भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

प्रथमोऽङ्कः ७१

वसन्त०—पल्लवआ ! पल्लवआ ! परहुदिए ! परहुदिए ! ( पल्लवक ! पल्लवक ! परभृतिके ! परभृतिके ! )
शकारः—-( सभयम् ] भावे ! भावे ! मणुश्शे ! मणुश्शे ! [ भाव ! भाव ! मनुष्या मनुष्याः ]
विटः—न भेतव्यं न भेतव्यम् ।
वसन्त०—माहविए ! माहविए ! । ( माधविके ! माधविके ! )
विटः—( सहासम् ! ) मूर्ख ! परिजनोऽन्विष्यते ।
शकारः—भावे ? भावे ? इत्थिआं अण्णेशदि ? । ( भाव ! भाव ! स्त्रियमन्विष्यति ? )


**अर्थ—शकार —-**वन में कुत्तों द्वारा पीछा की जाती हुई शृगाली (सियारिन) के समान (यहाँ) हम लोगों द्वारा बहुत पीछा की जाती हुई तुम मेरे हृदय को मूल के साथ साथ ले जाती हुई बहुत जल्दी-२ वेगपूर्वक भाग रही हो ॥ २८ ॥

**टीका—-**वने=अरण्ये, कुक्कुरैः=श्वभिः, ( अभिसार्यमाणा=अनुगम्यमाना ), शृगाली=क्रोष्ट्री, शिवा, इव=तुल्या, ( अत्र=अस्मिन् स्थाने ) अस्माभिः=मया मम जनैश्च, अभिसार्यमाणा=अनुगम्यमाना, (त्वम्), मम=केवलस्य शकारस्येति बोधनार्थमेकवचनप्रयोगः इति ज्ञेयम्, हृदयम्=चित्तम्, सवृन्तम्=वृन्तेन सहितम्, हरन्ती=अपनयन्ती, शीघ्रम्, त्वरितम्, सवेगम्=अतीव शीघ्रतया, पलायसे=प्रधावसि । अत्र शकार-वचनत्वात् पुनरुक्तिदोषो न विचारणीयः । अस्माभिरित्यत्र बहुवचनेन विट-चेट-शकारादीनां बहूनां बोधः, सर्वेऽपि वसन्तसेनामनुसरन्ति किन्तु 'मम' इत्येकवचनेन केवलस्य शकारस्य हृदयहरणमिति बोध्यते ॥ २८ ॥

**विमर्श—**यहाँ वसन्तसेना की उपमा शृगाली से और अपने लोगों की उपमा कुत्तों से देना शकार के अनुरूप है। शीघ्रम्, त्वरितम्, सवेगम्, यह पुनरुक्ति भी उसी की है। यहाँ 'अस्माभिः' यह बहुवचन विट चेट तथा शकार इन तीनों के लिये प्रयुक्त करता है परन्तु 'मम हृदयम्' यहाँ वह केवल अपने हृदय-हरण को सूचित करने के लिए एकवचन का प्रयोग करता है। इसमें उपमा अलंकार और उपजाति छन्द है। इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा दोनों के लक्षण मिला दिये जाते हैं तो उपजाति नामक छन्द माना जाता है ॥ २८ ॥

**अर्थ—वसन्तसेना —**पल्लवक ! पल्लवक ! परभृतिके ! परभृतिके !
शकार—- ( भय के साथ ) भाव भाव ! पुरुष, पुरुष ।
विट— मत डरो, मत डरो ।
**वसन्तसेना—**माधविके ! माधविके !
विट—-( हँसते हुये ) मूर्ख ! नौकर खोजा जा रहा है ।
शकार—-भाव ! भाव ! क्या स्त्री को खोज रही है ?

७२ मृच्छकटिकम्

विटः--अथ किम् ।

शकारः--इत्थिआणं शदं मालेमि । शूले हगे ? ( स्त्रीणां शतं मारयामि, शूरोऽहम् । )

वसन्त०--[ शून्यमवलोक्य । ] हद्धी ? हद्धी ? कथं परिअणो वि परि-ब्भट्ठो । एत्थ मए अप्पा सअं ज्जेव रक्खिदव्वो । ( हा धिक्, हा धिक् । कथं परिजनोऽपि परिभ्रष्टः । अत्र मया आत्मा स्वयमेव रक्षितव्यः )

विटः--अन्विष्यताम्, अन्विष्यताम् ।

शकारः--वशन्तशेणिए ? विलव विलव परहुदिअं वा पल्लवअं वा शव्वं वा वशन्तमाशं । मए अहिशालिअन्तीं तुमं के पलित्ताइश्शदि ? । [ वसन्तसेनिके ! विलप विलप परभृतिकां वा, पल्लवकं वा, सर्वं वा वसन्तमासम् । मया अभिसार्यमाणां त्वां कः परित्रास्यते ? ]

किं भीमशेणे जमदग्गिपुत्ते कुन्तीशूदे वा दशकन्धले वा ।
एशे हगे गेण्हिअ केशहत्थे दुश्शाशणश्शाणुकिकिंद कलेमि ॥ २६ ॥
( किं भीमसेनो जमदग्निपुत्रः कुन्तीसुतो वा दशकन्धरो वा ।
एषोऽहं गृहीत्वा केशहस्ते दुःशासनस्यानुकृतिं करोमि ॥ २६ ॥ )


विट--और क्या ।

शकार--स्त्रियाँ तो सैकड़ों मार सकता हूँ, मैं शूर हूँ ।

वसन्तसेना--( सूनसान देख कर ), ओह ! दुर्भाग्य है, ? दुर्भाग्य है ? क्या सेवक भी छूट गये ( खो गये ) यहाँ मुझे अपनी रक्षा स्वयं ही करनी है ।

विट--खोजिये, खोजिये !

शकार--वसन्तसेना ! बुलाओ, बुलाओ, परभृतिका को, पल्लवक को, अथवा सम्पूर्ण वसन्तमास को । मेरे द्वारा पीछा की जाती हुई तुम्हें कौन बचाता है ?

अन्वयः--किम्, भीमसेनः, जमदग्निपुत्रः, वा, कुन्तीसुतः, वा, दशकन्धरः, वा, ( त्वाम् रक्षिष्यति ), केशहस्ते, त्वाम्, गृहीत्वा, एषः, अहम्, दुःशासनस्य, अनु-कृतिम्, करोमि ॥ २६ ॥

शब्दार्थ--किम्=क्या, भीमसेनः=भीमसेन, ( तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? इसी प्रकार सब में जोड़ना चाहिये ) या जमदग्निपुत्रः=परशुराम, अथवा कुन्ती-पुत्रः=अर्जुन, अथवा दशकन्धरः=रावण ( तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? ) केश-हस्ते=केशपुञ्ज में, त्वाम्=तुम्हें, गृहीत्वा=पकड़कर अर्थात् तुम्हारे केशसमुदाय को पकड़ कर, एषः=यह, अहम्=मैं, दुःशासनस्य=दुर्योधन के छोटे भाई दुःशासन का, अनुकृतिम्=अनुकरण, नकल, करोमि=कर रहा हूँ ॥ २६ ॥

प्रथमोऽङ्कः ७३

णं पेक्ख, णं पेक्ख । [ ननु प्रेक्षस्व, ननु प्रेक्षस्व । ]

अशी शुतिक्खे, बलिदे अ मत्थके, कप्पेम शीशं उद मालएम वा ।
अलं तवेदेण पलाइदेण मुमुक्खु जे होदि, ण शे क्खु जीअदि ॥ ३० ॥
( असिः सुतीक्ष्णो बलितश्च मस्तकं कल्पये शीर्षम्, उत मारयामो वा ।
अलं तवैतेन पलायितेन मुमूर्षुर्यो भवति, न स खलु जीवति ॥ ३० ॥ )


**अर्थ—**क्या जमदग्निपुत्र परशुराम, अथवा, भीमसेन अथवा, कुन्तीपुत्र अर्जुनादि अथवा रावण तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? केशपाश में तुम्हें पकड़ कर यह मैं दुःशासन का अनुकरण करता हूँ । ( अथवा क्या जमदग्नि का पुत्र भीमसेन अथवा कुन्ती का पुत्र रावण तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? यह मैं तुम्हारे बालों को पकड़ कर दुःशासन का अनुकरण कर रहा हूँ । ) ॥ २६ ॥

**टीका—**किम्=इदं प्रश्ने, जमदग्निपुत्रः=जमदग्निनामकमहर्षेः सुतः=परशुरामः, अथवा भीमसेनः, कुन्तीसुतः=कुन्तीपुत्रः कर्णः अर्जुनो वा, दशकन्धरः=दशाननो वा, त्वां मत्तः रक्षितुं शक्नोति ? अत्र पृथ्वीधरः चतुर्णां पार्थक्येन वर्णनं करोति । परन्तु शकारवचनतया अत्र विशेष्यविशेषणभावं स्वीकृत्य ( १ ) जमदग्निपुत्रः भीमसेनः ( २ ) कुन्तीसुतः दशकन्धरः इत्येवोचितं प्रतिभाति । ईदृश-व्याख्यानेनैव दर्शकानां मनोरञ्जनमिति बोध्यम् । केशहस्ते=केशकलापे, त्वाम्=वसन्तसेनाम्, गृहीत्वा=आकृष्य, एषः=तादृशो विद्यमानः अहम्=शकारः, दुःशासनस्य=दुर्योधनानुजस्य, अनुकृतिम्=अनुकरणम्, करोमि=विदधामि । दुःशासनेन यथा द्रौपद्याः केशादीनामपहरणं विहितम् तथैवाद्याहमपि तव करोमीति भावः । अत्र चतुर्णां पार्थक्येन व्याख्याने न काप्यसङ्गतिः । विशेष्यविशेषणभावे तु—भीमसेनो न जमदग्निपुत्रोऽपितु पाण्डोः, दशकन्धरो न कुन्त्याः सुतोऽपितु अन्यस्येत्यसङ्गतिः, सा च शकारवचनतया परिहरणीया । उपमाऽलङ्कारः । इन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥ २६ ॥

