मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः <span style="float:right">८५</span>
वसन्त०---( स्वगतम् । ) सुदं गहिदं अ । (नाट्येन भूषणान्युत्सार्य, माल्यानि चापनीय, किञ्चित् परिक्रम्य, हस्तेन परामृश्य ।) अम्भो ! भित्ति-परामरिससूइदं पक्खदुआरअं क्खु एदं । जाणामि अ संजोएण गेहस्स संवुदं पक्खदुआरअं । ( श्रुतं गृहीतञ्च । अहो ! भित्तिपरामर्शसूचितं पक्ष-द्वारं खल्वेतत् । जानामि च संयोगेन गेहस्य संवृतं पक्षद्वारकम् । )
चारु०---वयस्य ! समाप्तजपोऽस्मि । तत् साम्प्रतं गच्छ, मातृभ्यो बलिमुपहर ।
विदू---भो ! ण गमिस्सं । ( भोः ! न गमिष्यामि । )
माल्यविनिर्गतः, अयम्=अनुभूयमानः, गन्धः=सौरभम्, त्वाम्=वसन्तसेनाम्, सूचयिष्यति=ज्ञापयिष्यति, च=तथा, मुखराणि = शब्दायमानानि, नूपुराणि = पादयोर्भूषणानि, च=अपि, एकश्चकारोऽप्यर्थे, सूचयिष्यन्तीति वचनविपरिणामेनान्वयः । अत्रोपमा, सूचनरूपायामेकस्यामेव क्रियायां गन्धनूपुरयोरन्वयात् तुल्ययोगिता चेति बोध्यम् । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ ३५ ॥
विमर्श---जनान्तिक---यह एक पारिभाषिक शब्द है । जब रंगमंच पर अनेक पात्रों के रहने पर किसी एक पात्रविशेष से कुछ कहना इष्ट रहता है और हाथ की तीन अंगुलियाँ उठा कर तथा अनामिका अंगुलि को वक्र करके किसी पात्र से कुछ कहा जाता है तब ‘जनान्तिक’ कहा जाता है । साहित्यदर्पण में यह लक्षण कहा गया है ।
त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम् ।
अन्योन्यामन्त्रणं यत् स्यात्तज्जनान्ते जनान्तिकम् ॥
शकार आदि रंगमंच पर रहते हैं तो भी यह वाक्य उन्हें नहीं सुनना है । इसमें दो चकार हैं एक 'अपि' अर्थ में है । सौदामनी इव---यह उपमा है । सूचन-रूपी एक ही क्रिया में गन्ध तथा नूपुरशब्द रूपी दो कारकों का अन्वय होने से तुल्ययोगिता है । दोनों निरपेक्ष हैं अतः संसृष्टि है । इसमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ ३५ ॥
अर्थ---वसन्तसेना---( स्वागत ) सुना और समझ भी लिया । ( अभिनय के साथ मालाओं को हटाकर कुछ घूमकर, हाथ से स्पर्श करके ) ओह, दीवाल के स्पर्श से यह मालूम होता है कि निश्चय ही यह बगल का दरवाजा है । और ( किवाड़ों के ) संयोग ( =मिले होने से, अथवा हाथ आदि के स्पर्श से अथवा भाग्य ) से यह समझ रही हूँ कि पक्षद्वार ( दरवाजा ) बन्द है ।
चारुदत्त---मित्र ! जप समाप्त कर चुका हूँ । इसलिये इस समय जाओ, मातृदेवियों को बलि चढ़ाओ ।
विदूषक---मित्र ! मैं नहीं जाऊँगा ।