदार है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता। यहाँ तक कि सेंध लगाकर उसके घर में घुस आने वाले चोर का ज्ञान होने पर वह दुखी हो जाता है क्योंकि वह जानता है कि उसके घर में चुराने लायक कुछ भी नहीं है। चोर का परिश्रम व्यर्थ ही हुआ होगा—‘‘सन्धिच्छेदनखिन्न एव सुचिरं पश्चा-न्निराशो गतः।’’ (३।२३) कर्णपूरक जब मत्त हाथी को मार देता है तो उसके पराक्रम से प्रसन्न होकर उसे अंगूठी देना चाहता है किन्तु अंगुली में अंगूठी न होने से वह अपना दुपट्टा ही दे देता है। (‘‘एकेच शून्यान्याभरणस्थानानि परामृश्य ऊर्ध्वं निःश्वस्यायं ममोपरि निक्षिप्तः।’’ (पृ० १७८) पंचम अंक में चेट जब वसन्तसेना के आगमन का समाचार देता है तो वह अति प्रसन्न होकर अपना दुपट्टा दे देता है--‘‘भद्र ! न कदाचित् प्रियवचनं निष्फलीकृतम्, तद्गृह्यतां पारितोषिकम् । ( इत्युत्तरीयं प्रयच्छति । ) (पृ० ३१८)’’
(३) अतिशय दयालु--
चारुदत्त के मन में प्राणिमात्र के लिये दया है। वह किसी को कभी भी कष्ट नहीं देना चाहता है और न किसी को दुखी देखना चाहता है। इस विषय में चेट द्वारा अपने स्वामी के लिये कही गयीं बातें ध्यान देने योग्य हैं--‘‘सुजनः खलु भृत्यानुकम्पकः।’’ (३।२)
चारुदत्त अपनी आराम के लिये किसी को कष्ट देना पसन्द नहीं करता है। इसी लिये देर रात में सोती हुई रदनिका को जगाने का निषेध कर देता है।
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"अलं सुप्तजनं प्रबोधयितुम् ।" (पृ० १९१) ऊपर आराम से बैठे हुये कपोतदम्पती को विदूषक जब मारने के लिये दौड़ता है तो वह रोकता हुआ कहता है "वयस्य ! उपविश, किमनेन, तिष्ठतु दयितासहितस्तपस्वी ।" (पृ० ३१४) दूसरी परम दयालुता उस समय देखने योग्य है जब वह अपनी मृत्यु का जाल रचने वाले शकार को भी मुक्त करा देता है। (पृ० ६४०)
(४) शरणागतरक्षक--
चारुदत्त शरण में आये हुये की रक्षा करने में अपने प्राणों को भी न्यौछावर करने से नहीं डरता है। जब कारागार से भागा हुआ आर्यक छिपा हुआ उसी की गाड़ी से आकर उसके सामने आता है और कहता है--"शरणागतो गोपालप्रकृतिः आर्यकोऽस्मि" यह सुनकर चारुदत्त प्रसन्न होकर उत्तर देता है--
विधिनैवोपनीतस्त्वं चक्षुर्विषयमागतः । अपि प्राणानहं जह्यां न तु त्वां शरणागतम् ॥ ७।६ ॥
शरणागतरक्षण की पराकाष्ठा तब होती है जब षड्यन्त्र रचा कर हत्या के अभियोग में चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिलाने वाला शकार भी उसकी शरण में आकर प्राणरक्षा की भीख मांगता है "तत्कमिदानीमशरणः शरणं व्रजामि ? भवतु तमेवाभ्युपपन्नवत्सलं गच्छामि । आर्य चारुदत्त ! परित्रायस्व, परित्रायस्य ।" चारुदत्त शकार के महापराध को भुला कर कहता है "अहह ! अभयमभयं शरणागतस्य ।" (पृ० ६३६) शर्विलक आदि उस दुष्ट शकार का वध करना चाहते हैं किन्तु चारुदत्त अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। वह कहता है--
शत्रुः कृतापराधः शरणमुपेत्य पादयोः पतितः । शरेण न हन्तव्यः उपकारहस्तस्तु कर्तव्यः ॥१०।५५
वह शकार को मुक्त करा देता है।
(५) सत्यवक्ता
चारुदत्त सत्यभाषण का प्रेमी है। वह हर परिस्थिति में सत्य ही बोलना चाहता है। जब वसन्तसेना के आभूषणों की चोरी हो जाती है और चारुदत्त को इसकी सूचना दी जाती है तब चिन्तित चारुदत्त से विदूषक यह कहता है कि थोड़ा झूठ बोलकर इस कष्ट से बचा जा सकता है। इस पर चारुदत्त उत्तर देता है--"अहमिदानीमनृतमभिधास्ये।"
भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि पुनर्न्यास-प्रतिक्रियाम् । अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारकम् ॥३।२६
भूमिका
३७
वसन्तसेना के गहनों के बदले में जब उसकी पत्नी धूता अपनी बहुमूल्य रत्नावली दे देती है तब प्रसन्न होकर चारुदत्त कहता है ।
विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद् भवान् ।
सत्यं च न परिभ्रष्टं यद्दरिद्रेषु दुर्लभम् ॥ ३।२८
न्यायालय में जब वसन्तसेना की हत्या के लिये उसे अपराधी सिद्ध किया जा रहा है उसी समय शकार के साथ झगड़ा करने वाले विदूषक की कुक्षि से गहने गिर पड़ते हैं। उनके बारे में वह सच ही बोलता है कि ये गहने वसन्तसेना के हैं। (पृ० ५५९) वह झूठ बोलकर अपनी रक्षा नहीं करना चाहता है।
(६) धर्माचारपरायण —
मृच्छकटिक के प्रारम्भ से ही चारुदत्त एक धर्म-कर्मनिरत व्यक्ति के रूप में दिखाई देता है। वह देवी, देवताओं की पूजा और उनके लिये बलिप्रदानादि कार्य में प्रमाद नहीं करता है। उनको नित्य कर्तव्य मानता है। वह सन्ध्यावन्दन और समाधि भी लगाता है। जब विदूषक इसके धर्माचार की आलोचना करता है तब वह कहता है “वयस्य ! मा मैवम्, गृहस्थस्य नित्योऽयं विधिः ।” (पृ० ५२)
