भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

भूमिका

ग्रीक नाटकों में (१) स्थानान्विति, (२) कालान्विति और (३) कार्यान्विति प्राप्त होतीं हैं। परन्तु संस्कृत नाटकों में केवल 'कार्यान्विति' पर बल दिया जाता है। ग्रीक नाटकों में 'कोरस' [ एक साथ गाने नाचने वालों की टोली ] का महत्त्व है। जब कि संस्कृत नाटकों में इसका अभाव है। अकेला सूत्रधार ही नान्दीपाठ के बाद नाटक प्रारम्भ करा देता है।

रंगमंच की दृष्टि से भी दोनों में बहुत अन्तर है। ग्रीक (यूनान) में नाटकों को खुले आसमान में सामान्य जनता के लिये खेला जाता था। जब कि संस्कृत नाटक प्रारंभिक काल से ही कलात्मक प्रेक्षागृहों में खेले जाते थे। इनके निर्माण की दक्षता की जानकारी प्राचीन काल से ही मिलती है। संस्कृत नाटकों का उद्देश्य केवल मनोरंजन कराना ही नहीं है, साथ-साथ शिक्षा देना भी रहा है। इसी प्रकार के ऐसे अनेक अन्तर हैं जो संस्कृत नाटकों पर ग्रीकप्रभाव का खण्डन करते हैं।$^१$ अतः संस्कृत नाटकों पर ग्रीकप्रभाव मानना अनुचित और अप्रामाणिक है।

संस्कृत में काव्य को सामान्यरूप से दो भेदों में बांटा गया है—(क) दृश्य और (ख) श्रव्य।$^२$ श्रव्य की अपेक्षा दृश्य का महत्त्व अधिक है। रंगमंच पर जिनका अभिनय करना संभव होता है उन्हें 'दृश्य' काव्य कहते हैं। इसके दो भेद होते हैं—(क) रूपक और (ख) उपरूपक। रूपक को रस, भाव, आदि का आश्रय माना जाता है।$^३$ इसके दश भेद होते हैं—

नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोग-समवकारडिमाः।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश ॥$^४$

१-नाटक, २-प्रकरण, ३-भाण, ४-व्यायोग, ५-समवकार, ६-डिम, ७-ईहामृग, ८-अंक, ९-वीथी, १०-प्रहसन।

उपरूपक के भी नाटिका आदि १८ भेद माने गये हैं। कुछ बातों को छोड़कर इनमें भी वे सभी बातें होतीं हैं जो नाटक में मानी जातीं हैं।$^५$


१. संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृ० ४७४-७८
२. दृश्यश्रव्यभेदेन काव्यं द्विधा मतम्। साहित्यदर्पण ६।१
३. अवस्थानुकृतिर्नाट्यं रूपं दृश्यतयोच्यते।
रूपकं तत्समावेशाद्दशधैव रसाश्रयम् ॥ दशरूपक १।७
४. साहित्यदर्पण ६।३
५. अष्टादश प्राहुरुपरूपकाणि मनीषिणः।
विना विशेषं सर्वेषां लक्ष्म नाटकवन्मतम् ॥ साहित्यदर्पण ६।६

मृच्छकटिक

दृश्य काव्य के भेद, उपभेद—वस्तु, नेता और रस के आधार पर किये जाते हैं। परन्तु आधुनिक समीक्षक नाटक में इन तत्त्वों पर भी महत्त्व देते हैं—कथानक, पात्र, उनका चरित्रचित्रण, संवाद, देश तथा काल का निर्णय, भाषा, शैली और अभिनययोग्यता आदि। इन सभी की दृष्टि से मृच्छकटिक की समीक्षा करनी आवश्यक है। परन्तु इन पर विचार करने के पहले इसके विवादग्रस्त विषय 'रचयिता' पर विचार कर लेना अच्छा है।

मृच्छकटिक का रचयिता

यद्यपि उपलब्ध सभी हस्तलेखों और प्रकाशित संस्करणों की भूमिका में मृच्छकटिक का रचयिता 'शूद्रक' नृप को ही माना गया है। परन्तु अभी तक विद्वान इसके रचयिता के विषय में सन्देह करते आ रहे हैं। इस सम्बन्ध में उपलब्ध मत और उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है—

मृच्छकटिक दण्डी की रचना है—पिशेल आदि का मत—

श्री पिशेल महोदय का मत है कि मृच्छकटिक दण्डी की रचना है। उनका यह कहना है कि राजशेखर ने दण्डी के तीन प्रबन्ध माने हैं—

“त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः।”१

इन तीनों में (क) दशकुमार-चरित और (ख) काव्यादर्श के अतिरिक्त तीसरी रचना (ग) 'मृच्छकटिक' है। पिशेल ने अपने मत के समर्थन में ये तर्क दिये हैं—

(१) ‘लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः ।’२ यह पद्य उदाहरण के रूप में काव्यादर्श ( २।२२६ ) में है। यही पद्य मृच्छकटिक के प्रथम अंक (१।३४) में भी है। इससे दोनों रचनाओं का एक कर्ता प्रतीत होता है।

(२) दशकुमार-चरित में सामाजिक अवस्था का जैसा वर्णन मिलता है वैसा ही मृच्छकटिक में भी है। दोनों की यह समानता भी दोनों का एक ही कर्ता होना सिद्ध करती है।३

पिशेल के उपर्युक्त मत का समर्थन मॅकडानल आदि ने भी किया है।

उपर्युक्त मत का खण्डन

दूसरे विद्वानों के मत में पिशेल के मत में कोई ठोस आधार नहीं है 'लिम्पतीव' यह पद्य तो सर्वप्रथम भास के 'चारुदत्त' में मिलता है। वहीं से अन्य कृतियों


१. राजशेखर २. काव्यादर्श २।२२६, मृच्छकटिक १।३४ ३. मृच्छकटिक-भूमिका M. R. काले पृ० १७

भूमिका ५

में उद्धृत है। सामाजिक अवस्था के वर्णन की समानता भी उक्त मत सिद्ध नहीं कर सकती क्योंकि कभी-कभी परिस्थितिवशात् दो लेखकों के समय में भी एक जैसी सामाजिक दशा मिलना संभव है। और जब से 'अवन्तिसुन्दरीकथा' नामक ग्रन्थ मिल गया है तब से विद्वान इसे ही दण्डी की तीसरी रचना के रूप में स्वीकार करते हैं। अतः पीटर्सन आदि विद्वान पिशेल का मत नहीं मानते हैं।¹

मृच्छकटिक भास की रचना है---

कुछ विद्वानों की धारणा है कि मृच्छकटिक महाकवि भास की रचना है। महाकवि भास ने अपने 'चारुदत्त' नामक नाटक को ही बाद में परिवर्द्धित करके 'मृच्छकटिक' नाम से प्रसिद्ध कर दिया।²

उक्त मत का खण्डन

किन्तु उपर्युक्त मत में कोई ठोस आधार नहीं है। कारण यह है कि जब भास ने अपनी अन्य सभी कृतियों में कर्ता के रूप में अपना उल्लेख किया है तब मृच्छकटिक को 'शूद्रक' नाम से क्यों लिखा ? भास को शूद्र मानने की कल्पना भी निराधार है। क्योंकि प्रस्तुत मृच्छकटिक की प्रस्तावना में इसके रचयिता को एक समर्थ और सम्पन्न राजा बताया गया है। वह अनेक विषयों का प्रौढ़ विद्वान भी था। अतः उसे जात्या शूद्र मानना तर्कसंगत नहीं है।

