भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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८६ मृच्छकटिकम्

चारु०--धिक् कष्टम् ।

दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न सन्तिष्ठते,
सुस्निग्धा विमुखीभवन्ति सुहृदः, स्फारीभवन्त्यापदः ।
सत्त्वं ह्रासमुपैति, शीलशशिनः कान्तिः परिम्लायते,
पापं कर्म च यत् परैरपि कृतं तत्तस्य सम्भाव्यते ॥ ३६ ॥

**विमर्श--**पाठकों को यह ध्यान होगा कि पूर्व कथा में विदूषक और चारुदत्त पूजन एवं बलि की चर्चा कर रहे थे । उसी समय चारुदत्त ने कहा था—'भवतु, तिष्ठ तावत् । अहं समाधिं निर्वर्तयामि ।' अतः रंगमञ्च पर इतनी देर तक चारुदत्त समाधि में बैठा रहता है । इस प्रकार वसन्तसेना और शकार आदि के अभिनय में कोई बाधा नहीं होती है । अतः इस स्थल पर उसके पुनः प्रवेश की शंका नहीं करनी चाहिये ।

**अन्वयः--**दारिद्र्यात्, बान्धवजनः, पुरुषस्य, वाक्ये, न, सन्तिष्ठते, सुस्निग्धाः सुहृदः, विमुखीभवन्ति, आपदः, स्फारीभवन्ति, सत्त्वम्, ह्रासम्, उपैति, शील-शशिनः, कान्तिः, परिम्लायते, परैः, अपि, च, यत्, पापम्, कर्म, कृतम्, तत्, तस्य, सम्भाव्यते ॥ ३६ ॥

**शब्दार्थ--**दारिद्र्यात्=गरीबी के कारण, बान्धवजनः=भाई बन्धु लोग, पुरुषस्य=निर्धन व्यक्ति के, वाक्ये=वचनों पर, न=नहीं, सन्तिष्ठते=रहते हैं मानते हैं, सुस्निग्धाः=अत्यन्त स्नेही, सुहृदः=मित्र, भी, विमुखीभवन्ति=मुख फेर लेते हैं, आपदः=आपत्तियाँ, स्फारीभवन्ति=बढ़ने लगती हैं, सत्त्वम्=बल, ह्रासम्=न्यूनता को, उपैति=प्राप्त करता है, शीलशशिनः=आचरणरूपी चन्द्रमा की, कान्तिः=कान्ति, परिम्लायते=मलिन होने लगती है, च=और; परैः=दूसरों के द्वारा, अपि=भी, कृतम्=किया गया; यत्=जो, पापम्=अपराध, कर्म=कर्म, तत्=वह, तस्य=उस निर्धन का, सम्भाव्यते=मान लिया जाता है ॥ ३६ ॥

अर्थ--चारुदत्त - ओह, कष्ट है—

गरीबी के कारण बन्धुबान्धव लोग उस निर्धन व्यक्ति के वचनों पर नहीं रहते हैं, नहीं मानते हैं । बहुत घनिष्ठ मित्र भी विमुख हो जाते हैं । आपत्तियाँ बढ़ जाती हैं । शक्ति क्षीण होने लगती हैं । चरित्ररूपी चन्द्रमा की कान्ति फीकी पड़ने लगती है । और दूसरों के द्वारा भी जो पाप कर्म किया गया है उसे उस गरीब का ही मान लिया जाता है ॥ ३६ ॥

**टीका--**दारिद्र्यात्=निर्धनत्वात्, बाधवजनः=स्वजनः, भ्रात्रादिरित्यर्थः, पुरुषस्य=निर्धनमनुष्यस्य, वाक्ये=वचने, आज्ञायामिति भावः, न=नैव, सन्तिष्ठते=वर्तते, वाक्यं न परिपालयतीति भावः, 'समवप्रविभ्यः स्थः' [पा. सू. १।३।२२] इत्यात्मने-