मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ६७
दाव चण्डो भोदि, किं उण अहं बम्हणो ! ता एदिणा अम्हादिस-जण-भाअधेअ-कुड़िलेण दण्डकट्ठेण दुट्ठस्स विअ सुक्खाण-वेणुअस्स मत्थअं दे पहारेहिं कुट्टइस्सं । ( मा तावत् । भोः ! स्वके गेहे कुक्कुरोऽपि तावत् चण्डो भवति, किं पुनरहं ब्राह्मणः । तदेतेन अस्मादृश-जन-भागधेय-कुटिलेन दण्डकाष्ठेन दुष्टस्येव शुष्कवेणुकस्य मस्तकं ते प्रहारैः कुट्टयिष्यामि । )
विटः—महाब्राह्मण ! मर्षय मर्षय ।
विदू०—( विटं दृष्ट्वा । ) ण एत्थ एसो अवरज्झदि । ( शकारं दृष्ट्वा ) एसो क्खु एत्थ अवरज्झदि । अरे रे राजसालअ । संट्ठाणअ । दुज्जण । दुम्मणुस्स । जुत्तं णेदं ? जहवि णाम तत्तभवं अज्जचारुदत्तो दलिद्दो संवृत्तो, ता किं तस्स गुणेहिं ण अलङ्किदा उज्जइणी जेण तस्स गेहं पबिसिअ परिअणस्स ईदिसो उवमद्दो करीअदि । ( नात्र एषोऽपराध्यति । एष खल्वत्र अपराध्यति ! अरे रे राजश्यालक ! संस्थानक ! दुर्जन ! दुर्मनुष्य ! युक्तं नेदम् । यद्यपि नाम तत्रभवान् आर्य्यचारुदत्तो दरिद्रः संवृत्तः, तत् किं तस्य गुणैर्नालङ्कृता उज्जयिनी येन तस्य गृहं प्रविश्य परिजनस्य ईदृश उपमर्दः क्रियते । )
ब्राह्मण (पुरुष) हूँ । इस लिये हम लोगों के (टेढ़े) भाग्य के समान टेढ़े इस लकड़ी के डण्डे से प्रहारों के द्वारा, सूखे बाँस के समान दुष्ट तेरे शिर को कूट (तोड़) डालता हूँ ।
विट—महाब्राह्मण ! क्षमा करो । क्षमा करो ।
विदूषक—(विट को देख कर) यहाँ यह अपराध=बलात्कार नहीं कर रहा है । (शकार को देखकर) अरे रे राजश्यालक (राजा के साले) संस्थानक, दुष्ट ! नीच मनुष्य ! यह ठीक नहीं है । यद्यपि आर्य चारुदत्त (इस समय) दरिद्र हो गये हैं, तो तो भी क्या उनके गुणों से उज्जयिनी नगरी अलंकृत नहीं है जो उनके घर में घुसकर परिजन (नोकरानी) को इस प्रकार अपमानित किया जा रहा है ।
विमर्श— चण्ड = शूर, बलशाली । भागधेय- यहाँ 'भागरूपनामभ्यो धेयः, वार्त्तिक से स्वाथिक धेय प्रत्यय है और भाग = भाग्यवाची है । वेणुकस्येव दुष्टस्य ते मस्तकं कुट्टयिष्यामि - यह योजना है । महाब्राह्मण- निकृष्ट ब्राह्मण । नौ शब्दों के साथ 'महत्' शब्द का योग निन्दित अर्थ व्यक्त करता है—
शङ्खे, तैले, तथा मांसे, वैद्ये, ज्योतिषिके, द्विजे ।
यात्रायां, पथि, निद्रायां महच्छब्दो न दीयते ॥
विदूषक निकृष्ट ब्राह्मण होता है । अतः महाब्राह्मण सम्बोधन ठीक है । संस्थानक- यह शकार का नाम है । उपमर्दः- निग्रह, अपमान ।
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