मृच्छकटिक किसी अज्ञात कवि की रचना है—

वास्तव में मृच्छकटिक के रचयिता का ज्ञान करना संभव नहीं है। यह किसी अज्ञात कवि की रचना है। यह मत डा० सिल्वालेवी ने प्रस्तुत किया था।³ इनका यह कहना है कि शूद्रक मृच्छकटिक के रचयिता नहीं हो सकते अपितु किसी अन्य कवि ने इसकी रचना करके अपनी इस रचना की प्राचीनता सिद्ध करने की भावना से शूद्रक की कृति घोषित कर दी। उस कवि ने अपनी कृति को शूद्रक के नाम से क्यों घोषित किया ? इस शंका का उत्तर देते हुये सिल्वालेवी का यह कहना है कि वह लेखक वास्तव में कालिदास से अर्वाचीन था किन्तु अपनी कृति को कालिदास से प्राचीन सिद्ध करना चाहता था। अतः कालिदास के आश्रयदाता राजा विक्रमादित्य से भी प्राचीन राजा शूद्रक के नाम से अपनी कृति को प्रसिद्ध कर दिया।


१. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० ३
२. मृच्छकटिक-भूमिका M. R, काले पृ० १७
३. मृच्छकटिक-भूमिका पं० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १०

६ मृच्छकटिक

डा० कीथ आदि कुछ विद्वान भी इस मत का अंशतः समर्थन करते हैं। उनके अनुसार कोई अज्ञात व्यक्ति ही मृच्छकटिक का रचयिता था। शूद्रक कोई वास्तविक व्यक्ति न होकर केवल कल्पित व्यक्ति था।¹

उपर्युक्त मत का खण्डन

परन्तु अधिकांश समीक्षक उपर्युक्त मत को नहीं मानते हैं। उनके अनुसार मृच्छकटिक को किसी अज्ञात कवि की रचना सिद्ध करने के लिए ठोस आधार और प्रमाणों का होना आवश्यक है। परन्तु इसमें केवल कल्पना के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं दिखलाई देता है। उपलब्ध सभी प्रकाशित और हस्तलिखित संस्करणों की प्रस्तावना में शूद्रक को ही इसका रचयिता कहा गया है।² इसके अतिरिक्त शूद्रक को ऐतिहासिक व्यक्ति न मानकर केवल कल्पित मानना भी प्रमादपूर्ण है।

पं० कान्तानाथ शास्त्री तेलंग का मत

“हमारे³ विचार से भी शूद्रक 'मृच्छकटिक' के कर्ता नहीं हैं। इसके कर्ता कोई दूसरे ही कवि हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कवि ने भास का 'दरिद्र-चारुदत्त' देखा। उन्हें वह अपूर्ण प्रतीत हुआ। उन पर उसे पूर्ण करने की धुन सवार हुई। उन्होंने आवश्यकता और अपनी रुचि के अनुसार 'दरिद्रचारुदत्त' में परिवर्तन किये। उसकी कथा के साथ अपनी कल्पना से रची हुई अथवा गुणाढ्य की 'बृहत्कथा' से ली हुई गोपालदारक आर्यक के विद्रोह की कथा वट थी। इस प्रकार 'मृच्छकटिक' तैयार हुआ। कवि ने अपना नाम जानबूझ कर छिपाया। प्रस्तावना में शूद्रक के साथ 'किल' का प्रयोग यही सूचित करता है। कवि ने इस शब्द का प्रयोग जानबूझ कर किया है। यह भी एक दो बार नहीं, चार-चार बार। तीन बार तो इसका प्रयोग शूद्रक के साथ किया गया है और एक बार चारुदत्त के। प्रस्तावना में शूद्रक का नाम बताने वाले पद्य देने के पहले ही कवि ने लिखा है--“एतत्कविः किल।” इसके बाद पुनः पांचवें पद्य में शूद्रक के साथ 'किल' शब्द है। इस अव्यय का प्रयोग प्रायः 'ऐतिह्य' 'अलीकता' या 'सम्भावना' सूचन करने के लिये पाया जाता है। यह अधिकतर अनिश्चय व्यक्त करता है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यहाँ इसका प्रयोग 'इदं किलाव्याज-


१. Sanskrit Drama पृ० १२६
२. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० २
३. मृच्छकटिक-भूमिका पं० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० ११-१२

भूमिका

मनोहरं वपुः' (शाकु०) की तरह ऐतिह्यादि अर्थों से भिन्न अर्थ का ज्ञान कराने के लिये किया गया है। "लब्ध्वा चायुः शताब्दं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः', 'बभूव', और 'चकार' के प्रकाश में यहाँ 'किल' शब्द 'ऐतिह्य' आदि अर्थों का ही बोध कराता है। कवि को अपनी आयु का निश्चित प्रमाण कैसे मालूम हो सकता है ? वह कैसे जान सकता है कि आगे चलकर उसकी मृत्यु कैसे और कब होगी ? 'बभूव' और 'चकार' का लिट् लकार भी परोक्ष भूत का बोधक होने के कारण ऐतिह्य आदि अर्थों का ही समर्थन करता है।"

"यहाँ यह भी नहीं कहा जा सकता कि नाटक तो शूद्रक का है, केवल प्रस्तावना के श्लोक दूसरे कवि के द्वारा प्रक्षिप्त हैं। ऐसा मानने का यह अर्थ होगा कि शूद्रक ने अपना नाटक बिना नाम डाले ही चला दिया। इसके अतिरिक्त 'बभूव' और 'चकार' के प्रकाश में यह भी मानना पड़ेगा कि शूद्रक के मरने के बहुत बाद प्रस्तावना के श्लोक डाले गये। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठेगा कि आखिर शूद्रक ने अपना नाटक अपना नाम दिये बिना ही क्यों चला दिया ? वह तो राजा था। उसे किसी का डर तो था नहीं। इसके अतिरिक्त बहुत दीर्घकाल तक किसी को उसका नाम डालने की क्यों नहीं सूझी ? बहुत लम्बे काल के बाद यह प्रश्न क्यों खड़ा हुआ ? इन प्रश्नों का कोई समुचित उत्तर नहीं मिलता। हमारे विचार से ये श्लोक यदि प्रक्षिप्त होते तो इनका स्वरूप ही दूसरा होता। यदि सच्चे दिल से केवल कवि का नाम स्थायी बनाने तथा उसका परिचय देने के लिये ही ये श्लोक प्रक्षिप्त होते तो इसमें सन्देह उत्पन्न करने वाली विचित्र बातें तथा परोक्षभूत की क्रिया न रखी गयी होती। जिस प्रकार अन्य प्रसिद्ध नाटकों के कवि अपना परिचय देते हैं वैसे ही सच मालूम होने वाले श्लोक बना कर मेल मिला दिया होता। अतः हम तो यही मानना श्रेयस्कर समझते हैं कि यह नाटक शूद्रक का नहीं है। किसी दूसरे कवि ने इसे रचकर शूद्रक के नाम से चला दिया है। शूद्रक इतिहासप्रसिद्ध व्यक्ति थे या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं है।"

आगे उन्होंने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुये लिखा है कि उस कवि ने अपना नाटक शूद्रक के नाम से क्यों चला दिया--इसके दो कारण हो सकते हैं--(१) उसने सोचा होगा कि इसमें आधा भाग भास का है। यदि इसे मैं अपने नाम से चलाऊँगा तो लोग मुझे चोर कहेंगे। (२) इस नाटक का घटनाचक्र तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों तथा मान्यताओं के विपरीत जान पड़ता है। चारुदत्त तथा शर्विलक जैसे ब्राह्मणों का वेश्याओं के साथ विवाह, ब्राह्मणों का चोर होना, चन्दनक और वीरक जैसे शूद्रों का राज्य के उच्च पदों पर स्थित होना—इत्यादि घटनायें क्रान्तिकारी विचारों की सूचक हैं। अतः यदि वह कवि अपने नाम से

८ मृच्छकटिक

इस नाटक को प्रचलित करता तो समाज और राजा उसकी दुर्गति कर देते। इसी कारण से उसने एक प्राचीन राजा के नाम से अपनी रचना को प्रसिद्ध किया होगा।