**विमर्श—**इस श्लोक में चार स्वतन्त्र व्यक्तियों का वर्णन है अथवा केवल दो का ? इसके उत्तर में पृथ्वीधर ने चार का माना है। परन्तु भीमसेनः, कुन्तीपुत्रः इनमें असंगति विचारणीय है। शकार की भाषणशैली के अनुसार यहाँ ( १ ) जमदग्निपुत्रः भीमसेनः, ( २ ) कुन्तीसुतः दशकन्धरः—यही अधिक संगत प्रतीत होता है । इसी से शकार की अज्ञानता सूचित होती है क्योकि भीम जमदग्नि के नहीं पाण्डु के पुत्र थे और रावण कुन्ती का पुत्र नहीं था । इसमें एक 'वा' शब्द का आधिक्य है। यहाँ उपमा अलंकार और इन्द्रवज्रा छन्द है ॥ २६ ॥

अन्वयः—( मम ), असिः, सुतीक्ष्णः, ( अस्ति ), तव, मस्तकम्, च वलितम्, ( अस्ति ), ( तव ), शीर्षम्, कल्पये, उत, वा, मारयामि, तव, एतेन, पलायितेन, अलम्, यः, मुमूर्षुः, भवति, सः, खलु, न, जीवति ॥ २६ ॥

शब्दार्थः—( मम=मेरी=शकार की ), असिः=तलवार, सुतीक्ष्णः=बहुत तेज

७४मृच्छकटिकम्

बसन्त०-अज्ज ! अबला क्खु अहं । ( आर्य ? अबला खलु अहम् ) ।
विटः-अत एव ध्रियसे ।
शकारः-अदो ज्जेव ण मालीअशि । ( अत एव न मार्यसे । )

धारवाली है, च=और, तव=तुम्हारा, मस्तकम्=मस्तक, वलितम्=झुका हुआ अथवा सुन्दर, (अस्ति=है), (तव=तुम्हारे), शीर्षम्=शिर को, कल्पये=काट डालूँगा, उत वा=अथवा, मारयामि=मार डालूँगा, तव=तुम्हारे, एतेन=इस, पलायितेन=भागने से, अलम्=कोई लाभ नहीं, व्यर्थ है, यः=जो, मुमूर्षुः=मरने वाला, भवति=होता है, सः=वह, न=नहीं, जीवति=जीवित रहता है ॥ २९ ॥

अर्थ-देखो, देखो,
(मेरी) तलवार बहुत तेजधार वाली है, तुम्हारा शिर भी (मेरी ओर) झुका हुआ है, अथवा सुन्दर है; मैं तुम्हारा शिर काट डालूँगा अथवा मार डालूँगा। तुम्हारे इस प्रकार भागने से कोई लाभ नहीं है, व्यर्थ है, जो मरने वाला होता है, वह निश्चित रूप से जीवित नहीं रहता है ॥२६॥

टीका-(मम = शकारस्य), असिः = खड्गः, सुतीक्ष्णः =अतीव निशितः, अस्ति, (तव) मस्तकम् = शिरः, च=तथा, वलितम् = ममाभिमुखमवनतम्, सुन्दरं वा, अस्ति, शीर्षम्=वसन्तसेनायाः शिरः, कल्पये=छिनद्मि, उत वा=अथवा, मारयामि-हन्मि, तव=वसन्तसेनायाः, पलायितेन=धावनेन, अलम्=किमपि साध्यं नास्ति, व्यर्थमिति भावः, 'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इति नियमात् तृतीयेति बोध्यम्। कथं व्यर्थमत आह-मुमूर्षुः=आसन्नमरणः, यः=जनो, भवति=वर्तते, सः=जनः, न=नैव, खलु=निश्चयेन, जीवति=प्राणधारणं करोति। अत्र काव्यलिङ्गमलङ्कारः। वंशस्थेन्द्रवज्रयोः सम्मेलनादुपजाति वृत्तम् ॥ २९ ॥

विमर्श-वलितम् इसकी व्याख्या में 'सुन्दरम्, लालितम्, ऐसा लिखा गया गया है। परन्तु प्रसङ्गानुसार इसका अर्थ-अवनतम् झुका हुआ होना-अधिक तर्कसंगत है। वल संचरणे-से 'क्त' प्रत्यय का रूप है। क्योंकि झुके शिर को काटना सरल होता है। और भागते समय सिर आगे की ओर झुक जाता है। शिर काटना और मार डालना-समानार्थक हैं। किन्तु शकार के वचन होने से इसे दोष नहीं मानना चाहिये। कप्पेम इस-इस प्राकृत का संस्कृत रूपान्तर- 'कल्पये' और 'कृन्तामः दो प्राप्त होते हैं। दोनों का भाव समान है। मुमूर्षुः-मरने वाला, √ मृङ् (प्राणत्यागे) + सन् मुमूर्ष + उ। इसमें काव्यलिङ्ग अथवा अर्थान्तरन्यास अलंकार है। प्रथम और चतुर्थ चरण में वंशस्थ तथा द्वितीय और तृतीय में इन्द्रवज्रा है। दोनों को मिलाने पर उपजाति छन्द हो गया है ॥ २६ ॥

अर्थ वसन्तसेना-आर्य ! मैं तो अबला (बलहीन स्त्री) हूँ !
विट-इसी लिये (अभी तक) जीवित हो।
शकार-इसी लिये तुम्हारा वध नहीं किया जा रहा है।

प्रथमोऽङ्कः ७५

वसन्त० (स्वगतम्।) कधं अणूणओ वि शे भअं उप्पादेदि। भोदु, एव्वं दाव। (प्रकाशम्।) अज्ज ! इमादो किं पि अलङ्करणं तक्कीअदि ? (कथमनुनयोऽप्यस्य भयमुत्पादयति। भवतु एवं तावत्। आर्य ! अस्मात् किमप्यलङ्करणं तर्क्यते ?।)

विटः—शान्तम् पापम्, शान्तं पापम्। भवति वसन्तसेने ! न पुष्पमोषमर्हति उद्यानलता। तत् कृतमलङ्करणैः।

वसन्त०—ता किं क्खु दाणिं ? (तत् किं खलु इदानीम् ?।)

शकारः—हगे देवपुलिशे मणुश्शे वासुदेवके कामइदव्वे। (अहं देवपुरुषो मनुष्यो वासुदेवः कामयितव्यः।)

वसन्त०—(सक्रोधम्) शन्तं शन्तं। अवेहि, अणज्जं मन्तेशि (शान्तं शान्तम्। अपेहि, अनार्यं मंत्रयसि !)

शकारः—(सहस्ततालं विहस्य।) भावे ! भावे ! पेक्ख दाव। अन्तलेण शुशिणिद्धा एशा गणिआदालिआ णं। जेण मं भणादि, एहि शन्तेशि किलिन्तेशि त्ति। हगे ण गामन्तरं ण णगलन्तरं वा गड़े। अज्जुके ! शवामि भावश्श शीशं अत्तणकेहि पादेहि। तव ज्जेव्व पश्चाणुपुश्विक्याए आहडन्तं शन्ते किलिंते ह्नि संवृत्ते। (भाव ! भाव ! प्रेक्षस्व तावत्। अन्तरेण सुस्निग्धा एषा गणिकादारिका ननु। येन मां भणति—एहि, श्रान्तोऽसि, क्लान्तोऽसीति। अहं न ग्रामान्तरं न नगरान्तरं वा गतः। आर्यके ! शपे भावस्य शीर्षम्, आत्मीयाभ्याम् पादाभ्याम्। तवैव पृष्ठानुपृष्ठिकया आहिण्डमानः, श्रान्तः क्लान्तोऽस्मि संवृत्तः।)


वसन्तसेना—(स्वगत) क्यों, इसकी विनय भी भय उत्पन्न करा रही है। अच्छा, मैं ऐसा (करती हूँ)। (प्रकाश) आर्य ? आप मुझसे कोई गहना लेना चाहते हैं ?

