भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ७५

वसन्त० (स्वगतम्।) कधं अणूणओ वि शे भअं उप्पादेदि। भोदु, एव्वं दाव। (प्रकाशम्।) अज्ज ! इमादो किं पि अलङ्करणं तक्कीअदि ? (कथमनुनयोऽप्यस्य भयमुत्पादयति। भवतु एवं तावत्। आर्य ! अस्मात् किमप्यलङ्करणं तर्क्यते ?।)

विटः—शान्तम् पापम्, शान्तं पापम्। भवति वसन्तसेने ! न पुष्पमोषमर्हति उद्यानलता। तत् कृतमलङ्करणैः।

वसन्त०—ता किं क्खु दाणिं ? (तत् किं खलु इदानीम् ?।)

शकारः—हगे देवपुलिशे मणुश्शे वासुदेवके कामइदव्वे। (अहं देवपुरुषो मनुष्यो वासुदेवः कामयितव्यः।)

वसन्त०—(सक्रोधम्) शन्तं शन्तं। अवेहि, अणज्जं मन्तेशि (शान्तं शान्तम्। अपेहि, अनार्यं मंत्रयसि !)

शकारः—(सहस्ततालं विहस्य।) भावे ! भावे ! पेक्ख दाव। अन्तलेण शुशिणिद्धा एशा गणिआदालिआ णं। जेण मं भणादि, एहि शन्तेशि किलिन्तेशि त्ति। हगे ण गामन्तरं ण णगलन्तरं वा गड़े। अज्जुके ! शवामि भावश्श शीशं अत्तणकेहि पादेहि। तव ज्जेव्व पश्चाणुपुश्विक्याए आहडन्तं शन्ते किलिंते ह्नि संवृत्ते। (भाव ! भाव ! प्रेक्षस्व तावत्। अन्तरेण सुस्निग्धा एषा गणिकादारिका ननु। येन मां भणति—एहि, श्रान्तोऽसि, क्लान्तोऽसीति। अहं न ग्रामान्तरं न नगरान्तरं वा गतः। आर्यके ! शपे भावस्य शीर्षम्, आत्मीयाभ्याम् पादाभ्याम्। तवैव पृष्ठानुपृष्ठिकया आहिण्डमानः, श्रान्तः क्लान्तोऽस्मि संवृत्तः।)


वसन्तसेना—(स्वगत) क्यों, इसकी विनय भी भय उत्पन्न करा रही है। अच्छा, मैं ऐसा (करती हूँ)। (प्रकाश) आर्य ? आप मुझसे कोई गहना लेना चाहते हैं ?

**विट—**पाप शान्त हो, पाप शान्त हो। आदरणीय वसन्तसेने ! उद्यान की लता पुष्प तोड़ने योग्य नहीं होती है। (अर्थात् उसके फूल नहीं तोड़े जाते हैं।) अतः गहनों को रहने दो। (इन्हें नहीं लेना है।)

**वसन्तसेना—**तो, इस समय (आपका) क्या प्रयोजन ?

**शकार—**मुझ देवपुरुष, मनुष्य, वासुदेव की कामना करो।

वसन्तसेना—(क्रोध के साथ) शान्त, शान्त अर्थात् चुप रहो, चुप रहो। दूर हट जाओ। तुम अनार्य=अशिष्ट=अनुचित बात कर रहे हो।

शकार—(ताली बजाते हुये हँस कर) भाव ! भाव ! जरा देखो तो। यह वेश्यापुत्री हृदय से (मुझपर) निश्चित ही प्रसन्न है। इसी लिये मुझसे कह रही है—'आओ थक गये हो, खिन्न हो गये हो।' मैं न किसी दूसरे गाँव गया न किसी दूसरे शहर। आर्ये ! मैं अपने पैरों से भाव=विट के शिर की शपथ खाता हूँ। तुम्हारे ही पीछे पीछे घूमता हुआ थका और खिन्न हो गया हूँ।

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