तपसा मनसा वाग्भिः पूजिता बलिकर्मभिः ॥१।१६
उसको अपने धर्माचरण पर पूर्ण विश्वास है। दशम अंक में उसे जब मृत्युदण्ड दे दिया जाता है तब भी वह धर्म पर विश्वास नहीं छोड़ता है ।
“प्रभवति यदि धर्मो दूषितस्यापि मेऽद्य ॥१०।३४
(७) प्रतिष्ठाप्रेमी—
चारुदत्त को अपने कुल की और अपनी मान-प्रतिष्ठा का ध्यान सदा रहता है। वह ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहता है जिससे उसकी अथवा उसके वंश की मान-प्रतिष्ठा को धक्का लगता हो । वसन्तसेना के गहनों की चोरी के सम्बन्ध में विदूषक द्वारा झूठ बुलवाये जाने के उत्तर में कहता है — “अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारकम् ।” (३।२६)
जब उस पर वसन्तसेना की हत्या का अपराध सिद्ध हो जाता है तो उसको अपनी मृत्यु का कोई कष्ट नहीं है अपि तु केवल चरित्रपतन का ही है—
“न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः । (१०।२७)
तेनास्म्यकृत-वैरेण क्षुद्रेणात्यल्पबुद्धिना ।
शरेणेव विषाक्तेन दूषितेनापि दूषितः ॥ १०।२८
३८ मृच्छकटिक
प्राप्यैतद्व्यसन - महार्णव - प्रपातं । .........वक्तव्यं यदिह मया हता - प्रियेति ॥ १०।३३
अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये वह एक झूठ भी बोलता है। जब वसन्तसेना के गहनों की चोरी हो जाती है तो वह उन गहनों को जुये में हार जाने की बात वसन्तसेना से कहलवाता है और गहनों के बदले में बहुमूल्य रत्नावली भेजता है। वह जानता है कि सत्य बात जानने पर वसन्तसेना रत्नावली नहीं लेगी। और समाज के लोग उसकी गरीबी के कारण सच घटना पर विश्वास नहीं करेंगे। फलस्वरूप चारों ओर उसकी बदनामी होगी। वह विदूषक से कहता है—
“कः [श्रद्धास्यति भूतार्थं सर्वो मां तुलयिष्यति।” ३।२४ “यं समालम्ब्य विश्वासं न्यासोऽस्मासु तया कृतः। तस्यैतन्महतो मूल्यं प्रत्ययस्यैव दीयते ॥” ३।२६
(८) कलाप्रेमी—गुणग्राही —
वह एक गुणग्राही के रूप में सामने आता है। वह हर अच्छी कला का सम्मान करता है। संगीत के प्रति उसकी विशेष रुचि है। कामदेवायतन उद्यान में इसी प्रसंग में उपस्थित उसको देखकर वसन्तसेना उस पर आकृष्ट हुई थी। उसकी इस आदत से चेट प्रसन्न नहीं है। वह इसे स्वाभाविक दोष मानता है।
“योऽपि स्वाभाविकदोषो न शक्यो वारयितुम् ।” ३।२
वह वीणा को बहुत पसन्द करता है। रेभिल के यहाँ संगीत सुनने के बाद भी वह उसका आनन्दानुभव करता रहता है।
शर्विलक द्वारा लगायी गयी कलापूर्ण सेंध को देखकर उसकी प्रशंसा करने लगता है—‘‘अहो, दर्शनीयोऽयं सन्धिः। कथमस्मिन्नपि कर्मणि कुशलता ?” (पृष्ठ २१७)
(६) आदर्श प्रेमी—
मृच्छकटिक में चारुदत्त को एक उच्च कोटि का आदर्श प्रेमी चित्रित किया गया है। वह एक सर्वश्रेष्ठ परम सुन्दरी गणिका को चाहता है किन्तु प्रेम-व्यवहार के प्रदर्शन में वह गणिका ही पहले कदम उठाती है। चारुदत्त को शकार द्वारा कहलाये गये विदूषक के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि वसन्तसेना उस पर अनुरक्त है "एसा वसन्तसेना कामदेवाअदणुज्जाणादो पहुदि भवन्तमणुरत्ता।" (पृ० ८०) परन्तु वह अपनी निर्धनता से खूब परिचित है। अतः अपने घर आई हुई भी वसन्तसेना को देखकर प्रसन्न होकर भी सोचता है कि मेरा प्रेम मुझ तक ही सीमित रहने वाला है--
भूमिका
यया मे जनितः कामः क्षीणे विभवविस्तरे ।
क्रोधः कुपुरुषस्येव स्वगात्रेष्वेव सीदति ॥ १।५५
आगे जब विदूषक वसन्तसेना के घर जाकर उसे रत्नावली देकर उसके व्यवहार से रुष्ट होकर लौटता है और चारुदत्त से वेश्या-सम्बन्ध तोड़ने को कहता है, तब वह अपनी स्थिति समझता हुआ उत्तर देता है "वयस्य ! अलमिदानीं परीवादमुक्त्वा । अवस्थयैवास्मि निवारितः ।"
वेगं करोति तुरगस्त्वरितं प्रयातुं
... ... ... ... पुनर्विशन्ति ॥ ५।८
यस्यार्थास्तस्य सा कान्ता धनहार्यो ह्यसौ जनः ।
वयमर्थैः परित्यक्ता ननु त्यक्तैव सा मया ॥ ५।६
न्यायालय में जब उसकी मित्रता वसन्तसेना के साथ पूछी जाती है तो वह कुछ लज्जित होकर उत्तर देता है "भो अधिकृताः ! मम मित्रमिति । अथवा यौवन-मत्रापराध्यति ।” (पृ० ५३५ ) वह वसन्तसेना के बिना अपने जीवन को व्यर्थ समझता है । वह मृत्युदण्ड स्वीकार करते हुये कहता है - “न च मे वसन्तसेना-विरहितस्य जीवनेन कृत्यम् ।” (पृ० ५६० )
वह यद्यपि गणिका वसन्तसेना से प्रेम करता है किन्तु अन्यत्र इस विषय में सावधान है। वह स्त्रीलम्पट नहीं है। प्रथम अंक में जब भ्रमवश रदनिका समझकर वसन्तसेना पर अपना दुपट्टा ( अपने पुत्र को उड़ाने के लिये) फेंक देता है तब अन्य स्त्री का ज्ञान होते ही पश्चात्ताप करने लगता है--“न युक्तं परकलत्र-दर्शनम् ।” (पृ० ११८ )
