मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
६१ प्रथमोऽङ्कः
शकारः—भावे ! भावे ! अण्णेशामि वशन्तशणिअं ? ( भाव ? भाव ! अन्विष्यामि वसन्तसेनिकाम् । ) विटः—अन्विष्यताम् अन्विष्यताम् । शकारः—(तथा कृत्वा) भावे ! भावे ! गहिदा गहिदा ( भाव ! भाव ! गृहीता गृहीता । ) विटः—मूर्ख ! नन्वहम् । शकारः—इदो दाव पाच्छन्नो भविअ एअन्ते भावे चिट्ठदु । ( पुनरन्विष्य चेट गृहीत्वा । ) भावे ! भावे ! गहिदा गहिदा । ( इतस्तावत् प्रच्छन्नो भूत्वा एकान्ते भावस्तिष्ठतु । भाव ! भाव ! गृहीता गृहीता । ) चेटः—भट्टके ! चेडो हगे । ( भट्टारक ! चेटोऽहम् । ) शकारः—इदो भावे, इदो चेड़े, भावे चेड़े, चेड़े भावे । तुम्हे दाव एअन्ते चिट्ठ । ( पुनरन्विष्य रदनिकां केशेषु गृहीत्वा ) भावे ! भावे ! शंपदं गहिदा गहिदा वसंतशेणिआ । ( इतो भावः, इतश्चेटः, भावश्चेटः, चेटो भावः, युवां तावत् एकान्ते तिष्ठतम् । भाव ! भाव ! सांप्रतं गृहीता गृहीता वसन्तसेनिका । )
अन्धआले पलाअन्ती मल्लगन्धेण शूइदा ।
केशविन्दे पलामिश्टा चाणक्केणेव दोव्वदी ॥ ३६ ॥
बुझा दिया । रदनिके ! तुम बगल के दरवाजे से निकल जाओ। मैं भी भीतरी चौशाल से दीपक जला कर आता हूँ । ( इस प्रकार निकल जाता है ।)
शकार—भाव ! भाव ! वसन्तसेना को खोजूँगा ।
विट—खोजिये, खोजिये ।
शकार—( वैसा करके=खोज करके ) भाव ! भाव ! पकड़ ली, पकड़ ली ।
विट—मूर्ख ! यह तो मैं हूँ ।
शकार—इधर होकर आप तब तक एकान्त में रहिये । ( फिर खोज कर चेट को पकड़ कर ) भाव ! भाव ! पकड़ ली, पकड़ ली ।
चेट—स्वामिन् ! यह तो मैं ( चेट ) हूँ ।
शकार—इधर भाव ( विट ), उधर चेट, भाव, चेट, चेट, भाव । आप दोनों तब तक एकान्त में ही बैठिये । ( फिर खोज कर रदनिका को बालों में पकड़ कर ) भाव ! भाव ! इस समय वसन्तसेना पकड़ ली, पकड़ ली ।
अन्वयः—अन्धकारे, पलायमाना, माल्यगन्धेन, सूचिता, ( वसन्तसेना ), चाणक्येन, द्रौपदी, इव, केशवृन्दे, परामृष्टा ॥ ३६ ॥
६२ मृच्छकटिकम्
( अन्धकारे पलायमाना माल्यगन्धेन सूचिता ।
केशवृन्दे परामृष्टा चाणक्येनेव द्रौपदी ॥ २६ ॥
विट:--
एषासि वयसो दर्पात् कुलपुत्रानुसारिणी ।
केशेषु कुसुमाढ्येषु सेवितव्येषु कर्षिता ॥ ४० ॥
शब्दार्थ—अन्धकारे=अन्धेरे में, पलायमाना=भागनेवाली, किन्तु माल्यगन्धेन=माला के पुष्पों की गन्ध से, सूचिता=सूचित=ज्ञात हो जाने वाली, (वसन्तसेना को), चाणक्येन=चाणक्य द्वारा, द्रौपदी इव=पाण्डवों की पत्नी के समान, केशवृन्दे=केशसमूहमें, परामृष्टा=पकड़ ली गई, अर्थात् बालों में पकड़ ली गई ॥ ३९ ॥
अर्थ—अन्धेरे में भागती हुई (किन्तु) माला की गन्ध से सूचित (ज्ञात) हो जाने वाली (वसन्तसेना) को उसी प्रकार बालों में पकड़ लिया है जैसे चाणक्य ने द्रौपदी को (पकड़ा था) अर्थात् वसन्तसेना का केशसमूह मैंने पकड़ लिया है ॥ ३६ ॥
टीका—अन्धकारे=तमसि, पलायमाना=धावन्ती, किन्तु, माल्यगन्धेन=माल्यस्य=मालागुम्फितपुष्पसमुदायस्य, गन्धेन=सौरभेण, सूचिता=संकेतिता, ज्ञापिता, (वसन्तसेना), चाणक्येन=कौटिल्येन, द्रौपदी इव=पाण्डवपत्नी इव, केशवृन्दे=कचसमुदाये, अवच्छेदकत्वं सप्तम्यर्थः केशवृन्दावच्छेदेनेत्यर्थः, परामृष्टा=गृहीता, धृता वा, मयेति शेषः। अत्रापि प्रसिद्धिविरुद्धत्वात् हतोपमा । अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ३६ ॥
विमर्श—चाणक्येन द्रौपदी इव—यह कथन सर्वथा असंगत है। किन्तु शकार की बातें मूर्खतापूर्ण ही होती हैं अतः अविचारणीय हैं। केशवृन्दे–यहाँ सप्तमी का अर्थ अवच्छेदकता है–केशवृन्दावच्छेदेन गृहीता–इसका तात्पर्य है–बालों से पकड़ ली गई। हतोपमा है। अनुष्टुप् छन्द है। लक्षण—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ ३६ ॥
अन्वयः—एषा, (त्वम्) वयसः, दर्पात्, कुलपुत्रानुसारिणी, सेवितव्येषु, पुष्पाढ्येषु, केशेषु, कर्षिता, असि ॥ ४० ॥
शब्दार्थ—एषा=यह (तुम वसन्तसेने !) वयसः=अवस्था=यौवन के, दर्पात्=घमण्ड से, कुलपुत्रानुसारिणी=कुलीन चारुदत्त का अनुसरण करने वाली, उससे मिलने के लिये जाने वाली, सेवितव्येषु=सेवा करने के योग्य, कुसुमाढ्येषु=फूलों से खूब सजे हुये, केशेषु=बालों में, कर्षिता=खींची गई, असि=हो, अर्थात् बालों को पकड़ कर तुम्हें खींचा गया है ॥ ४० ॥
प्रथमोऽङ्कः ६३
शकारः--
एशाशि वाशू ! शिलशि ग्गहोदा केशेशु बालेशु शिलोलुहेशु ।
अक्कोश विक्कोश लवाहिचण्डं शम्भुं शिवं शंकलमीशलं वा ॥४१॥
( एषासि वासु ! शिरसि गृहीता केशेषु बालेषु शिरोरुहेषु ।
आक्रोश विक्रोश लपाधिचण्डं शम्भुं शिवं शंकरमीश्वरं वा ॥ ४१ ॥
**अर्थ--**यह ( वसन्तसेना ! तुम ) अपने यौवन के दर्प से कुलपुत्र चारुदत्त से मिलने जा रही हो, किन्तु सेवा करने योग्य, खूब फूलों से सजे हुये तुम्हारे केशों को पकड़ कर खींचा जा रहा है ॥ ४० ॥
**टीका--**एषा=अन्धकारे विलीनापि शकारेण गृहीता त्वम्, वसन्तसेना, वयसः=यौवनस्य, दर्पात्=अभिमानात्, कुलपुत्रानुसारिणी=कुलपुत्रस्य चारुदत्तस्य अनुगमनशीला, असि, किन्तु, सेवितव्येषु=सेवायोग्येषु कुसुमाढ्येषु=कुसुमैः=पुष्पैः आढ्येषु=युक्तेषु केशेषु अत्राप्यवच्छेदकत्व सप्तम्यर्थः, केशावच्छेदेनेत्यर्थः, कर्षिता=आकृष्टा असि, शकारेणेति शेषः। अतः शकारमुपसेवस्वेति भावः। अनुष्टुप् छन्दः ॥ ४० ॥
**विमर्श--**दर्पात्-अपने यौवन के दर्प के कारण हम लोगों की उपेक्षा करके तुम चारुदत्त के पास जाना चाहती हो, परन्तु नहीं जा सकती हो। सेवितव्येषु √सेव् + तव्यत् । पुष्पाढ्येषु=जिनमें बहुत फूल गुथे हैं। केशेषु-सप्तमी का अर्थ-अवच्छेदकता है-केशावच्छेदेन कर्षिता। अनुष्टुप् छन्द है ॥ ४० ॥
**अन्वयः--**हे वासु !, शिरसि, केशेषु, बालेषु शिरोरुहेषु, गृहीता, त्वम्, (अधुना), आक्रोश, विक्रोश, वा, शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम्, वा, अधिचण्डम्, लप ॥ ४१ ॥
**शब्दार्थ--**हे वासु ! हे बालिके !, शिरसि=सिर में, केशेषु=केशों में, बालेषु=बालों में, शिरोरुहेषु=शिर के बालों में, गृहीता=पकड़ ली गई, त्वम्=तुम, ( अधुना=अब ) आक्रोश=गाली दो, नाराज हो जाओ, वा=अथवा, विक्रोश=चिल्लाओ, शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम् वा=शम्भु, शिव, शंकर और ईश्वर को, अधिचण्डम्=खूब जोर जोर से, लप=पुकारो ॥ ४१ ॥
**अर्थ--शकार--**हे बालिके ! ( अरी छोकरी ), शिरमें, बालों में पकड़ी गई तुम अब चाहे चिल्लाओ अथवा ( नाराज हो जाओ ), गाली दो, और शिव शम्भु, शंकर, ईश्वर को जोर जोर से पुकारो । ( मैं किसी से डरनेवाला नहीं हूँ ) ॥ ४१ ॥
**टीका--**हे वासु !=अयि बालिके ! शिरसि=केशेषु, बालेषु, शिरोरुहेषु=शिरोभागे स्थितेषु कचेष्वित्यर्थः, गृहीता=धृता, त्वम्=वसन्तसेना, अधुना आक्रोश=शापं
६४ मृच्छकटिकम्
रदनिका--(सभयम् ।) किं अज्जमिस्सेहिं ववसिदं । (किमार्य-मिश्रैर्व्यवसितम् ?)
