भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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७२ मृच्छकटिकम्

विटः--अथ किम् ।

शकारः--इत्थिआणं शदं मालेमि । शूले हगे ? ( स्त्रीणां शतं मारयामि, शूरोऽहम् । )

वसन्त०--[ शून्यमवलोक्य । ] हद्धी ? हद्धी ? कथं परिअणो वि परि-ब्भट्ठो । एत्थ मए अप्पा सअं ज्जेव रक्खिदव्वो । ( हा धिक्, हा धिक् । कथं परिजनोऽपि परिभ्रष्टः । अत्र मया आत्मा स्वयमेव रक्षितव्यः )

विटः--अन्विष्यताम्, अन्विष्यताम् ।

शकारः--वशन्तशेणिए ? विलव विलव परहुदिअं वा पल्लवअं वा शव्वं वा वशन्तमाशं । मए अहिशालिअन्तीं तुमं के पलित्ताइश्शदि ? । [ वसन्तसेनिके ! विलप विलप परभृतिकां वा, पल्लवकं वा, सर्वं वा वसन्तमासम् । मया अभिसार्यमाणां त्वां कः परित्रास्यते ? ]

किं भीमशेणे जमदग्गिपुत्ते कुन्तीशूदे वा दशकन्धले वा ।
एशे हगे गेण्हिअ केशहत्थे दुश्शाशणश्शाणुकिकिंद कलेमि ॥ २६ ॥
( किं भीमसेनो जमदग्निपुत्रः कुन्तीसुतो वा दशकन्धरो वा ।
एषोऽहं गृहीत्वा केशहस्ते दुःशासनस्यानुकृतिं करोमि ॥ २६ ॥ )


विट--और क्या ।

शकार--स्त्रियाँ तो सैकड़ों मार सकता हूँ, मैं शूर हूँ ।

वसन्तसेना--( सूनसान देख कर ), ओह ! दुर्भाग्य है, ? दुर्भाग्य है ? क्या सेवक भी छूट गये ( खो गये ) यहाँ मुझे अपनी रक्षा स्वयं ही करनी है ।

विट--खोजिये, खोजिये !

शकार--वसन्तसेना ! बुलाओ, बुलाओ, परभृतिका को, पल्लवक को, अथवा सम्पूर्ण वसन्तमास को । मेरे द्वारा पीछा की जाती हुई तुम्हें कौन बचाता है ?

अन्वयः--किम्, भीमसेनः, जमदग्निपुत्रः, वा, कुन्तीसुतः, वा, दशकन्धरः, वा, ( त्वाम् रक्षिष्यति ), केशहस्ते, त्वाम्, गृहीत्वा, एषः, अहम्, दुःशासनस्य, अनु-कृतिम्, करोमि ॥ २६ ॥

शब्दार्थ--किम्=क्या, भीमसेनः=भीमसेन, ( तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? इसी प्रकार सब में जोड़ना चाहिये ) या जमदग्निपुत्रः=परशुराम, अथवा कुन्ती-पुत्रः=अर्जुन, अथवा दशकन्धरः=रावण ( तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? ) केश-हस्ते=केशपुञ्ज में, त्वाम्=तुम्हें, गृहीत्वा=पकड़कर अर्थात् तुम्हारे केशसमुदाय को पकड़ कर, एषः=यह, अहम्=मैं, दुःशासनस्य=दुर्योधन के छोटे भाई दुःशासन का, अनुकृतिम्=अनुकरण, नकल, करोमि=कर रहा हूँ ॥ २६ ॥