भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१०८ मृच्छकटिकम्

शकारः—जइ गच्छशि, गच्छ तुमं, हगे ण गमिश्शं । ( यदि गच्छसि, गच्छ त्वम्, अहं न गमिष्यामि । )
विटः—एवम्, गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । )
शकारः—गड़े क्खु भावे अभावं । ( विदूषकमुद्दिश्य ) अले काकपदशीशमत्थका दुट्टवडुका ! उवविश उवविश । ( गतः खलु भावः अभावम् । अरे काकपदशीर्षमस्तक दुष्टबटुक ! उपविश उपविश । )


कर ही ) वश में किया जाता है ( पकड़ा जाता है ), घोड़ा लगामों ( को लगाने ) पर ही वश में किया जाता है और स्त्री हृदय में ( विद्यमान प्रेम द्वारा ही ) वश में की जाती है, ( न कि तुम्हारे समान बलपूर्वक ) । यदि यह ( उसका और तुम्हारा परस्पर अनुरागपूर्ण हृदय ) नहीं है तो ( यहाँ से ) जाइये ।। ५० ।।

टीका—हस्ती=हस्तः=शुण्डादण्डः अस्ति अस्य सः करी, गजः, आलाने=बन्धनस्तम्भे, गृह्यते=निरुध्यते, वशीक्रियते, बाजी=अश्वः, बल्गासु=मुखरज्जुषु, खलीनेषु, गृह्यते=वशीक्रियते, बल्गाकर्षणेन नियम्यते, नारी=स्त्री, हृदये=अन्तःकरणे, तत्रस्थे अनुरागे सत्येव गृह्यते, यदि=चेत् इदम्=तस्याः तव चोभयोरनुरागपूर्णं हृदयम्, नास्ति=नैव वर्तते, तदा=तस्यां स्थितौ, गम्यताम्=तस्याः प्राप्त्याशां विहायान्यत्र व्रज्यतां त्वया शकारेणेति भावः । अत्र आलानादौ हस्त्यादिग्रहणमिव हृदये वारीग्रहणमितिबिम्बानुविम्बभावे पर्यवसानात् निदर्शनानामालङ्कारः। पथ्यावक्त्रं वृत्तं तल्लक्षणं पूर्वमुक्तम् ।। ५० ।।

विमर्श—हृदये-विट का भाव यह है कि जैसे हाथी स्तम्भ में बन्धने पर ही रोका जाता है और घोड़ा लगाम लगाने पर ही रोका जाता है उसी प्रकार स्त्री हृदय में ही वश में की जा सकती है, शरीर में नहीं। अतः वसन्तसेना के हृदय में प्रविष्ट होकर उसे अपने वश में करो। शरीर पर अधिकार कर लेने पर भी वास्तव में उसे अपने वश में कर पाना कठिन है। सप्तमी विभक्ति इसीलिये प्रयुक्त है। आलानादि में हाथी आदि के ग्रहण के समान हृदय में नारी का ग्रहण—यह बिम्ब-अनुविम्बभाव में पर्यवसान होने से निदर्शना अलंकार है—

सम्भवन् वस्तुसम्बन्धोऽसम्भवन् वापि कुत्रचित् ।
यत्र बिम्बानुबिम्बत्वं बोधयेत् सा निदर्शना ॥
सा० द० १०।५१

पथ्यावक्त्र छन्द है। लक्षण-युजोर्जेन सरिद्भर्तुः पथ्यावक्त्र प्रकीर्तितम् ।। ५० ।।

अर्थःशकार—यदि तुम जाते हो तो जाओ, मैं नहीं जाऊँगा ।
विट—बहुत अच्छा, मैं जाता हूँ । ( इस प्रकार निकल जाता है । )
शकार—भाव अभाव को प्राप्त कर गया, अर्थात् चला गया । ( विदूषक को

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