भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ६३

शकारः--

एशाशि वाशू ! शिलशि ग्गहोदा केशेशु बालेशु शिलोलुहेशु ।
अक्कोश विक्कोश लवाहिचण्डं शम्भुं शिवं शंकलमीशलं वा ॥४१॥
( एषासि वासु ! शिरसि गृहीता केशेषु बालेषु शिरोरुहेषु ।
आक्रोश विक्रोश लपाधिचण्डं शम्भुं शिवं शंकरमीश्वरं वा ॥ ४१ ॥

**अर्थ--**यह ( वसन्तसेना ! तुम ) अपने यौवन के दर्प से कुलपुत्र चारुदत्त से मिलने जा रही हो, किन्तु सेवा करने योग्य, खूब फूलों से सजे हुये तुम्हारे केशों को पकड़ कर खींचा जा रहा है ॥ ४० ॥

**टीका--**एषा=अन्धकारे विलीनापि शकारेण गृहीता त्वम्, वसन्तसेना, वयसः=यौवनस्य, दर्पात्=अभिमानात्, कुलपुत्रानुसारिणी=कुलपुत्रस्य चारुदत्तस्य अनुगमनशीला, असि, किन्तु, सेवितव्येषु=सेवायोग्येषु कुसुमाढ्येषु=कुसुमैः=पुष्पैः आढ्येषु=युक्तेषु केशेषु अत्राप्यवच्छेदकत्व सप्तम्यर्थः, केशावच्छेदेनेत्यर्थः, कर्षिता=आकृष्टा असि, शकारेणेति शेषः। अतः शकारमुपसेवस्वेति भावः। अनुष्टुप् छन्दः ॥ ४० ॥

**विमर्श--**दर्पात्-अपने यौवन के दर्प के कारण हम लोगों की उपेक्षा करके तुम चारुदत्त के पास जाना चाहती हो, परन्तु नहीं जा सकती हो। सेवितव्येषु √सेव् + तव्यत् । पुष्पाढ्येषु=जिनमें बहुत फूल गुथे हैं। केशेषु-सप्तमी का अर्थ-अवच्छेदकता है-केशावच्छेदेन कर्षिता। अनुष्टुप् छन्द है ॥ ४० ॥

**अन्वयः--**हे वासु !, शिरसि, केशेषु, बालेषु शिरोरुहेषु, गृहीता, त्वम्, (अधुना), आक्रोश, विक्रोश, वा, शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम्, वा, अधिचण्डम्, लप ॥ ४१ ॥

**शब्दार्थ--**हे वासु ! हे बालिके !, शिरसि=सिर में, केशेषु=केशों में, बालेषु=बालों में, शिरोरुहेषु=शिर के बालों में, गृहीता=पकड़ ली गई, त्वम्=तुम, ( अधुना=अब ) आक्रोश=गाली दो, नाराज हो जाओ, वा=अथवा, विक्रोश=चिल्लाओ, शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम् वा=शम्भु, शिव, शंकर और ईश्वर को, अधिचण्डम्=खूब जोर जोर से, लप=पुकारो ॥ ४१ ॥

**अर्थ--शकार--**हे बालिके ! ( अरी छोकरी ), शिरमें, बालों में पकड़ी गई तुम अब चाहे चिल्लाओ अथवा ( नाराज हो जाओ ), गाली दो, और शिव शम्भु, शंकर, ईश्वर को जोर जोर से पुकारो । ( मैं किसी से डरनेवाला नहीं हूँ ) ॥ ४१ ॥

**टीका--**हे वासु !=अयि बालिके ! शिरसि=केशेषु, बालेषु, शिरोरुहेषु=शिरोभागे स्थितेषु कचेष्वित्यर्थः, गृहीता=धृता, त्वम्=वसन्तसेना, अधुना आक्रोश=शापं