उपर्युक्त मत में अनुपपत्तियाँ

माननीय तेलंग जी के उपर्युक्त मत से तो ऐसा प्रतीत होता है कि शूद्रक का 'मृच्छकटिक' के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है। किसी कवि ने श्रम एवं प्रतिभा से इतनी विशाल और महत्त्वपूर्ण कृति की रचना की हो और वह बिना किसी विशेष कारण अपना नाम छोड़कर अन्य 'शूद्रक' के नाम से प्रसिद्ध कर दे, ऐसी बात बुद्धिगम्य नहीं है। ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखाई देता। यह कहा जाय कि क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत करने के कारण उसे राजा या समाज का भय था, तो यह भी तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि क्रान्तिकारी को किसी से भय नहीं होता है। 'किल' 'चकार' 'बभूव' आदि शब्दों के प्रयोग अवश्य विचारणीय हैं।

मृच्छकटिक शूद्रक की ही रचना है-परम्परावादी मत

परम्परावादी विद्वानों का मत है कि शूद्रक ही मृच्छकटिक के रचयिता हैं। प्रत्येक नाटक में उसके रचयिता का नाम उसकी प्रस्तावना में प्राप्त होता है। ठीक यही स्थिति मृच्छकटिक में भी है। इसकी भी प्रस्तावना में स्पष्ट शब्दों में 'शूद्रक नृप' को ही इसका रचयिता लिखा है।१ यहाँ परोक्ष भूतकालिक क्रिया के वाचक 'चकार' 'बभूव' 'अग्निं प्रविष्टः' आदि पदों का प्रयोग सन्देह अवश्य पैदा करता हैं। इन प्रयोगों की उपपत्ति का प्रयास विभिन्न टीकाकारों ने किया है। यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हों। अथवा लिपिकर्ता आदि के प्रमाद से अशुद्ध हो गये हों। अतः जब तक कोई ठोस आधार और प्रबल प्रमाण उपलब्ध नहीं होता तब तक शूद्रक को ही मृच्छकटिक का रचयिता मानना उचित है।

शूद्रक नृप के पुत्र के आश्रित कवि की रचना है—

ऊपर विभिन्न कल्पनाओं के साथ मेरा एक विनम्र परामर्श है कि मृच्छकटिक का रचयिता शूद्रक नहीं है। ऐसा लगता है कि शूद्रक का पुत्र जब राजा बना तो उसे अपने पिता की प्रसिद्धि स्थिर बनाने का विचार आया और उसने अपने आश्रित किसी महाकवि द्वारा यह रचना करायी। बाद में धनादि देकर अपने पिता का नाम उसमें जुड़वा दिया। चूँकि उस समय राजा शूद्रक नहीं थे। अतः उस कवि ने


१. द्र० प्रस्तुत संस्करण की प्रस्तावना के श्लोक।

दशमोऽङ्कः (संहार - मुक्ति व भारतवाक्य)

भूमिका ६

उनका नाम तो जोड़ दिया किन्तु भूतकालिक क्रियावाची पदों का प्रयोग करके भ्रम उत्पन्न करा दिया। संभव है उसे यह आभास न हुआ हो कि भविष्य में उसके प्रयोगों की समीक्षा करने पर अनेक समस्यायें खड़ी हो जायेंगी।

यदि वास्तव में शूद्रक ही रचयिता होते तो वे आत्मप्रशंसा में इतने श्लोक न लिखते। यदि आत्मप्रशंसा-प्रेमी होते तो 'मृच्छकटिक' की समाप्ति में भी अपना नाम अवश्य लिखते। मुझे जितने भी प्रकाशित संस्करण उपलब्ध हुए, उनमें 'संहारो नाम दशमोऽङ्कः' इतना ही लिखा है।

अस्तु, जो भी हो, अभी तक यह समस्या ही बनी है। इस विषय में 'इदमित्थम्' कह सकना दुस्साहसमात्र है।

शूद्रक—

जब तक कोई ठोस आधार नहीं प्राप्त होता तब तक शूद्रक को ही मृच्छकटिक का कर्ता मानना चाहिये। परन्तु ऐसा मान लेने पर दूसरा प्रश्न उठता है शूद्रक के व्यक्तित्व के विषय में। मृच्छकटिक की प्रस्तावना में यह स्पष्ट है कि शूद्रक एक प्रौढ़ विद्वान और बलशाली राजा था। वह अनेक विषयों का मर्मज्ञ और वैदिक परम्परा का अनुयायी था। उसने इस प्रस्तुत प्रकरण की रचना की।

भारत में ऐसे अनेक राजा हुए हैं जिनकी साहित्यिक गतिविधियां भी उच्च-कोटि की थीं। इनमें समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन, यशोवर्मा, मुञ्ज तथा भोज आदि प्रमुख हैं। इन्होंने राजकार्य की व्यस्तता में भी उत्कृष्ट रचनायें कीं। अतः शूद्रक भी राजा होकर इस प्रकरण की रचना कर सकता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। प्रस्तावना में 'शूद्रको नृपः' यह स्पष्ट लिखा है।

परन्तु भारतीय समाज में ऐसे भी अनेक कवियों की चर्चा है जिन्होंने राजा द्वारा पुरस्कृत होने पर कृतज्ञतास्वरूप अपनी कृति को उस राजा के नाम से प्रसिद्ध कर दिया। इस बात का स्पष्ट उल्लेख आचार्य मम्मट के काव्य-प्रकाश में काव्य-प्रयोजन की चर्चा के प्रसंग में है "काव्यं यशसे, अर्थकृते' की व्याख्या में लिखा है—"श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव धनम्।" सम्भव है यह स्थिति शूद्रक या उसके पुत्र की राजसभा के किसी पण्डित की भी रही हो। राजशेखर ने इस प्रकार के कुछ राजाओं का उल्लेख भी किया है—"वासुदेव-शातवाहन-शूद्रक-साहसांकादीन् सकलान् सभापतीन् दानमानाभ्यामनुकुर्यात्।" (काव्यमीमांसा) उपर्युक्त तथ्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि स्वयं शूद्रक ने अथवा उसके आश्रित किसी कवि ने या शूद्रक के पुत्र के आश्रित किसी कवि ने मृच्छकटिक की रचना की है और शूद्रक के नाम से प्रसिद्ध कर दी है।

१० | मृच्छकटिक

कुछ समय पहले मद्रास में 'अवन्तिसुन्दरी-कथा' नाम का एक ग्रन्थ मिला जिसे विद्वानों ने दण्डी की तीसरी कृति माना। उसमें शूद्रक की प्रशंसा में निम्न श्लोक है--

शूद्रकेणासकृज्जित्वा स्वच्छया खड्गधारया।
जगद् भूयोऽवष्टब्धं वाचा स्वचरितार्थया ॥१

इसमें शूद्रक को एक वीर योद्धा कहा गया है। 'वाचा स्वचरितार्थया' इन पदों से यही प्रतीत होता है कि शूद्रक ने अपनी रचना में आत्मकथा प्रतिबिम्बित की है। कुछ विद्वानों का कहना है कि मृच्छकटिक में शूद्रक के जीवन की कुछ प्रमुख घटनाओं का संकेत है। यहाँ का चारुदत्त शूद्रक के मित्र बन्धुदत्त का दूसरा रूप है। और गोपालपुत्र आर्यक के रूप में शूद्रक ने स्वयं को प्रस्तुत किया है। परन्तु इस कल्पना में कोई ठोस तर्क या प्रमाण नहीं दिया गया। केवल यही कहा जा सकता है कि शूद्रक एक वीर योद्धा था।

वामन की काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति से भी यह संकेत मिलता है कि शूद्रक नाम का कोई कवि था। उसकी रचनायें लोककथाश्रित थीं। अर्थगुणों के विवेचन के प्रसङ्ग में वामन ने श्लेष (घटना) का उल्लेख किया है और शूद्रक की रचनाओं में इस श्लेष का विशेष प्रयोग बताया है "शूद्रकादिरचितेषु प्रबन्धेषु अस्य भूयान् प्रपञ्चो दृश्यते।" (काव्यालङ्कार-सूत्रवृत्ति ३।२।४) इस उल्लेख से शूद्रक का कवि होना और श्लेष में उसकी दक्षता ये दो बातें प्रमाणित होती हैं।

