भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ३१

इसी बीच रेभिल द्वारा यह जानकर कि चारुदत्त को न्यायालय में बुलाया गया है विदूषक चिन्तित हो जाता है। वह वसन्तसेना के गहने देने के पहले न्यायालय चल पड़ता है। वहाँ शकार के साथ उसका वाद-विवाद बढ़ जाता है। और मार पीट होने लगती है जिससे विदूषक के पास रखे हुये वसन्तसेना के गहने जमीन पर गिर पड़ते हैं। शकार घबड़ा कर उन गहनों को उठा कर दिखाता है और कहता है कि इन गहनों के कारण ही चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध किया है।

उन गहनों को देखकर चारुदत्त यह स्वीकार करता है वे गहने वसन्तसेना के ही हैं। परन्तु वह यह नहीं बता पाता कि वे गहने वसन्तसेना से अलग कैसे हुये। गहनों को देखकर न्यायाधिकारी और अधिक चिन्तित हो जाते हैं। और चारुदत्त से सब सच-सच बोलने की कहते हैं। चारुदत्त कहता है कि मैं निष्पाप लोगों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ और मैं स्वयं भी निरपराध हूँ किन्तु यदि मुझ पर पाप की सम्भावना की जाती है तो मेरे निष्पाप होने से भी क्या लाभ ? वह सोचने लगता है कि वसन्तसेना से रहित उसका जीवन व्यर्थ है। न्यायाधिकारी चारुदत्त को अपराधी घोषित करके राजा 'पालक' के पास दण्डनिर्णय के लिये भेजते हैं और अपनी सम्मति देते हैं कि यह चारुदत्त ब्राह्मण है। अतः इसे मृत्युदण्ड न देकर धनसहित राज्य से बाहर कर दिया जाय। परन्तु राजा 'पालक' कठोर दण्ड की आज्ञा देता है कि इन्हीं गहनों के साथ ही इसको दक्षिणश्मशान ले जाकर शूली पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड दे दिया जाय। जिससे कोई भी दूसरा ऐसे पाप कर्म का साहस न कर सके। दण्ड सुनकर चारुदत्त दुखी हो जाता है। वह विदूषक से कहता है कि मुझे प्रिय बेटा रोहसेन का मुख दिखा दो। वह अविवेकी राजा पालक को मृत्युदण्ड देने के लिये कोसने लगता है।

दशम अङ्क—

दशम अङ्क के प्रथम दृश्य में दो चाण्डाल चारुदत्त को वधस्थान की ओर ले जाते हुये दिखाई देते हैं। चारुदत्त को मृत्युदण्ड की वेशभूषा पहना दी गई है। मार्ग में अपार भीड़ चारुदत्त को देखने के लिये खड़ी है। चाण्डाल लोगों को हटा रहे हैं और चारुदत्त का वध न देखने का परामर्श दे रहे हैं। महलों में झरोखों से स्त्रियाँ भी दुखी होकर आंसू गिरा रही हैं। चाण्डाल चारुदत्त के कुल गोत्र का परिचय देते हुये उसके अपराध और मृत्युदण्ड की घोषणा करते हैं। उसे सुन कर चारुदत्त बहुत दुःखी हो जाता है। उसी समय विदूषक चारुदत्त के पुत्र को लेकर वहाँ आ जाता है। वह लड़का अपने पिता को देखने के लिये रोने लगता है।