(१०) पत्नी का महत्त्व समझने वाला—
यद्यपि प्रारम्भ से ही वह गणिका वसन्तसेना पर अनुरक्त दिखाई देता है तथापि वह अपनी धर्मपत्नी धूता पर पूरी निष्ठा और अटूट प्रेम रखता है। वह हर समय उसको सम्मान देता है। वह उसका स्थान सदैव ऊँचा समझता है। वसन्तसेना के गहनों की चोरी का समाचार जब धूता को मिलता है तो वह मूर्च्छित हो जाती है। वह अपने पति की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये अपनी बहुमूल्य रत्नावली दे देती है। उसको पाकर पहले चारुदत्त कुछ चिन्तित होता है परन्तु उसी समय अपनी पत्नी की बुद्धिमत्ता को समझते हुये उसके ऊपर गर्व करता हुआ कहता है--
'विभवानुगता भार्या ... ... ... ... ॥ ३।२८
४० मृच्छकटिक
दशम अंक में चारुदत्त के मृत्युदण्ड के समाचार से दुखी धूता के आत्मदाह का समाचार जानकर चारुदत्त घबड़ा जाता है। वह वसन्तसेना को प्राप्त करके भी अपनी धर्मपत्नी का वियोग नहीं चाहता है। वह उसको अकेले स्वर्ग जाना अच्छा नही मानता है।
न महीतलस्थितिसहानि भवच्चरितानि ।
... ... ... ... तव विहाय पतिम् ॥ १०।५६
जब अचानक वहाँ पहुँच कर अपने पुत्र रोहसेन को उठाकर आलिंगन करने लगता है। तब अपनी पत्नी से कहता है--
हा प्रेयसि ! प्रेयसि विद्यमाने
कोऽयं कठोरो व्यवसाय आसीत् ।
अम्भोजिनी - लोचनमुद्रणं किं
भानावदस्तंगमिते करोति ? ॥ १०।५८
(११) पुत्रस्नेहो—
चारुदत्त अपने एकमात्र पुत्र पर अपार स्नेह करता है। प्रथम अंक में वह उसे सायंकालीन शीतल हवा से बचाने के लिये अपना दुपट्टा देता है। (पृ० ११५) आगे नवम अंक में अपनी मृत्यु के पश्चात् अपने समान ही पुत्र से भी प्रेम करने के लिए विदूषक से आग्रह करता है।
नृणां लोकान्तरस्थानां देहप्रतिकृतिः सुतः ।
मयि यो वै तव स्नेहो रोहसेने स युज्यताम् ॥ ९।६२
दशम अंक में मृत्युदण्ड के समय चाण्डालों से पुत्रदर्शन की याचना करता है--"नापरीक्ष्यकारी दुराचारः पालक इव चाण्डालः, तत्परलोकार्थं पुत्रमुखं द्रष्टुमभ्यर्थये।" ( पृ० ५८५-८६ )
अल्प अवस्था वाले पुत्र के हाथों से भविष्य में दिये जाने वाले तर्पणजल के विषय में कहता है--
चिरं खलु भविष्यामि परलोके पिपासितः ।
अत्यल्पमिदमस्माकं निपावोदकभोजनम् ॥ १०।१७
मृत्यु का समय सोचकर ब्राह्मणों का विभूषण, देवकार्य तथा पितृकार्य का उपयोगी साधन 'यज्ञोपवीत' पुत्र को देता है। (१०।१८)
वहीं पुत्र का आलिंगन करता हुआ कहता है--
इदं तत् स्नेहसर्वस्वं सममाढ्यदरिद्रयोः ।
अचन्दनमनोशीरं हृदयस्यानुलेपनम् ॥ १०।२३
भूमिका ४१
पुत्र को शीघ्र ही घर जाने के लिये कहता हुआ सावधान करता है—
आश्रमं वत्स गन्तव्यं गृहीत्वार्यांच मातरम् । मा त्वयि पितृदोषेण त्वमप्येवं गमिष्यसि ॥ १०।३२
(१२) आदर्श मित्र
चारुदत्त एक आदर्श मित्र है । वह अपने हर मित्र के हर सुख-दुःख में साथ देने को तैयार रहता है । वह मित्रता की कसौटी को जानता है ! वह किसी की विपन्नता में मित्रता छोड़ने की निन्दा करता है ।
सत्यं न मे विभवनाशकृतास्ति चिन्ता भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति । एतत्तु मां दहति नष्टधनाश्रयस्य यत्सौहृदादपि जनाः शिथिलीभवन्ति ॥ १।१६
यदा तु भाग्यक्षयपीडितां दशां नरः कृतान्तोपहितां प्रपद्यते । तदास्य मित्राण्यपि यान्त्यमित्रतां चिरानुरक्तोऽपि विरज्यते जनः ॥ १।५३
वह अच्छे मित्र की प्रशंसा करता है । विदूषक को वह एक अच्छा मित्र समझता है । वह कहता है—
'अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः !' ( पृ० ४१ ) ... ...... ...... सुख-दुःख-सुहृद्भवान् ॥ ३।२८
अपने शोक में विदूषक को प्राण छोड़ने से मना करता है ।
(१३) चारुदत्त की निर्धनता
एक अतिसम्पन्न परिवार में जन्म लेने पर भी अनवरत दान करने के कारण चारुदत्त बहुत अधिक निर्धन हो चुका है । अपनी निर्धनता से उसे कभी-कभी बहुत अधिक मानसिक क्लेश होता है । उसने अपनी निर्धनता में जो अनुभव किये हैं उन्हें सभी को बताना चाहता है । इस सम्बन्ध में प्रथम अंक के ९, १०, ११, १२, १३, १५, और ५३, पंचम अंक के ४०, ४१, ४२, श्लोक ध्यान देने योग्य हैं ।
(१४) भाग्यवादी
चारुदत्त कर्म की अपेक्षा भाग्य पर अधिक विश्वास करता है । इसीलिये सम्भवतः वह निर्धन होता चला जाता है । वह धनादि की प्राप्ति और हानि को भाग्याधीन ही मानता है ।
"भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति ।" १।१३
४४ मृच्छकटिक
चारुदत्त से स्वयं मिलने के लिये आई हुई वसन्तसेना के विषय में विट का यह कहना महत्त्वपूर्ण है—
अपद्मा श्रीरेषा प्रहरणमनङ्गस्य ललितं,