**विट—**पाप शान्त हो, पाप शान्त हो। आदरणीय वसन्तसेने ! उद्यान की लता पुष्प तोड़ने योग्य नहीं होती है। (अर्थात् उसके फूल नहीं तोड़े जाते हैं।) अतः गहनों को रहने दो। (इन्हें नहीं लेना है।)

**वसन्तसेना—**तो, इस समय (आपका) क्या प्रयोजन ?

**शकार—**मुझ देवपुरुष, मनुष्य, वासुदेव की कामना करो।

वसन्तसेना—(क्रोध के साथ) शान्त, शान्त अर्थात् चुप रहो, चुप रहो। दूर हट जाओ। तुम अनार्य=अशिष्ट=अनुचित बात कर रहे हो।

शकार—(ताली बजाते हुये हँस कर) भाव ! भाव ! जरा देखो तो। यह वेश्यापुत्री हृदय से (मुझपर) निश्चित ही प्रसन्न है। इसी लिये मुझसे कह रही है—'आओ थक गये हो, खिन्न हो गये हो।' मैं न किसी दूसरे गाँव गया न किसी दूसरे शहर। आर्ये ! मैं अपने पैरों से भाव=विट के शिर की शपथ खाता हूँ। तुम्हारे ही पीछे पीछे घूमता हुआ थका और खिन्न हो गया हूँ।

७६ मृच्छकटिकम्

विटः—( स्वगतम् ) अये ! कथं शान्तमित्यभिहिते श्रान्त इत्यवगच्छति मूर्खः । ( प्रकाशम् । ) वसन्तसेने ! वेशवासविरुद्धमभिहितं भवत्या । पश्य—

टीका—अबला=न बलं यस्याः सा, दीनेत्यर्थः । ध्रियसे प्राणैरिति शेषः । जीवसीत्यर्थः । मार्यसे=हन्यसे मयेति शेषः । अस्य=शकारस्य, अनुनयः=विनयः, अस्मात्=अबलारूपमादृशजनात्, तक्यंते=चिन्त्यते, ग्रहीतुमिष्यते इति भावः । पुष्पमोषम्=कुसुमत्रोटनम्, नार्हति=न शोभते इति भावः । कृतम्=अलम् । इदानीम्=अधुना, प्रयोजनमिति शेषः । अहम्=राजश्यालकः शकारः, देवपुरुष-इत्यादीनां कथनं मूर्खत्वसूचकम् । कामयितव्यः=अभिलषणीयः । शान्तं शान्तम्=मा ब्रूहि, मा ब्रूहीति भावः । अपेहि=दूरं याहि, अनार्यम्=आर्यजनविरुद्धम्, अशिष्टमित्यर्थः, मन्त्रयसि=वदसि । सहस्ततालम्=करतलताडनपूर्वकम् । अन्तरेण=हृदयेन, सुस्निग्धा=अत्यनुरक्ता मयीति शेषः, गणिका दारिका=वेश्यास्त्री । अत्र केचित्—माम् अन्तरेण सुस्निग्धा—इति पाठं प्रकल्प्य ‘अन्तराऽन्तरेण युक्ते’ ( पा. सू. २।३।४ ) इति द्वितीयेत्याहु-स्तन्न, तत्र सूत्रे ‘अन्तरेण’ इति विनार्थकोऽव्ययशब्दः । अत्र ‘अन्तरेण’ इति तृतीयान्तो हृदयवाचीति बोध्यम् । पृष्ठानुपृष्ठिकया = पृष्ठामनुपृष्ठमित्यस्यां क्रियायामित्यर्थे ठन्=इक--प्रत्यये टापि पृष्ठानुपृष्ठिका, तया, पश्चात् पश्चात्-इति भावः । आहिण्ड-मानः=अनुसरन्, संवृत्तः=जातः ॥

विमर्श—ध्रियसे=प्राणों द्वारा धारण की जा रही हो, जीवित हो । तक्यंते=सोंचते हैं । अर्थात् क्या लेने की सोंचते है । अनार्यम्--शिष्ट लोगों की मर्यादा का उल्लंघन करते हुये कहना । कुछ विद्वानों ने ‘( माम् ) अन्तरेण सुस्निग्धा’ यह पाठ मान कर ‘अन्तरान्तरेण युक्ते’ सूत्र से द्वितीया का विधान किया है । परन्तु यह व्याकरणानभिज्ञता का परिचायक हैं । क्योंकि इस सूत्र में ‘अन्तरेण’ यह अव्यय शब्द है और इस का अर्थ है—विना=अतिरिक्त । इसी लिये सिद्धान्त--कौमुदी आदि में इसका उदाहरण यह है—अन्तरेण हरिं न सुखम् । परन्तु प्रस्तुत ‘अन्तरेणं’ यह हृदयवाचक तृतीयाविभक्त्यन्त है—इसका अर्थ है—हृदय से चाहती है । अतः ‘माम्’ से रहित ही पाठ भी मानना चाहिये । यदि आग्रह है तो ‘मम अन्तरेण सुस्निग्धा-’ हृदय से मेरी अनुरक्त है । श्रान्तः--वसन्तसेना ने—शन्तं, शन्तं—यह प्राकृत बोला । शकार ने इसे शन्त=श्रान्त समझा और उसी के आधार पर उत्तर दिया । पृष्ठानुपृष्ठिकया पृष्ठम् अनुपृष्ठम्-इत्यस्यां क्रियायाम्--इस अर्थ में ठन्=इक प्रत्यय और टाप् करके तृतीया एकवचन का रूप है । आहिण्ड-मानः आ + √ हिण्ड् + शानच्=आन ।

अर्थ--विट--( स्वगत ) अरे ! ‘शान्त’ ऐसा कहा जाने पर यह मूर्ख ‘श्रान्त’ ऐसा क्यों समझ रहा है । ( प्रकाश ) वसन्तसेने ! वेश्यालय के निवास के विरुद्ध तुमने कहा है । ( अर्थात् वेश्या को ऐसा नहीं कहना चाहिये ।)

प्रथमोऽङ्कः ७७

तरुणजनसहायश्चिन्त्यतां वेशवासो, विगणय गणिका त्वं मार्गजाता लतेव । वहसि हि धनहार्यं पण्यभूतं शरीरं, सममुपचर भद्रे ! सुप्रियं चाप्रियञ्च ॥३१॥

अन्वयः—वेशवासः, तरुणजनसहायः, चिन्त्यताम्, विगणय, मार्गजाता, लता, इव, त्वम्, गणिका, असि, हि, पण्यभूतम्, धनहार्यम्, शरीरम्, वहसि, भद्रे ! सुप्रियम्, च अप्रियम्, च, समम्, उपचर ॥३१॥

शब्दार्थः—पश्य=देखो, वेशवासः=वेश्यालय का निवास, तरुणजनसहायः=युवा जनों की सहायता पर आश्रित [ होता है, इति=ऐसा ] चिन्त्यताम्=समझ लो, विगणय=सोचों, त्वम्=तुम, मार्गजाता=सड़क पर पैदा होने वाली, लता इव=लता के समान, गणिका=वेश्या हो, हि=क्योंकि, पण्यभूतम्=बेची जानी वाली वस्तु के समान, धनहार्यम्=धन से प्राप्य=खरीदने योग्य, शरीरम्=शरीर को, वहसि=धारण करती हों, (अतः) भद्रे ! =हे भद्र वारी, सुप्रियम्=बहुत अधिक प्रिय को, च=और, अप्रियम्=अप्रिय=अनचाहे को, समम्=समान रूप से, उपचर=व्यवहार करो, उनकी सेवा करो ॥ ३१ ॥

अर्थ—देखो...

वेश्यालय का निवास युवक जनों की सहायता पर आश्रित रहने वाला होता है, यह समझ लो, (अतः युवक शकार की अवहेलना मत करो)। सोंचो, सड़क पर उत्पन्न लता के समान (सभी द्वारा उपभोग्या) तुम वेश्या हो, क्योंकि विक्रय-योग्य पदार्थ के समान धन से खरीदने योग्य शरीर को धारण कर रही हो। (अतः, हे भद्रे ! सुप्रिय अथवा अप्रिय दोनों के साथ समान रूप से व्यवहार करो ॥ ३१ ॥

टीका—पश्य=अवलोकय-इति गद्येनान्वयः। वेशवासः=वेशे=वेश्यालये, वासः=निवासः, वेश्याजनवासस्थानमित्यर्थः, तरुण-जन-सहायः=तरुणजनः सहायो यस्य तादृशः, तरुणजनप्रदत्तधनाश्रितः इति भावः, इति=इदम्, चिन्त्यताम्=अवधार्यताम्; विगणय=विशेषेण विचारय, मार्गजाता=मार्गे=पथि, जाता=उत्पन्ना, लता=वल्ली इव=यथा, त्वम्, गणिका=वेश्या, असि, यथा मार्गोत्पन्नाया लतायाः सामान्यतया सर्वैरुपभोगः क्रियते तथैव तवाप्युपभोगः सर्वसाधारण इति त्वं विचारय, हि=यतः, पण्यभूतम्=विक्रेयवस्तुतुल्यम्, धनहार्यम्=धनप्राप्यम्, शरीरम् = देहम्, वहसि=धारयसि, अतः, भद्रे ! =सुस्वभावे ! सुप्रियम्=अभीप्सितम्, अप्रियम्=अनीप्सितम् च=तथा, समम्=समानरूपेण, उपचर=श्रयस्व, सेवस्व, अत्राधिकश्चकारः । अत्रोपमा काव्यलिङ्गं च । मालिनी वृत्तम् ॥ ३१ ॥

विमर्श—तरुणजनसहायः-तरुणाश्च ते जनाः ते सहायाः=सहायकाः यस्य स तादृशः-अर्थात् वेश्यालय में रहना तभी हो पाता है जब तरुणजन उन पर आकृष्ट होकर धनादि देते रहते हैं। विगणय-वि-+-√गण-+-णिच्-+-लोट् । विशेषरूप

७८ मृच्छकटिकम्

अपि च—

वाप्यां स्नाति विचक्षणो द्विजवरो मूर्खोऽपि वर्णाधमः,
फुल्लं नाम्यति वायसोऽपि हि लतां या नामिता बर्हिणा।
ब्रह्मक्षत्रविशस्तरन्ति च यया नावा तयैवेतरे,
त्वं वांपीव लतेव नौरिव जनं वेश्यासि सर्वं भज ॥ ३२ ॥