विटः--काणेलीमातः ! अन्य एवैष स्वरसंयोगः ।
शकारः--भावे ! भावे ! जधा दहिच्छल्लि-पलिंलूद्धाए मज्जलीआ शल-पलिवत्ते होदि, तधा दाशीएधीए शलपलिवत्ते कडे (भाव ! भाव ! यथा दधिशरपरिलुब्धाया मार्जार्याः स्वरपरिवर्त्तो भवति, तथा दास्याः पुत्र्या स्वरपरिवर्त्तः कृतः ।)
गालिं वा देहि, वा=अथवा, वक्रोश=रक्षार्थं कमपि आह्वय, अथवा शम्भुम्=शिवम्=शङ्करम्=ईश्वरम्=महादेवमित्यर्थः, अधिचण्डम्=अत्युच्चैः, क्रियाविशेषणमिदम्, लप=रक्षार्थम् आकारय, अहं शकारो न कस्मादपि बिभेमीति भावः । अत्र पूर्वार्धे उत्तरार्द्धे च पुनरुक्तिः शकारवचनत्वात् सोढव्या । इन्द्रवज्रा वृत्तम् ।। ४१ ।।
**विमर्श--**शिरसि, केशेषु, बालेषु, शिरोरुहेषु--इन सभी का एक ही तात्पर्य है । इसी प्रकार--शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम्=इनका भी एक ही अर्थ है । शकार की मूर्खता के कारण ये दोष नहीं हैं । 'अधिचण्डम्' इसे कुछ विद्वान् 'लप' क्रिया का विशेषण मानते हैं और कुछ इसे भी महादेव का पर्याय मानते हैं--'चण्डम्=महादेवं च'--पृथ्वीधर । आक्रोश--√आङ् + क्रुश + लोट् म. पु. ए. व. । क्रुश=आह्वाने रोदने च । परन्तु उपसर्ग के कारण शाप देना अथवा गाली देना अर्थ हो जाता है । इसी प्रकार वि + √क्रुश + लोट् म. पु. ए. व. में बुलाना अर्थ है । यहाँ इन्द्रवज्रा छन्द है ।। ४१ ।।
अर्थ--रदनिका-- (भय के साथ) आप महानुभावों ने यह क्या किया ? (अथवा कर रहे हैं ?)
**विट--**काणेलीपुत्र ! यह तो दूसरी ही आवाज (लगती) है !
**शकार--**भाव ! भाव ! जैसे दही के ऊपर की मलाई खाने की इच्छुक बिल्ली की आवाज बदल जाती है उसी प्रकार इस दासी की पुत्री ने (अपनी) आवाज बदल ली है ।
**टीका--आर्यमिश्रैः=**आर्याश्च ते मिश्राश्च=पूजनीयैर्महानुभावैरिति भावः, **व्यवसितम्=**कृतम् क्रियते वा, **दधिशरपरिलुब्धाया=**शरः=दध्नः उपरिभागः, हिन्द्यां मलाई इति प्रसिद्धम्, तस्य **लुब्धाया=**अभिलाषिण्याः क्वचित् **दधिभक्तलुब्धायाः=**इत्यपि पाठः, **स्वरपरिवर्त्तः=**ध्वनेः परिवर्त्तनं मार्जारिकायाः भवति तथैवानया वसन्तसेनयापि स्वस्वरस्य परिवर्त्तनं कृतम् ।
**विमर्श--दधि-शर-परिलुब्धायाः--**शर=दही के ऊपरी भाग=मलाई को कहते हैं । दही के ऊपर की मलाई खाने की इच्छुक बिल्ली जैसे अपनी स्वाभाविक आवाज बदल लेती है वैसे ही वसन्तसेना ने अपनी आवाज बदल ली है । कहीं कहीं
४५
प्रथमोऽङ्कः
विट :--कथं स्वरपरिवर्त्तः कृतः । अहो चित्रम् । अथवा किमत्र चित्रम् ?
इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया ।
वञ्चनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ॥ ४२ ॥
( प्रविश्य )
विदूषकः-- ही ही भो ! पदोसमन्दमारुदेण पसुबन्धोवणीदस्स विअ छाअलस्स हिअअं, फुरफुराअदि पदीवो ( उपसृत्य रदनिकां दृष्ट्वा ) भो ! रदणिए । ( आश्चर्यम् ! भोः ! प्रदोषमन्दमारुतेन पशुबन्धोपनीतस्येव छागलस्य हृदयं फुरफुरायते प्रदीपः । भो रदनिके ! । )
दधिभक्तलुब्धायाः=-यह भी पाठ है । दही भात खाने की इच्छुक--यह अर्थ है । परन्तु प्रथम पाठ ही तर्कसंगत है ।
अन्वयः--रङ्गप्रवेशेन, कलानाम्, उपशिक्षया, च, वञ्चनापण्डितत्वेन, च, इयम्, स्वरनैपुण्यम्, आश्रिता ॥ ४२ ॥
शब्दार्थ--रङ्ग-प्रवेशन= नाट्यशाला में प्रवेश= कार्य करने से, च= और, कलानाम्= संगीत आदि ६४ कलाओं की, उपशिक्षया= शिक्षा अथवा अभ्यास के कारण, तथा, वञ्चनापण्डितत्वेन= ठगने की चतुरता के कारण, इयम्= इस वसन्तसेना ने, स्वरनैपुण्यम= अपनी आवाज ( बदलने ) की निपुणता, आश्रिता= प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
अर्थ--विट - क्या स्वर बदल लिया ? बड़ा आश्चर्य है । अथवा इसमें आश्चर्य क्या है ?
रंगशाला में ( अभिनयादि करने के लिये ) प्रवेश करने से और [संगीत आदि] कलाओं की शिक्षा [ या अभ्यास ] से तथा ठगने में चतुर होनेसे इसने स्वर [ परिवर्तन आदि ] में निपुणता प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
टीका--रङ्गप्रवेशन=रङ्गः= नाट्यशाला तत्र अभिनयाद्यर्थं गमनेन, कलानाम्= सङ्गीतशास्त्रादिप्रसिद्धकलानाम्, उपशिक्षया= अभ्यासेन, शिक्षणाद्वा, वञ्चनापण्डितत्वेन-वञ्चना= प्रतारणा, तस्यां पण्डितत्वेन-चातुर्येण, इयम्= वसन्तसेना, स्वरनैपुण्यम्= स्वध्वनेः परिवर्त्तनादिविषयकं कौशलम्, आश्रिता= प्राप्तवती । एवञ्च वसन्तसेनेवेयमिति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ४२ ॥
विमर्श--वञ्चनापण्डितत्वेन=-वञ्चना= ठगना, उसमें पण्डितत्व-- पण्डित होने से-- पण्डित शब्द से भाव में त्वल् प्रत्यय है । स्वरनैपुण्यम्-- यहाँ स्वर का नैपुण्य-निपुण शब्द से भाव में ष्यञ्=य प्रत्यय होता है । स्वरनैपुण्य का अभिप्राय इच्छानुसार स्वर कर लेना है । तीन हेतुओं से स्वरनैपुण्य का आश्रयण कार्य हो रहा है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । और अनुष्टुप् छन्द है ॥४२॥
[ प्रवेश करके ]
अर्थ--विदूषक-- अरे आश्चर्य है ! प्रदोष=सन्ध्या-कालीन हवा से यह दीपक, यज्ञीय पशु को बांधने के लिये बने खूंटे के पास ले जाये गये पशु
प्रथमोऽङ्कः । ६५
विट :--कथं स्वरपरिवर्त्तः कृतः । अहो चित्रम् । अथवा किमत्र चित्रम् ?
इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया ।
वञ्चनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ॥ ४२ ॥
( प्रविश्य )
विदूषकः-- ही ही भो ! पदोसमन्दमारुदेण पसुबन्धोवणीदस्स विअ छाअलस्स हिअअं, फुरफुराअदि पदीवो ( उपसृत्य रदनिकां दृष्ट्वा ) भो ! रदणिए । ( आश्चर्यम् ! भोः ! प्रदोषमन्दमारुतेन पशुबन्धोपनीतस्येव छागलस्य हृदयं फुरफुरायते प्रदीपः । भो रदनिके ! । )
दधिभक्तलुब्धायाः=यह भी पाठ है । दही भात खाने की इच्छुक—यह अर्थ है । परन्तु प्रथम पाठ ही तर्कसंगत है ।
अन्वयः--रङ्गप्रवेशेन, कलानाम्, उपशिक्षया, च, वञ्चनापण्डितत्वेन, च, इयम्, स्वग्नैपुण्यम्, आश्रिता ॥ ४२ ॥
**शब्दार्थ--रङ्ग-प्रवेशेन=**नाट्यशाला में प्रवेश=कार्य करने से, **च=**और, **कलानाम्=**संगीत आदि ६४ कलाओं की, **उपशिक्षया=**शिक्षा अथवा अभ्यास के कारण, तथा, **वञ्चनापण्डितत्वेन=**ठगने की चतुरता के कारण, **इयम्=**इस वसन्तसेना ने, **स्वरनैपुण्यम्=**अपनी आवाज ( बदलने ) की निपुणता, **आश्रिता=**प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
अर्थ--विट—क्या स्वर बदल लिया ? बड़ा आश्चर्य है। अथवा इसमें आश्चर्य क्या है ?
रंगशाला में ( अभिनयादि करने के लिये ) प्रवेश करने से और [संगीत आदि] कलाओं की शिक्षा [ या अभ्यास ] से तथा ठगने में चतुर होनेसे इसने स्वर [ परिवर्तन आदि ] में निपुणता प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
**टीका--रङ्गप्रवेशेन=रङ्गः=**नाट्यशाला तत्र अभिनयाद्यर्थं गमनेन, कलानाम्= सङ्गीतशास्त्रादिप्रसिद्धकलानाम्, **उपशिक्षया=**अभ्यासेन, शिक्षणाद्वा, **वञ्चनापण्डितत्वेन—वञ्चना=**प्रतारणा, तस्यां **पण्डितत्वेन=**चातुर्येण, **इयम्=**वसन्तसेना, **स्वरनैपुण्यम्=**स्वध्वनेः परिवर्तनादिविषयकं **कौशलम्, आश्रिता=**प्राप्तवती । एवञ्च वसन्तसेनॆवेयपिति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ४२ ॥
**विमर्श--वञ्चनापण्डितत्वेन-=वञ्चना=**ठगना, उसमें पण्डितत्व—पण्डित होने से—पण्डित शब्द से भाव में त्वल् प्रत्यय है। **स्वरनैपुण्यम्—**यहाँ स्वर का नैपुण्य—निपुण शब्द से भाव में ष्यञ्=य प्रत्यय होता है । स्वरनैपुण्य का अभिप्राय इच्छानुसार स्वर कर लेना है । तीन हेतुओं से स्वरनैपुण्य का आश्रयण कार्य हो रहा है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । और अनुष्टुप् छन्द है ॥४२॥
[ प्रवेश करके ]
अर्थ--विदूषक--अरे आश्चर्य है ! **प्रदोष=**सन्ध्या-कालीन हवा से यह दीपक, यज्ञीय पशु को बांधने के लिये बने खूंटे के पास ले जाये गये पशु
६६ मृच्छकटिकम्
शकारः—भावे ! भावे ! मणुश्शे मणुश्शे । ( भाव ! भाव ! मनुष्यो मनुष्यः । )
विदूषकः—जुत्तं णेदं, सरिसं णेदं, जं अज्जचारुदत्तस्स दलिद्ददाए सम्पंदं परपुरिसा गेहं पविसन्ति । ( युक्तं नेदम्, सदृशं नेदम्, यदार्यचारुदत्तस्य दरिद्रतया साम्प्रतं परपुरुषा गेहं प्रविशन्ति । )
रद०--अज्ज मित्तेअ ! पेक्ख मे परिहवं । ( आर्य्य ! मैत्रेय ! प्रेक्षस्व मे परिभवम् ? )
विदूषकः—किं तव परिहवो ? आदु अम्हाणं ? ( किं तव परिभवः ? अथवा अस्माकम् ? )
रद०—णं तुम्हाणं ज्जेव । ( ननु युष्माकमेव । )
विदूषकः—किं एसो बलक्कारो ? । ( किमेष बलात्कारः ? । )
रद०—अध इं । ( अथ किम् । )
विदूषकः--सच्चं ? ( सत्यम् ? । )
रद०—सच्चं ? ( सत्यम् । )
विदू०--(सक्रोध दण्डकाष्ठमुद्यम्य) मा दाव । भो ! सके गेहे कुक्कुरोऽवि
के हृदय के समान, फुर फुर कर रहा है । (पास जाकर रदनिका को देख कर) अरी ! रदनिके ।
विमर्श—प्रदोषमन्दमारुतेन = प्रदोष = सायंकालीन मन्द हवा से, पशुबन्धोपनीतस्य--पशुः बध्यते अत्र-इस विग्रह में अधिकरण अर्थ में घञ्=अ प्रत्यय होता है--पशुबन्धः, तत्र उपनीतस्य=बलिप्रदानार्थं बद्धस्य, छागलस्य=बकरे के, फुरफुरायते=फुर-फुर इस प्रकार के अव्यक्त शब्द को कर रहा है, अथवा हिल रहा है।
अर्थ—शकार—भाव ! भाव ! पुरुष है पुरुष ।
विदूषक—यह उचित नहीं है, शोभनीय नहीं है कि आर्य चारुदत्त के दरिद्र होने के कारण इस समय दूसरे लोग घर में घुस रहे हैं ।
रदनिका—आर्य मैत्रेय ! मेरा अपमान तो देखो ।
विदूषक—क्या तेरा अपमान अथवा हम लोगों का ?
रदनिका—हाँ, आप लोंगों का ही ।
विदूषक—क्या यह बलात्कार (बलपूर्वक अपमान) है ?
रदनिका—हाँ, और क्या ।
विदूषक—सच ?