कुलस्त्रीणां शोको, मदनवरवृक्षस्य कुसुमम्।
सलीलं गच्छन्ती, रतिसमयसज्जा-प्रणयिनी,
रतिक्षेत्रे रङ्गे प्रियपथिक-सार्थैरनुगता ॥ ५।२२
अष्टम अंक में शकार द्वारा वसन्तसेना का गला दबा दिये जाने पर उसकी मृत्यु से दुखी विट कहता है—
दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता याता स्वदेशं रति-
र्हा हालङ्कृतभूषणे सुवदने क्रीडारसोद्भासिनि।
हा सौजन्यनदि प्रहासपुलिने हा मावृशामाश्रये
हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ८।३८
वह आगे शकार से कहता है—
अपापा पापकल्पेन नगरश्रीनिरपातिता । ८।३६
(२) वेश्या की अपेक्षा गणिका का वैशिष्ट्य
वेश्या शब्द सामान्यतया प्रयुक्त होता है परन्तु गणिका शब्द का प्रयोग सम्मानित तथा उच्चस्तरीय वेश्या के लिये होता है। यहाँ वसन्तसेना को गणिका के रूप में चित्रित किया गया है।
(३) अतुल वैभवशाली
वसन्तसेना उज्जायिनी की एक अतुल वैभव-सम्पन्न गणिका है। चतुर्थ अंक में विदूषक ने उसके भवनों और उनमें विद्यमान पदार्थों का वर्णन करते हुए उसे कुबेर भवन का अंश कहा है। (द्र० यत्सत्यं स्वर्गायत इदं गेहम्। ... यत्सत्यं खलु नन्दनवनमिव मे गणिकागृहं भासते। ......... किं तावद् गणिकागृहम्, अथवा कुवेरभवनपरिच्छेद इति ।) (पृ० २५२)
उसे धन की लिप्सा नहीं है। जब शकार द्वारा भेजी गयीं दश सहस्र मुद्राओं के कारण उसकी माता उसे शकार के पास जाने के लिये आदेश देती है तो वह तत्काल अस्वीकार कर देती है।
“यदि मां जीवन्तीमिच्छसि, तदैवं पुनरहं न मात्राऽऽज्ञापयितव्या ।” (पृ० २३५)
भूमिका
४५
प्रथम अंक में जब विट उसे वेश्या होने के कारण सभी की सेवा में उपस्थित होने का परामर्श देता है तो वह शकार को ठुकराती हुई कहती है—
"गुणः खल्वनुरागस्य कारणम्, न पुनर्बलात्कारः।" (पृ० ८०)
अष्टम अंक में जब गाड़ी बदल जाने के कारण वह शकार के उद्यान में पहुँच जाती है तब उसे देखकर विट कहता है—
'पूर्वं मानाववज्ञाय द्रव्यार्थे जननन्तेवशात्।' (८।१७)
यह सुनकर वह तुरन्त सिर हिलाकर निषेध करती है—"न"।
(४) निर्लोभता
गणिका होने पर भी वसन्तसेना में लोभ नहीं है। वह धन की चिन्ता नहीं करती है। द्वितीय अंक में जब मदनिका चारुदत्त के साथ उसका प्रेम जानती है तब वह कहती है—"दरिद्रः खलु सः श्रूयते।" इस पर वसन्तसेना तत्काल उत्तर देती है—
"अत एव काम्यते। दरिद्रपुरुषसंक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति। (पृ० १३३)
चतुर्थ अंक में विदूषक के मुख से चारुदत्त द्वारा गहनों का जुए में हारना मालूम होता है। इसके बदले में उसे रत्नावली प्राप्त होती है। परन्तु इसके पूर्व वह शर्विलक के हाथ से चुराये गये अपने आभूषण प्राप्त कर चुकी है। अतः वह उदारता देख कर चारुदत्त पर और अधिक आकृष्ट हो जाती है "कथं चौरैरपहृतमपि शौण्डीरतया द्यूते हारितमिति भणति। अत एव काम्यते।" (पृ० २६५) शकार द्वारा भेजी गयी दश हजार मुद्राओं को वह बिना किसी सोच-विचार के ठुकरा देती है। वह गहनों के बदले में पाई हुई रत्नावली को वापस देने के लिए स्वयं जाती है। और चारुदत्त की धर्मपत्नी धूता के पास विनयपूर्वक भेजती है कि उसे लेकर उस पर अनुग्रह करें।
द्वितीय अंक में जुआ में कर्ज लेकर हारा हुआ संवाहक जब उसके पास पहुँचता है और पीछे-पीछे कर्जदार। वह संवाहक को चारुदत्त का सेवक जानकर तत्काल सोने के कड़े भिजवा कर उसे ऋणमुक्त करा देती है।
शर्विलक चोरी करने के बाद जब मदनिका को प्राप्त करने की इच्छा से वसन्तसेना के पास जाता है। वह मदनिका से पूछता है कि क्या तुम्हारी स्वामिनी धन लेकर तुम्हें मुक्त कर देगी। तब वह जवाब देती है कि स्वामिनी का वश चले
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तो वह बिना धन के सभी को मुक्त कर दें—‘‘यदि मम छन्दस्तदा विनाऽर्थं सर्वं परिजनमभुजिष्यं करिष्यामि।’’ (पृ० २४१-४२)
उसकी निर्लोभता और वात्सल्य पर ही इस नाटक (प्रकरण) की आधार-शिला है। षष्ठ अंक में जब दासी चारुदत्त के पुत्र को मिट्टी की गाड़ी से खिलाना चाहती है किन्तु वह पड़ोसी के लड़के की सोने की गाड़ी से ही खेलने की जिद करता है। तब वसन्तसेना उसे देख कर अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं कर पाती है। वह उस बच्चे की मार्मिक बातें सुन कर तत्काल अपने गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इन गहनों से अपनी गाड़ी बनवा कर खेलो। (पृ० ३७३)
(५) अतिप्रतिभाशाली