से विचार करो, क्योंकि वसन्तसेना तुम्हारी स्थिति उसी प्रकार है जैसे सड़क पर पैदा हुई लता की। जो भी चाहता है, उसे मसल सकता है, तोड़ सकता है, प्रशंसा कर सकता है, निन्दा कर सकता है। धनहार्यम्-धनेन हार्यम्, पण्यभूतम्--पण्यंभूतम्-पण्यभूतम् विक्रेय पदार्थ के समान, जिसे कोई भी खरीद सकता है। उपचर-उप + √ चर् + लोट् = व्यवहार करो, अर्थात् इच्छा पूरी करो। इसमें उपमा और काव्यलिङ्ग अलङ्कार हैं। मालिनी छन्द है—

न-न-म-यय-ययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥ ३१ ॥

अन्वयः--विचक्षणः, द्विजवरः, मूर्खः, वर्णाधमः, अपि, (एकस्यामेव) वाप्याम् स्नाति, या, बर्हिणा, नामिता, फुल्लाम्, (तामेव), लताम्, वायसः, अपि, नाम्यति, हि, यथा, नावा, ब्रह्मक्षत्रविशः, तरन्ति, तया, एव, इतरे, च, (तरन्ति), त्वम्, वेश्या, असि, अतः, वापी, इव, लता, इव, नौः, इव, सर्वम्, जनम् भज ॥ ३२ ॥

शब्दार्थ—विचक्षणः=अतिशय विद्वान्, द्विजवरः=ब्राह्मण, (और) मूर्खः=मूर्ख, अशिक्षित, वर्णाधमः=नीच जाति वाला शूद्र, अपि=भी, (एकस्यामेव=एक ही) वाप्याम्=बावड़ी में, स्नाति=स्नान करता है, या=जो लता, बर्हिणा=मोर द्वारा (बैठनेसे) नामिता=झुकाई गई थी, फुल्लाम्=फूली हुई, खिली हुई, ताम्=उस, लताम्=लता को (ही), वायसः=कौआ, अपि=भी, नाम्यति=झुका देता है, हि=प्रसिद्ध ही है कि, यथा=जिस, नावा=नौका से, ब्रह्मक्षत्रविशः=ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, तरन्ति=(गंगादि नदियां) पार करते है, तया एव=उसी नौका से, इतरे=इन तीनों से भिन्न=शूद्र, च=भी, (पार करते हैं,) त्वम्=तुम, वेश्या=वेश्या, असि=हो, (अतः=इसलिये) वापी इव=बावड़ी के समान, लता इव=लता के समान, (और), नौः इव=नौका के समान, सर्वम्=सभी, जनम्=लोगों की, भज=सेवा करो, सन्तुष्ट करो ॥ ३२ ॥

अर्थ—और भी, अतिशय विद्वान् ब्राह्मण (और) मूर्ख वर्णाधम=शूद्रादि (एक ही) बावड़ी में स्नान करता है। जो लता (ऊपर बैठकर) मोर द्वारा झुकाई गयी थी, उसी फूली हुई लता पर (बैठकर) कौआ झुका देता है। जिस नौका से ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य (गंगादि नदियाँ) पार करते हैं उसी से शूद्र भी। तुम (वसन्त-

प्रथमोऽङ्कः ७६

सेना ) वेश्या हो, इसलिये बावड़ी के समान, लता के समान और नौका के समान सभी लोगों की सेवा करो अर्थात् जैसे ये तीनों किसी भेदभाव के बिना व्यवहार करती हैं वैसी ही वेश्या होने से तुम्हें भी भेदभाव नहीं करना चाहिये ।। ३२ ।।

टीका -- **विचक्षणः=**अतिशयविद्वान्, द्विजवरः=ब्राह्मणश्रेष्ठः, तथा, **मूर्खः=जडः, वर्णाधमः=वर्णेनाधमः=**निकृष्टः **शूद्रादिः, अपिः=**समुच्चये, **एकस्यामेव वाप्याम्=**दीर्घिकायाम्, **स्नाति=**निमज्जति, शरीरं प्रक्षालयतीत्यर्थः। **या=**लता, तदुपरि स्थित्वा, **बर्हिणा=**मयुरेण, **नामिता=**अधःकृता, **ताम्=**तामेव, **फुल्लाम्=विकसिताम्, लताम्=**वल्लीम्, **वायसः=**काकः **अपि, नाम्यति=**नामयति, नाम्यतीति कण्ड्‌वादिपाठात् 'नामं करोतीत्यर्थे यकि अकारलोपे च रूपम् । यथा मगधशब्दे मागध्यतीति भवति । नामं करोतीत्यर्थे णिचि 'संज्ञा पूर्वको विधिरनित्यः' इति गुणमकृत्वा यणादेशे नाम्यतीति रूपमित्येके । ण्यन्तात् सम्पदादिपाठमभ्युपेत्य क्विपि क्यचि रूपम् इत्यपरे--इति पृथ्वीधरः । **यया=**नावा च, **ब्रह्म-क्षत्रविशः=ब्राह्मण-क्षत्रियवैश्याः, तरन्ति=**नद्याः पारं प्रयान्ति, **तया एव नावा=**तया एव नौकया, **इतरे च=वर्णाधमाः शूद्राश्च तरन्तीति शेषः । फलितमाह-त्वम्=**सवन्तसेनेत्यर्थः, **वेश्या=**गणिका, **असि=**वर्तसे, **अतः, वापी इव=**दीर्घिका इव, **लता इव=**वल्ली **इव, नौः इव=**नौका इव, **सर्वम्=**त्वत्समीपे आगच्छन्तं निखिलम्, **जनम्=**लोकम्, **भज=**सेवस्व । यथा वापी, लता, नौका इमाः अभेदपूर्वकं सर्वान्, समानरूपेण व्यवहारन्ति तथैव वेश्ये वसन्तसेने ! त्वयापि सर्वेषामपि सेवा विधेयेति शकारमपि सन्तोषयेति भावः । अत्र मालोपमा, तुल्ययोगिता काव्यलिङ्गञ्चेत्येतेषां परस्परमङ्गाङ्गिभावेन सङ्करालङ्कारः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम्-सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूल विक्रीडितम् ।। ३२ ।।

विमर्श -- विचक्षणः द्विजवरः-बहुत बड़ा विद्वान् ब्राह्मणश्रेष्ठ पुरुषः । **वर्णाधमः-वर्णेन अधमः=**शूद्रादिः । √फुल्ल विकसने-इस भौवादिक धातु से ही 'क्त' और परसवर्ण करके-फुल्ला शब्द के द्वि० ए० व० में फुल्लाम् यह रूप है। कुछ लोगों ने √'फुल्' धातु से क्त प्रत्यय माना है वह असंगत है क्योंकि तुदादिगणीय फुल का अर्थ संचरण है । नाम्यति-इसकी व्युत्पत्ति अनेक रूपों से की गई है-(१) आकृतिगण मानकर कण्ड्‌वादिगण में इसका पाठ मानकर-नामं करोति-इस अर्थ में 'कण्ड्‌वादिभ्यो यक्' ( पा० सू० ) से यक् प्रत्यय और 'अ' लोप कर के 'नाम्यति' यह रूप होता है । (२) नमनं=नामः, नामं करोति-इस अर्थ में णिच् प्रत्यय होता है 'संज्ञापूर्वोको विधिरनित्यः' के आधार पर 'इ' का गुण न करके यण् करने पर नाम्यति होता है पक्ष में नामयति । (३) णिजन्त नामि का सम्पदादि गण में पाठ कल्पित करके क्विप् और क्यच् प्रत्यय करके नाम्यति रूप सम्भव है । **सर्वम्=**जिस प्रकार स्नान कराने में वापी किसी से भेद नहीं करती है,

८०मृच्छकटिकम्

वसन्त०—गुणो क्खु अणुराअस्स कारणं, ण उण बळाक्कारो। (गुणः खलु अनुरागस्य कारणम् न पुनर्बलात्कारः।)

शकारः—भाव ! भावे ! एशा गब्भदासी कामदेवाअदणुज्जाणादो पहुदि ताह दलिद्दचालुदत्ताह अणुलत्ता ण मं कामेदि। वामदो तश्श घलं। जधा तव मम अ हत्यादों एशा ण पलिब्भंशदि, तथा कलेदु भावे। (भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता, न मां कामयते। वामतस्तस्य गृहम्, यथा तव मम च हस्तात् एषा न परिभ्रश्यति, तथा करोतु भावः।)

विटः—(स्वगतम्।) यदेव परिहर्त्तव्यं तदेवोदाहरति मूर्खः। कथं वसन्तसेना आर्यचारुदत्तमनुरक्ता? सुष्ठु खल्विदमुच्यते—'रत्नं रत्नेन सङ्गच्छते' इति। तद्गच्छतु, किमनेन मूर्खेण ! (प्रकाशम्।) काणेलीमातः ! वामतस्तस्य सार्थवाहस्य गृहम् ?।


झुकने में लता भेद नहीं करती है, वसन्तसेना भी इसी श्रेणी में आती है। अतः इसे शकार की सेवा में उपस्थित ही होना चाहिये।

(१) इसमें अप्रस्तुत पदार्थ—द्विजवर और वर्णाधम का स्नानरूप एक क्रिया के साथ सम्बन्ध है। और बाह्मण क्षत्रिय वैश्यों का तथा इतर=शूद्र का तरण रूप एक क्रिया के साथ सम्बन्ध है। अतः दोनों में तुल्ययोगिता अलंकार है। (२) वेश्या रूपी एक उपमेय का तीन (वापी, लता, नौका) उपमानों के साथ सादृश्य वर्णित होने से मालोपमा है। (३) सर्वं भज—सभी की सेवा करो—इस वाक्यार्थ के प्रति 'त्वं वेश्यासि' यह वाक्यार्थ हेतु है अतः काव्यलिङ्ग है। (४) इनका परस्पर अङ्गाङ्गिभाव होने से संकर अलंकार है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। लक्षण—

सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ३२ ॥

अर्थ—वसन्तसेना—प्रेम का कारण गुण होता है, बलात्कार नहीं।

शकार—भाव ! भाव जन्म काल से ही दासी यह वसन्तसेना काम-देवा-यतन उद्यान (में जाने) से लेकर उस दरिद्र चारुदत्त पर ही अनुरक्त है, मुझे नहीं चाहती है। बाँयी ओर उस (चारुदत्त) का घर है। आप ऐसा उपाय कीजिये जिससे मेरे तथा आपके हाथ से यह न निकल सके।

विट—(स्वगत)—जो नहीं कहना चाहिये, मूर्ख वही कह रहा है। क्या वसन्तसेना चारुदत्त पर अनुरक्त है? यह ठीक ही कहा जाता है—'रत्न रत्न से ही मिलता है।' अच्छा तो (वसन्तसेना) जाय, इस मूर्ख के लिये क्या चिन्ता करना ! (प्रकाश) अरे काणेलीपुत्र ! बाँयी ओर उस सार्थवाह (चारुदत्त) का घर है ?

