भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 194

१०६ मृच्छकटिकम्

तदितो गच्छामः।
शकारः—अगेणिहअ वशन्तशाणअ ! ( अगृहीत्वा वसन्तसेनिकाम् ? )
विटः--नष्टा वसन्तसेना।
शकारः--कधं विअ ? ( कथमिव ? )
विटः--

अन्धस्य दृष्टिरिव पुष्टिरिवातुरस्य
मूर्खस्य बुद्धिरिव सिद्धिरिवालसस्य।
स्वल्पस्मृतेर्व्यसनिनः परमेव विद्या
त्वां प्राप्य सा रतिरिborder वारिजने प्रनष्टा ॥४६॥


कभी भी मर्यादा का अतिक्रमण न करने वाला। नावमन्ता-न अवमन्ता-ये दो पद भी सम्भव हैं और 'नावमन्ता' यह एक समस्त पद भी सम्भव है क्योंकि 'न' के साथ समास करने पर लोप और नुट् आदि उसी प्रकार नहीं होते हैं जैसे-नैकधा, नैकध्यम् आदि में। इसमें एक चारुदत्त का ही अनेक रूपों से उल्लेख होने के कारण उल्लेख अलंकार है--

'एकस्यानेधोल्लेखो यः स उल्लेख उच्यते।' स्वगुणफलनतः, शीलवेला-समुद्रः आदि में रूपक है और 'उच्छ्वसन्ति इव' इसमें क्रियोत्प्रेक्षा है इनकी संसृष्टि है। स्रग्धरा छन्द है—'म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्' ।। ४८ ।।

अर्थ—तो इस लिये यहाँ से चलें।
शकार—वसन्तसेना को बिना प्राप्त किये ?
विट—वसन्तसेना तो अदृश्य हो गयी।
शकार—किस प्रकार ?
अन्वयः—अन्धस्य, दृष्टिः, इव, आतुरस्य, पुष्टिः, इव, मूर्खस्य, बुद्धिः, इव, अलसस्य, सिद्धिः इव, स्वल्पस्मृतेः व्यसनिनः, परमा, विद्या इव, अरिजने, रतिः, इव, सा, त्वाम्, प्राप्य, विनष्टा ॥ ४६ ॥
शब्दार्थः—अन्धस्य=अन्धे की, दृष्टिः इव=आँख (की ज्योति) के समान, आतुरस्य=रोगी की, पुष्टिः इव=पुष्टता के समान, मूर्खस्य=मूर्ख की, बुद्धिः इव=बुद्धि के समान, अलसस्य=आलस्ययुक्त पुरुष की, सिद्धिः इव=सिद्धि=सफलता के समान, स्वल्पस्मृतेः=साधारण स्मरण शक्ति वाले, व्यसनिनः=कामादि व्यसनों में आसक्त (पुरुष) की, परमा=उत्कृष्ट, विद्या इव=विद्या के समान, ब्रह्मविद्या के समान, अरिजने=शत्रु में, रतिः इव=प्रेम के समान, सा=वह वसन्तसेना, त्वाम्=आप (शकार) को, प्राप्य=प्राप्त करके, प्रनष्टा=अदृश्य हो गयी ॥ ४६ ॥
अर्थ—विट—