वसन्तसेना एक अति प्रतिभासम्पन्न गणिका है। उसे विविध कलाओं का अच्छा ज्ञान है। वह किसी बात का तात्पर्य समझने में अति कुशल है। प्रथम अंक में जब शकारादि से घिर जाती है और विट रहस्यमय ढंग से कुछ कहता है तो वह उसका आशय समझ कर तदनुसार आचरण करती है। अपनी माला और पैर के नूपुर हटा देती है। चारुदत्त के पास गहने धरोहर रखने के लिये भी वह अकाट्य तर्क देती है ‘‘पुरुषेषु न्यासा निक्षिप्यन्ते न पुनर्गेहेषु।’’ (पृ० १२१) द्वितीय अंक में मदनिका के साथ चारुदत्त के विषय में बातचीत करती हुई भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाती है। चतुर्थ अंक में शर्विलक और मदनिका की गुप्त बातें सुनकर वह तत्काल उसका आशय समझ लेती है। और इसीलिये शर्विलक द्वारा गहने दिये जाने पर वह उसे उसके बदले में मदनिका देती हुई अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करती है—‘‘अहमार्यचारुदत्तेन भणिता य इममलङ्कारकं समर्पयिष्यति तस्य त्वया मदनिका दातव्या। तत् स एवैतां ते ददातीत्यार्येणावगन्तव्यम्।’’ (पृ० २६३-६४) पंचम अंक में जब चारुदत्त के पास अभिसार के लिये जाती है तो मार्ग में विट द्वारा मेघों का वर्णन सुनकर स्वयं भी उसी स्तर का वर्णन करने लगती है। वहाँ का वर्णन गंभीर और प्रभावोत्पादक है। संस्कृतभाषा का प्रयोग करती है। (द्र० ५।१५, १६, १८, २०) चारुदत्त से अकेले मिलने के लिये बड़ी चतुरता से छत्रधारिणी को विट के पास ही रहने देती है, जिससे विट कहने लगता है—‘‘अनेनोपायेन निपुणं प्रेषितोस्मि।’’ (पृ० ३४५) षष्ठ अंक में जब चारुदत्त के भवन के भीतर अपने को देखती है तब अपने को गणिका होने से वह प्रवेश की अपराधिनी समझ कर कहती है कि क्या मेरे आने से चारुदत्त के परिजनों को सन्ताप हो रहा है? (पृ० ३६६) आगे रदनिका के साथ लाये गये चारुदत्त के पुत्र के साथ बातचीत करते समय बालक की मार्मिक बातें सुनकर उनका आशय समझ कर तत्काल अपने गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इनसे गाड़ी बनवाकर खेलो। (पृ० ३७३)
भूमिका ४७
अष्टम अंक में जब गाड़ी बदल जाने के कारण शकार के पास पहुँच जाती है और विट इससे अप्रसन्न होकर कुछ कहता है तो उसके प्रश्नों का उत्तर बड़ी कुशलता से देती है । पंचम अंक में विट ने उसकी कलाभिज्ञता स्पष्ट कही है—
'सकलकलाभिज्ञायाः न किंचिदपि उपदेष्टव्यमस्ति ।' (पृ० ३४२)
(६) चारुदत्त से अटूट प्रेमभावना
कामदेवायतन उद्यान में जब से चारुदत्त को देखा है तभी से वह उस पर आसक्त हो जाती है । वह हर मूल्य पर चारुदत्त को पाना चाहती है । प्रथम अंक से ही शकार की बातों से उसका चारुदत्त के साथ प्रेम-सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है । उसके इस प्रेम के लिये जब शकारादि उससे कहते हैं तो वह अपने को गर्वान्वित समझती है । जुआ में हार कर कर्जदार बना हुआ संवाहक जब उसके पास आता है तब वह उसे चारुदत्त का सेवक जानकर बहुत प्रसन्न होती है और स्नेहभाव प्रदर्शित करके सोने के कड़े भिजवा कर उसे ऋणमुक्त करा देती है । वहीं मदनिका से बात करती हुई चारुदत्त के साथ अपने प्रेमसम्बन्ध को प्रकट कर देती है । जब मदनिका चारुदत्त की निर्धनता का संकेत करती है तो वह जवाब देती है--“अत एव काम्यते । दरिद्र-पुरुष-संक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति ।” (पृ० १३३)
प्रथम अंक में जब चारुदत्त भ्रम से उस पर अपना दुपट्टा डाल देता है और वास्तविकता प्रकट होने पर अपने कृत्य के लिये खेद प्रकट करता है । तब वह अपने मन में इसे अच्छा समझती हुई हर्ष प्रकट करती है । कर्णपूरक को प्राप्त हुआ दुपट्टा जब उसे मिलता है, उसमें चारुदत्त का नाम पड़ती है तो आनन्द से तत्काल ओढ़ लेती है । वह अपने गहने भी इसी लिये चारुदत्त के पास धरोहर रखती है कि उस कारण उसे उससे अधिक मिलने का अवसर प्राप्त होता रहेगा । चारुदत्त द्वारा विदूषक के हाथों भिजवायी गई रत्नमाला वापस देने के लिये स्वयं ही आती है । वह गहनों की चोरी की घटना की सारी बातें कहने के बाद विदूषक के मुख से वर्षा का ज्ञान प्राप्त करके शृंगारभाव प्रकट करती हुई पहले स्वयं ही आलिंगन करती है । यह उसके प्रबल अनुराग का स्पष्ट उदाहरण है । वह प्रेम में गुण को प्रमुख कारण मानती है—“गुणः खल्वनुरागस्य कारणम्, न पुनर्बलात्कारः ।” (पृ० ८०) इसी लिए अति सम्पन्न राजश्यालक द्वारा प्रेषित विपुल धनराशि को ठुकरा कर निर्धन जानते हुए भी चारुदत्त से विशुद्ध प्रेम करती है । गाड़ी बदल जाने से भ्रमवश जब शकार के सामने पहुँच जाती है और बलपूर्वक प्रेम करने को बाध्य की जाती है तब भी वह मृत्यु की चिन्ता नहीं करती है और
