मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः । ६५
विट :--कथं स्वरपरिवर्त्तः कृतः । अहो चित्रम् । अथवा किमत्र चित्रम् ?
इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया ।
वञ्चनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ॥ ४२ ॥
( प्रविश्य )
विदूषकः-- ही ही भो ! पदोसमन्दमारुदेण पसुबन्धोवणीदस्स विअ छाअलस्स हिअअं, फुरफुराअदि पदीवो ( उपसृत्य रदनिकां दृष्ट्वा ) भो ! रदणिए । ( आश्चर्यम् ! भोः ! प्रदोषमन्दमारुतेन पशुबन्धोपनीतस्येव छागलस्य हृदयं फुरफुरायते प्रदीपः । भो रदनिके ! । )
दधिभक्तलुब्धायाः=यह भी पाठ है । दही भात खाने की इच्छुक—यह अर्थ है । परन्तु प्रथम पाठ ही तर्कसंगत है ।
अन्वयः--रङ्गप्रवेशेन, कलानाम्, उपशिक्षया, च, वञ्चनापण्डितत्वेन, च, इयम्, स्वग्नैपुण्यम्, आश्रिता ॥ ४२ ॥
**शब्दार्थ--रङ्ग-प्रवेशेन=**नाट्यशाला में प्रवेश=कार्य करने से, **च=**और, **कलानाम्=**संगीत आदि ६४ कलाओं की, **उपशिक्षया=**शिक्षा अथवा अभ्यास के कारण, तथा, **वञ्चनापण्डितत्वेन=**ठगने की चतुरता के कारण, **इयम्=**इस वसन्तसेना ने, **स्वरनैपुण्यम्=**अपनी आवाज ( बदलने ) की निपुणता, **आश्रिता=**प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
अर्थ--विट—क्या स्वर बदल लिया ? बड़ा आश्चर्य है। अथवा इसमें आश्चर्य क्या है ?
रंगशाला में ( अभिनयादि करने के लिये ) प्रवेश करने से और [संगीत आदि] कलाओं की शिक्षा [ या अभ्यास ] से तथा ठगने में चतुर होनेसे इसने स्वर [ परिवर्तन आदि ] में निपुणता प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
**टीका--रङ्गप्रवेशेन=रङ्गः=**नाट्यशाला तत्र अभिनयाद्यर्थं गमनेन, कलानाम्= सङ्गीतशास्त्रादिप्रसिद्धकलानाम्, **उपशिक्षया=**अभ्यासेन, शिक्षणाद्वा, **वञ्चनापण्डितत्वेन—वञ्चना=**प्रतारणा, तस्यां **पण्डितत्वेन=**चातुर्येण, **इयम्=**वसन्तसेना, **स्वरनैपुण्यम्=**स्वध्वनेः परिवर्तनादिविषयकं **कौशलम्, आश्रिता=**प्राप्तवती । एवञ्च वसन्तसेनॆवेयपिति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ४२ ॥
**विमर्श--वञ्चनापण्डितत्वेन-=वञ्चना=**ठगना, उसमें पण्डितत्व—पण्डित होने से—पण्डित शब्द से भाव में त्वल् प्रत्यय है। **स्वरनैपुण्यम्—**यहाँ स्वर का नैपुण्य—निपुण शब्द से भाव में ष्यञ्=य प्रत्यय होता है । स्वरनैपुण्य का अभिप्राय इच्छानुसार स्वर कर लेना है । तीन हेतुओं से स्वरनैपुण्य का आश्रयण कार्य हो रहा है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । और अनुष्टुप् छन्द है ॥४२॥
[ प्रवेश करके ]
अर्थ--विदूषक--अरे आश्चर्य है ! **प्रदोष=**सन्ध्या-कालीन हवा से यह दीपक, यज्ञीय पशु को बांधने के लिये बने खूंटे के पास ले जाये गये पशु