भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः

विट :--कथं स्वरपरिवर्त्तः कृतः । अहो चित्रम् । अथवा किमत्र चित्रम् ?

इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया ।
वञ्चनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ॥ ४२ ॥

( प्रविश्य )

विदूषकः-- ही ही भो ! पदोसमन्दमारुदेण पसुबन्धोवणीदस्स विअ छाअलस्स हिअअं, फुरफुराअदि पदीवो ( उपसृत्य रदनिकां दृष्ट्वा ) भो ! रदणिए । ( आश्चर्यम् ! भोः ! प्रदोषमन्दमारुतेन पशुबन्धोपनीतस्येव छागलस्य हृदयं फुरफुरायते प्रदीपः । भो रदनिके ! । )


दधिभक्तलुब्धायाः=-यह भी पाठ है । दही भात खाने की इच्छुक--यह अर्थ है । परन्तु प्रथम पाठ ही तर्कसंगत है ।

अन्वयः--रङ्गप्रवेशेन, कलानाम्, उपशिक्षया, च, वञ्चनापण्डितत्वेन, च, इयम्, स्वरनैपुण्यम्, आश्रिता ॥ ४२ ॥

शब्दार्थ--रङ्ग-प्रवेशन= नाट्यशाला में प्रवेश= कार्य करने से, च= और, कलानाम्= संगीत आदि ६४ कलाओं की, उपशिक्षया= शिक्षा अथवा अभ्यास के कारण, तथा, वञ्चनापण्डितत्वेन= ठगने की चतुरता के कारण, इयम्= इस वसन्तसेना ने, स्वरनैपुण्यम= अपनी आवाज ( बदलने ) की निपुणता, आश्रिता= प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥

अर्थ--विट - क्या स्वर बदल लिया ? बड़ा आश्चर्य है । अथवा इसमें आश्चर्य क्या है ?

रंगशाला में ( अभिनयादि करने के लिये ) प्रवेश करने से और [संगीत आदि] कलाओं की शिक्षा [ या अभ्यास ] से तथा ठगने में चतुर होनेसे इसने स्वर [ परिवर्तन आदि ] में निपुणता प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥

टीका--रङ्गप्रवेशन=रङ्गः= नाट्यशाला तत्र अभिनयाद्यर्थं गमनेन, कलानाम्= सङ्गीतशास्त्रादिप्रसिद्धकलानाम्, उपशिक्षया= अभ्यासेन, शिक्षणाद्वा, वञ्चनापण्डितत्वेन-वञ्चना= प्रतारणा, तस्यां पण्डितत्वेन-चातुर्येण, इयम्= वसन्तसेना, स्वरनैपुण्यम्= स्वध्वनेः परिवर्त्तनादिविषयकं कौशलम्, आश्रिता= प्राप्तवती । एवञ्च वसन्तसेनेवेयमिति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ४२ ॥

विमर्श--वञ्चनापण्डितत्वेन=-वञ्चना= ठगना, उसमें पण्डितत्व-- पण्डित होने से-- पण्डित शब्द से भाव में त्वल् प्रत्यय है । स्वरनैपुण्यम्-- यहाँ स्वर का नैपुण्य-निपुण शब्द से भाव में ष्यञ्=य प्रत्यय होता है । स्वरनैपुण्य का अभिप्राय इच्छानुसार स्वर कर लेना है । तीन हेतुओं से स्वरनैपुण्य का आश्रयण कार्य हो रहा है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । और अनुष्टुप् छन्द है ॥४२॥

[ प्रवेश करके ]

अर्थ--विदूषक-- अरे आश्चर्य है ! प्रदोष=सन्ध्या-कालीन हवा से यह दीपक, यज्ञीय पशु को बांधने के लिये बने खूंटे के पास ले जाये गये पशु