रदनिका—सच ।
विदूषक—(क्रोधपूर्वक लकड़ी का डण्डा उठाकर) ऐसा नहीं (हो सकता) । अरे ! अपने घर में तो कुत्ता भी बहादुर बन जाता है और मैं तो भला
प्रथमोऽङ्कः ६७
दाव चण्डो भोदि, किं उण अहं बम्हणो ! ता एदिणा अम्हादिस-जण-भाअधेअ-कुड़िलेण दण्डकट्ठेण दुट्ठस्स विअ सुक्खाण-वेणुअस्स मत्थअं दे पहारेहिं कुट्टइस्सं । ( मा तावत् । भोः ! स्वके गेहे कुक्कुरोऽपि तावत् चण्डो भवति, किं पुनरहं ब्राह्मणः । तदेतेन अस्मादृश-जन-भागधेय-कुटिलेन दण्डकाष्ठेन दुष्टस्येव शुष्कवेणुकस्य मस्तकं ते प्रहारैः कुट्टयिष्यामि । )
विटः—महाब्राह्मण ! मर्षय मर्षय ।
विदू०—( विटं दृष्ट्वा । ) ण एत्थ एसो अवरज्झदि । ( शकारं दृष्ट्वा ) एसो क्खु एत्थ अवरज्झदि । अरे रे राजसालअ । संट्ठाणअ । दुज्जण । दुम्मणुस्स । जुत्तं णेदं ? जहवि णाम तत्तभवं अज्जचारुदत्तो दलिद्दो संवृत्तो, ता किं तस्स गुणेहिं ण अलङ्किदा उज्जइणी जेण तस्स गेहं पबिसिअ परिअणस्स ईदिसो उवमद्दो करीअदि । ( नात्र एषोऽपराध्यति । एष खल्वत्र अपराध्यति ! अरे रे राजश्यालक ! संस्थानक ! दुर्जन ! दुर्मनुष्य ! युक्तं नेदम् । यद्यपि नाम तत्रभवान् आर्य्यचारुदत्तो दरिद्रः संवृत्तः, तत् किं तस्य गुणैर्नालङ्कृता उज्जयिनी येन तस्य गृहं प्रविश्य परिजनस्य ईदृश उपमर्दः क्रियते । )
ब्राह्मण (पुरुष) हूँ । इस लिये हम लोगों के (टेढ़े) भाग्य के समान टेढ़े इस लकड़ी के डण्डे से प्रहारों के द्वारा, सूखे बाँस के समान दुष्ट तेरे शिर को कूट (तोड़) डालता हूँ ।
विट—महाब्राह्मण ! क्षमा करो । क्षमा करो ।
विदूषक—(विट को देख कर) यहाँ यह अपराध=बलात्कार नहीं कर रहा है । (शकार को देखकर) अरे रे राजश्यालक (राजा के साले) संस्थानक, दुष्ट ! नीच मनुष्य ! यह ठीक नहीं है । यद्यपि आर्य चारुदत्त (इस समय) दरिद्र हो गये हैं, तो तो भी क्या उनके गुणों से उज्जयिनी नगरी अलंकृत नहीं है जो उनके घर में घुसकर परिजन (नोकरानी) को इस प्रकार अपमानित किया जा रहा है ।
विमर्श— चण्ड = शूर, बलशाली । भागधेय- यहाँ 'भागरूपनामभ्यो धेयः, वार्त्तिक से स्वाथिक धेय प्रत्यय है और भाग = भाग्यवाची है । वेणुकस्येव दुष्टस्य ते मस्तकं कुट्टयिष्यामि - यह योजना है । महाब्राह्मण- निकृष्ट ब्राह्मण । नौ शब्दों के साथ 'महत्' शब्द का योग निन्दित अर्थ व्यक्त करता है—
शङ्खे, तैले, तथा मांसे, वैद्ये, ज्योतिषिके, द्विजे ।
यात्रायां, पथि, निद्रायां महच्छब्दो न दीयते ॥
विदूषक निकृष्ट ब्राह्मण होता है । अतः महाब्राह्मण सम्बोधन ठीक है । संस्थानक- यह शकार का नाम है । उपमर्दः- निग्रह, अपमान ।
७ मृ०
६८ | मृच्छकटिकम्
मा दुग्गदोत्ति परिहवो णत्थि कअन्तस्स दुग्गदो णाम ।
चारित्तेण विहीणो अड्ढो विअ दुग्गदो होइ ॥ ४३ ॥( मा दुर्गत इति परिभवो नास्ति कृतान्तस्य दुर्गतो नाम ।
चारित्र्येण विहीन आढ्योऽपि च दुर्गतो भवति ॥ ४३ ॥ )
अन्वयः— (अयं, जनः ), दुर्गतः, 'इति, परिभवः, मा, (कार्षीः ), कृतान्तस्य, (समक्षम्), दुर्गतः, न, अस्ति, नाम, च, चारित्र्येण, विहीनः, आढ्यः, अपि, दुर्गतः, भवति ॥ ४३ ॥
शब्दार्थ— (अयं जनः=यह व्यक्ति), दुर्गतः=दरिद्र (है), इति=इसलिये, परिभवः=अपमान, मा=मत, (कार्षीः=करो); कृतान्तस्य=यमराज के (समक्षम्=सामने) दुर्गतः=दरिद्र, न=नहीं, अस्ति=है, नाम च=प्रत्युत, चारित्र्येण=सदाचरण से, विहीनः=रहित, आढ्यः=धनी, अपि=भी, दुर्गतः=दरिद्र, भवति=होता है ॥४३॥
अर्थ— (यह) दरिद्र है इसलिये (किसी का) अपमान मत करो, क्योंकि यमराज के सामने कोई दरिद्र नहीं है। धनी भी चरित्र से विहीन निर्धन ही होता है। अतः दरिद्र समझ कर चारुदत्त अथवा उसके सम्बन्धियों का अपमान करना अनुचित है ॥ ४३ ॥
टीका— (अयम्) दुर्गतः=दुखं प्राप्तः दरिद्रः, इति=हेतोः, (तस्य) परिभवः=अवमानना, मा=नैव, (कार्षीः) हि, कृतान्तस्य=यमराजस्य, (समक्षम्) दुर्गतः=दरिद्रः, न=नैव, अस्ति=भवति, नाम, इदं सम्भावनायाम् । यमस्य समक्षम् निश्चयेन कश्चिदपि दरिद्रो धनी वा न भवति । चारित्र्येण=सदाचारेण, शास्त्र-सम्मताचारेण, विहीनः=रहितः, आढ्यः=धनवान्, अपि दुर्गतः=दरिद्रो, भवति=वर्तते। एवञ्च धनेन अस्य धनिकत्वं नैव द्रष्टव्यम्, प्रत्युत शिष्टाचारेणेति भावः। प्रथमवाक्यार्थस्य द्वितीयवाक्यार्थेन समर्थनात् काव्यलिङ्गम् । अप्रस्तुतप्रशंसा चेत्यनयोः संसृष्टिः। गाथा छन्दः । तल्लक्षणम्—
विषमाक्षरपादत्वात्, पादौ रसमञ्जस धर्मवत् ।
यश्छन्दसि नोक्तमत्र, गायेति तत् कथितं सूरिभिः ॥४३॥
विमर्श— दुर्गतः—दुर्=कष्टं गतः=प्राप्तः अर्थात् दरिद्रः । परिभवः=तिरस्कार । चारित्र्येण—चरित्र शब्द से स्वार्थिक ष्यञ् प्रत्यय हैं अतः चरित्र, चारित्र और चारित्र्य सभी समानार्थक ही हैं । कृतान्तः=कृतः अन्तः येन सः—सभी का अन्त करनेवाला यमराज । इसमें काव्यलिङ्ग और अप्रस्तुतप्रशंसा की निरपेक्षरूपेण स्थिति होने से संसृष्टि है। गाथा छन्द है। लक्षण संस्कृत टीका में देखिये ॥४२॥
प्रथमोऽङ्कः ६६
विटः—( सवैलक्ष्यम् ) महाब्राह्मण ! मर्षय मर्षय । अन्यजनशङ्कया खल्विदमनुष्ठितम्, न दर्पात् । पश्य—
सकामाऽन्विष्यतेऽस्माभिः.............
विदू०—किं इमं ? । ( किमियम् ? )
विटः—शान्तं पापम् ।
..................काचित् स्वाधीनयौवना ।
सा नष्टा शङ्कया तस्याः प्राप्तेयं शीलवञ्चना ॥ ४४ ॥
अर्थ—विट—( लज्जा के साथ ) महाब्राह्मण ! क्षमा करो, क्षमा करो । किसी अन्य व्यक्ति ( वसन्तसेना ) की शंका से यह हो गया, न कि घमण्ड से । देखो—
हम लोग एक कामिनी ( वेश्या ) की खोज कर रहे हैं········· ।
विदूषक—क्या इस की ?
विट—अनिष्ट शान्त हो !