प्रथमोऽङ्कः ८१

**शकारः—**अध इं, वामदो तश्श घलं । ( अथ किम्, वामतस्तस्य गृहम् । )

वसन्त०—( स्वगतम् । ) अह्नाहे ! वामदो तश्श गेहं त्ति जं सच्चं, अवरज्झन्तेण वि दुज्जणेण उवकिदं, जेण पिअशङ्गमं पाविदं । ( आश्चर्यम् । वामतस्तस्य गृहमिति यत्सत्यम्, अपराध्यतापि दुर्जनेन उपकृतम्, येन प्रियसङ्गमः प्रापितः । )


शकार—और क्या । बायीं ओर ही उसका घर है ।

वसन्तसेना ( स्वगत ) आश्चर्य ! बाँयी ओर उस ( चारुदत्त ) का घर है यह यदि सत्य है तो अपराध करते हुये भी इस दुष्ट ने ( मेरा ) भला ही किया है जिससे प्रियसंगम ( प्रेमी चारुदत्त का मिलन ) हो गया ।

**टीका—**गुणः=औदार्यादिः, अनुरागस्य=प्रेम्णः, बलात्कारः=बलपूर्वकं करणम्, गर्भदासी=जन्मप्रभृति चेटी, कामदेवायतनोद्यानात्=कामंदेवस्य=मदनस्य, आयतनम्=स्थानम् तत्सम्बन्धि यदुद्यानम् तत्र जातात् चारुदत्त-दर्शनाद्, प्रभृति=आरभ्य, चारुदत्तस्य अनुरक्ता=चारुदत्त-कर्मकानुरागवतीति भावः, कामयते=इच्छति, परिभ्रश्यति=प्रच्युता जायते, परिहर्त्तव्यम्=परित्यक्तव्यम्, वर्जनीयम्, उदाहरति=वदति, कथम्=किम्, तद्गच्छतु=तस्मात् व्रजतु, वसन्तसेना इति भावः, किम्=न किमपीत्यर्थः । काणेलीमातः=अविवाहिता कन्या, व्यभिचारिणी असती स्त्री वा माता यस्य सः, तत्सम्बुद्धौ रूपम् । "काणेली कन्यकामाता' इति देवीप्रकाशः । 'असती काणेली' इत्येके इति पृथ्वीधरः । अपराध्यतापि=अशिष्टाचारमविनयं कुर्वंतापीत्यर्थः, प्रियसङ्गमः=चारुदत्तस्य संसर्गः, प्रापितः=सम्पादितः । अत्र 'प्रियसङ्गमं प्रापिता' इति उचितः पाठः ।

**विमर्श—**बलात्कारः=बलपूर्वक किसी को अपने प्रति अनुरक्त बनाना सम्भव नहीं होता है, यह वसन्तसेनाका आशय है । गर्भदासी = वेश्याकुल में उत्पन्न स्त्री जन्मकाल से ही दासी बन जाती है। चारुदत्तस्य अनुरक्ता—यहाँ कर्म की अविवक्षा मानकर सम्बन्धसामान्य में षष्ठी है—चारुदत्त-सम्बन्धि-अनुरागवती—यह अर्थ है । उदाहरति—उद् + आ + √हृ + लट् प्र. पु. ए. व. । तद्गच्छतु—यह वसन्तसेना को ध्यान में रख कर कहा है—तो वसन्तसेना चली जाय। काणेलीमातः—व्यभिचारिणी के बच्चे ! काणेली=असती, अथवा कन्या माता यस्य सः—सम्बोधन का रूप है। प्रियसङ्गमः—यहाँ दो प्रकार के पाठ मिलते हैं (१) जेण पिअसंगमं पाविदा=येन प्रियसंगम प्रापिता—जिससे प्रिय संगमको प्राप्त कराई गई—यह अर्थ अधिक अच्छा है। ( २ ) जेण पिअसंगमं पाबिदं—येन प्रियसंगमः प्रापितः—जिससे प्रियसंगम कराया गया ।

६ मृ०

८२ मृच्छकटिकम्

शकारः—भावे ! भावे ! वलिए क्खु अन्धआले माशराशिपाविट्ठा विअ मशिगुडिआ दीशन्दी ज्जेव पणट्ठा वशन्तशेणिआ । ( भाव ! भाव ! बलीयसि खल्वन्धकारे माषराशिप्रविष्टेव मसीगुटिका दृश्यमानैव प्रनष्टा वसन्तसेना ।

विटः—अहो ! बलवानन्धकारः । तथाहि—

आलोकविशाला मे सहसा तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना । उन्मीलितापि दृष्टिनिमीलितेवान्धकारेण ॥ ३३ ॥

अपि च—

लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः ।


अर्थः—शकार—भाव ! भाव ! इस घोर अन्धकार में, ( काले ) उड़द के ढेर मे गिरी हुई स्याही की टिकिया के समान, दिखाई पड़ती हुई ही वसन्तसेना गायब=अदृश्य हो गई ।

अन्वयः—आलोकविशाला, मे, दृष्टिः, सहसा, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना, (अत एव ), उन्मीलिता, अपि, अन्धकारेण, निमीलिता, इव, ( भवति ), ॥३३॥

शब्दार्थ—आलोकविशाला=प्रकाश में ( सभी कुछ देखने में ) समर्थ, मे=मेरी (=विट की), दृष्टिः = आंख, सहसा = अचानक, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=अन्धकार के आ जाने से शक्तिरहित अथवा अन्धकार में आ जाने से शक्तिरहित ( अत एव=इसीलिये ), उन्मीलिता=खुली हुई, अपि=भी, अन्धकारेण=अन्धेरे के कारण, निमीलितां इव=बन्द के समान, ( भवति=हो रही है ।) ॥ ३३ ॥

अर्थ—विट—अरे घोर अन्धकार है । क्योंकि—

प्रकाश में (सभी कुछ) देखने में समर्थ मेरी दृष्टि ( नेत्र ) अचानक अन्धेरा आ जाने से ( अथवा अन्धेरे में आ जाने से ) शक्तिहीन ( हो गई है । इसीलिये ) खुली हुई भी अन्धकार के कारण बन्द के समान हो रही है ॥ ३३ ॥

टीका—आलोकविशाला=आलोके=दर्शने विशाला अथवा, आलोके=प्रकाशे विशाला, मे=मम, विटस्येत्यर्थः, दृष्टिः = नेत्रज्योतिरित्यर्थः, सहसा=झटिति, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=तिमिरे प्रवेशेन विच्छिन्ना, तिमिरस्य प्रवेशेन = आगमनेन विच्छिन्ना=हीनशक्तिः, अतः, उन्मीलितापि=उद्घाटितापि, अन्धकारेण=तमसा, निमीलिता=मुद्रिता इव भवतीति भावः । अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः । आर्या वृत्तम् ॥३३॥

विमर्शः—आलोकविशाला=आलोके=देखने में विशाल=अतिसमर्थ, अथवा आलोके=प्रकाश में कार्यसमर्थ । तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=तिमिर में प्रवेश करने से हीनशक्तिवाली अथवा तिमिरं=अन्धकार के आ जाने से क्षीण शक्तिवाली । निमीलिता इव—यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है और आर्या छन्द है ॥ ३३ ॥

प्रथमोऽङ्कः ८३

असत्पुरुषसेवेव दृष्टिविफलतां गता ॥ ३४ ॥

शकारः—भावे ! भावे ! अण्णेशामि वशन्तशेणिअं ? । (भाव ? भाव ! अन्विष्यामि वसन्तसेनिकाम् ।)
विटः—काणेलीमातः ! अस्ति किञ्चिच्चिह्नं यदुपलक्षयसि ।
शकारः—भावे ! भावे ! किं बिअ ? (भाव ! भाव ! किमिव ?)
विट—भूषणशब्दं सौरव्यानुविद्धं माल्यगन्धं वा ।

**अन्वयः—**तमः, अङ्गानि, लिम्पति, इव, नभः, अञ्जनम्, वर्षति, इव, असत्पुरुषसेवा, इव, दृष्टिः, विफलताम्, गता ॥ ३४ ॥

**शब्दार्थः—**तमः = अन्धेरा, अङ्गानि = अवयवों को, लिम्पति इव = लीप सा रहा है; व्याप्त कर रहा है, नभः = आकाश, अञ्जनम् = अँजन = काजल आदि, वर्षति इव = बरसा सा कर रहा है, असत्पुरुषसेवा = दुष्टजनशुश्रूषा के, इव = समान, दृष्टिः = नेत्रज्योति, विफलताम् = विफलता को, गता = प्राप्त हो गई है ॥ ३४ ॥

