भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 760 में से

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प्रथमोऽङ्कः (८६)

अपि च--

दारिद्र्य ! शोचामि भवन्तमेवमस्मच्छरीरे सुहृदित्युषित्वा ।
विपन्नदेहे मयि मन्दभाग्ये, ममेति चिन्ता क्व गमिष्यसि त्वम् ॥ ३८ ॥


तो—अपर्याप्त वस्त्रों वाला दरिद्र लज्जा के कारण महाजनों को दूर से ही छोड़े रहता है, उनसे नहीं मिलता है—यह अर्थ हो जाता है। अल्पच्छदः—अल्पः=अपर्याप्तः छदः=वस्त्रं यस्य सः—थोड़े वस्त्रों वाला—बहुव्रीहि है। 'मन्ये' के प्रयोग के कारण उत्प्रेक्षा अलङ्कार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ ३७ ॥

**अन्वयः—**हे दारिद्र्य ! भवन्तम्, एवम्, शोचामि, अस्मच्छरीरे, सुहृद्, इति, उषित्वा, मन्दभाग्ये, मयि, विपन्नदेहे (सति), त्वम्, क्व, गमिष्यसि, इति, मम, चिन्ता, अस्ति ॥ ३८ ॥

**शब्दार्थ—**हे दारिद्र्य ! हे निर्धनते ! (गरीबी), भवन्तम्=आपको अर्थात् आपके विषय में, एवम्=इस प्रकार, शोचामि=दुःख का अनुभव कर रहा हूँ, अस्मच्छरीरे=मेरे शरीर में, सुहृद्=मित्र, इति=इस रूप से, उषित्वा=रह कर, मन्दभाग्ये=अभागे, मयि=मेरे, विपन्नदेहे=शरीरत्याग कर देने पर अर्थात् मर जाने पर, त्वम्=तुम दारिद्र्य, क्व=कहाँ, गमिष्यसि=जाओगे, इति=इस प्रकार की, मम=मुझ चारुदत्त की, चिन्ता=चिन्ता, अस्ति=है ॥ ३८ ॥

**अर्थ—**और भी—

हे निर्धनते ! (गरीबी) आपके विषय में मैं इस प्रकार दुःख कर रहा हूँ कि मेरे शरीर में मित्र इस रूप से रह कर मुझ अभागे के शरीर छोड़ देने पर अर्थात् मर जाने पर तुम (निराधार होकर) कहाँ जाओगे—यह मुझे (चारुदत्तको) चिन्ता है ॥ ३८ ॥

**टीका—**हे दारिद्र्य !=हे निर्धनत्व !, भवन्तम्=त्वाम्, एवम्=अनेन रूपेण, शोचामि=दुःखमनुचिन्तयामि, अस्मच्छरीरे=मम देहे, सुहृद् इति=सखा इति रूपेण, उषित्वा=स्थित्वा, निवासं कृत्वा, मन्दभाग्ये=हतभाग्ये, मयि=चारुदत्ते, विपन्नदेहे=त्यक्तशरीरे, मृते, सति त्वम्=दारिद्र्य ! निराधारो भूत्वा, क्व=कुत्र, गमिष्यसि=यास्यसि, आश्रयं ग्रहीष्यसि, इति=इत्येवं प्रकारेण, मम=चारुदत्तस्य, चिन्ता=मानसिकी व्यथा अस्ति=वर्तते। काव्यलिङ्गमलङ्कारः। इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रयोः सम्मेलनादुपजातिर्वृत्तम् ॥ ३८ ॥

**विमर्श—**दारिद्र्य—दरिद्र + ष्यञ्=य भाव अर्थ में। उषित्वा—√वस् + इट् + क्त्वा सम्प्रसारण होने से 'व' का उ और-षत्व करने से उष् + इ + त्वा। सुहृद्—शोभनं हृदयं यस्य सः—'सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः' (पा० सू० ५।४।१५०) इससे हृदय को हृद् आदेश। विपन्नदेहे—विपन्नः=विनष्टः, देहः=शरीरम् यस्य सः—

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