**अन्वयः—**स्वाधीनयौवना, सकामा, काचित्, अस्माभिः, अन्विष्यते, (किन्तु), सा, नष्टा, तस्याः, शङ्कया, इयम्, शीलवञ्चना, प्राप्ता ॥ ४४ ॥
**शब्दार्थ—**स्वाधीनयौवना=अपनी जवानी पर अधिकार रखने वाली, सकामा=कामवासनायुक्त, काचित्=कोई ( वसन्तसेना ), अस्माभिः=हम लोगों-द्वारा, अन्विष्यते=खोजी जा रही है ( किन्तु ) सा=वह ( वसन्तसेना ), नष्टा=गायब हो गई है, यस्याः=उसी स्त्री की शङ्कया=भ्रम से, इयम्=यह (रदनिका का केशग्रहणरूपी) शीलवञ्चना=सदाचार का उल्लङ्घन, प्राप्ता=हो गया ॥ ४४ ॥
**अर्थ—**अपनी जवानी की मालकिन कामातुर किसी ( वेश्या ) की खोज हम लोग कर रहे हैं, परन्तु वह तो गायब ( अदृश्य ) हो गई, उसी के भ्रम के कारण यह शिष्टाचार की हानि ( उल्लङ्घन ) हो गई ( अर्थात् चारुदत्त की निर्धनता के कारण ऐसा अपराध नहीं हुआ है ) ॥ ४४ ॥
**टीका—**स्वाधीनम्=स्वायत्तम्, यौवनम्=युवावस्था यस्याः सा, स्वेच्छया यौवनोपभोगसमर्थेति भावः, सकामा=कामातुरा, काचित्=कापि, वेश्या, वसन्त-सेनेत्यर्थः, अस्माभिः=शकारादिभिः अन्विष्यते=अनुसन्धीयते, किन्तु सा=स्त्री, वसन्तसेना, नष्टा=अदृष्टा, तस्याः=अदृष्टरमण्याः, वेश्यायाः, शङ्कया=भ्रमात्, इयम्=साम्प्रतं रदनिकया सह घटिता, शीलवञ्चना=शिष्टाचारस्य प्रतारणा, परस्त्रीस्पर्शः इत्यर्थः, प्राप्ता=सञ्जाता, अस्माभिरिदमत्रापि योजनीयम् । एवञ्च चारुदत्तस्य दारिद्र्यं नात्र हेतुः, किन्तु वेश्याभ्रम एवेति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ४४ ॥
| १०० | मृच्छकटिकम् |
|---|
सर्वथा इदमदुनयसर्वस्वं गृह्यताम् । (इति खड्गमुत्सृज्य कृताञ्जलिः पादयोः पतति ।)
**विदू०—**सप्पुरिस । उट्ठेहि उट्ठेहि । अआणन्तेण मए तुमं उवालद्धे, सम्पद्ं उण जाणन्तो अणुणेमि । (सत्पुरुष ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ । अजानता मया त्वमुपालब्धः, साम्प्रतं पुनर्जानन् अनुनयामि ।)
**विटः—**ननु भवानेवात्रानुनयेः । तदुत्तिष्ठामि समयतः ।
**विदू०—**भणादु भवं (भणतु भवान् ।)
**विटः—**यदीमं वृत्तान्तमार्यचारुदत्तस्य नाख्यास्यसि ।
**विदू०—**ण कधइस्सं । (न कथयिष्यामि ।)
**विटः—**एष ते प्रणयो विप्र ! शिरसा धार्यते मया ।
गुणशस्त्रैर्वयं येन शस्त्रवन्तोऽपि निर्जिताः ॥ ४५ ॥
**विमर्श—**यहाँ सकामा तथा स्वाधीनयौवना इन दो विशेषणों से वेश्या की प्रतीति हो जाती है। सकामा=कामेन=मदनावेगेन सहिता सकामा=कामातुरा। स्वाधीनयौवना=स्व अपने ही (न कि पति आदि किसी अन्य के) अधीन है यौवन=यौवन का प्रभाव जिसके वह। नष्टा—√णश् अदर्शने धातु का निष्ठा-क्त प्रत्यय के साथ रूप है। इसलिये इसका अर्थ हैं—अदृष्टा। शीलवञ्चना=शील=शिष्टचार की वञ्चना=प्रतारणा, हानि, उल्लंघन। पथ्यावक्त्र छन्द है। लक्षण—
युजोर्जेन सरिद्भर्तुः पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ॥ ४४ ॥
**अर्थ—**किसी अपने यौवन की स्वामिनी (खोज कर रहें।) किन्तु वह अदृश्य हो गयी, उसी के भ्रम के कारण (रदनिका का केश ग्रहण रूपी) शिष्टाचारो-ल्लंघन हो गया ॥ ४४ ॥
सब प्रकार से बड़ी मेरी बिनती को मान लें। (ऐसा कह कर तलवार छोड़-कर, हाथ जोड़ कर पैरों पर गिर जाता है।)
**अर्थ—विदूषक—**हे सदाचारी पुरुष ! उठो, उठो। बिना जाने हुये ही मैंने तुम्हारी निन्दा कर डाली, (उलाहना दे डाला), अब जान लेने पर तो मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ।
**विट—**इस विषय में तो आप ही प्रार्थना के पात्र हैं। तो एक शर्त पर उठ सकता हूँ।
**विदूषक—**आप कहिये।
**विट—**यदि यह घटना आर्य चारुदत्त से नहीं कहोगे (तो मैं उठता हूँ)।
**विदूषक—**नहीं कहूँगा।
**अन्वयः—**हे विप्र ! एषः, ते, प्रणयः, मया, शिरसा, धार्यते, येन, शस्त्रवन्तः अपि, वयम्, गुणशस्त्रैः, निर्जिताः ॥ ४५ ॥
प्रथमोऽङ्कः १०५
शकारः—( सासूयम् ) किं निमित्तं उण भावे एदश्श दुट्ठबडुअश्श विणअञ्जलिं कदुअ पाएशु णिपडिदे ? । ( किं निमित्तं पुनर्भाव ! एतस्य दुष्टवटुकस्य विनयाञ्जलिं कृत्वा पादयोर्निपतितः ? । )
**विटः—**भीतोऽस्मि ।
**शकारः—**कश्श तुमं भोदे ? । ( कस्मात् त्वं भीतः ? । )
**विटः—**तस्य चारुदत्तस्य गुणेभ्यः ।
**शकारः—**के तश्श गुणा जश्श गेहं पविशिअ अशिदव्वं वि णत्थि । ( के तस्य गुणाः यस्य गेहं प्रविश्याशितव्यमपि नास्ति । )
**शब्दार्थ—**हे विप्र ! = हे ब्राह्मण !, एषः=यह, ते=तुम्हारा, प्रणयः=अनुग्रह, ( सज्जनता ), मया=मेरे द्वारा, शिरसा=सिर-से, धार्यते=धारण की जाती है, येन=जिसके कारण, शस्त्रवन्तः=शस्त्रधारी, अपि=भी, वयम् = हम लोग, गुणशस्त्रैः=गुणरूपी शस्त्रों से, निर्जिताः=पराजित करा दिये गये ॥ ४५ ॥
**अर्थ—विट—**हे विप्र ! यह आपका ( मेरी प्रार्थना का स्वीकार रूपी ) अनुग्रह मै सिर से धारण कर रहा हूँ, जिसके कारण शस्त्रधारी भी हम लोग ( आपके ) गुणरूपी शस्त्रों से पराजित करा दिये गये ॥ ४५ ॥
**टीका—**हे विप्र !=हे ब्राह्मण !, एषः=त्वयाऽधुना प्रदर्शितः, प्रणयः=मत्प्रार्थना-स्वीकृतिरूपः अनुग्रहः, मया=विटेन, शिरसा=मस्तकेन, धार्यते=स्वीक्रियते, येन=प्रणयेन हेतुना, शस्त्रवन्तः=शस्त्रधारिणः, अपि, वयम्=शकारादयः, गुणशस्त्रैः=गुणाः=औदार्यादयः एव शस्त्राणि=आयुधानि, तैः, विनिर्जिताः=पराजिताः । अत्र गुणेषु शस्त्रत्वारोपात् रूपकमलङ्कारः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम्, लक्षणन्तु पूर्वस्मिन् श्लोके उक्तम् ॥ ४५ ॥
**विमर्श—**प्रणयः=प्र√ +णीञ् +अच् । गुणों में शस्त्रत्व के आरोप के कारण रूपक अलंकार है, पथ्यावक्त्र छन्द है ॥ ४५ ॥
अर्थ—शकार—( ईर्ष्या के साथ ) भाव ! हाथ जोड़कर इस दुष्ट ब्राह्मण के पैरों पर क्यों गिर रहे हो ?