परन्तु उपर्युक्त उल्लेख से यह अनुमान लगाना कठिन है कि वामन शूद्रक को मृच्छकटिक के रचयिता के रूप में जानता था अथवा नहीं। कारण यह है कि मृच्छकटिक को विशेष रूप से श्लेषगुणयुक्त कहना कठिन है। परन्तु वामन ने सूत्रवृत्ति में ऐसे कई उदाहरण दिये हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि वह भी मृच्छकटिक से सुपरिचित था। यह श्लेष गुण श्लेष अलंकार से सर्वथा भिन्न है। अतः वामन के उपर्युक्त कथन से भी यह अनुमान करना सम्भव है कि शूद्रक ने मृच्छकटिक के अतिरिक्त और दूसरी भी रचना की थी।

शूद्रक के विषय में ऐतिहासिक उल्लेख :

संस्कृत-साहित्य में अनेक शूद्रकों का उल्लेख प्राप्त होता है। अतः इसको केवल काल्पनिक व्यक्ति मानना ठीक नहीं है। यह शूद्रक विभिन्न प्रसंगों और विभिन्न कालों में चर्चित है। अतः इन शूद्रकों में कौन शूद्रक मृच्छकटिक का रचयिता है—यह कहना कठिन है। इस विषय में निम्न विवेचन उपयोगी होगा—


१. मृच्छकटिक भूमिका M. R. काले पृ० २१ में उद्धृत।

भूमिका

(१) स्कन्दपुराण में कुमारिका-खण्ड में यह लिखा है कि कलि सम्वत् ३२६० अर्थात् १६० ई० में शूद्रक नाम का कोई राजा हुआ था।¹ कुछ विद्वान स्कन्द-पुराण में निर्दिष्ट शूद्रक को आन्ध्रवंशीय प्रथम राजा 'सिमुक' से अभिन्न मानते हैं। उनके कथन का आधार है भागवतपुराण में आन्ध्रवंश के प्रथम राजा को 'शूद्र' कहना। यह भी सम्भव है कि सिमुक का वास्तविक नाम 'शूद्रक' ही रहा हो। M.R. काले महोदय ने आन्ध्रवंश का प्रथम राजा 'शूद्रक' ही माना है। उसका यह समय आन्तरिक प्रमाणों से भी पुष्ट होता है और उसके पूर्ववर्ती कवि भास के समय से भी मेल खाता है।²

(२) आन्ध्रवंश का राज्य दक्षिण भारत में था और वामन की काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति के एक टीकाकार के अनुसार 'शूद्रक' भी दक्षिण का था। इस कथन की पुष्टि मृच्छकटिक के अन्तःसाक्ष्यों से भी होती है। दूसरे अंक में 'खुण्डमोटक' शब्द का प्रयोग दक्षिण भारत का है। दशम अंक में चारुदत्त के वध के समय चाण्डालों द्वारा 'सह्यवासिनी' का स्मरण “भगवति सह्यवासिनि ! प्रसीद प्रसीद” भी दाक्षिणात्य होने में प्रमाण है। भवभूति ने भी दुर्गा को इसी नाम से लिखा है। इसके विपरीत उत्तर भारत में 'विन्ध्यवासिनी' शब्द प्रयुक्त होता है। छठे अंक में वीरक और चन्दनक के कलह में 'दाक्षिणात्य' तथा 'कर्णाटककलहप्रयोग' आदि शब्द यही सिद्ध करते हैं। पैसा के अर्थ में 'नाणक' का प्रयोग भी उक्त कथन की पुष्टि करता है। इससे शूद्रक का दाक्षिणात्य होना सिद्ध होता है।³ परन्तु कुछ विद्वान उज्जयिनी का विशेष वर्णन देखकर वहीं का मानते हैं। अथवा दक्षिण से आकर वहाँ रहने लगा हो, ऐसा कहते हैं।

राजशेखर के अनुसार 'रामिल' और 'सोमिल' नामक कवियों ने 'शूद्रककथा' नाम का ग्रन्थ लिखा था⁴। यह 'सोमिल' वही प्रतीत होता है जिसका उल्लेख कालिदास ने 'सौमिल्लक' नाम से किया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि


१. त्रिषु वर्षसहस्रेषु कलेर्यातेषु पार्थिव।
त्रिशतेषु दशन्यूनेष्वस्यां भुवि भविष्यति ॥
शूद्रको नाम वीराणामधिपः सिद्धिमत्र सः।
चर्चितायां समाराध्य लप्स्यते भूभयापहः ॥

२. मृच्छकटिक भूमिका M.R. काले पृ० १९।
३. द्र० मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवासशास्त्री पृ० १३ ।

४. तौ शूद्रककथाकारौ रम्यो रामिलसौमिलौ।
काव्यं ययोर्द्वयोरासीदर्धनारीनरोपमम् ॥

१२ मृच्छकटिक

'सोमिल' कालिदास से प्राचीन था और शूद्रक इसका समकालीन या इससे पूर्ववर्ती था।

प्रो० कोनो ने आभीरवंश के राजा शिवदत्त को ही शूद्रक बताया है। इनका राज्यकाल ई० की तीसरी शती है। इसका आधार 'गोपालदारक' शब्द है।$^१$ अन्य कुछ विद्वानों ने भी कुछ शब्दों के साम्यादि को आधार मानकर अनेक कल्पनायें की हैं जिनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है।

साहित्यिक उल्लेख :

कुछ ऐसे साहित्यिक उल्लेख यह सिद्ध करते हैं कि उदयन तथा विक्रमादित्य के समान शूद्रक भी एक साहित्यानुरागी राजा था। शूद्रक के नाम से 'विक्रान्त-शूद्रक' 'शूद्रकवध', 'शूद्रकचरित' आदि ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है। परन्तु अभी तक ये ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हुये हैं। अतः इनके द्वारा किसी प्रकार का निर्णय करना कठिन है। कल्हण ने अपनी 'राजतरंगिणी' में और सोमदेव ने अपने 'कथासरित्-सागर' में 'शूद्रक' का उल्लेख किया है। बाण ने अपनी 'कादम्बरी' में शूद्रक को विदिशा का राजा बताया है और 'हर्षचरित' में इसे चन्द्रकेतु का शत्रु कहा है। दण्डी ने भी 'दशकुमारचरित' में शूद्रक का उल्लेख किया है। 'वेताल-पंचविंशतिका' में शूद्रक की राजधानी 'वर्धमान' या 'शोभावती' कही गयी है। वामन ने अपने काव्यालंकारसूत्र में शूद्रक का कवि के रूप में स्पष्ट उल्लेख किया है और मृच्छकटिक के कुछ उदाहरण भी दिये हैं।$^२$

उपर्युक्त विवेचन से यह प्रतीत होता है कि शूद्रक नाम के कई राजा और कवि हुये थे। परन्तु मृच्छकटिक का रचयिता कौन सा शूद्रक है-यह कहना कठिन है।

मृच्छकटिक का रचनाकाल

जिस प्रकार मृच्छकटिक के कर्ता शूद्रक का व्यक्तित्व विवादग्रस्त है ठीक इसी प्रकार इनका काल भी। इनका काल ई० पू० ३०० से लेकर ई०अ० ६०० तक के मध्य में दोलायमान है।

(क) ई० पू० ३०० से लेकर ई० प्रथम शती तक :

कुछ विद्वान यह कहते हैं कि मृच्छकटिक का रचयिता शूद्रक आन्ध्रवंशीय प्रथम राजा से अभिन्न है। अतः इसका काल ई० पू० तीसरी शती से लेकर ई०


१ मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तेलंग पृ० ८।
२. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० ८।

