भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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८८ मृच्छकटिकम्


साथ, अवलोक्यते=देखा जाता है, अल्पच्छदः=अपर्याप्त वस्त्र धारण करने वाला ( दरिद्र ), लज्जया=लाज के कारण, महाजनस्य=बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति के, दूरात्=दूर से, एव=ही, विहरति=चलता है, साथ में नहीं चलता है, ( इसलिये मैं यही ), मन्ये=मानता हूँ, कि, निर्धनता=गरीबी, अपरम्=दूसरा, ( पाँच महापातकों से भिन्न ), प्रकामम्=बड़ा प्रबल, षष्ठम्=छठा, महापातकम्=महापातक, है ।। ३७ ।।

अर्थ-- और भी--

चूँकि कोई भी व्यक्ति निर्धन का साथ नहीं करता है, अतः कोई भी ( इससे ) आदरपूर्वक नहीं बोलता है । उत्सवों में, धनवानों के घर पर पहुँचने वाला निर्धन पुरुष अपमान के साथ देखा जाता है । अपर्याप्त वस्त्रों वाला निर्धन व्यक्ति लज्जा के कारण बड़े लोगों से दूर दूर ही चलता है, रहता है । अतः ( मैं चारुदत्त यही ) मानता हूँ कि निर्धनता ( पाँच महापातकों से ) भिन्न छठा प्रबल महापातक है ।। ३७ ।।

टीका-- हि=यतः, कश्चित्=कश्चनापि जनः, अस्य=दरिद्रस्य, सङ्गम्=सङ्गतिम्, नैव कुरुते नैव करोति, अतः कश्चिदपि, आदरात्=सम्मानात्, न=नैव, सम्भाषते=सम्यक् वदति, उत्सवेषु=विवाहादिमहोत्सवेषु, धनिनाम्=धनिकानाम्, गृहम्=आवासम्, सम्प्राप्तः=समागतः, उपस्थितः, सावज्ञम्=अवज्ञया=अपमानेन सह, अवलोक्यते=दृश्यते, सर्वैरिति शेषः, अल्पच्छदः=स्वल्पः, छदः=वस्त्रं यस्य सः तादृशः अपर्याप्तवस्त्रयुतः, दरिद्रः, लज्जया=व्रीडया, महाजनस्य=धनिकस्य, उत्तमवस्त्रादिसमलङ्कृतस्य; दूरात्=विप्रकृष्टात्, एव, विहरति=चलति, तादृशवस्त्राभावात् जुगुप्सयात्मानं गोपयन् दूरे दूरे एव प्रचलति न तु तैः सहेति भावः, ( अतः अहं चारुदत्तः इदम् ) मन्ये=चिन्तयामि, निर्धनता=दरिद्रता, अपरम्=धर्मशास्त्रादौ प्रसिद्धातिरिक्तम्, प्रकामम्=प्रबलम्, षष्ठम्=षष्ठसंख्याकम्, महापातकम्=महापापम्, पञ्चमहापातकानि चैवं मनुना प्रतिपादितानि--

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ।। [ मनु. ११।५४ ]

अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। ३७ ।।

विमर्श-- षष्ठं महापातकम्-- मनु आदि महर्षियों ने पाँच महापातक माने हैं—(१) ब्रह्महत्या, (२) सुरापान, (३) चोरी, (४) गुरुपत्नी-गमन, (५) इनमें किसी भी पातकी के साथ वर्ष भर रहना । दरिद्रता को इन्हीं की कोटि में छठा महापातक माना गया है । कुरुते-- √डुकृञ् + लट् लकार प्र. पु. ए. व आत्मनेपद । सावज्ञम्-- अवज्ञया सहितम् । महाजनः-- महांश्चासौ जनः—यहाँ महत्त्व धनादि के आधार पर समझना चाहिये । यदि 'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव' नियम से 'महाजनस्य' में षष्ठी मान लें और 'विहरति' का अर्थ छोड़ता है, यह मान लें