**विट—**डर गया हूँ।
**शकार—**तुम किससे डर गये हो ?
**विट—**उस चारुदत्त के गुणों से ।
**शकार—**उसके कौन से गुण हैं जिसके घर पर प्रवेश करने पर कुछ खाने को भी नहीं है ।
१०२ मृच्छकटिकम्
विट:--मा मैवम् ।
सोऽस्मद्विधानां प्रणयैः कृशीकृतो न तेन कश्चिद्विभवैर्विमानितः । निदाघकालेष्विव सोदको ह्रदो नृणां स तृष्णामपनीय शुष्कवान् ॥४६॥
अन्वयः--सः, अस्मद्विधानाम्, प्रणयैः, कृशीकृतः, तेन, कश्चित्, विभवैः, न, विमानितः, निदाघकालेषु, सोदकः, ह्रदः, इव, नृणाम्, तृष्णाम्, अपनीय, शुष्कवान् ॥ ४६ ॥
शब्दार्थ--सः=वह चारुदत्त, अस्मद्विधानाम् = हमारे जैसे लोगों के, प्रणयैः=धनादि की याचनाओं से, कृशीकृतः=क्षीण=निर्धन बना दिया गया है, तेन=उस, चारुदत्त के द्वारा, कश्चित्=कोई भी व्यक्ति, विभवैः=अपने धनादि से, न=नहीं, विमानितः = अपमानित किया गया है। निदाघकालेषु=गर्मी के दिनों में, सोदकः=जल से भरे हुये, ह्रदः=तालाब के, इव=समान, नृणाम्=मनुष्यों की, तृष्णाम्=प्यास को, अपनीय=दूर करके, शुष्कवान्,=सूख गया, निर्धन हो गया ॥ ४६ ॥
**अर्थ-विट-**नहीं, ऐसा मत (कहो)—वह चारुदत्त हमारे जैसे लोगों की धनादि-सम्बन्धी प्रार्थनाओं (को पूरी करने के) कारण, निर्धन (क्षीण) बना दिया गया है, इसने धन से कभी किसी को अपमानित नहीं किया है। गर्मी के दिनों में जल से भरे हुये तालाब के समान लोगों की प्यास बुझा कर सूख गया, निर्धन हो गया ॥ ४६ ॥
टीका--सः = चारुदत्तः, अस्मद्विधानाम् = अस्माकं विधा इव विधा=प्रकारः=सादृश्यम् येषां ते, मादृशानाम् याचकानाम् इत्यर्थः प्रणयैः=धनादि-विषयक-प्रार्थनैः, कृशीकृतः = दरिद्रीकृतः, तेन=चारुदत्तेन, विभवैः=धनादिभिः, कश्चित्=कोऽपि, जनः=मानवः, न=नैव, विमानितः=अपमानितः, सर्वेषां याचकानां प्रार्थनाः परिपूरिताः, धनादिगर्वेण कस्यापि कदापि नापमानं कृतमिति भावः । निदाघ-कालेषु = ग्रीष्मादिवसेषु, सोदकः = जलपरिपूर्णः, ह्रदः इव=तडाग इव, नृणाम्=पिपासुजनानाम्, तृष्णाम्=धनादिपिपासाम्, अपनीय=दूरीकृत्य, शुष्कवान्=शुष्कतां प्राप्तवान्, एकत्र धनाभावरूपा शुष्कता, अपरत्र च, जलाभावरूपा शुष्कतेति भेदः । अत्र पूर्णोपमांलकारः, उपजातिवृत्तम् । यत्तु केनचित् वंशस्थं वृत्तमिति लिखितम्, तदज्ञानादिति बोध्यम् ॥ ४६ ॥
विमर्श--कृशीकृतः-अभूत-तद्भावे च्विः । निदाघकालेषु-यहाँ काल शब्द दिन का प्रतिपादक होने से बहुवचन है। सोदकः--उदकेन सहितः । शुष्कवान्—$\surd$ शुष्+क्तवतु ‘शुषः कः’ [ पा. सू. ] से निष्ठा ‘त’ का ‘क’ होने पर शुष्कवान् होता है। अपनीय--अप+णीञ्+ल्यप्=य । यहाँ उपमान
प्रथमोऽङ्कः १०३
शकारः—[सामर्षम् ] के शे गब्भदासीए पुत्ते ? । ( कः स गर्भदास्याः पुत्रः ? )
शूरे विक्किन्ते पण्डवे ? शेदकेदू पुत्ते लाधाए ? लवणं इन्ददत्ते ? ।
अहो कुन्तीए तेण लामेण जादे अश्शत्थामे ? धम्मपुत्ते जडाऊ ॥४७॥
उपमेय, साधारणधर्म, एवं सादृश्यवाचक सभी का उल्लेख होने से पूर्ण उपमा अलंकार है। यहाँ उपजाति छन्द है। किसी व्याख्या में वंशस्थ छन्द लिखा है वह अनधानता के कारण है ।। ४६ ।।
अन्वयः— (कः सः इति गद्यस्थेनान्वयः) (किम्) शूरः, विक्रान्तः, पाण्डवः, श्वेतकेतुः ? अथवा, इन्द्रदत्तः, राधायाः, पुत्रः, रावणः, ? आहो, तेन, रामेण, कुन्त्याम्, जातः, अश्वत्थामा ? (अथवा) धर्म-पुत्रः जटायुः ? ॥ ४७ ॥
शब्दार्थ— कः=कौन है, सः=वह, गर्भदास्याः=जन्म से नौकरानी का पुत्र ? किम्=क्या, शूरः=वीर, विक्रान्तः=पराक्रमी, पाण्डवः=पाण्डु का पुत्र, श्वेतकेतुः=श्वेतकेतु (ऋषि) है ? अथवा=या, इद्रदत्तः=इन्द्वारा दत्तः=वररूपेण प्रदत्त, राधायाः=राधा (कर्ण की माँ) का पुत्र रावण है ? आहो=अथवा, तेन=उस प्रसिद्ध, रामेण=रामचन्द्र के द्वारा, कुन्त्यम्=कुन्ती में, जातः=उत्पन्न होने वाला, अश्वत्थामा=(महान् धनुर्धारी) अश्वत्थामा है ? अथवा धर्मपुत्रः=धर्मराज का पुत्र, जटायुः=जटायुनामक पक्षी है ? ॥ ४७ ॥
अर्थ—शकार— (क्रोध के साथ) जन्म से ही दासी का पुत्र वह कौन है ? क्या वह शूर, वीर, पराक्रमी, पाण्डुपुत्र श्वेतकेतु है ? अथवा इन्द्र द्वारा (वरदान में) प्रदत्त राधा का पुत्र रावण है ? अथवा उस (प्रसिद्ध) राम द्वारा कुन्ती में उत्पन्न अश्वत्थामा है ? अथवा धर्मराज (यमराज) का पुत्र जटायु है ? ॥ ४७ ॥
टीका— कः सः, किम् शूरः=वीरः, विक्रान्तः=पराक्रमी, पाण्डवः=पाण्डुपुत्रः, श्वेतकुतुः=एतन्नाम्ना प्रसिद्धः ऋषिः ? वा=अथवा, इन्द्रदत्तः=इन्द्रेण=देवराजेन, दत्तः=वरप्रदानरूपेण समर्पितः, राधायाः = एतन्नामिकायाः कर्णमातुरिति भावः, पुत्रः=सुतः, रावणः=दशाननः ? आहो=अथवा, तेन=प्रसिद्धेन, रामेण=रामचन्द्रेण, कुन्त्याम्=तन्नामिकायाम्, पाण्डुपत्न्यामित्यर्थः, जातः=उत्पन्न, अश्वत्थामा=द्रोणपुत्रः ? धर्मपुत्रः=धर्मस्य=यमस्य पुत्रः=सुतः, जटायुः=तन्नामा पक्षी ? यदि पूर्वोक्तेषु मध्ये कश्चित् सो भवेत् तंदा तस्मात् भयमुचितम्। अन्यथा तव मूर्खत्वमेवेति तस्य भावः । अत्र पुराणादिप्रसिद्धिविरुद्धत्वं शकारवचनत्वात् सोढव्यम् । सामाजिकानां मनोविनोदार्थमेवैतादृशकथनमिति बोध्यम् । अत्र वैश्वदेवी वृत्तम्। तल्लक्षणन्तु- वाणाश्वैश्छिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ ॥ ४७ ॥
१०४ | मृच्छकटिकम्
शूरो विक्रान्तः पाण्डवः श्वेतकेतुः ? पुत्रो राधायाः, रावण इन्द्रदत्तः ? ।
आहो कुन्त्यां तेन रामेण जातः अश्वत्थामा ? धर्मपुत्रो जटायुः ? ॥४७॥
विटः— मूर्ख ! आर्यचारुदत्तः खल्वसौ ।
दीनानां कल्पवृक्षः स्वगुणफलनतः, सज्जनानां कुटुम्बी,
आदर्शः शिक्षितानां, सुचरितनिकषः, शीलवेलासमुद्रः ।
सत्कर्ता, नावमन्ता, पुरुषगुणनिधिर्दक्षिणोदारसत्त्वो
ह्येकः श्लाघ्यः स जीवत्यधिकगुणतया चोच्छ्वसन्तीव चान्ये ॥४८॥