**अर्थ—**और भी, अन्धेरा अवयवों को व्याप्त सा कर ले रहा है, आकाश अंजन की बरसा सी कर रहा है, दुष्ट पुरुष की सेवा के समान मेरी दृष्टि व्यर्थ हो गई है ॥ ३४ ॥

**टीका—**तमः = अन्धकारः, अङ्गानि = अवयवान्, लिम्पति इव = व्याप्नोति इव, नभः = आकाशः, अञ्जनम् = कज्जलादिकम्, वर्षति इव = पातयति इव, अत्रोभय-त्रोत्प्रेक्षा, असत्पुरुषसेवा इव = दुष्टपुरुषसमाराधना इव, दृष्टिः = नेत्रज्योतिः, विफलताम् = निष्फलत्वम्, गता = प्राप्ता । असत्पुरुषसेवेत्यनेन शकारसेवायां निष्फलत्वं ध्वनितमिति बोध्यम् । अत्र पूर्वार्द्धे उभयत्र उत्प्रेक्षा, उत्तरार्द्धे चोपमा—इत्यनयोः संसृष्टिः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ३४ ॥

**विमर्शः—**असत्पुरुषसेवा इव—यहाँ दुष्ट शकार की सेवा का संकेत है । वह व्यर्थ है । अतः वसन्तसेना उसे नहीं चाहती है, यह ठीक ही है । पूर्वार्द्ध में दोनों वाक्यों में क्रिया के साथ 'इव' का प्रयोग होने से उत्प्रेक्षा है । उत्तरार्द्ध में उपमा है । इन दोनों की संसृष्टि है । यमक और अनुप्रास ये शब्दालंकार भी हैं । इसमें अनुष्टुप् छन्द है । लक्षण—

श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ ३४ ॥

**अर्थ—शकार—**भाव ! भाव ! वसन्तसेना को ढूँढ़ता हूँ ।
**विट—**काणेलीपुत्र ! कोई चिह्न है जिसके माध्यम से तुम (वसन्तसेना को) खोज रहे हो ।
**शकार—**भाव ! भाव ! कैसा (चिह्न) ?
**विट—**आभूषणों की आवाज अथवा सुगन्धित फूलों की गन्ध ।

८४
मृच्छकटिकम्

शकार--शुणामि मल्लगन्धं अन्धआलपूलिदाए उण णाशिआए सुव्वत्तं, उण ण पेक्खामि भूषणशद्दं ! ( शृणोमि माल्यगन्धम्, अन्धकार-पूरितया पुनर्नासिकया सुव्यक्तं पुनर्न प्रेक्षे भूषणशब्दम् । )

विट:--( जनान्तिकम् । ) वसन्तसेने ?

कामं प्रदोषतिमिरेण न दृश्यसे त्वं
सौदामनीव जलदोदरसन्धिलौना ।
त्वां सूचयिष्यति तु माल्यसमुद्भवोऽयं
गन्धश्च भीरु ! मुखराणि च नूपुराणि ॥ ३५ ॥

श्रुतं वसन्तसेने ! ।


शकार--माला की गन्ध सुन रहा हूँ । किन्तु अन्धकार से भरी हुई नाक से आभूषणों की आवाज को साफ-साफ नहीं देख पा रहा हूँ ।

अन्वय:--हे वसन्तसेने ! ( इति गद्यांशेनान्वयः ) जलदोदरसन्धिलौना, सौदामनी, इव, त्वम्, प्रदोषतिमिरेण, कामम्, न, दृश्यसे, तु, हे भीरु ! माल्यसमुद्भवः, अयम्, गन्धः, त्वाम्, सूचयिष्यति, मुखराणि, च, नूपुराणि, च, (सूचयिष्यन्ति) ॥ ३५ ॥

शब्दार्थ:--( हे वसन्तसेने ! ), जलदोदरसन्धिलौना=मेघों के गर्भ में छिपी हुई, सौदामनी इव=बिजली के समान, त्वम्=तुम, प्रदोषतिमिरेण = सायंकालीन अन्धेरे से, कामम्=पर्याप्त, न=नहीं, दृश्यसे = दिखाई दे रही हो, तु=किन्तु, हे भीरु=भयशीले !, माल्यसमुद्भवः=मालाओं से निकलने वाला अयम्=यह अनुभूयमान, गन्धः=सुगन्ध, त्वाम्=तुमको, सूचयिष्यति = सूचित कर देगा, च=तथा, मुखराणि=शब्द करनेवाले, नूपुराणि=पैरों के आभूषण पायजेब, च=भी ( सूचित कर देंगे ) ॥ ३५ ॥

अर्थ--विट--( जनान्तिक ) हे वसन्तसेने !

मेघों के मध्य में छिपी हुई बिजली के समान तुम सायंकालीन अन्धेरे के कारण बिलकुल नहीं दिखाई दे रही हो । परन्तु हे भीरु ! मालाओं के फूलों से निकलने वाली यह ( उत्कट ) गन्ध तुम्हारी सूचना दे देगा । और शब्द करने वाले नूपुर ( पायजेब ) भी ( तुम्हारी सूचना दे देंगे ) ॥ ३५ ॥

श्रुतं वसन्तसेने ?

टीका--जलदोदर-सन्धिलौना = जलदानाम्=मेघानाम्, उदरसन्धौ = मध्ये, आभ्यन्तरे वा, लीना=अन्तर्हिता, सौदामनी इव = सुदाम्नो मेघविशेषस्य पत्नी विद्युत् इव, कामम्=पर्याप्तं यथा स्यात् तथा. न=नैव, दृश्यसे=विलोवयसे, तु=किन्तु, हे भीरु !=हे भयशीले ! माल्यसमुद्भवः =माल्यात् समुद्भवः = उत्पत्तिर्यस्य सः,

प्रथमोऽङ्कः <span style="float:right">८५</span>

वसन्त०---( स्वगतम् । ) सुदं गहिदं अ । (नाट्येन भूषणान्युत्सार्य, माल्यानि चापनीय, किञ्चित् परिक्रम्य, हस्तेन परामृश्य ।) अम्भो ! भित्ति-परामरिससूइदं पक्खदुआरअं क्खु एदं । जाणामि अ संजोएण गेहस्स संवुदं पक्खदुआरअं । ( श्रुतं गृहीतञ्च । अहो ! भित्तिपरामर्शसूचितं पक्ष-द्वारं खल्वेतत् । जानामि च संयोगेन गेहस्य संवृतं पक्षद्वारकम् । )

चारु०---वयस्य ! समाप्तजपोऽस्मि । तत् साम्प्रतं गच्छ, मातृभ्यो बलिमुपहर ।

विदू---भो ! ण गमिस्सं । ( भोः ! न गमिष्यामि । )


माल्यविनिर्गतः, अयम्=अनुभूयमानः, गन्धः=सौरभम्, त्वाम्=वसन्तसेनाम्, सूचयिष्यति=ज्ञापयिष्यति, च=तथा, मुखराणि = शब्दायमानानि, नूपुराणि = पादयोर्भूषणानि, च=अपि, एकश्चकारोऽप्यर्थे, सूचयिष्यन्तीति वचनविपरिणामेनान्वयः । अत्रोपमा, सूचनरूपायामेकस्यामेव क्रियायां गन्धनूपुरयोरन्वयात् तुल्ययोगिता चेति बोध्यम् । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ ३५ ॥

विमर्श---जनान्तिक---यह एक पारिभाषिक शब्द है । जब रंगमंच पर अनेक पात्रों के रहने पर किसी एक पात्रविशेष से कुछ कहना इष्ट रहता है और हाथ की तीन अंगुलियाँ उठा कर तथा अनामिका अंगुलि को वक्र करके किसी पात्र से कुछ कहा जाता है तब ‘जनान्तिक’ कहा जाता है । साहित्यदर्पण में यह लक्षण कहा गया है ।

त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम् ।
अन्योन्यामन्त्रणं यत् स्यात्तज्जनान्ते जनान्तिकम् ॥

शकार आदि रंगमंच पर रहते हैं तो भी यह वाक्य उन्हें नहीं सुनना है । इसमें दो चकार हैं एक 'अपि' अर्थ में है । सौदामनी इव---यह उपमा है । सूचन-रूपी एक ही क्रिया में गन्ध तथा नूपुरशब्द रूपी दो कारकों का अन्वय होने से तुल्ययोगिता है । दोनों निरपेक्ष हैं अतः संसृष्टि है । इसमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ ३५ ॥

अर्थ---वसन्तसेना---( स्वागत ) सुना और समझ भी लिया । ( अभिनय के साथ मालाओं को हटाकर कुछ घूमकर, हाथ से स्पर्श करके ) ओह, दीवाल के स्पर्श से यह मालूम होता है कि निश्चय ही यह बगल का दरवाजा है । और ( किवाड़ों के ) संयोग ( =मिले होने से, अथवा हाथ आदि के स्पर्श से अथवा भाग्य ) से यह समझ रही हूँ कि पक्षद्वार ( दरवाजा ) बन्द है ।

चारुदत्त---मित्र ! जप समाप्त कर चुका हूँ । इसलिये इस समय जाओ, मातृदेवियों को बलि चढ़ाओ ।

