भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 177
६०मृच्छकटिकम्

विदू०---( सवैलक्ष्यम् ।) भो वअस्स ! जइ मए गन्तव्वं, ता एसा वि से सहाइणी रदणिआ भोदु । ( भो वयस्य ! यदि मया गन्तव्यम्, तदेषापि मम सहायिनी रदनिका भवतु । )

चारु०--रदनिके ! मैत्रेयमनुगच्छ ।

चेटी--जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

विदू०--भोदि ! रदणिए । गेण्ह बलिं पदीवं अ । अहं अवावुदं पक्खदुआरअं करेमि । ( तथा करोति । ) ( भवति रदनिके ! गृहाण बलिं प्रदीपञ्च । अहमपावृतं पक्षद्वारकं करोमि । )

वसन्त०--मम अब्भुववत्तिणिमित्तं विअ अवावुदं पक्खदुआरअं, ता जाव पविसामि । ( दृष्ट्वा ) हद्धी ! हद्धी ! कथं पदीवो । ( पटान्तेन निर्वाप्य प्रविष्टा । ) ( मम अभ्युपपत्तिनिमित्तमिव अपावृतं पक्षद्वारकम्, तद्यावत् प्रविशामि । हा धिक् ! हा धिक् ! कथं प्रदीपः ! । )

चारु०--मैत्रेय ! किमेतत् ? ।

विदू०--अवावुदपक्खदुआरएण पिण्डीकिदेण वादेण णिव्वाविदो पदीवो । भोदि ! रदणिए ! णिक्कम तुमं पक्खदुआरएण । अहंपि अब्भन्तरचदुस्सालादो पदीवं पज्जालिअ आअच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । ) ( अपावृतपक्षद्वारेण पिण्डीकृतेन वातेन निर्वापितः प्रदीपः । भवति रदनिके ! निष्क्राम त्वं पक्षद्वारकेण । अहमपि अभ्यन्तरचतुःशालातः प्रदीपं प्रज्वाल्य आगच्छामि । )


ब० व्री० । मयि यहाँ सतिसप्तमी है। इसमें इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के संयोग के कारण उपजाति छन्द है। प्राचीन संस्कृत में युष्मत् और भवत् के प्रयोग में बहुत भेद नहीं माना जाता था। अतः यहाँ 'भवन्तम्' और 'त्वम्' दोनों का प्रयोग ठीक है ॥३८॥

अर्थ--विदूषक--( लज्जा के साथ ) हे मित्र ! यदि मुझे जाना है तो यह रदनिका भी मेरे साथ चले ।

**चारुदत्त--**रदनिके ! मैत्रेय के साथ जाओ ।

**चेटी--**आपकी जो आज्ञा !

**विदूषक--**हे रदनिके ! बलि और दीपक लो । मैं बगल का दरवाजा खोलता हूँ । ( दरवाजा खोलता है । )

**वसन्तसेना--**मुझ पर अनुग्रह करने के लिये ही मानों बगल के दरवाजा के किवाड़ खुले हैं । तो इसमें प्रवेश करती हूँ । ( देख कर ) हाय ! हाय ! ( अब ) क्या ? यहाँ दीप ( जल रहा है । ) ( आँचल से दीपक को बुझा कर प्रवेश करती है । )

**चारुदत्त--**मैत्रेय ! यह क्या ?

**विदूषक--**बगल के दरवाजे के खुलने से एकत्रित वायु के झोंके ने यह दीपक