मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ मृच्छकटिकम्
( अन्धकारे पलायमाना माल्यगन्धेन सूचिता ।
केशवृन्दे परामृष्टा चाणक्येनेव द्रौपदी ॥ २६ ॥
विट:--
एषासि वयसो दर्पात् कुलपुत्रानुसारिणी ।
केशेषु कुसुमाढ्येषु सेवितव्येषु कर्षिता ॥ ४० ॥
शब्दार्थ—अन्धकारे=अन्धेरे में, पलायमाना=भागनेवाली, किन्तु माल्यगन्धेन=माला के पुष्पों की गन्ध से, सूचिता=सूचित=ज्ञात हो जाने वाली, (वसन्तसेना को), चाणक्येन=चाणक्य द्वारा, द्रौपदी इव=पाण्डवों की पत्नी के समान, केशवृन्दे=केशसमूहमें, परामृष्टा=पकड़ ली गई, अर्थात् बालों में पकड़ ली गई ॥ ३९ ॥
अर्थ—अन्धेरे में भागती हुई (किन्तु) माला की गन्ध से सूचित (ज्ञात) हो जाने वाली (वसन्तसेना) को उसी प्रकार बालों में पकड़ लिया है जैसे चाणक्य ने द्रौपदी को (पकड़ा था) अर्थात् वसन्तसेना का केशसमूह मैंने पकड़ लिया है ॥ ३६ ॥
टीका—अन्धकारे=तमसि, पलायमाना=धावन्ती, किन्तु, माल्यगन्धेन=माल्यस्य=मालागुम्फितपुष्पसमुदायस्य, गन्धेन=सौरभेण, सूचिता=संकेतिता, ज्ञापिता, (वसन्तसेना), चाणक्येन=कौटिल्येन, द्रौपदी इव=पाण्डवपत्नी इव, केशवृन्दे=कचसमुदाये, अवच्छेदकत्वं सप्तम्यर्थः केशवृन्दावच्छेदेनेत्यर्थः, परामृष्टा=गृहीता, धृता वा, मयेति शेषः। अत्रापि प्रसिद्धिविरुद्धत्वात् हतोपमा । अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ३६ ॥
विमर्श—चाणक्येन द्रौपदी इव—यह कथन सर्वथा असंगत है। किन्तु शकार की बातें मूर्खतापूर्ण ही होती हैं अतः अविचारणीय हैं। केशवृन्दे–यहाँ सप्तमी का अर्थ अवच्छेदकता है–केशवृन्दावच्छेदेन गृहीता–इसका तात्पर्य है–बालों से पकड़ ली गई। हतोपमा है। अनुष्टुप् छन्द है। लक्षण—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ ३६ ॥
अन्वयः—एषा, (त्वम्) वयसः, दर्पात्, कुलपुत्रानुसारिणी, सेवितव्येषु, पुष्पाढ्येषु, केशेषु, कर्षिता, असि ॥ ४० ॥
शब्दार्थ—एषा=यह (तुम वसन्तसेने !) वयसः=अवस्था=यौवन के, दर्पात्=घमण्ड से, कुलपुत्रानुसारिणी=कुलीन चारुदत्त का अनुसरण करने वाली, उससे मिलने के लिये जाने वाली, सेवितव्येषु=सेवा करने के योग्य, कुसुमाढ्येषु=फूलों से खूब सजे हुये, केशेषु=बालों में, कर्षिता=खींची गई, असि=हो, अर्थात् बालों को पकड़ कर तुम्हें खींचा गया है ॥ ४० ॥