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चारुदत्त के साथ ही प्रेम कहती रहती है। इसी कारण क्रुद्ध होकर शकार उसका गला दबा कर मार डालता है। दशम अंक में जब अपनी हत्या के अपराध में चारुदत्त के मृत्युदण्ड का ज्ञान होता है तब अपनी पूरी शक्ति लगा कर दौड़ती हुई आकर उसे मृत्युदण्ड देने से रोकती है और चारुदत्त के वक्षस्थल पर गिर जाती है। उसके इस प्रबल प्रेम के कारण ही नया राजा बना ‘आर्यक’ उसे चारुदत्त की वधू बना देता है––
“आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं बधूशब्देनानुगृह्णाति ।” (पृ० ६४७)
(७) धूता के प्रति आदरभावना
वसन्तसेना अपनी सामाजिक मर्यादा के प्रति सदैव सावधान रहती है। वह जब सबसे पहले चारुदत्त के घर अचानक पहुँचती है और उन लोगों द्वारा पहचान ली जाती है तब वह अपराध समझकर क्षमायाचना करने लगती है––
“एतेनानुचितभूमिकारोहणेनापराद्धयं शीर्षेण प्रणम्य प्रसादयामि ।” (पृ० १२१)
जब उसके गहनों की चोरी के बदले में चारुदत्त अपनी पत्नी धूता की बहुमूल्य रत्नावली उसके पास भेजता है तब वह उसे स्वीकार तो कर लेती है जिससे चारुदत्त के मन को ठेस न पहुँचे। परन्तु धूता के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए स्वयं वापस लौटाने जाती है और वह उस रात में उसके घर रहती है। प्रातः काल चेटी द्वारा धूता के पास रत्नावली भेजती हुई कहती है––
“चेटि ! गृहाणैतां रत्नावलीं मम भगिन्या आर्यधूतायै गत्वा समर्पय । वक्तव्यं च––‘अहं श्रीचारुदत्तस्य गुणनिर्जिता दासी तदा युष्माकमपि । तदेषा तवैव कण्ठाभरणं भवतु ।’” (पृ० ३६५)
इससे धूता के प्रति उसकी अतिशय सम्मानभावना प्रकट होती है। दशम अंक में अग्निप्रवेश के समय जब वह धूता के पास पहुँचती है और चारुदत्त को जीवित देखकर धूता अपना अग्निदाह रोक देती है, वसन्तसेना को साथ में देखकर कहती है “दिष्ट्या कुशलिनी भगिनी ।” तब वसन्तसेना कहती है “अधुना कुशलिनी संवृत्तास्मि ।” (पृ० ६४७) वह चारुदत्त से प्रगाढ़ प्रेम करती हुई भी धूता के प्रति सदैव सम्मान-भावना और सद्भाव रखती है।
(८) रोहसेन के प्रति वात्सल्य
वसन्तसेना गणिका होने के कारण सन्तानसुख से वंचित है। परन्तु उसके मन में स्त्रीसुलभ मातृत्व विद्यमान है। प्रथम अंक में वह चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को जान लेती है। षष्ठ अंक में रदनिका जब गोद में लेकर उसे वसन्तसेना के पास लाती है, तब उसको रोता हुआ देख कर उसके बारे में पूछती है––
“रदनिके ! स्वागतं ते, कस्य पुनरयं दारकः अनलंकृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति माम् ।”
भूमिका ४९
(पृ० ३७१) जब रदनिका उसे चारुदत्त का पुत्र बतलाती है तब उसका स्नेह उमड़ पड़ता है। वह हाथ फैलाकर कहती है- "एहि मे पुत्रक! आलिङ्ग।" यह कहकर गोद में उठा लेती है। चारुदत्त के समान सुन्दर रूप देखकर मुग्ध हो जाती है। पूछे जाने पर अपना परिचय देती है "ते पितुर्गुणनिर्जिता दासी।" वहाँ बालक की भोली भाली किन्तु मार्मिक बातें सुनकर उसका हृदय द्रवित हो जाता है। वह अति भावुक होकर बोलती है- "जात! मुग्धेन मुखेनातिकरुणं मन्त्रयसि।" वह तत्काल बालक की इच्छा पूरी करने के लिये अपने सभी गहने उतार कर दे देती है और कहती है- "एषेदानीं ते जननी संवृत्ता। तद्गृहाणैतमलंकारम्, सौवर्ण-शकटिकां कारय।" (पृ० ३७३) यहाँ मिट्टी की गाड़ी के बदले सोने की गाड़ी से खेलने की जिद पूरी करती है। इसी घटनाचक्र पर यह नाटक (प्रकरण) केन्द्रित है।
(६) धर्माचरण में प्रवृत्ति
गणिका होने पर भी वह सामान्यतया नित्य स्नान और देवतार्चन आदि करती है। द्वितीय अंक में जब माता की आज्ञा होती है कि स्नान करके देवताओं की पूजा सम्पन्न करो। तब उद्विग्नचित्त होने से वह कह देती है- "चेटि! विज्ञापय मातरम् अद्य न स्नास्यामि। तद् ब्राह्मण एव पूजां निर्वर्तयतु।" (पृ०१२९)
(१०) उपसंहार
इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि मृच्छकटिक में वसन्तसेना एक अनुपम सुन्दरी, नवयौवना गणिका के रूप में चित्रित होने पर भी वह अति उदार, सरल, भावुक, बड़ों का सम्मान करने वाली, छोटों पर स्नेह करने वाली, सभी के सुख, दुःख को समझने वाली, पवित्र प्रेम की उपासिका और कुलीन स्त्री के समान आचरण करने का प्रयास करने वाली है। गणिका होने पर भी उसे धन की लिप्सा नहीं है। उसका व्यवहार सभी को प्रभावित करने वाला है। उसका एक-मात्र दोष है गणिका होना, इसी कारण शकार द्वारा चाही जाने पर भी जब उसे नहीं स्वीकार करती है और वह गला दबाकर मार डालता डालता है तब शोकातुर विट कहता है-
"अन्यस्यामपि जातौ मा वेश्या भूस्त्वं हि सुन्दरि।
चारित्र्यगुणसम्पन्ने जायेथाः विमले कुले ॥८।४३