विमर्श— श्वेतकेतु न तो पाण्डुपुत्र थे और न युद्धप्रिय, अपि तु उपनिषदों में प्रसिद्ध उद्दालक ऋषि की सन्तान थे। श्वेतः केतुः = पताका यस्य सः तादृशः = अर्जुनः यह अर्थ करने पर शकार का कथन यथार्थ ही है। रावण न तो इन्द्रप्रदत्त था और न राधा की सन्तान था। राधा तो कर्ण की पालन करने वाली माँ थी, वास्तव में तो सूर्य द्वारा कुन्ती में ही कर्ण का जन्म हुआ था। अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र थे न कि राम और कुन्ती के। यह जटायु अरुण (सूर्यसारथी) का पुत्र था न कि धर्मराज का। परन्तु ये सभी महान् पराक्रमी थे। अतः शकार का यह ज्ञान सत्य ही ठहरता है। सम्बन्धों में ही उसकी मूर्खता प्रकट होती है। इसमें वैश्वदेवी छन्द है। लक्षण—'वाणाश्वैश्छिन्ना वैश्वदेवी म-मौ यौ' ॥४७॥
अन्वयः— दीनानाम्, स्वगुणफलनतः, कल्पवृक्षः, सज्जनानाम्, कुटुम्बी, शिक्षितानाम्, आदर्शः, सुचरितनिकषः, शीलवेलासमुद्रः, सत्कर्ता, न, अवमन्ता (नावमन्ता), पुरुषगुणनिधिः दक्षिणोदारसत्त्वः, श्लाघ्यः, च, सः, एकः, हि, अधिकगुणतया, जीवति, अन्ये, च, उच्छ्वसन्ति, इव ॥४८॥
शब्दार्थ— दीनानाम् = निर्धन लोगों का, स्वगुणफलनतः = अपने गुणरूपी फलों के भार से नीचे झुका हुआ, कल्पवृक्षः = कल्पवृक्ष, सज्जनानाम् = सज्जन पुरुषों का, कुटुम्बी = परिवार वाला, भाईबन्धु, शिक्षितानाम् = पढ़े लिखे, विद्वानों का, आदर्शः = आदर्श, (शीशा के समान निदर्शनभूत), सुचरितनिकषः = अच्छे आचरण = सदाचार की कसौटी, शीलवेलासमुद्रः = सत्स्वभावरूपी वेला = किनारे, तटों का समुद्र (कभी भी मर्यादा का उल्लंघन न करने वाले), सत्कर्ता = (योग्य का) सत्कार करने वाले, न अवमन्ता = (किसी का) अपमान न करने वाले, पुरुषगुणनिधिः = मनुष्य में रहने वाले सद्गुणों का समुद्र, दक्षिणोदारसत्त्वः = सरल एवम् उदार स्वभाव वाले, च = और, श्लाघ्यः = प्रशंसनीय, सः = वह, चारुदत्त, एकः = अकेला, हि = निश्चितरूप से, अधिकगुणतया = अधिक गुणों वाला होने के कारण, जीवति = जीवित हैं, च = और, अन्ये = दूसरे, लोग, उच्छ्वसन्ति इव = साँस सी ले रहे हैं, अर्थात् उनका जीना न जीना बराबर है ॥४८॥
प्रथमोऽङ्कः १०५
अर्थ--विट--मूर्ख ! यह आर्य चारुदत्त—दीनों के (मनोरथों को पूर्ण करने वाले), अपने गुणरूपी फलों के भार से झुके हुये कल्पवृक्ष, सज्जनों के बन्धु, शिक्षितों के (दर्पणतुल्य) आदर्श, सदाचार की कसौटी; सत्स्वभावरूपी मर्यादा के समुद्र, सत्कार करने वाले, अपमान न करने वाले, पुरुष में रहने वाले गुणों के निधि, सरल एवम् उदार स्वभाव वाले, और श्लाघनीय वे अकेले (चारुदत्त ही) अधिक गुण वाले होने से जीवित हैं, अन्य लोग सांस सी ले रहे हैं, अर्थात् उनका जीवन व्यर्थ है ॥ ४८ ॥
टीका—चारुदत्तस्य गुणान् वर्णयति—दीनानाम्=दरिद्रजनानाम्, स्वगुण-फलनंतः=स्वगुणा एव फलानि तेषां भारेण नतः=विनम्रः, कल्पवृक्षः=कल्पद्रुमः, मनोरथानां पूरक इत्यर्थः, सज्जनानाम्=सत्पुरुषाणाम्, कुटुम्बी=परिपालकों बन्धुः, शिक्षितानाम्=विदुषाम्, आदर्शः=मुकुर इव निदर्शनभूतः, सुचरितनिकषः=सुचरितस्य=सदाचारस्य, निकषः=कषपट्टिका 'कसौटी' इति हिन्द्याम्, शीलवेला-समुद्रः=शीलम् एव वेला=तटबन्धः, मर्यादा, तस्याः समुद्रः यथा समुद्रः स्वमर्यादां न कदापि अतिक्रामति, तथैवायमपि न कदापि स्वमर्यादामतिक्रामतीति भावः, सत्कर्ता=योग्यानां समादरकर्ता, न अवमन्ता=कस्यचिदपि अपमानस्य न कर्त्ता, अत्र 'न' शब्देन समासे 'नावमन्ता' इत्येकं समस्तं पदम्, नैकधावत् इति बोध्यम्, पुरुषगुणनिधिः=पुरुषे सम्भवानां दयादाक्षिण्यादीनां गुणानाम् निधिः=आलयः, दक्षिणोदारसत्त्वः=दक्षिणम्=सरलम्, उदारम्=महत्, सत्त्वम्=स्वभावः यस्य सः, श्लाघ्यः=प्रशंसनीयः, च=तथा, सः=चारुदत्तः, एकः=एकाकी एव, अधिक-गुणतया=अधिकाः इतरातिशायिनो गुणा यस्य सः तस्य भावस्तया = विविध-गुणाश्रयतया, जीवति=प्राणान् धारयति, अन्ये च=तथा इतरे जनाः, उच्छ्वसन्ति इव=चर्मभस्त्रेव श्वासोच्छ्वासं कुर्वन्ति, न तु सफलं सार्थकं जीवनं तेषामिति भावः। अत्र मालारूपकमिति पृथ्वीधरः। एकस्यैव चारुदत्तस्य विविधरूपेणो-ल्लेखात् उल्लेखाऽलङ्कारः, 'उच्छ्वसन्ति इव' अत्र क्रियोत्प्रेक्षा च। स्रग्धरा वृत्तम् ॥ ४८ ॥
विमर्श— इस श्लोक में विट चारुदत्त के महान् व्यक्तित्व का वर्णन करता है। स्वगुणफलनतः— यहाँ अपने औदार्यादि गुण रूपी फलों के भार से झुका हुआ=विनम्र—यही अर्थ तर्कसंगत है। किसी ने—फल=परिणाम से विनत—यह अर्थ भी लिखा है वह ठीक नहीं है। **आदर्शः—**दर्पण, जैसे दर्पण में विम्ब प्रतिबिम्ब में अन्तर नहीं होता है वैसा ही यहाँ है। यदि 'आदर्श' का अर्थ 'दृष्टान्त' मानें तो अधिक अच्छा है। **शीलवेलासमुद्रः—**शील = सत्स्वभाव रूपी वेला=समुद्रतट=मर्यादा, उसका समुद्र, उसी में सीमित रहने वाला,
१०६ मृच्छकटिकम्
तदितो गच्छामः।
शकारः—अगेणिहअ वशन्तशाणअ ! ( अगृहीत्वा वसन्तसेनिकाम् ? )
विटः--नष्टा वसन्तसेना।
शकारः--कधं विअ ? ( कथमिव ? )
विटः--
अन्धस्य दृष्टिरिव पुष्टिरिवातुरस्य
मूर्खस्य बुद्धिरिव सिद्धिरिवालसस्य।
स्वल्पस्मृतेर्व्यसनिनः परमेव विद्या
त्वां प्राप्य सा रतिरिborder वारिजने प्रनष्टा ॥४६॥
कभी भी मर्यादा का अतिक्रमण न करने वाला। नावमन्ता-न अवमन्ता-ये दो पद भी सम्भव हैं और 'नावमन्ता' यह एक समस्त पद भी सम्भव है क्योंकि 'न' के साथ समास करने पर लोप और नुट् आदि उसी प्रकार नहीं होते हैं जैसे-नैकधा, नैकध्यम् आदि में। इसमें एक चारुदत्त का ही अनेक रूपों से उल्लेख होने के कारण उल्लेख अलंकार है--
'एकस्यानेधोल्लेखो यः स उल्लेख उच्यते।' स्वगुणफलनतः, शीलवेला-समुद्रः आदि में रूपक है और 'उच्छ्वसन्ति इव' इसमें क्रियोत्प्रेक्षा है इनकी संसृष्टि है। स्रग्धरा छन्द है—'म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्' ।। ४८ ।।
अर्थ—तो इस लिये यहाँ से चलें।
शकार—वसन्तसेना को बिना प्राप्त किये ?
विट—वसन्तसेना तो अदृश्य हो गयी।
शकार—किस प्रकार ?
