मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १०० | मृच्छकटिकम् |
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सर्वथा इदमदुनयसर्वस्वं गृह्यताम् । (इति खड्गमुत्सृज्य कृताञ्जलिः पादयोः पतति ।)
**विदू०—**सप्पुरिस । उट्ठेहि उट्ठेहि । अआणन्तेण मए तुमं उवालद्धे, सम्पद्ं उण जाणन्तो अणुणेमि । (सत्पुरुष ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ । अजानता मया त्वमुपालब्धः, साम्प्रतं पुनर्जानन् अनुनयामि ।)
**विटः—**ननु भवानेवात्रानुनयेः । तदुत्तिष्ठामि समयतः ।
**विदू०—**भणादु भवं (भणतु भवान् ।)
**विटः—**यदीमं वृत्तान्तमार्यचारुदत्तस्य नाख्यास्यसि ।
**विदू०—**ण कधइस्सं । (न कथयिष्यामि ।)
**विटः—**एष ते प्रणयो विप्र ! शिरसा धार्यते मया ।
गुणशस्त्रैर्वयं येन शस्त्रवन्तोऽपि निर्जिताः ॥ ४५ ॥
**विमर्श—**यहाँ सकामा तथा स्वाधीनयौवना इन दो विशेषणों से वेश्या की प्रतीति हो जाती है। सकामा=कामेन=मदनावेगेन सहिता सकामा=कामातुरा। स्वाधीनयौवना=स्व अपने ही (न कि पति आदि किसी अन्य के) अधीन है यौवन=यौवन का प्रभाव जिसके वह। नष्टा—√णश् अदर्शने धातु का निष्ठा-क्त प्रत्यय के साथ रूप है। इसलिये इसका अर्थ हैं—अदृष्टा। शीलवञ्चना=शील=शिष्टचार की वञ्चना=प्रतारणा, हानि, उल्लंघन। पथ्यावक्त्र छन्द है। लक्षण—
युजोर्जेन सरिद्भर्तुः पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ॥ ४४ ॥
**अर्थ—**किसी अपने यौवन की स्वामिनी (खोज कर रहें।) किन्तु वह अदृश्य हो गयी, उसी के भ्रम के कारण (रदनिका का केश ग्रहण रूपी) शिष्टाचारो-ल्लंघन हो गया ॥ ४४ ॥
सब प्रकार से बड़ी मेरी बिनती को मान लें। (ऐसा कह कर तलवार छोड़-कर, हाथ जोड़ कर पैरों पर गिर जाता है।)
**अर्थ—विदूषक—**हे सदाचारी पुरुष ! उठो, उठो। बिना जाने हुये ही मैंने तुम्हारी निन्दा कर डाली, (उलाहना दे डाला), अब जान लेने पर तो मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ।
**विट—**इस विषय में तो आप ही प्रार्थना के पात्र हैं। तो एक शर्त पर उठ सकता हूँ।
**विदूषक—**आप कहिये।
**विट—**यदि यह घटना आर्य चारुदत्त से नहीं कहोगे (तो मैं उठता हूँ)।
**विदूषक—**नहीं कहूँगा।
**अन्वयः—**हे विप्र ! एषः, ते, प्रणयः, मया, शिरसा, धार्यते, येन, शस्त्रवन्तः अपि, वयम्, गुणशस्त्रैः, निर्जिताः ॥ ४५ ॥