भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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मृच्छकटिकम्

शकार--शुणामि मल्लगन्धं अन्धआलपूलिदाए उण णाशिआए सुव्वत्तं, उण ण पेक्खामि भूषणशद्दं ! ( शृणोमि माल्यगन्धम्, अन्धकार-पूरितया पुनर्नासिकया सुव्यक्तं पुनर्न प्रेक्षे भूषणशब्दम् । )

विट:--( जनान्तिकम् । ) वसन्तसेने ?

कामं प्रदोषतिमिरेण न दृश्यसे त्वं
सौदामनीव जलदोदरसन्धिलौना ।
त्वां सूचयिष्यति तु माल्यसमुद्भवोऽयं
गन्धश्च भीरु ! मुखराणि च नूपुराणि ॥ ३५ ॥

श्रुतं वसन्तसेने ! ।


शकार--माला की गन्ध सुन रहा हूँ । किन्तु अन्धकार से भरी हुई नाक से आभूषणों की आवाज को साफ-साफ नहीं देख पा रहा हूँ ।

अन्वय:--हे वसन्तसेने ! ( इति गद्यांशेनान्वयः ) जलदोदरसन्धिलौना, सौदामनी, इव, त्वम्, प्रदोषतिमिरेण, कामम्, न, दृश्यसे, तु, हे भीरु ! माल्यसमुद्भवः, अयम्, गन्धः, त्वाम्, सूचयिष्यति, मुखराणि, च, नूपुराणि, च, (सूचयिष्यन्ति) ॥ ३५ ॥

शब्दार्थ:--( हे वसन्तसेने ! ), जलदोदरसन्धिलौना=मेघों के गर्भ में छिपी हुई, सौदामनी इव=बिजली के समान, त्वम्=तुम, प्रदोषतिमिरेण = सायंकालीन अन्धेरे से, कामम्=पर्याप्त, न=नहीं, दृश्यसे = दिखाई दे रही हो, तु=किन्तु, हे भीरु=भयशीले !, माल्यसमुद्भवः=मालाओं से निकलने वाला अयम्=यह अनुभूयमान, गन्धः=सुगन्ध, त्वाम्=तुमको, सूचयिष्यति = सूचित कर देगा, च=तथा, मुखराणि=शब्द करनेवाले, नूपुराणि=पैरों के आभूषण पायजेब, च=भी ( सूचित कर देंगे ) ॥ ३५ ॥

अर्थ--विट--( जनान्तिक ) हे वसन्तसेने !

मेघों के मध्य में छिपी हुई बिजली के समान तुम सायंकालीन अन्धेरे के कारण बिलकुल नहीं दिखाई दे रही हो । परन्तु हे भीरु ! मालाओं के फूलों से निकलने वाली यह ( उत्कट ) गन्ध तुम्हारी सूचना दे देगा । और शब्द करने वाले नूपुर ( पायजेब ) भी ( तुम्हारी सूचना दे देंगे ) ॥ ३५ ॥

श्रुतं वसन्तसेने ?

टीका--जलदोदर-सन्धिलौना = जलदानाम्=मेघानाम्, उदरसन्धौ = मध्ये, आभ्यन्तरे वा, लीना=अन्तर्हिता, सौदामनी इव = सुदाम्नो मेघविशेषस्य पत्नी विद्युत् इव, कामम्=पर्याप्तं यथा स्यात् तथा. न=नैव, दृश्यसे=विलोवयसे, तु=किन्तु, हे भीरु !=हे भयशीले ! माल्यसमुद्भवः =माल्यात् समुद्भवः = उत्पत्तिर्यस्य सः,