भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६४ मृच्छकटिकम्

रदनिका--(सभयम् ।) किं अज्जमिस्सेहिं ववसिदं । (किमार्य-मिश्रैर्व्यवसितम् ?)

विटः--काणेलीमातः ! अन्य एवैष स्वरसंयोगः ।

शकारः--भावे ! भावे ! जधा दहिच्छल्लि-पलिंलूद्धाए मज्जलीआ शल-पलिवत्ते होदि, तधा दाशीएधीए शलपलिवत्ते कडे (भाव ! भाव ! यथा दधिशरपरिलुब्धाया मार्जार्याः स्वरपरिवर्त्तो भवति, तथा दास्याः पुत्र्या स्वरपरिवर्त्तः कृतः ।)

गालिं वा देहि, वा=अथवा, वक्रोश=रक्षार्थं कमपि आह्वय, अथवा शम्भुम्=शिवम्=शङ्करम्=ईश्वरम्=महादेवमित्यर्थः, अधिचण्डम्=अत्युच्चैः, क्रियाविशेषणमिदम्, लप=रक्षार्थम् आकारय, अहं शकारो न कस्मादपि बिभेमीति भावः । अत्र पूर्वार्धे उत्तरार्द्धे च पुनरुक्तिः शकारवचनत्वात् सोढव्या । इन्द्रवज्रा वृत्तम् ।। ४१ ।।

**विमर्श--**शिरसि, केशेषु, बालेषु, शिरोरुहेषु--इन सभी का एक ही तात्पर्य है । इसी प्रकार--शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम्=इनका भी एक ही अर्थ है । शकार की मूर्खता के कारण ये दोष नहीं हैं । 'अधिचण्डम्' इसे कुछ विद्वान् 'लप' क्रिया का विशेषण मानते हैं और कुछ इसे भी महादेव का पर्याय मानते हैं--'चण्डम्=महादेवं च'--पृथ्वीधर । आक्रोश--√आङ् + क्रुश + लोट् म. पु. ए. व. । क्रुश=आह्वाने रोदने च । परन्तु उपसर्ग के कारण शाप देना अथवा गाली देना अर्थ हो जाता है । इसी प्रकार वि + √क्रुश + लोट् म. पु. ए. व. में बुलाना अर्थ है । यहाँ इन्द्रवज्रा छन्द है ।। ४१ ।।

अर्थ--रदनिका-- (भय के साथ) आप महानुभावों ने यह क्या किया ? (अथवा कर रहे हैं ?)

**विट--**काणेलीपुत्र ! यह तो दूसरी ही आवाज (लगती) है !

**शकार--**भाव ! भाव ! जैसे दही के ऊपर की मलाई खाने की इच्छुक बिल्ली की आवाज बदल जाती है उसी प्रकार इस दासी की पुत्री ने (अपनी) आवाज बदल ली है ।

**टीका--आर्यमिश्रैः=**आर्याश्च ते मिश्राश्च=पूजनीयैर्महानुभावैरिति भावः, **व्यवसितम्=**कृतम् क्रियते वा, **दधिशरपरिलुब्धाया=**शरः=दध्नः उपरिभागः, हिन्द्यां मलाई इति प्रसिद्धम्, तस्य **लुब्धाया=**अभिलाषिण्याः क्वचित् **दधिभक्तलुब्धायाः=**इत्यपि पाठः, **स्वरपरिवर्त्तः=**ध्वनेः परिवर्त्तनं मार्जारिकायाः भवति तथैवानया वसन्तसेनयापि स्वस्वरस्य परिवर्त्तनं कृतम् ।

**विमर्श--दधि-शर-परिलुब्धायाः--**शर=दही के ऊपरी भाग=मलाई को कहते हैं । दही के ऊपर की मलाई खाने की इच्छुक बिल्ली जैसे अपनी स्वाभाविक आवाज बदल लेती है वैसे ही वसन्तसेना ने अपनी आवाज बदल ली है । कहीं कहीं