उसी अवसर पर विट के निम्न वचन भी ध्यान देने योग्य है-
दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता, याता स्वदेशं रति-
र्हा ह्यलंकृतभूषणे, सुवदने, क्रीडारसोद्भासिनि।
मृ० भू०-४
५० मृच्छकटिक
हा सौजन्यनदि, प्रहासपुलिने, हा मादृशामाश्रये,
हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ८।३८
शकार
मृच्छकटिक का चारुदत्त यदि गुणों का निधि है तो शकार अवगुणों की खान । भरत के अनुसार शकार का लक्षण —
उज्ज्वलवस्त्राभरणः कुप्यत्यनिमित्ततः प्रसीदति च ।
अधमो मागधभाषी शकारो बहुबुद्धिमान् ॥
साहित्यदर्पणकार ने जो लक्षण लिखा है वह मृच्छकटिक के शकार को लक्ष्य में रख कर ही किया है—
मदमूर्खताभिमानी दुष्कुलतैश्वर्यसंयुक्तः ।
सोऽयमनूढाभ्राता राज्ञः श्यालः शकार इत्युक्तः ॥ सा० द० ३।५४
मृच्छकटिक के शकार का आचरण देखते ही इसकी नीच कुलोत्पत्ति का ज्ञान हो जाता है। यह राजा पालक की रखैल स्त्री का भाई है। अतः इसे राजा का साला होने का बड़ा घमण्ड है। अपने इस सम्बन्ध का दुरुपयोग करने में यह कभी भी नहीं हिचकिचाता है।
प्रथम अंक में विट इसे ‘काणेलीमातः’ कह कर बुलाता है। विदूषक भी इसी प्रकार ‘काणेलीपुत्र’ ‘कुट्टिनीसुत’ आदि गर्हित शब्दों से ही बुलाता है। यह वसन्तसेना को प्राप्त करने के लिये सभी प्रकार के प्रयास करता है किन्तु विट को यह अच्छा नहीं लगता है। अपने लोगों से घिरी हुई वसन्तसेना को विट सांकेतिक शब्दों में भागने का परामर्श देता है। किन्तु जब वसन्तसेना घिर जाती है तब शकार अपने को ‘वर-पुरुष-मनुष्य वासुदेव’ कहकर आत्मप्रशंसा करता हुआ वसन्तसेना को प्रभावित करना चाहता है।
वास्तव में यह महामूर्ख है परन्तु अपनी बहुज्ञता प्रकट करने के लिये अनेक असंगत पौराणिक बातें कहा करता है। (पृ० ७२, ४९६) इसकी अनर्गल बातों से दर्शकों का मनोरंजन होता है।
यह अत्यन्त डरपोक है किन्तु अपनी बहादुरी की डींग हांकता रहता है। स्त्रियों को मारने में अपनी शूरता मानता है। प्रथम अंक में जब वसन्तसेना अपनी परिचारिकाओं को बुलाती है तो यह मनुष्य का आना समझ कर डर जाता है किन्तु जब स्त्री का आना मालूम पड़ता है तब कहता है—“स्त्रीणां शतं मारयामि ।
भूमिका ५१
शूरोऽहम् ।” ( पृ० ७२ ) प्रथम अंक में जब विदूषक से क्षमा मांग कर विट चला जाता है। तब यह भी भय-वश जाने लगता है—“तच्छीत्र-मपक्रमावः ।” ( पृ० १३३ )
अष्टम अंक के प्रारम्भ में यह बौद्ध भिक्षु को पीटता हैं। इससे बौद्ध धर्म में इसकी अनास्था प्रतीत होती है ।
यह सुरीले कण्ठ का गायक नहीं है किन्तु अपने मधुर कण्ठ की खूब प्रशंसा करता है । ( देखिये श्लोक—८।१३-१४ )
इसके मूर्खतापूर्ण आचरण का एक अच्छा उदाहरण अष्टम अंक में है। जब स्थावरक चेट गाड़ी ले आने की सूचना देता है तब यह चहारदीवारी को पार कर ही गाड़ी ले आने की जिद करता है । ( पृ० ४५३ ) इसे गाड़ी टूटने, बैल मरने और स्थावरक के मरने की कोई चिन्ता नहीं होती है ।
जब वसन्तसेना के आने का ज्ञान होता है तो अपनी प्रशंसा करने लगता है—“'भाव, भाव ! मां प्रवरपुरुषं मनुष्यं वासुदेवकम् । ... ... तेन ह्यपूर्वा श्रीः समासादिता । तस्मिन् काले मया रोषिता साम्प्रतं पादयोः पतित्वा प्रसादयामि ।” ( पृ० ४५३ )
किन्तु वसन्तसेना इसकी प्रार्थना नहीं सुनती है और प्रसन्न होने की अपेक्षा इसे पैर से मार देती है। तब यह क्रुद्ध होकर उसको मार डालने की धमकी देता है। पहले तो विट और चेट से मारने के लिये कहता है किन्तु उनके इनकार कर देने पर स्वयं गला दबाकर मार डालता है। विट द्वारा पूछे जाने पर अपने इस पाप कृत्य की प्रशंसा करने लगता है। और इसी सन्दर्भ में स्वयं ले जाकर मृत वसन्त-सेना को दिखाता है। जब इस पाप कर्म को विट पर मढ़ना चाहता है तब विट अपनी तलवार खींच लेता है। जिससे यह डर जाता है और बहाना करने लगता है।
इसको स्वर्ग, नरक की चिन्ता नहीं है। मूर्ख होने पर भी इसने बड़ी चतुराई के साथ वसन्तसेना की हत्या का आरोप चारुदत्त पर लगाने में सफलता प्राप्त की। वसन्तसेना द्वारा की गयी उपेक्षा के कारण इसने उसकी हत्या करने में संकोच नहीं किया। साथ ही, उसके प्रेमी चारुदत्त को भी मृत्युदण्ड दिलवा दिया। इसकी निर्दयता असीम है। जब चारुदत्त को मृत्युदण्ड के लिये ले जाया जा रहा था उस समय में उसका पुत्र रोहसेन विदूषक के साथ वहाँ आया था। यह उस पुत्र के साथ ही चारुदत्त के मृत्युदण्ड का आदेश दे देता है—“सपुत्रमेवैतं मारय ।”
५२ मृच्छकटिक
(पृ० ६०६) अपने षड्यन्त्र में सफल होने से प्रसन्न होता है और अपने सामने ही चारुदत्त का वध देखना चाहता है। “तत् प्रेक्षिष्ये, शत्रुविनाशो नाम मम महान् हृदयस्य परितोषो भवति । श्रुतं च मया, यो हि किल शत्रुं व्यापाद्यमानं पश्यति तस्य अन्यस्मिन् जन्मान्तरे अक्षिरोगो न भवति ।” (पृ० ६०१)
