मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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वसन्त०—गुणो क्खु अणुराअस्स कारणं, ण उण बळाक्कारो। (गुणः खलु अनुरागस्य कारणम् न पुनर्बलात्कारः।)
शकारः—भाव ! भावे ! एशा गब्भदासी कामदेवाअदणुज्जाणादो पहुदि ताह दलिद्दचालुदत्ताह अणुलत्ता ण मं कामेदि। वामदो तश्श घलं। जधा तव मम अ हत्यादों एशा ण पलिब्भंशदि, तथा कलेदु भावे। (भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता, न मां कामयते। वामतस्तस्य गृहम्, यथा तव मम च हस्तात् एषा न परिभ्रश्यति, तथा करोतु भावः।)
विटः—(स्वगतम्।) यदेव परिहर्त्तव्यं तदेवोदाहरति मूर्खः। कथं वसन्तसेना आर्यचारुदत्तमनुरक्ता? सुष्ठु खल्विदमुच्यते—'रत्नं रत्नेन सङ्गच्छते' इति। तद्गच्छतु, किमनेन मूर्खेण ! (प्रकाशम्।) काणेलीमातः ! वामतस्तस्य सार्थवाहस्य गृहम् ?।
झुकने में लता भेद नहीं करती है, वसन्तसेना भी इसी श्रेणी में आती है। अतः इसे शकार की सेवा में उपस्थित ही होना चाहिये।
(१) इसमें अप्रस्तुत पदार्थ—द्विजवर और वर्णाधम का स्नानरूप एक क्रिया के साथ सम्बन्ध है। और बाह्मण क्षत्रिय वैश्यों का तथा इतर=शूद्र का तरण रूप एक क्रिया के साथ सम्बन्ध है। अतः दोनों में तुल्ययोगिता अलंकार है। (२) वेश्या रूपी एक उपमेय का तीन (वापी, लता, नौका) उपमानों के साथ सादृश्य वर्णित होने से मालोपमा है। (३) सर्वं भज—सभी की सेवा करो—इस वाक्यार्थ के प्रति 'त्वं वेश्यासि' यह वाक्यार्थ हेतु है अतः काव्यलिङ्ग है। (४) इनका परस्पर अङ्गाङ्गिभाव होने से संकर अलंकार है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ३२ ॥
अर्थ—वसन्तसेना—प्रेम का कारण गुण होता है, बलात्कार नहीं।
शकार—भाव ! भाव जन्म काल से ही दासी यह वसन्तसेना काम-देवा-यतन उद्यान (में जाने) से लेकर उस दरिद्र चारुदत्त पर ही अनुरक्त है, मुझे नहीं चाहती है। बाँयी ओर उस (चारुदत्त) का घर है। आप ऐसा उपाय कीजिये जिससे मेरे तथा आपके हाथ से यह न निकल सके।
विट—(स्वगत)—जो नहीं कहना चाहिये, मूर्ख वही कह रहा है। क्या वसन्तसेना चारुदत्त पर अनुरक्त है? यह ठीक ही कहा जाता है—'रत्न रत्न से ही मिलता है।' अच्छा तो (वसन्तसेना) जाय, इस मूर्ख के लिये क्या चिन्ता करना ! (प्रकाश) अरे काणेलीपुत्र ! बाँयी ओर उस सार्थवाह (चारुदत्त) का घर है ?