भूमिका १३

अ० प्रथम शती का मध्य हो सकता है। इस काल की पुष्टि अन्तःसाक्ष्य और बाह्य साक्ष्य दोनों से होती है। इस वक्तव्य में M.R. काले के विचार ध्यान देने योग्य हैं —

(१) इस नाटक के कथानक के अनुसार उस समय बौद्ध धर्म उन्नत अवस्था में था। जनता में बौद्ध भिक्षुओं का सम्मान था। भिक्षु भी अपने धर्म का पालन सावधानी से करते थे। ईसा की पहली शती से ही बौद्धधर्म ह्रासोन्मुख हो चला था। अतः इसकी रचना इस काल के पहले की होनी चाहिये, जैसा कि भण्डारकर ने बताया है कि आन्ध्रवंशीय राजाओं के समय बौद्ध धर्म उन्नत अवस्था में था।$^१$

(२) नवम अंक में अधिकरणिक ने 'अङ्गारकविरुद्धस्य' [ ९।३३ ] इस श्लोक में मंगल को वृहस्पति का शत्रु ग्रह बताया गया है। यह मान्यता वराहमिहिर से पहले की थी। वराहमिहिर का काल ई० ५०० के लगभग माना जाता है। अतः इससे काफी पहले ही इस मृच्छकटिक की रचना हो जानी चाहिये।

(३) "वैशिकी कला"$^२$ का उल्लेख तथा किसी वेश्या के नायिका बनने की कल्पना वात्स्यायन के कामसूत्र की रचना के समकालीन या उसके बाद होनी चाहिये। कामसूत्र की रचना ई० १०० के अनन्तर नहीं मानी जा सकती। अतः मृच्छकटिक भी इसी के समीप का होना चाहिये।

(४) नाट्यकला के ऐसे अनेक नियम बाद में प्रचलित हुये जिनसे मृच्छकटिक का कर्ता परिचित नहीं प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ—किसी पात्र के विशेष प्राकृत बोलने का नियम, रसों की प्रधानता का नियम आदि। इसके अतिरिक्त मृच्छकटिक में भास के समान सादगी और सरलता है। इसकी शैली कालिदास के समान न तो परिष्कृत है और न भवभूति के समान कलापूर्ण। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि मृच्छकटिक की रचना संस्कृत नाटकों के आरम्भिक काल की है।

(५) मृच्छकटिक की प्राकृत भाषायें व्याकरण के नियमों के सर्वथा अनुकूल नहीं प्रतीत होती हैं। वे प्राकृत भाषा के प्रारम्भिक विकास को सूचित करती हैं। इससे कालिदास की अपेक्षा शूद्रक की प्राचीनता सिद्ध होती है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि शूद्रक कालिदास से प्राचीन हैं। क्योंकि रामिल तथा सोमिल ने 'शूद्रककथा' लिखी थी और कालिदास ने सोमिल का उल्लेख किया है। यहाँ शंका हो सकती है कि कालिदास


१. मृच्छकटिक भूमिका M.R. काले पृ० ३२ में। २. मृच्छकटिक १।४।

१४ मृच्छकटिक

ने शूद्रक का उल्लेख क्यों नहीं किया ? उत्तर है कि उस समय तक शायद शूद्रक की उतनी अधिक प्रसिद्धि नहीं हो पायी होगी।

(ख) ३०० ई० से लेकर ७०० ई० के मध्य :

कुछ विद्वान उपर्युक्त प्राचीनता नहीं मानते हैं। उनका तर्क यह है कि भास के 'चारुदत्त' नाटक की खोज के बाद यह सिद्ध हो गया है कि 'मृच्छकटिक' की रचना 'चारुदत्त' के आधार पर हुई है। अतः मृच्छकटिक के कर्ता शूद्रक की सीमा भास का समय हो सकती है और भास का समय अभी तक अनिर्णीत है। उनका समय ई० पू० ३०० से लेकर ई० अ० ६०० के मध्य माना जा सकता है। मृच्छकटिक के नवमं अंक में अधिकरणिक ने चारुदत्त को दण्ड देने के लिये मनु का यह आदेश उद्धृत किया है।

“अयं हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत् । राष्ट्रादस्मात्तु निर्वास्यो विभवैरक्षतः सह ॥”१

मनु का काल ई० पू० २०० है। अतः मृच्छकटिक की पूर्व सीमा ई० पू २०० के लगभग हो सकती है।२

डा० कीथ का मत है कि यह सन्देहास्पद है कि मृच्छकटिक कालिदास से प्राचीन है या अर्वाचीन। जैकोबी का मत है कि मृच्छकटिक कालिदास से अर्वाचीन है। कुछ समालोचकों का यह मत है कि कालिदास के नाटकों पर मृच्छकटिक का कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता है, अतः कालिदास मृच्छकटिक की अपर सीमा नहीं हो सकते।

इनकी अपर सीमा क्या है ? वामन ने अपनी काव्यालंकार-सूत्र-वृत्ति में शूद्रक का कवि के रूप में उल्लेख किया है और मृच्छकटिक के कई पद्य भी उद्धृत किये हैं। अतः मृच्छकटिक की अपर सीमा वही है। दण्डी के काव्यादर्श में “लिम्पतीव” (१.३४) यह पद्य मिलता है। अतः ई० ७०० अपर सीमा है, ऐसा भी कुछ लोग मानते हैं। डा० देवस्थली के अनुसार पंचतन्त्र के दो पद्य मृच्छकटिक में हैं और पंचतन्त्र का समय ई० अ० ५०० है। अतः यह अपर सीमा हो सकती है। किन्तु इसका खण्डन कुछ विद्वानों ने किया है। उनके अनुसार पंचतन्त्र का काल अभी तक अनिर्णीत है।३ अतः दण्डी ही इसके अपर सीमा हो सकते हैं।


१. मृच्छकटिक ९।३९ । २. मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १७ । ३. मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १६ ।

भूमिका १५

मृच्छकटिक के अन्तःसाक्ष्य भी इसी की पुष्टि करते हैं। गुप्त-साम्राज्य के बाद हर्षवर्धन ही एक सार्वभौम सम्राट् हुये। उनके बाद की पतन-अवस्था का चित्रण इसमें सम्भव है। अतः इसका समय पांचवीं या छठी शती हो सकता है।

ऊपर यह स्पष्ट किया गया है कि मृच्छकटिक के कर्ता की पूर्व सीमा ई० पू० ३०० है और अपर सीमा ई० अ० ३०० से लेकर ७०० तक है। यह कष्ट का विषय है कि अभी तक एक सर्वसम्मत काल का निर्णय नहीं हो सका है।

शूद्रक का परिचय :

ऊपर यह दिखाया जा चुका है कि संस्कृत-साहित्य में कई शूद्रक हैं। उनमें से मृच्छकटिक का रचयिता कोई ‘शूद्रक नृप’ है यही जानकारी प्रस्तावना से होती है। वह बड़ा विद्वान और शक्तिशाली योद्धा था। उसने एक सौ वर्ष और दश दिन की आयु व्यतीत की। अपने पुत्र का राज्याभिषेक करके अग्नि में प्रवेश किया।¹ इस उल्लेख के विषय में पैदा होने वाली शंकाओं का संकेत पहले किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं प्राप्त होती है।

शूद्रक का निवास स्थान :

मृच्छकटिक का कर्ता दाक्षिणात्य था। कुछ के अनुसार महाराष्ट्रीय था। कुछ लोग उज्जैन का मानते हैं। इस विषय में पहले लिखा जा चुका है।

शूद्रक की रचनायें :

दण्डी तथा वामन के उल्लेख से ऐसा प्रतीत होता है कि शूद्रक ने कुछ और भी रचनायें कीं थीं। परन्तु आजकल एकमात्र मृच्छकटिक ही उनकी रचना उपलब्ध होती है। इसी पर कीर्तिपताका फहरा रही है।

मृच्छकटिक का मूल-स्रोत :