अन्वयः—अन्धस्य, दृष्टिः, इव, आतुरस्य, पुष्टिः, इव, मूर्खस्य, बुद्धिः, इव, अलसस्य, सिद्धिः इव, स्वल्पस्मृतेः व्यसनिनः, परमा, विद्या इव, अरिजने, रतिः, इव, सा, त्वाम्, प्राप्य, विनष्टा ॥ ४६ ॥
शब्दार्थः—अन्धस्य=अन्धे की, दृष्टिः इव=आँख (की ज्योति) के समान, आतुरस्य=रोगी की, पुष्टिः इव=पुष्टता के समान, मूर्खस्य=मूर्ख की, बुद्धिः इव=बुद्धि के समान, अलसस्य=आलस्ययुक्त पुरुष की, सिद्धिः इव=सिद्धि=सफलता के समान, स्वल्पस्मृतेः=साधारण स्मरण शक्ति वाले, व्यसनिनः=कामादि व्यसनों में आसक्त (पुरुष) की, परमा=उत्कृष्ट, विद्या इव=विद्या के समान, ब्रह्मविद्या के समान, अरिजने=शत्रु में, रतिः इव=प्रेम के समान, सा=वह वसन्तसेना, त्वाम्=आप (शकार) को, प्राप्य=प्राप्त करके, प्रनष्टा=अदृश्य हो गयी ॥ ४६ ॥
अर्थ—विट—
प्रथमोऽङ्कः १०७
शकारः-- अगेण्हिअ वशन्तशेणिअं ण गमिश्शं । ( अगृहीत्वा वसन्तसेनां न गमिष्यामि । )
विटः-- एतदपि न श्रुतं त्वया ? ।
आलाने गृह्यते हस्ती वाजी वल्गासु गृह्यते । हृदये गृह्यते नारी यदिदं नास्ति गम्यताम् ॥५०॥
अन्धे की आंख के समान, रोगी की पुष्टता ( शक्ति ) के समान, मूर्ख की बुद्धि के समान, आलसी की सफलता के समान, मन्द बुद्धिवाले व्यसनी की परम विद्या ( उत्कृष्ट विद्या या वेदान्त-विद्या ) के समान, शत्रुजन में प्रेम के समान, वह वसन्तसेना तुम्हें पाकर [ तुमसे मिलते ही ] अदृश्य हो गयी ॥ ४९ ॥
टीका— अन्धस्य=नेत्रद्वयरहितस्य, दृष्टिः इव = नेत्रज्योतिरिब, आतुरस्य=रुग्णस्य, पुष्टिः इव=शारीरिकपुष्टता इव, मूर्खस्य=जडस्य, बुद्धिः इव=कार्य-सफलता इव, स्वल्पस्मृतेः=क्षीणस्मृतिशक्तिकस्य, व्यसनिनः = कामादिदुर्व्यसनासक्तस्य, परमा-उत्कृष्टा, विद्या इव=ज्ञानम् इव, ब्रह्मविद्येवेति भावः, अरिजने=शत्रुजने, रतिः इव=अनुराग इव, सा=वसन्तसेना, त्वाम् दुष्टं शकारम्, प्राप्य=लब्ध्वा, मिलित्वेति भावः, प्रनष्टा = अदर्शनं गता, णश् अदर्शने इत्यस्माद् भूते क्तः । अत्रोपमेयभूताया वसन्तसेनाया अनेक-विधोपमानप्रदर्शनात् मालोपमालंकारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ ४९ ॥
विमर्श— इसमें दृष्टिः, पुष्टिः, बुद्धिः, सिद्धिः, विद्या, रतिः—इन अनेक उपमानों से उपमेयभूत वसन्तसेना का उल्लेख करने के कारण मालोपमा अलंकार है--
'मालोपमा यदेकस्योपमानं बहु दृश्यते।' सा० द० १०।२६
प्रनष्टा - प्र + $\sqrt{\text{णश्}}$ ( अदर्शने ) + क्त; अतः प्रनष्टा=अदृष्टा यह अर्थ होता है । वसन्ततिलका छन्द है—उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः ॥ ४९ ॥
**अर्थ—शकार—**वसन्तसेना को लिये बिना नहीं जाऊँगा ।
**अन्वयः--**हस्ती, आलाने, गृह्यते, वाजी, वल्गासु, गृह्यते, नारी, हृदये, गृह्यते, यदि, इदम्, न, अस्ति, ( तदा ) गम्यताम् ॥ ५० ॥
**शब्दार्थः--**हस्ती=हाथी, आलाने=बन्धनस्तम्भ में ही, गृह्यते=बांधा, रोका जाता है, वाजी=घोड़ा, वल्गासु=लगामों में, गृह्यते=वश में किया जाता है, नारी=स्त्री, हृदये=हृदय में, गृह्यते=वश में की जाती है, यदि=अगर, इदम्=यह ( अनुराग-पूर्ण हृदय ) न=नहीं, तदा=तब, गम्यताम्=जाइये ॥ ५० ॥
**अर्थ—विट—**क्या तुमने यह भी नहीं सुना ?—हाथी बन्धनस्तम्भ में (बांध
१०८ मृच्छकटिकम्
शकारः—जइ गच्छशि, गच्छ तुमं, हगे ण गमिश्शं । ( यदि गच्छसि, गच्छ त्वम्, अहं न गमिष्यामि । )
विटः—एवम्, गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । )
शकारः—गड़े क्खु भावे अभावं । ( विदूषकमुद्दिश्य ) अले काकपदशीशमत्थका दुट्टवडुका ! उवविश उवविश । ( गतः खलु भावः अभावम् । अरे काकपदशीर्षमस्तक दुष्टबटुक ! उपविश उपविश । )
कर ही ) वश में किया जाता है ( पकड़ा जाता है ), घोड़ा लगामों ( को लगाने ) पर ही वश में किया जाता है और स्त्री हृदय में ( विद्यमान प्रेम द्वारा ही ) वश में की जाती है, ( न कि तुम्हारे समान बलपूर्वक ) । यदि यह ( उसका और तुम्हारा परस्पर अनुरागपूर्ण हृदय ) नहीं है तो ( यहाँ से ) जाइये ।। ५० ।।
टीका—हस्ती=हस्तः=शुण्डादण्डः अस्ति अस्य सः करी, गजः, आलाने=बन्धनस्तम्भे, गृह्यते=निरुध्यते, वशीक्रियते, बाजी=अश्वः, बल्गासु=मुखरज्जुषु, खलीनेषु, गृह्यते=वशीक्रियते, बल्गाकर्षणेन नियम्यते, नारी=स्त्री, हृदये=अन्तःकरणे, तत्रस्थे अनुरागे सत्येव गृह्यते, यदि=चेत् इदम्=तस्याः तव चोभयोरनुरागपूर्णं हृदयम्, नास्ति=नैव वर्तते, तदा=तस्यां स्थितौ, गम्यताम्=तस्याः प्राप्त्याशां विहायान्यत्र व्रज्यतां त्वया शकारेणेति भावः । अत्र आलानादौ हस्त्यादिग्रहणमिव हृदये वारीग्रहणमितिबिम्बानुविम्बभावे पर्यवसानात् निदर्शनानामालङ्कारः। पथ्यावक्त्रं वृत्तं तल्लक्षणं पूर्वमुक्तम् ।। ५० ।।
विमर्श—हृदये-विट का भाव यह है कि जैसे हाथी स्तम्भ में बन्धने पर ही रोका जाता है और घोड़ा लगाम लगाने पर ही रोका जाता है उसी प्रकार स्त्री हृदय में ही वश में की जा सकती है, शरीर में नहीं। अतः वसन्तसेना के हृदय में प्रविष्ट होकर उसे अपने वश में करो। शरीर पर अधिकार कर लेने पर भी वास्तव में उसे अपने वश में कर पाना कठिन है। सप्तमी विभक्ति इसीलिये प्रयुक्त है। आलानादि में हाथी आदि के ग्रहण के समान हृदय में नारी का ग्रहण—यह बिम्ब-अनुविम्बभाव में पर्यवसान होने से निदर्शना अलंकार है—
सम्भवन् वस्तुसम्बन्धोऽसम्भवन् वापि कुत्रचित् ।
यत्र बिम्बानुबिम्बत्वं बोधयेत् सा निदर्शना ॥
सा० द० १०।५१
पथ्यावक्त्र छन्द है। लक्षण-युजोर्जेन सरिद्भर्तुः पथ्यावक्त्र प्रकीर्तितम् ।। ५० ।।
अर्थः—शकार—यदि तुम जाते हो तो जाओ, मैं नहीं जाऊँगा ।
विट—बहुत अच्छा, मैं जाता हूँ । ( इस प्रकार निकल जाता है । )
शकार—भाव अभाव को प्राप्त कर गया, अर्थात् चला गया । ( विदूषक को
प्रथमोऽङ्कः १०६
**विदूषकः—**उववेसिदा ज्जेव अम्हे । ( उपवेशिता एव वयम् । )
**शकारः—**केण ? । ( केन ? । )
**विदूषकः—**कअन्तेण । ( कृतान्तेन । )
**शकारः—**उट्ठेहि उट्ठेहि । ( उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ । )
**विदूषकः—**उट्ठिस्सामो । ( उत्थास्यामः । )
**शकारः—**कदा ? ( कदा ? )
**विदूषकः—**जदा पुणो वि देव्वं अणुऊलं भविस्सदि । (यदा पुनरपि दैवमनुकूलं भविष्यति । )
**शकारः—**अले ! लोद लोद । ( अरे ! रुदिहि रुदिहि । )
**विदूषकः—**रोदाविदा ज्जेव अम्हे । ( रोदिता एव वयम् । )
**शकारः—**केण ? ( केन ? )
**विदूषकः—**दुग्गदीए । ( दुर्गत्या । )
**शकारः—**अले ! हश हश । ( अरे ! हस हस । )
**विदूषकः—**हसिस्सामो । ( हसिष्यामः । )
**शकारः—**कदा ? ( कदा ? । )
उद्देश्य करके ) अरे कौआ के पैर के समान शिर तथा मस्तक वाले दुष्ट वटुक ! ( ब्राह्मण के बच्चे ! ) बैठ जा, बैठ जा ।
**विदूषक—**हम लोग तो बैठा ही दिये गये हैं ।
**शकार—**किसके द्वारा ?
**विदूषक—**भाग्य ( दैव ) के द्वारा ।
**शकार—**उठो, उठो ।
**विदूषक—**उठेंगे ।
**शकार—**कब ?
**विदूषक—**जब फिर भाग्य अनुकूल होगा ।
**शकार—**अरे ! रोओ, रोओ ।
**विदूषक—**हम लोग तो रुलाये ही जा चुके हैं ।
**शकार—**किसके द्वारा ?
**विदूषक—**दुर्गति ( दरिद्रता ) के द्वारा ।
**शकार—**अरे ! हँस, हँस ।
**विदूषक—**हसेंगे ।
**शकार—**कब ?