मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः १०५
अर्थ--विट--मूर्ख ! यह आर्य चारुदत्त—दीनों के (मनोरथों को पूर्ण करने वाले), अपने गुणरूपी फलों के भार से झुके हुये कल्पवृक्ष, सज्जनों के बन्धु, शिक्षितों के (दर्पणतुल्य) आदर्श, सदाचार की कसौटी; सत्स्वभावरूपी मर्यादा के समुद्र, सत्कार करने वाले, अपमान न करने वाले, पुरुष में रहने वाले गुणों के निधि, सरल एवम् उदार स्वभाव वाले, और श्लाघनीय वे अकेले (चारुदत्त ही) अधिक गुण वाले होने से जीवित हैं, अन्य लोग सांस सी ले रहे हैं, अर्थात् उनका जीवन व्यर्थ है ॥ ४८ ॥
टीका—चारुदत्तस्य गुणान् वर्णयति—दीनानाम्=दरिद्रजनानाम्, स्वगुण-फलनंतः=स्वगुणा एव फलानि तेषां भारेण नतः=विनम्रः, कल्पवृक्षः=कल्पद्रुमः, मनोरथानां पूरक इत्यर्थः, सज्जनानाम्=सत्पुरुषाणाम्, कुटुम्बी=परिपालकों बन्धुः, शिक्षितानाम्=विदुषाम्, आदर्शः=मुकुर इव निदर्शनभूतः, सुचरितनिकषः=सुचरितस्य=सदाचारस्य, निकषः=कषपट्टिका 'कसौटी' इति हिन्द्याम्, शीलवेला-समुद्रः=शीलम् एव वेला=तटबन्धः, मर्यादा, तस्याः समुद्रः यथा समुद्रः स्वमर्यादां न कदापि अतिक्रामति, तथैवायमपि न कदापि स्वमर्यादामतिक्रामतीति भावः, सत्कर्ता=योग्यानां समादरकर्ता, न अवमन्ता=कस्यचिदपि अपमानस्य न कर्त्ता, अत्र 'न' शब्देन समासे 'नावमन्ता' इत्येकं समस्तं पदम्, नैकधावत् इति बोध्यम्, पुरुषगुणनिधिः=पुरुषे सम्भवानां दयादाक्षिण्यादीनां गुणानाम् निधिः=आलयः, दक्षिणोदारसत्त्वः=दक्षिणम्=सरलम्, उदारम्=महत्, सत्त्वम्=स्वभावः यस्य सः, श्लाघ्यः=प्रशंसनीयः, च=तथा, सः=चारुदत्तः, एकः=एकाकी एव, अधिक-गुणतया=अधिकाः इतरातिशायिनो गुणा यस्य सः तस्य भावस्तया = विविध-गुणाश्रयतया, जीवति=प्राणान् धारयति, अन्ये च=तथा इतरे जनाः, उच्छ्वसन्ति इव=चर्मभस्त्रेव श्वासोच्छ्वासं कुर्वन्ति, न तु सफलं सार्थकं जीवनं तेषामिति भावः। अत्र मालारूपकमिति पृथ्वीधरः। एकस्यैव चारुदत्तस्य विविधरूपेणो-ल्लेखात् उल्लेखाऽलङ्कारः, 'उच्छ्वसन्ति इव' अत्र क्रियोत्प्रेक्षा च। स्रग्धरा वृत्तम् ॥ ४८ ॥
विमर्श— इस श्लोक में विट चारुदत्त के महान् व्यक्तित्व का वर्णन करता है। स्वगुणफलनतः— यहाँ अपने औदार्यादि गुण रूपी फलों के भार से झुका हुआ=विनम्र—यही अर्थ तर्कसंगत है। किसी ने—फल=परिणाम से विनत—यह अर्थ भी लिखा है वह ठीक नहीं है। **आदर्शः—**दर्पण, जैसे दर्पण में विम्ब प्रतिबिम्ब में अन्तर नहीं होता है वैसा ही यहाँ है। यदि 'आदर्श' का अर्थ 'दृष्टान्त' मानें तो अधिक अच्छा है। **शीलवेलासमुद्रः—**शील = सत्स्वभाव रूपी वेला=समुद्रतट=मर्यादा, उसका समुद्र, उसी में सीमित रहने वाला,