संस्कृत-साहित्य में कई ऐसे ग्रन्थ हैं जिनका घटनाचक्र मृच्छकटिक से मिलता जुलता है। इस प्रकार के ग्रन्थों में भास का ‘दरिद्रचारुदत्त’ दण्डी का ‘दशकुमार-चरित’ सोमदेव का ‘कथासरित्सागर’ है। कालिदास के ‘शाकुन्तल’ और विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस’ की भी कुछ घटनाओं में समानता है। अतः इसका मूलस्रोत निश्चित करना आवश्यक है।

मृच्छकटिक की कथावस्तु को दो भागों में बाँटा जा सकता है—(१) चारुदत्त और वसन्तसेना का प्रेम और (२) आर्यक की राज्यप्राप्ति।


१. द्र० मृच्छकटिक-प्रस्तावना श्लोक ३-७ ।

१६मृच्छकटिक

भास के 'चारुदत्त' नाटक की कथा को देखने पर यह स्पष्ट प्रतीत हो जाता है प्रथम भाग की कथा इसी से प्रभावित है। चारुदत्त में केवल चार अंक हैं। मृच्छकटिक की प्रारम्भिक कथा इससे बहुत अधिक मिलती जुलती है। दोनों की सूक्ष्मता से तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि 'मृच्छकटिक' के कर्ता ने 'दरिद्रचारुदत्त' को देखा और बड़ी सावधानी से उसे कुछ परिवर्तित करके और अधिक आकर्षक रूप दे दिया। इसीलिये अधिकांश विद्वान यह मानते हैं कि 'मृच्छकटिक' 'दरिद्रचारुदत्त' का ही परिवर्द्धित और परिष्कृत संस्करण है। भाषा शैली की दृष्टि से भी 'मृच्छकटिक' अधिक परिष्कृत है। उदाहरणार्थ—

दरिद्रचारुदत्तमृच्छकटिक
१—शृणोमि गन्धं श्रवणाभ्याम् ।<br>अन्धकारपूरिताभ्यां नासापुटाभ्यां सुष्ठु न पश्यामि ।शृणोमि माल्यगन्धम् ।<br>अन्धकारपूरितया पुनर्नासिकया न सुव्यक्तं पश्यामि भूषणशब्दम् ।
२—स्वरान्तरेण हि दक्षा व्याहर्तुं तन्न मुच्यताम् ।वंचनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ।
३—तव मम च दारुणः क्षोभो भविष्यति ।मरणान्तिकं वैरं भविष्यति ।
४—उत्कण्ठितस्य हृदयानगुता सखीव ।उत्कण्ठितस्य हृदयानुगुणा वयस्या ।
५—शतसहस्रमूल्या ।चतुःसमुद्रसारभूता ।
६—कोऽप्युच्चारोऽपि नैतया भणितः ।अहो गणिकाया लोभोऽदक्षिणता च यतो न कथापि कृतान्या ।

इसी प्रकार के और भी अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं। उनसे यह प्रतीत हो जाता है कि शूद्रक को भाषा शैली पर पूरा अधिकार है। साधारण बात भी इस रूप में प्रस्तुत है कि पाठक आकृष्ट हुये बिना नहीं रहता। किसी वस्तु के वर्णन-विस्तार में इनकी दक्षता देखने योग्य है। चाहे वसन्तसेना के भवन का वर्णन हो या वर्षा ऋतु का, शूद्रक की कल्पना अव्याहत रूप से उड़ती है।

मृच्छकटिक नामकरण का अभिप्राय :

किसी भी ग्रन्थ के आकर्षक नाम से अध्येता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसीलिये साहित्यदर्पण में यह लिखा "नाम कार्य नाटकस्य गर्भितार्थप्रकाशकम् ।" (सा० द० ६।१४२)। प्रकरण के नामकरण के विषय में यह लिखा है "नायिका-नायकाख्यानात् संख्या प्रकरणादिषु । (सा० द० ६।१४३) इसके अनुसार यहाँ वसन्तसेना या चारुदत्त के आधार पर नाम होना चाहिये था। परन्तु ऐसा न

भूमिका १७

करके षष्ठ अंक की एक घटना के आधार पर नाम रखने का औचित्य विचारणीय है ।

घटना इस प्रकार है—चारुदत्त का पुत्र अपने किसी पड़ोसी के पुत्र की सोने की गाड़ी से खेल कर आया है और अपने घर पर उसी प्रकार की सोने की गाड़ी से खेलने की जिद कर रहा है। रदनिका उसे बहलाने के लिये मिट्टी की गाड़ी देती है । वह लेने से इनकार कर देता है । तब वह उसे वसन्तसेना के पास ले जाती है। वसन्तसेना को जब उसके रोदन का कारण मालूम होता है और उससे बातें करती है तब प्रेमार्द्र होकर अपने सारे गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इनसे गाड़ी बनवा लो । [ मृत्=मिट्टी की शकटिका=छोटी गाड़ी है वर्णित जिसमें—इस प्रकार का अर्थ 'मृच्छकटिकम्' का होता है । ]

प्रस्तुत प्रकरण का घटनाचक्र इन गहनों से अधिक प्रभावशाली बन जाता है । जब चारुदत्त को इस घटना का ज्ञान होता है । तब वह विदूषक द्वारा गहने वापस भेज देता है । किन्तु किन्हीं कारणों से विदूषक उन्हें वसन्तसेना के पास नहीं ले जा पाता है । उधर चारुदत्त को न्यायाधिकरण में बुला लिया जाता है । यह जानकारी मिलने पर विदूषक पहले न्यायाधिकरण ही पहुँचता है । वहाँ शकार के साथ उसका झगड़ा होने पर वे गहने उसके पास से जमीन पर गिर जाते हैं और चारुदत्त अपराधी सिद्ध हो जाता है । उसे मृत्युदण्ड दे दिया जाता है । इस प्रकार यह एक महत्त्वपूर्ण घटना बन जाती है ।

यह कहा जाय कि उक्त आधार पर तो 'सुवर्णशकटिकम्' यह नाम रखना चाहिये था ? इसका उत्तर यह है कि नाम आकर्षक और उत्कण्ठाजनक होना चाहिये । 'मिट्टी की गाड़ी' यह नाम 'सोने की गाड़ी' से अधिक उत्कण्ठा पैदा करने वाला है ।

इस नामकरण के औचित्य को सिद्ध करने के लिये कुछ¹ विद्वानों ने कई तर्क प्रस्तुत किये हैं—(१) इस नाम के द्वारा कवि जीवन के लिये शिक्षा देना चाहता है । रोहसेन अपनी मिट्टी की गाड़ी से सन्तुष्ट नहीं है । वह पड़ोसी के पुत्र की सोने की गाड़ी लेना चाहता है । परन्तु अपनी वास्तविक परिस्थिति से असन्तोष और दूसरों की उन्नत अवस्था से ईर्ष्या करना दोष है । ऐसे दोषों के कारण मनुष्य को आपत्ति का सामना करना पड़ता है । इसी प्रकार चारुदत्त भी अपनी पत्नी धूता से पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं हो पाता है वह वसन्तसेना की ओर भी आकृष्ट होता है । इसी कारण उसका जीवन कष्टमय हो जाता है । (२) दो प्रकार की


१. द्र० मृच्छकटिकभूमिका कान्तानाथ शास्त्री तेलङ्ग पृ० ३२ ।
मृ० भू० २

१८ मृच्छकटिक

गाड़ियों की घटना आगामी प्रवहणविपर्यय की घटना को सूचित करती है जो इस प्रकार की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना है। (३) भासकृत 'चारुदत्त' नाटक 'मृच्छकटिक' का मूल स्रोत है। इस समय उसमें केवल चार अंक ही मिलते हैं। वसन्तसेना चारुदत्त से मिलने के लिये उद्यत है—इतनी कथा से ही नाटक समाप्त हो जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह नाटक अपूर्ण है। इसमें कम से कम एक अंक और रहा होगा। इसकी कथा मृच्छकटिक के पंचम अंक तक की कथा के बराबर रही होगी। यदि यह स्थिति मान ली जाय तो कहा जा सकता है कि इससे आगे की कथा शूद्रक द्वारा कल्पित है। षष्ठ अंक में ही मिट्टी की गाड़ी वाली घटना आती है। इसलिये कवि ने अपनी कल्पना के आरम्भ को प्रकट करने की अभिलाषा से इस घटना के नाम पर ही 'प्रकरण' का नाम रख दिया।

