मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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शकारः—भावे ! भावे ! मणुश्शे मणुश्शे । ( भाव ! भाव ! मनुष्यो मनुष्यः । )
विदूषकः—जुत्तं णेदं, सरिसं णेदं, जं अज्जचारुदत्तस्स दलिद्ददाए सम्पंदं परपुरिसा गेहं पविसन्ति । ( युक्तं नेदम्, सदृशं नेदम्, यदार्यचारुदत्तस्य दरिद्रतया साम्प्रतं परपुरुषा गेहं प्रविशन्ति । )
रद०--अज्ज मित्तेअ ! पेक्ख मे परिहवं । ( आर्य्य ! मैत्रेय ! प्रेक्षस्व मे परिभवम् ? )
विदूषकः—किं तव परिहवो ? आदु अम्हाणं ? ( किं तव परिभवः ? अथवा अस्माकम् ? )
रद०—णं तुम्हाणं ज्जेव । ( ननु युष्माकमेव । )
विदूषकः—किं एसो बलक्कारो ? । ( किमेष बलात्कारः ? । )
रद०—अध इं । ( अथ किम् । )
विदूषकः--सच्चं ? ( सत्यम् ? । )
रद०—सच्चं ? ( सत्यम् । )
विदू०--(सक्रोध दण्डकाष्ठमुद्यम्य) मा दाव । भो ! सके गेहे कुक्कुरोऽवि
के हृदय के समान, फुर फुर कर रहा है । (पास जाकर रदनिका को देख कर) अरी ! रदनिके ।
विमर्श—प्रदोषमन्दमारुतेन = प्रदोष = सायंकालीन मन्द हवा से, पशुबन्धोपनीतस्य--पशुः बध्यते अत्र-इस विग्रह में अधिकरण अर्थ में घञ्=अ प्रत्यय होता है--पशुबन्धः, तत्र उपनीतस्य=बलिप्रदानार्थं बद्धस्य, छागलस्य=बकरे के, फुरफुरायते=फुर-फुर इस प्रकार के अव्यक्त शब्द को कर रहा है, अथवा हिल रहा है।
अर्थ—शकार—भाव ! भाव ! पुरुष है पुरुष ।
विदूषक—यह उचित नहीं है, शोभनीय नहीं है कि आर्य चारुदत्त के दरिद्र होने के कारण इस समय दूसरे लोग घर में घुस रहे हैं ।
रदनिका—आर्य मैत्रेय ! मेरा अपमान तो देखो ।
विदूषक—क्या तेरा अपमान अथवा हम लोगों का ?
रदनिका—हाँ, आप लोंगों का ही ।
विदूषक—क्या यह बलात्कार (बलपूर्वक अपमान) है ?
रदनिका—हाँ, और क्या ।
विदूषक—सच ?
रदनिका—सच ।
विदूषक—(क्रोधपूर्वक लकड़ी का डण्डा उठाकर) ऐसा नहीं (हो सकता) । अरे ! अपने घर में तो कुत्ता भी बहादुर बन जाता है और मैं तो भला