विदूषक---मित्र ! मैं नहीं जाऊँगा ।

८६ मृच्छकटिकम्

चारु०--धिक् कष्टम् ।

दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न सन्तिष्ठते,
सुस्निग्धा विमुखीभवन्ति सुहृदः, स्फारीभवन्त्यापदः ।
सत्त्वं ह्रासमुपैति, शीलशशिनः कान्तिः परिम्लायते,
पापं कर्म च यत् परैरपि कृतं तत्तस्य सम्भाव्यते ॥ ३६ ॥

**विमर्श--**पाठकों को यह ध्यान होगा कि पूर्व कथा में विदूषक और चारुदत्त पूजन एवं बलि की चर्चा कर रहे थे । उसी समय चारुदत्त ने कहा था—'भवतु, तिष्ठ तावत् । अहं समाधिं निर्वर्तयामि ।' अतः रंगमञ्च पर इतनी देर तक चारुदत्त समाधि में बैठा रहता है । इस प्रकार वसन्तसेना और शकार आदि के अभिनय में कोई बाधा नहीं होती है । अतः इस स्थल पर उसके पुनः प्रवेश की शंका नहीं करनी चाहिये ।

**अन्वयः--**दारिद्र्यात्, बान्धवजनः, पुरुषस्य, वाक्ये, न, सन्तिष्ठते, सुस्निग्धाः सुहृदः, विमुखीभवन्ति, आपदः, स्फारीभवन्ति, सत्त्वम्, ह्रासम्, उपैति, शील-शशिनः, कान्तिः, परिम्लायते, परैः, अपि, च, यत्, पापम्, कर्म, कृतम्, तत्, तस्य, सम्भाव्यते ॥ ३६ ॥

**शब्दार्थ--**दारिद्र्यात्=गरीबी के कारण, बान्धवजनः=भाई बन्धु लोग, पुरुषस्य=निर्धन व्यक्ति के, वाक्ये=वचनों पर, न=नहीं, सन्तिष्ठते=रहते हैं मानते हैं, सुस्निग्धाः=अत्यन्त स्नेही, सुहृदः=मित्र, भी, विमुखीभवन्ति=मुख फेर लेते हैं, आपदः=आपत्तियाँ, स्फारीभवन्ति=बढ़ने लगती हैं, सत्त्वम्=बल, ह्रासम्=न्यूनता को, उपैति=प्राप्त करता है, शीलशशिनः=आचरणरूपी चन्द्रमा की, कान्तिः=कान्ति, परिम्लायते=मलिन होने लगती है, च=और; परैः=दूसरों के द्वारा, अपि=भी, कृतम्=किया गया; यत्=जो, पापम्=अपराध, कर्म=कर्म, तत्=वह, तस्य=उस निर्धन का, सम्भाव्यते=मान लिया जाता है ॥ ३६ ॥

अर्थ--चारुदत्त - ओह, कष्ट है—

गरीबी के कारण बन्धुबान्धव लोग उस निर्धन व्यक्ति के वचनों पर नहीं रहते हैं, नहीं मानते हैं । बहुत घनिष्ठ मित्र भी विमुख हो जाते हैं । आपत्तियाँ बढ़ जाती हैं । शक्ति क्षीण होने लगती हैं । चरित्ररूपी चन्द्रमा की कान्ति फीकी पड़ने लगती है । और दूसरों के द्वारा भी जो पाप कर्म किया गया है उसे उस गरीब का ही मान लिया जाता है ॥ ३६ ॥

**टीका--**दारिद्र्यात्=निर्धनत्वात्, बाधवजनः=स्वजनः, भ्रात्रादिरित्यर्थः, पुरुषस्य=निर्धनमनुष्यस्य, वाक्ये=वचने, आज्ञायामिति भावः, न=नैव, सन्तिष्ठते=वर्तते, वाक्यं न परिपालयतीति भावः, 'समवप्रविभ्यः स्थः' [पा. सू. १।३।२२] इत्यात्मने-

प्रथमोऽङ्कः ८७

अपि च—

सङ्गं नैव हि कश्चिदस्य कुरुते, सम्भाषते नादरात्,
सम्प्राप्तो गृहमुत्सवेषु धनिनां सावज्ञमालोक्यते ।
दूरादेव महाजनस्य विहरत्यल्पच्छदो लज्जया,
मन्ये निर्धनता प्रकाममपरं षष्ठं महापातकम् ॥ ३७ ॥


पदम्, सुस्निग्धाः=अत्यन्तस्नेहयुक्ताः, प्रगाढाः इति यावत्, सुहृदः=सखायः, विमुखी-भवन्ति=पराङ्मुखा भवन्ति, मैत्रीं परित्यजन्तीति भावः, आपदः=विपत्तयः, स्फारी-भवन्ति=एकीभवन्ति ततो वृद्धिं गच्छन्तीत्यर्थः, सत्त्वम्=बलम्, ह्रासम्=क्षीणताम्, उपैति=प्राप्नोति, शीलशशिनः=शीलम्=आचरणम् एव शशी, तस्य, चारित्र्यचन्द्रस्य, कान्तिः=प्रभा, दीप्तिर्वा, परिम्लायते=परितो मालिन्यं गच्छति, परैः=अन्यैः, अपि, च, यत्, पापम्=निन्दितम्, अधर्मादिजनकम्, कर्म=कार्यम्, कृतम्=विहितम्, तत्=अन्यजनविहितं निन्दितं कर्म, तस्य = निर्धनपुरुषस्य, सम्भाव्यते = अनुमीयते, सर्वैरिति शेषः। दरिद्रतयाऽनेनैव धनादिलोभेनेदमकार्यं कृतमिति झटिति सर्वैरनुमीयते इति भावः। अत्र शीले शशित्त्वारोपात् रूपकालंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम्। तल्लक्षणम्—सूर्याश्वैर्याद मः सजौ, सततगाः, शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ३६ ॥

विमर्श—विदूषक चारुदत्त का गहरा मित्र है किन्तु इस समय वह भी आज्ञा-पालन नहीं कर रहा है, इसका कारण, चारुदत्त अपनी निर्धनता ही समझता है। अतः यहाँ से तीन श्लोकों में निर्धनता के विषय में ही कहता है।

शीलशशिनः—शीलम्=आचरणम् एव शशी=चन्द्रः तस्य-यहाँ रूपक अलंकार है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। सन्तिष्ठते-सम् + √स्था + लट् प्र. पु. ए.व.-इसमें 'समवप्रविभ्यः स्थः' [ पा. सू. १।३।२२ ] सूत्र से आत्मनेपद होता है। विमुखीभवन्ति और स्फारीभवन्ति-ये नामधातु के रूप हैं। इनमें च्वि प्रत्यय आदि होता है। परिम्लायते -परि + √म्लै + लट् प्र० पु० ए० व०। सम्भाव्यते - भाववाच्य लट्लकार का रूप है ॥ ३६ ॥

अन्वयः—हि, कश्चित्, अस्य, सङ्गम्, नैव, कुरुते, ( अतः ), आदरात्, न, सम्भाषते, उत्सवेषु, धनिनाम्, गृहम्, सम्प्राप्तः, सावज्ञम्, अवलोक्यते, अल्पच्छदः, ( निर्धनः ), लज्जया, महाजनस्य, दूरात्, एव, विहरति, ( अतः अहम् इदम् ) मन्ये, निर्धनता, अपरम्, प्रकामम्, षष्ठम्, महापातकम् ॥ ३७ ॥

शब्दार्थ—हि=चूँकि, कश्चित्=कोई भी, अस्य=इस दरिद्र का, सङ्गम्=साथ, नैव=नहीं, कुरुते=करता है, अतः=इसलिये, ( कोई भी ) आदरात्=आदर से, न=नहीं, सम्भाषते=बोलता है, उत्सवेषु=उत्सवों, जलसों में, धनिनाम्=धनवानों के, गृहम्=घर को, सम्प्राप्तः=प्राप्त करने वाला, पहुँचने वाला, सावज्ञम्=अपमान के

८८ मृच्छकटिकम्


साथ, अवलोक्यते=देखा जाता है, अल्पच्छदः=अपर्याप्त वस्त्र धारण करने वाला ( दरिद्र ), लज्जया=लाज के कारण, महाजनस्य=बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति के, दूरात्=दूर से, एव=ही, विहरति=चलता है, साथ में नहीं चलता है, ( इसलिये मैं यही ), मन्ये=मानता हूँ, कि, निर्धनता=गरीबी, अपरम्=दूसरा, ( पाँच महापातकों से भिन्न ), प्रकामम्=बड़ा प्रबल, षष्ठम्=छठा, महापातकम्=महापातक, है ।। ३७ ।।

अर्थ-- और भी--

चूँकि कोई भी व्यक्ति निर्धन का साथ नहीं करता है, अतः कोई भी ( इससे ) आदरपूर्वक नहीं बोलता है । उत्सवों में, धनवानों के घर पर पहुँचने वाला निर्धन पुरुष अपमान के साथ देखा जाता है । अपर्याप्त वस्त्रों वाला निर्धन व्यक्ति लज्जा के कारण बड़े लोगों से दूर दूर ही चलता है, रहता है । अतः ( मैं चारुदत्त यही ) मानता हूँ कि निर्धनता ( पाँच महापातकों से ) भिन्न छठा प्रबल महापातक है ।। ३७ ।।

