भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ७१

वसन्त०—पल्लवआ ! पल्लवआ ! परहुदिए ! परहुदिए ! ( पल्लवक ! पल्लवक ! परभृतिके ! परभृतिके ! )
शकारः—-( सभयम् ] भावे ! भावे ! मणुश्शे ! मणुश्शे ! [ भाव ! भाव ! मनुष्या मनुष्याः ]
विटः—न भेतव्यं न भेतव्यम् ।
वसन्त०—माहविए ! माहविए ! । ( माधविके ! माधविके ! )
विटः—( सहासम् ! ) मूर्ख ! परिजनोऽन्विष्यते ।
शकारः—भावे ? भावे ? इत्थिआं अण्णेशदि ? । ( भाव ! भाव ! स्त्रियमन्विष्यति ? )


**अर्थ—शकार —-**वन में कुत्तों द्वारा पीछा की जाती हुई शृगाली (सियारिन) के समान (यहाँ) हम लोगों द्वारा बहुत पीछा की जाती हुई तुम मेरे हृदय को मूल के साथ साथ ले जाती हुई बहुत जल्दी-२ वेगपूर्वक भाग रही हो ॥ २८ ॥

**टीका—-**वने=अरण्ये, कुक्कुरैः=श्वभिः, ( अभिसार्यमाणा=अनुगम्यमाना ), शृगाली=क्रोष्ट्री, शिवा, इव=तुल्या, ( अत्र=अस्मिन् स्थाने ) अस्माभिः=मया मम जनैश्च, अभिसार्यमाणा=अनुगम्यमाना, (त्वम्), मम=केवलस्य शकारस्येति बोधनार्थमेकवचनप्रयोगः इति ज्ञेयम्, हृदयम्=चित्तम्, सवृन्तम्=वृन्तेन सहितम्, हरन्ती=अपनयन्ती, शीघ्रम्, त्वरितम्, सवेगम्=अतीव शीघ्रतया, पलायसे=प्रधावसि । अत्र शकार-वचनत्वात् पुनरुक्तिदोषो न विचारणीयः । अस्माभिरित्यत्र बहुवचनेन विट-चेट-शकारादीनां बहूनां बोधः, सर्वेऽपि वसन्तसेनामनुसरन्ति किन्तु 'मम' इत्येकवचनेन केवलस्य शकारस्य हृदयहरणमिति बोध्यते ॥ २८ ॥

**विमर्श—**यहाँ वसन्तसेना की उपमा शृगाली से और अपने लोगों की उपमा कुत्तों से देना शकार के अनुरूप है। शीघ्रम्, त्वरितम्, सवेगम्, यह पुनरुक्ति भी उसी की है। यहाँ 'अस्माभिः' यह बहुवचन विट चेट तथा शकार इन तीनों के लिये प्रयुक्त करता है परन्तु 'मम हृदयम्' यहाँ वह केवल अपने हृदय-हरण को सूचित करने के लिए एकवचन का प्रयोग करता है। इसमें उपमा अलंकार और उपजाति छन्द है। इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा दोनों के लक्षण मिला दिये जाते हैं तो उपजाति नामक छन्द माना जाता है ॥ २८ ॥

**अर्थ—वसन्तसेना —**पल्लवक ! पल्लवक ! परभृतिके ! परभृतिके !
शकार—- ( भय के साथ ) भाव भाव ! पुरुष, पुरुष ।
विट— मत डरो, मत डरो ।
**वसन्तसेना—**माधविके ! माधविके !
विट—-( हँसते हुये ) मूर्ख ! नौकर खोजा जा रहा है ।
शकार—-भाव ! भाव ! क्या स्त्री को खोज रही है ?