अब एक ही प्रश्न है लक्षणग्रन्थों से विरोध? इसका सीधा समाधान यह है कि नाटकादि के जो भी लक्षण बनाये गये हैं वे इनकी रचना को देखकर ही बाद में बनाये गये। सम्भव है मृच्छकटिक की ओर इन लक्षणकारों की दृष्टि न गयी हो। अतः इस प्रकरण का नाम 'मृच्छकटिकम्' उचित प्रतीत होता है। नायक या नायिका का नाम आधार बनाने पर श्रोता को अधिक उत्कण्ठा नहीं हो पाती, क्योंकि पहले से ही 'चारुदत्त' नाटक प्रसिद्ध था। अतः प्रस्तुत नाम की कल्पना उचित है।

मृच्छकटिक एक प्रकरण (रूपकविशेष) है :—

पहले रूपक के दश भेद लिखे जा चुके हैं। इनमें 'नाटक' के बाद 'प्रकरण' आता है। मृच्छकटिक भी एक प्रकरण है। प्रकरण के लक्षण साहित्यदर्पण में इस प्रकार हैं—

'भवेत् प्रकरणे वृत्तं लौकिकं कविकल्पितम्।
शृङ्गारोऽङ्गी नायकस्तु विप्रोऽमात्योऽथवा वणिक् ॥
सापायधर्मकामार्थपरो धीरप्रशान्तकः ।
नायिका कुलजा क्वापि, वेश्या, क्वापि द्वयं क्वचित् ।।
तेन भेदास्त्रयस्तस्य तत्र भेदस्तृतीयकः ।
कितवद्यूतकारादि - विट - चेटक - संकुलः ॥
[ अस्य नाटकप्रकृतित्वात् शेषं नाटकवत् ...... । ]¹

रूपकों में 'प्रकरण' का वृत्त (कथानक) लौकिक तथा कविकल्पित होता है। शृङ्गार मुख्य रस होता है, ब्राह्मण, अमात्य या वणिक् में से कोई एक नायक होता


१. साहित्यदर्पण ६।२४१-४३

भूमिका १६

है। वह नायक धीरप्रशान्त होता है तथा विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म, अर्थ तथा काम में परायण होता है। प्रकरण की नायिका कुलस्त्री या वेश्या होती है। कभी-कहीं दोनों नायिकायें होती हैं। इस प्रकार नायिकाभेद से इसके भी तीन भेद बन जाते हैं। इसमें धूर्त, विट और चेट आदि रहते हैं। यह प्रकरण नाटक का ही परिवर्तित रूप है। अतः सन्धि, प्रवेशक इत्यादि शेष बातें नाटक के समान ही होती हैं।

**मृच्छकटिक में समन्वयः—**प्रस्तुत प्रकरण का कथानक लोकाश्रित है। इसमें कवि की कल्पना अधिक है। इसका मुख्य रस शृङ्गार है। करुण, हास्य, बीभत्स रस अङ्ग रस के रूप में हैं। इसका नायक चारुदत्त ब्राह्मण है। वह अति दरिद्र होने पर भी धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि में लगा रहता है। इसमें दो नायिकायें हैं—वेश्या (वसन्त्तसेना) और कुलस्त्री (धर्मपत्नी धूता)। इसलिए यह तीसरा भेद है। यहाँ धूर्त, द्यूतकर, विट, चेट आदि भी हैं। इस कारण यह 'संकीर्ण प्रकरण' समझना चाहिये।

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि 'मृच्छकटिक' में लक्षणग्रन्थों के सभी नियम पूरी तरह लागू नहीं होते हैं। कारण स्पष्ट है कि इसकी रचना के समय तक ये नियम मान्यताप्राप्त रूप नहीं ले सके होंगे। सामान्यतया नायक या नायिका के नाम पर ही इस प्रकरण का नाम होना चाहिये था। परन्तु ऐसा नहीं है। यहाँ षष्ठ अंक की घटना को ही महत्त्व दिया गया है। इसके प्रत्येक अंक में नायक 'चारुदत्त' की उपस्थिति नहीं है। नाट्यशास्त्र और दशरूपक के अनुसार कुलस्त्री और वेश्या एक साथ रंगमंच पर नहीं आनी चाहिये, परन्तु इसमें ऐसा नहीं है। दशम अंक में दोनों आमने सामने आती हैं और एक दूसरे का स्वागत करती हैं। परस्पर मिलती हैं। ऐसी ही कुछ और भी अनियमिततायें हैं। फिर भी, विद्वानों का मत है कि मृच्छकटिक को छोड़कर संकीर्ण-प्रकरण का दूसरा अच्छा उदाहरण मिलना कठिन है।

मृच्छकटिक का संक्षिप्त कथानक

**प्रस्तावना—**मृच्छकटिक एक 'प्रकरण' है। इसका प्रारम्भ नान्दी-पाठ के बाद प्रस्तावना से होता है। चिरकाल तक संगीत का अभ्यास करने से क्षुधार्त्त सूत्रधार अपने घर पहुँचकर वहाँ होने वाली अभूतपूर्व तैयारी देख कर आश्चर्यचकित हो जाता है। इसका रहस्य जानने के लिये वह अपनी पत्नी से पूछता है। वह उसे 'अभिरूपपति' नामक व्रत के अनुष्ठान की तैयारी बताती है। इसे सुनकर वह क्रुद्ध हो जाता है। परन्तु वस्तुस्थिति जानकर बह भी उस अनुष्ठान में सहयोग देने के

२० मृच्छकटिक

लिये ब्राह्मण को निमन्त्रित करने के विचार से चल पड़ता है। वह उज्जयिनी-वासियों की सम्पन्नता और अपनी निर्धनता से चिन्तित है कि उसके यहाँ भोजन करने के लिये किसी भी ब्राह्मण का तैयार होना कठिन है। उस समय अकस्मात् उसे आता हुआ मैत्रेय दिखाई देता है किन्तु उसके घर भोजन के लिये मैत्रेय किसी भी प्रकार नहीं तैयार होता है। दुःखी होकर सूत्रधार दूसरे ब्राह्मण की खोज में निकल जाता है। और इस प्रकार रंगमंच पर मैत्रेय के आने की सूचना के साथ प्रस्तावना समाप्त हो जाती है।

प्रथम अङ्कः—

प्रथम अंक के प्रथम दृश्य में मैत्रेय (विदूषक) रंगमंच पर आता है। वह चारुदत्त की बीती हुई सम्पन्नता और वर्तमान अतिनिर्धनता को याद करके दुखी हो जाता है। वह प्रिय मित्र जूर्णवृद्ध द्वारा दिया गया जातीकुसुमवासित दुपट्टा देने के लिये चारुदत्त के पास जाता है। चारुदत्त अपने घर की दशा देखकर दुखी होकर बैठा है। विदूषक को आया देखकर चारुदत्त उसका स्वागत करता है। विदूषक वह दुपट्टा उसे दे देता है। चारुदत्त अपनी निर्धनता के कारण लोगों के परिवर्तित व्यवहार को देखकर बहुत दुःख प्रकट करता है। वह विदूषक को मातृदेवियों के लिये बलि समर्पित करने को कहता है। किन्तु वह जाने से कतराता है। तब चारुदत्त उसे वहाँ ठहरने के लिये कह कर समाधि सम्पन्न करने लगता है।

