मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ | मृच्छकटिकम्
शूरो विक्रान्तः पाण्डवः श्वेतकेतुः ? पुत्रो राधायाः, रावण इन्द्रदत्तः ? ।
आहो कुन्त्यां तेन रामेण जातः अश्वत्थामा ? धर्मपुत्रो जटायुः ? ॥४७॥
विटः— मूर्ख ! आर्यचारुदत्तः खल्वसौ ।
दीनानां कल्पवृक्षः स्वगुणफलनतः, सज्जनानां कुटुम्बी,
आदर्शः शिक्षितानां, सुचरितनिकषः, शीलवेलासमुद्रः ।
सत्कर्ता, नावमन्ता, पुरुषगुणनिधिर्दक्षिणोदारसत्त्वो
ह्येकः श्लाघ्यः स जीवत्यधिकगुणतया चोच्छ्वसन्तीव चान्ये ॥४८॥
विमर्श— श्वेतकेतु न तो पाण्डुपुत्र थे और न युद्धप्रिय, अपि तु उपनिषदों में प्रसिद्ध उद्दालक ऋषि की सन्तान थे। श्वेतः केतुः = पताका यस्य सः तादृशः = अर्जुनः यह अर्थ करने पर शकार का कथन यथार्थ ही है। रावण न तो इन्द्रप्रदत्त था और न राधा की सन्तान था। राधा तो कर्ण की पालन करने वाली माँ थी, वास्तव में तो सूर्य द्वारा कुन्ती में ही कर्ण का जन्म हुआ था। अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र थे न कि राम और कुन्ती के। यह जटायु अरुण (सूर्यसारथी) का पुत्र था न कि धर्मराज का। परन्तु ये सभी महान् पराक्रमी थे। अतः शकार का यह ज्ञान सत्य ही ठहरता है। सम्बन्धों में ही उसकी मूर्खता प्रकट होती है। इसमें वैश्वदेवी छन्द है। लक्षण—'वाणाश्वैश्छिन्ना वैश्वदेवी म-मौ यौ' ॥४७॥
अन्वयः— दीनानाम्, स्वगुणफलनतः, कल्पवृक्षः, सज्जनानाम्, कुटुम्बी, शिक्षितानाम्, आदर्शः, सुचरितनिकषः, शीलवेलासमुद्रः, सत्कर्ता, न, अवमन्ता (नावमन्ता), पुरुषगुणनिधिः दक्षिणोदारसत्त्वः, श्लाघ्यः, च, सः, एकः, हि, अधिकगुणतया, जीवति, अन्ये, च, उच्छ्वसन्ति, इव ॥४८॥
शब्दार्थ— दीनानाम् = निर्धन लोगों का, स्वगुणफलनतः = अपने गुणरूपी फलों के भार से नीचे झुका हुआ, कल्पवृक्षः = कल्पवृक्ष, सज्जनानाम् = सज्जन पुरुषों का, कुटुम्बी = परिवार वाला, भाईबन्धु, शिक्षितानाम् = पढ़े लिखे, विद्वानों का, आदर्शः = आदर्श, (शीशा के समान निदर्शनभूत), सुचरितनिकषः = अच्छे आचरण = सदाचार की कसौटी, शीलवेलासमुद्रः = सत्स्वभावरूपी वेला = किनारे, तटों का समुद्र (कभी भी मर्यादा का उल्लंघन न करने वाले), सत्कर्ता = (योग्य का) सत्कार करने वाले, न अवमन्ता = (किसी का) अपमान न करने वाले, पुरुषगुणनिधिः = मनुष्य में रहने वाले सद्गुणों का समुद्र, दक्षिणोदारसत्त्वः = सरल एवम् उदार स्वभाव वाले, च = और, श्लाघ्यः = प्रशंसनीय, सः = वह, चारुदत्त, एकः = अकेला, हि = निश्चितरूप से, अधिकगुणतया = अधिक गुणों वाला होने के कारण, जीवति = जीवित हैं, च = और, अन्ये = दूसरे, लोग, उच्छ्वसन्ति इव = साँस सी ले रहे हैं, अर्थात् उनका जीना न जीना बराबर है ॥४८॥