मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७४ | मृच्छकटिकम् |
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बसन्त०-अज्ज ! अबला क्खु अहं । ( आर्य ? अबला खलु अहम् ) ।
विटः-अत एव ध्रियसे ।
शकारः-अदो ज्जेव ण मालीअशि । ( अत एव न मार्यसे । )
धारवाली है, च=और, तव=तुम्हारा, मस्तकम्=मस्तक, वलितम्=झुका हुआ अथवा सुन्दर, (अस्ति=है), (तव=तुम्हारे), शीर्षम्=शिर को, कल्पये=काट डालूँगा, उत वा=अथवा, मारयामि=मार डालूँगा, तव=तुम्हारे, एतेन=इस, पलायितेन=भागने से, अलम्=कोई लाभ नहीं, व्यर्थ है, यः=जो, मुमूर्षुः=मरने वाला, भवति=होता है, सः=वह, न=नहीं, जीवति=जीवित रहता है ॥ २९ ॥
अर्थ-देखो, देखो,
(मेरी) तलवार बहुत तेजधार वाली है, तुम्हारा शिर भी (मेरी ओर) झुका हुआ है, अथवा सुन्दर है; मैं तुम्हारा शिर काट डालूँगा अथवा मार डालूँगा। तुम्हारे इस प्रकार भागने से कोई लाभ नहीं है, व्यर्थ है, जो मरने वाला होता है, वह निश्चित रूप से जीवित नहीं रहता है ॥२६॥
टीका-(मम = शकारस्य), असिः = खड्गः, सुतीक्ष्णः =अतीव निशितः, अस्ति, (तव) मस्तकम् = शिरः, च=तथा, वलितम् = ममाभिमुखमवनतम्, सुन्दरं वा, अस्ति, शीर्षम्=वसन्तसेनायाः शिरः, कल्पये=छिनद्मि, उत वा=अथवा, मारयामि-हन्मि, तव=वसन्तसेनायाः, पलायितेन=धावनेन, अलम्=किमपि साध्यं नास्ति, व्यर्थमिति भावः, 'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इति नियमात् तृतीयेति बोध्यम्। कथं व्यर्थमत आह-मुमूर्षुः=आसन्नमरणः, यः=जनो, भवति=वर्तते, सः=जनः, न=नैव, खलु=निश्चयेन, जीवति=प्राणधारणं करोति। अत्र काव्यलिङ्गमलङ्कारः। वंशस्थेन्द्रवज्रयोः सम्मेलनादुपजाति वृत्तम् ॥ २९ ॥
विमर्श-वलितम् इसकी व्याख्या में 'सुन्दरम्, लालितम्, ऐसा लिखा गया गया है। परन्तु प्रसङ्गानुसार इसका अर्थ-अवनतम् झुका हुआ होना-अधिक तर्कसंगत है। वल संचरणे-से 'क्त' प्रत्यय का रूप है। क्योंकि झुके शिर को काटना सरल होता है। और भागते समय सिर आगे की ओर झुक जाता है। शिर काटना और मार डालना-समानार्थक हैं। किन्तु शकार के वचन होने से इसे दोष नहीं मानना चाहिये। कप्पेम इस-इस प्राकृत का संस्कृत रूपान्तर- 'कल्पये' और 'कृन्तामः दो प्राप्त होते हैं। दोनों का भाव समान है। मुमूर्षुः-मरने वाला, √ मृङ् (प्राणत्यागे) + सन् मुमूर्ष + उ। इसमें काव्यलिङ्ग अथवा अर्थान्तरन्यास अलंकार है। प्रथम और चतुर्थ चरण में वंशस्थ तथा द्वितीय और तृतीय में इन्द्रवज्रा है। दोनों को मिलाने पर उपजाति छन्द हो गया है ॥ २६ ॥
अर्थ वसन्तसेना-आर्य ! मैं तो अबला (बलहीन स्त्री) हूँ !
विट-इसी लिये (अभी तक) जीवित हो।
शकार-इसी लिये तुम्हारा वध नहीं किया जा रहा है।