अपने पद के दुरुपयोग में यह कभी नहीं चूकता है। नवम अंक में इसके मुकदमा की सुनवाई के लिये न्यायाधिकारी आनाकानी करते हैं तब यह उनके स्थानान्तरण की धमकी देता है जिससे डर कर वे लोग उसी दिन इसका मुकदमा विचार के लिए ले लेते हैं। इससे यह मन में बहुत प्रसन्न होता है कि अब भयभीत न्यायाधिकारियों से अपनी हर बात मनवा लूंगा । “ही, प्रथमं भणन्ति न दृश्यते, सांप्रतं दृश्यते इति । तन्नामा भीतभीता अधिकरणभोजकाः, यद्यदहं भणिष्यामि तत्तत्प्रत्याययिष्यामि ।” (पृ० ५१४)
यह चारुदत्त का अपमान करने का निश्चय कर चुका है। न्यायालय में उसको दिये गये आसन का विरोध करता है। और उसे आसन से उतरवा कर जमीन पर बैठवा देता है ।
यह बड़ा कायर है । दशम अंक में जब वसन्तसेना आ जाती है। सारी सत्यता प्रकट हो जाती है। लोग शकार को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं तब यह भाग जाता है। उसी बीच राजपरिवर्तन हो जाता है। और यह पकड़ लिया जाता है। शर्विलक इसको दण्डित करने के लिये कहता है। वहाँ यह अपनी मूर्खता प्रकट करता हुआ वसन्तसेना से कहता है—“गर्भदासि ! प्रसीद प्रसीद, न पुनर्मार-यिष्यामि ।” (पृ० ६३८) किन्तु अपने को असहाय देखकर यह चारुदत्त की ही शरण में जाना उचित समझता है और तत्काल चारुदत्त की शरण में चला जाता है और अपने प्राणों की रक्षा की प्रार्थना करता है। (पृ० ६३७)
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि शकार एक दुष्ट, धूर्त, मूर्ख और घमण्डी पात्र है। यह मूर्खता और कुटिलता की मूर्ति है। किन्तु यह अपने इन व्यवहारों से दर्शकों को प्रभावित कर लेता है। आज के खलनायक के दृष्टिकोण से इसका चरित्र उत्कृष्ट कोटि का माना जा सकता है।
विदूषक
मृच्छकटिक में विदूषक का नाम मैत्रेय है। यह निकृष्ट ब्राह्मणकुल का है। द्वितीय अंक में रात में पैर धोने के प्रसंग में यह अपना परिचय देता है—“यथा नागानां मध्ये डडुभस्तथा सर्वब्राह्मणानां मध्येऽहं ब्राह्मणः ।” (पृ० १६१) यह
भूमिका <span style="float: right;">५३</span>
पेटू है। हर समय खान-पान की चिन्ता करता है। चारुदत्त की सम्पन्नता में यह विविध व्यंजनों का आनन्द लिया करता था। उनकी याद करके दुखी हो जाता है। (पृ० ३६) चतुर्थ अंक में वसन्तसेना का वैभव देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है। किन्तु उसके द्वारा किये गये केवल मौखिक सत्कार से सन्तुष्ट नहीं होता है। यह चारुदत्त से शिकायत करता है—"एतावर्त्या ऋद्धया न तयाऽहं भणितः—आर्य मैत्रेय ! विश्रम्यताम्, मल्लकेन पानीयमपि पीत्वा गम्यताम् ।" (पृ० ३०६)
यह भीतर से बड़ा डरपोक है। जब चारुदत्त इसे चौराहे पर बलिसमर्पण के लिये जाने को कहता है तब सायंकाल अकेले जाने में डरता है और इसी लिये इन्कार कर देता है। फिर रदनिका को साथ लेकर जाना स्वीकार करता है। प्रथम अंक में ही जब चारुदत्त वसन्तसेना के साथ जाने के लिये कहता है तब भी यह अस्वीकार कर देता है। (पृ० १३३) जब चारुदत्त चलने लगता है तब यह उसका साथ देता है।
तृतीय अंक में वसन्तसेना के स्वर्णाभूषणों का भाण्ड रखने में यह डरता है किन्तु विवश होकर रखता है।
इसे धर्माचारण में रुचि नहीं है। यह देवी-देवताओं की पूजा आदि में विश्वास नहीं करता है। यह ऐसा मानता है कि इस पूजा पाठ का कोई फल नहीं है। क्योंकि नियमपूर्वक पूजा पाठ करने वाला चारुदत्त क्यों विपत्ति में पड़ जाता है। (पृ० ५२)
यह कभी-कभी बड़ी मूर्खता दिखाता है। जब वसन्तसेना के आगमन के समय विट इसे कुछ प्रश्न देता है तो यह उनका उत्तर नहीं कह पाता है और बार-बार चारुदत्त की सहायता लेता है। (पृ० ३१६) यह मजाकिया स्वभाव का है। प्रथम अंक में जब वसन्तसेना चारुदत्त के घर में अपने प्रवेश के लिए क्षमायाचना करती है, दूसरी ओर उसके साथ दासी के समान व्यवहार करने के कारण चारुदत्त भी क्षमायाचना करता है। इस विचित्र स्थिति में यह विदूषक दोनों के सामने हाथ जोड़कर दोनों से क्षमायाचना का सुन्दर अभिनय करता है। (पृ० १२१)
इसे वेश्यासम्पर्क अच्छा नहीं लगता है। इसी कारण यह चारुदत्त से भी वेश्या का सम्पर्क तोड़ने का आग्रह करता है। (पृ० ३०६) यह वेश्यासम्पर्क को बहुत बड़ा प्रत्यवाय मानता है। इसकी दृष्टि में वेश्यामात्र कुटिल होती है। यह वसन्तसेना को भी एक साधारण वेश्या ही समझता है—"सुष्ठूपलक्षितं दुष्टविलासिन्या।" (पृ० २९६) जब वसन्तसेना के भवन में बन्धुलों [जारजसन्तानों] को बहुत