दूसरे दृश्य में वसन्तसेना का पीछा करते हुये विट, चेट और शकार का प्रवेश होता है। वसन्तसेना भागती है। ये तीनों उसका पीछा करते हैं। तेज चलने से वह आगे निकल जाती है उसके परिजन पीछे छूट जाते हैं। शकार ( राजा का शाला ) उससे अपना प्रेम प्रकट करता है और वसन्तसेना से प्रेम के लिए आग्रह करता है। विट भी वसन्तसेना को समझाता है किन्तु वह किसी भी तरह उसे नहीं चाहती है। मूर्खता से शकार यह कह देता है कि चारुदत्त का घर समीप में ही है। यह सुनकर वसन्तसेना खुश होकर अन्धकार में गायब हो जाती है। वह चारुदत्त के घर के पास पहुँचती है। वहाँ दरवाजा बन्द है।

तृतीय दृश्य में पुनः चारुदत्त और विदूषक सामने आते हैं। चारुदत्त जप समाप्त करके पुनः विदूषक को बलि देने के लिये कहता है। उसका इनकार सुन कर चारुदत्त बहुत दुखी होता है। तब विदूषक रदनिका के साथ जाने के लिये राजी होता है। विदूषक दरवाजा खोलता है। बाहर खड़ी वसन्तसेना अपने आंचल से दीप बुझा देती है। विदूषक रदनिका से बाहर चलने को कहता है और स्वयं दीप जलाने के लिये अन्दर चला जाता है। अवसर का लाभ उठाकर वसन्तसेना भीतर

भूमिका २१

चली आती है। इधर उसको खोजते हुये शकार आदि भी वहीं पहुँच जाते हैं। शकार अंधेरे में खड़ी रदनिका को ही वसन्तसेना समझकर उसके बाल पकड़ लेता है। वह प्रतिवाद करती है। इसी बीच दीप लेकर विदूषक आ जाता है। रदनिका के अपमान से वह बहुत नाराज होता है किन्तु विट द्वारा सारी स्थिति बताने और प्रार्थना करने पर शान्त हो जाता है। विट वहाँ से चलने के लिए कहता है। किन्तु शकार वसन्तसेना को लिए बिना नहीं जाना चाहता है। कुछ देर बाद वह चारुदत्त को धमकी देकर वापस चला जाता है। विदूषक रदनिका को समझा बुझा कर भीतर ले जाता है।

प्रथम अंक के चतुर्थ दृश्य में चारुदत्त वसन्तसेना को रदनिका समझ लेता है और पुत्र रोहसेन को भीतर ले जाने के लिए उससे कहता है। वह पुत्र को ठंड से बचाने के लिये दुपट्टा ओढ़ने के लिए देता है। उसकी पुष्पगन्ध सूंघकर वसन्तसेना प्रसन्न हो जाती है। वह अभी भी उसके यौवन के प्रभाव को समझती है। वह चुपचाप खड़ी रहती है। अपने आदेश का पालन न होते देखकर चारुदत्त पुनः अपनी निर्धनता के लिये दुःखी होने लगता है। इतने में विदूषक और रदनिका वहाँ आ जाते हैं। तब वसन्तसेना की सारी घटना चारुदत्त को मालूम हो जाती है। वे दोनों परस्पर क्षमायाचना करने लगते हैं। वसन्तसेना अपने सारे गहनें उसके पास धरोहर के रूप में रख देती है। चारुदत्त और विदूषक दोनों वसन्तसेना को उसके घर छोड़ कर वापस लौटते हैं। चारुदत्त उस सुवर्ण-भाण्ड की रक्षा का भार दिन में वर्धमानक पर और रात में विदूषक पर डाल देता है।

द्वितीय अङ्क -

द्वितीय अङ्क के प्रथम दृश्य में वसन्तसेना और मदनिका रंगमंच पर आती हैं। एक चेटी वसन्तसेना की माता का आदेश लेकर वसन्तसेना से स्नान और पूजन करने के लिये कहती है। किन्तु वह इनकार कर देती है। वह चेटी वापस चली जाती है। मदनिका वसन्तसेना की उदासी देखकर इसका कारण पूछती है। वह चारुदत्त के प्रति अपने प्रेम का रहस्य प्रकट कर देती है। जब मदनिका चारुदत्त की अति निर्धनता कहती है तो वह अपना निर्लोभ प्रेम और रमणेच्छा प्रकट करती है।

द्वितीय अंक के दूसरे दृश्य में जूये में हारा हुआ संवाहक रंगमंच पर आता है। वह जुये की खूब निन्दा करता है और अपनी रक्षा के लिये मूर्तिरहित मन्दिर में जाकर देवता के समान निश्चल होकर खड़ा हो जाता है। उसको खोजते हुये सभिक माथुर और द्यूतकर भी वहीं पहुँच जाते हैं। वे अपनी हानि के लिये चिल्लाते

२२ मृच्छकटिक

हुये उसी मन्दिर में घुस कर फिर जुआ खेलने लगते हैं। जुआ देखकर संवाहक अपनी इच्छा नहीं रोक पाता है और अचानक खेलने आ जाता है। वे दोनों उसे पकड़ लेते हैं और अपनी उधार दी गयीं दश सुवर्ण-मुद्रायें माँगते हैं। न देने पर पीटने लगते हैं। तब संवाहक अपने को बेचकर ऋण चुकाना चाहता है। इसी बीच दर्दुरक आ जाता है। वह संवाहक का पक्ष लेता है। माथुर और दर्दुरक में झगड़ा होता है। मौका देखकर दर्दुरक माथुर की आँखों में धूल झोंक कर संवाहक से भागने का इशारा करता है। जब तक माथुर आँखों से धूल निकालता है तब तक वे दोनों भाग जाते हैं।

द्वितीय अंक के तीसरे दृश्य में माथुर और द्यूतकर के भय से भागा हुआ संवाहक वसन्तसेना के घर पहुँच जाता है। उसका पीछा करते हुये वे दोनों भी वहाँ पहुँच जाते हैं। संवाहक वसन्तसेना को अपना परिचय देकर अपने को चारुदत्त का पुराना सेवक (संवाहक) बताता है। इससे वसन्तसेना प्रसन्न होकर उसके भय का कारण पूछती है। वह जुये में हार और कर्ज की घटना बता देता है। सारी बातें सुन कर वसन्तसेना अपनी सेविका द्वारा आभूषण भेजकर उन दोनों को दिला देती है जिससे वे प्रसन्न होकर वापस चले जाते हैं। किन्तु जुये में हारने के कारण हुये अपमान की ग्लानि से वह संवाहक बौद्ध संन्यासी बनना चाहता है। वसन्तसेना द्वारा मना किये जाने पर भी वह अपना निश्चय नहीं बदलता है और संन्यासी बनने के लिये चला जाता है।

द्वितीय अंक के चौथे दृश्य में कर्णपूरक प्रवेश करता है। वह वसन्तसेना से उसके खुण्डमोटक नामक मतवाले हाथी के उपद्रव और उससे परिव्राजक को बचाने के लिये किये गये अपने पराक्रम की चर्चा करता है। वह भीड़ में खड़े हुये किसी व्यक्ति (चारुदत्त) द्वारा दिये गये दुपट्टा को दिखाता है। वसन्तसेना पहचान कर उसे ओढ़ लेती है और कर्णपूरक को पुरस्कार में आभूषण दे देती है। कर्णपूरक खुश होकर चला जाता है। उसके मुख से चारुदत्त के जाने की बात सुनकर वह सेविका के साथ ऊपर छत पर चढ़ कर चारुदत्त को देखने के लिये चली जाती है।

तृतीय अङ्क—

तृतीय अंक के प्रथम दृश्य में चारुदत्त का चेट रंगमंच पर आता है। आधी रात बीत चुकी है। संगीत का आनन्द उठाने के लिये गया हुआ चारुदत्त अभी तक वापस नहीं आया है। चेट स्वाभाविक दोष की निन्दा करके सोने के लिये चला जाता है।