टीका-- हि=यतः, कश्चित्=कश्चनापि जनः, अस्य=दरिद्रस्य, सङ्गम्=सङ्गतिम्, नैव कुरुते नैव करोति, अतः कश्चिदपि, आदरात्=सम्मानात्, न=नैव, सम्भाषते=सम्यक् वदति, उत्सवेषु=विवाहादिमहोत्सवेषु, धनिनाम्=धनिकानाम्, गृहम्=आवासम्, सम्प्राप्तः=समागतः, उपस्थितः, सावज्ञम्=अवज्ञया=अपमानेन सह, अवलोक्यते=दृश्यते, सर्वैरिति शेषः, अल्पच्छदः=स्वल्पः, छदः=वस्त्रं यस्य सः तादृशः अपर्याप्तवस्त्रयुतः, दरिद्रः, लज्जया=व्रीडया, महाजनस्य=धनिकस्य, उत्तमवस्त्रादिसमलङ्कृतस्य; दूरात्=विप्रकृष्टात्, एव, विहरति=चलति, तादृशवस्त्राभावात् जुगुप्सयात्मानं गोपयन् दूरे दूरे एव प्रचलति न तु तैः सहेति भावः, ( अतः अहं चारुदत्तः इदम् ) मन्ये=चिन्तयामि, निर्धनता=दरिद्रता, अपरम्=धर्मशास्त्रादौ प्रसिद्धातिरिक्तम्, प्रकामम्=प्रबलम्, षष्ठम्=षष्ठसंख्याकम्, महापातकम्=महापापम्, पञ्चमहापातकानि चैवं मनुना प्रतिपादितानि--

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ।। [ मनु. ११।५४ ]

अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। ३७ ।।

विमर्श-- षष्ठं महापातकम्-- मनु आदि महर्षियों ने पाँच महापातक माने हैं—(१) ब्रह्महत्या, (२) सुरापान, (३) चोरी, (४) गुरुपत्नी-गमन, (५) इनमें किसी भी पातकी के साथ वर्ष भर रहना । दरिद्रता को इन्हीं की कोटि में छठा महापातक माना गया है । कुरुते-- √डुकृञ् + लट् लकार प्र. पु. ए. व आत्मनेपद । सावज्ञम्-- अवज्ञया सहितम् । महाजनः-- महांश्चासौ जनः—यहाँ महत्त्व धनादि के आधार पर समझना चाहिये । यदि 'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव' नियम से 'महाजनस्य' में षष्ठी मान लें और 'विहरति' का अर्थ छोड़ता है, यह मान लें

प्रथमोऽङ्कः (८६)

अपि च--

दारिद्र्य ! शोचामि भवन्तमेवमस्मच्छरीरे सुहृदित्युषित्वा ।
विपन्नदेहे मयि मन्दभाग्ये, ममेति चिन्ता क्व गमिष्यसि त्वम् ॥ ३८ ॥


तो—अपर्याप्त वस्त्रों वाला दरिद्र लज्जा के कारण महाजनों को दूर से ही छोड़े रहता है, उनसे नहीं मिलता है—यह अर्थ हो जाता है। अल्पच्छदः—अल्पः=अपर्याप्तः छदः=वस्त्रं यस्य सः—थोड़े वस्त्रों वाला—बहुव्रीहि है। 'मन्ये' के प्रयोग के कारण उत्प्रेक्षा अलङ्कार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ ३७ ॥

**अन्वयः—**हे दारिद्र्य ! भवन्तम्, एवम्, शोचामि, अस्मच्छरीरे, सुहृद्, इति, उषित्वा, मन्दभाग्ये, मयि, विपन्नदेहे (सति), त्वम्, क्व, गमिष्यसि, इति, मम, चिन्ता, अस्ति ॥ ३८ ॥

**शब्दार्थ—**हे दारिद्र्य ! हे निर्धनते ! (गरीबी), भवन्तम्=आपको अर्थात् आपके विषय में, एवम्=इस प्रकार, शोचामि=दुःख का अनुभव कर रहा हूँ, अस्मच्छरीरे=मेरे शरीर में, सुहृद्=मित्र, इति=इस रूप से, उषित्वा=रह कर, मन्दभाग्ये=अभागे, मयि=मेरे, विपन्नदेहे=शरीरत्याग कर देने पर अर्थात् मर जाने पर, त्वम्=तुम दारिद्र्य, क्व=कहाँ, गमिष्यसि=जाओगे, इति=इस प्रकार की, मम=मुझ चारुदत्त की, चिन्ता=चिन्ता, अस्ति=है ॥ ३८ ॥

**अर्थ—**और भी—

हे निर्धनते ! (गरीबी) आपके विषय में मैं इस प्रकार दुःख कर रहा हूँ कि मेरे शरीर में मित्र इस रूप से रह कर मुझ अभागे के शरीर छोड़ देने पर अर्थात् मर जाने पर तुम (निराधार होकर) कहाँ जाओगे—यह मुझे (चारुदत्तको) चिन्ता है ॥ ३८ ॥

**टीका—**हे दारिद्र्य !=हे निर्धनत्व !, भवन्तम्=त्वाम्, एवम्=अनेन रूपेण, शोचामि=दुःखमनुचिन्तयामि, अस्मच्छरीरे=मम देहे, सुहृद् इति=सखा इति रूपेण, उषित्वा=स्थित्वा, निवासं कृत्वा, मन्दभाग्ये=हतभाग्ये, मयि=चारुदत्ते, विपन्नदेहे=त्यक्तशरीरे, मृते, सति त्वम्=दारिद्र्य ! निराधारो भूत्वा, क्व=कुत्र, गमिष्यसि=यास्यसि, आश्रयं ग्रहीष्यसि, इति=इत्येवं प्रकारेण, मम=चारुदत्तस्य, चिन्ता=मानसिकी व्यथा अस्ति=वर्तते। काव्यलिङ्गमलङ्कारः। इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रयोः सम्मेलनादुपजातिर्वृत्तम् ॥ ३८ ॥

**विमर्श—**दारिद्र्य—दरिद्र + ष्यञ्=य भाव अर्थ में। उषित्वा—√वस् + इट् + क्त्वा सम्प्रसारण होने से 'व' का उ और-षत्व करने से उष् + इ + त्वा। सुहृद्—शोभनं हृदयं यस्य सः—'सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः' (पा० सू० ५।४।१५०) इससे हृदय को हृद् आदेश। विपन्नदेहे—विपन्नः=विनष्टः, देहः=शरीरम् यस्य सः—

६०मृच्छकटिकम्

विदू०---( सवैलक्ष्यम् ।) भो वअस्स ! जइ मए गन्तव्वं, ता एसा वि से सहाइणी रदणिआ भोदु । ( भो वयस्य ! यदि मया गन्तव्यम्, तदेषापि मम सहायिनी रदनिका भवतु । )

चारु०--रदनिके ! मैत्रेयमनुगच्छ ।

चेटी--जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

विदू०--भोदि ! रदणिए । गेण्ह बलिं पदीवं अ । अहं अवावुदं पक्खदुआरअं करेमि । ( तथा करोति । ) ( भवति रदनिके ! गृहाण बलिं प्रदीपञ्च । अहमपावृतं पक्षद्वारकं करोमि । )

वसन्त०--मम अब्भुववत्तिणिमित्तं विअ अवावुदं पक्खदुआरअं, ता जाव पविसामि । ( दृष्ट्वा ) हद्धी ! हद्धी ! कथं पदीवो । ( पटान्तेन निर्वाप्य प्रविष्टा । ) ( मम अभ्युपपत्तिनिमित्तमिव अपावृतं पक्षद्वारकम्, तद्यावत् प्रविशामि । हा धिक् ! हा धिक् ! कथं प्रदीपः ! । )

चारु०--मैत्रेय ! किमेतत् ? ।

विदू०--अवावुदपक्खदुआरएण पिण्डीकिदेण वादेण णिव्वाविदो पदीवो । भोदि ! रदणिए ! णिक्कम तुमं पक्खदुआरएण । अहंपि अब्भन्तरचदुस्सालादो पदीवं पज्जालिअ आअच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । ) ( अपावृतपक्षद्वारेण पिण्डीकृतेन वातेन निर्वापितः प्रदीपः । भवति रदनिके ! निष्क्राम त्वं पक्षद्वारकेण । अहमपि अभ्यन्तरचतुःशालातः प्रदीपं प्रज्वाल्य आगच्छामि । )


ब० व्री० । मयि यहाँ सतिसप्तमी है। इसमें इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के संयोग के कारण उपजाति छन्द है। प्राचीन संस्कृत में युष्मत् और भवत् के प्रयोग में बहुत भेद नहीं माना जाता था। अतः यहाँ 'भवन्तम्' और 'त्वम्' दोनों का प्रयोग ठीक है ॥३८॥

अर्थ--विदूषक--( लज्जा के साथ ) हे मित्र ! यदि मुझे जाना है तो यह रदनिका भी मेरे साथ चले ।

**चारुदत्त--**रदनिके ! मैत्रेय के साथ जाओ ।

**चेटी--**आपकी जो आज्ञा !

**विदूषक--**हे रदनिके ! बलि और दीपक लो । मैं बगल का दरवाजा खोलता हूँ । ( दरवाजा खोलता है । )

**वसन्तसेना--**मुझ पर अनुग्रह करने के लिये ही मानों बगल के दरवाजा के किवाड़ खुले हैं । तो इसमें प्रवेश करती हूँ । ( देख कर ) हाय ! हाय ! ( अब ) क्या ? यहाँ दीप ( जल रहा है । ) ( आँचल से दीपक को बुझा कर प्रवेश करती है । )

**चारुदत्त--**मैत्रेय ! यह क्या ?

**विदूषक--**बगल के दरवाजे के खुलने से एकत्रित वायु के झोंके ने यह दीपक