भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६१ प्रथमोऽङ्कः

शकारः—भावे ! भावे ! अण्णेशामि वशन्तशणिअं ? ( भाव ? भाव ! अन्विष्यामि वसन्तसेनिकाम् । ) विटः—अन्विष्यताम् अन्विष्यताम् । शकारः—(तथा कृत्वा) भावे ! भावे ! गहिदा गहिदा ( भाव ! भाव ! गृहीता गृहीता । ) विटः—मूर्ख ! नन्वहम् । शकारः—इदो दाव पाच्छन्नो भविअ एअन्ते भावे चिट्ठदु । ( पुनरन्विष्य चेट गृहीत्वा । ) भावे ! भावे ! गहिदा गहिदा । ( इतस्तावत् प्रच्छन्नो भूत्वा एकान्ते भावस्तिष्ठतु । भाव ! भाव ! गृहीता गृहीता । ) चेटः—भट्टके ! चेडो हगे । ( भट्टारक ! चेटोऽहम् । ) शकारः—इदो भावे, इदो चेड़े, भावे चेड़े, चेड़े भावे । तुम्हे दाव एअन्ते चिट्ठ । ( पुनरन्विष्य रदनिकां केशेषु गृहीत्वा ) भावे ! भावे ! शंपदं गहिदा गहिदा वसंतशेणिआ । ( इतो भावः, इतश्चेटः, भावश्चेटः, चेटो भावः, युवां तावत् एकान्ते तिष्ठतम् । भाव ! भाव ! सांप्रतं गृहीता गृहीता वसन्तसेनिका । )

अन्धआले पलाअन्ती मल्लगन्धेण शूइदा ।
केशविन्दे पलामिश्टा चाणक्केणेव दोव्वदी ॥ ३६ ॥


बुझा दिया । रदनिके ! तुम बगल के दरवाजे से निकल जाओ। मैं भी भीतरी चौशाल से दीपक जला कर आता हूँ । ( इस प्रकार निकल जाता है ।)

शकार—भाव ! भाव ! वसन्तसेना को खोजूँगा ।

विट—खोजिये, खोजिये ।

शकार—( वैसा करके=खोज करके ) भाव ! भाव ! पकड़ ली, पकड़ ली ।

विट—मूर्ख ! यह तो मैं हूँ ।

शकार—इधर होकर आप तब तक एकान्त में रहिये । ( फिर खोज कर चेट को पकड़ कर ) भाव ! भाव ! पकड़ ली, पकड़ ली ।

चेट—स्वामिन् ! यह तो मैं ( चेट ) हूँ ।

शकार—इधर भाव ( विट ), उधर चेट, भाव, चेट, चेट, भाव । आप दोनों तब तक एकान्त में ही बैठिये । ( फिर खोज कर रदनिका को बालों में पकड़ कर ) भाव ! भाव ! इस समय वसन्तसेना पकड़ ली, पकड़ ली ।

अन्वयः—अन्धकारे, पलायमाना, माल्यगन्धेन, सूचिता, ( वसन्तसेना ), चाणक्येन, द्रौपदी, इव, केशवृन्दे, परामृष्टा ॥ ३६ ॥

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