मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ मृच्छकटिकम्
अपि च—
वाप्यां स्नाति विचक्षणो द्विजवरो मूर्खोऽपि वर्णाधमः,
फुल्लं नाम्यति वायसोऽपि हि लतां या नामिता बर्हिणा।
ब्रह्मक्षत्रविशस्तरन्ति च यया नावा तयैवेतरे,
त्वं वांपीव लतेव नौरिव जनं वेश्यासि सर्वं भज ॥ ३२ ॥
से विचार करो, क्योंकि वसन्तसेना तुम्हारी स्थिति उसी प्रकार है जैसे सड़क पर पैदा हुई लता की। जो भी चाहता है, उसे मसल सकता है, तोड़ सकता है, प्रशंसा कर सकता है, निन्दा कर सकता है। धनहार्यम्-धनेन हार्यम्, पण्यभूतम्--पण्यंभूतम्-पण्यभूतम् विक्रेय पदार्थ के समान, जिसे कोई भी खरीद सकता है। उपचर-उप + √ चर् + लोट् = व्यवहार करो, अर्थात् इच्छा पूरी करो। इसमें उपमा और काव्यलिङ्ग अलङ्कार हैं। मालिनी छन्द है—
न-न-म-यय-ययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥ ३१ ॥
अन्वयः--विचक्षणः, द्विजवरः, मूर्खः, वर्णाधमः, अपि, (एकस्यामेव) वाप्याम् स्नाति, या, बर्हिणा, नामिता, फुल्लाम्, (तामेव), लताम्, वायसः, अपि, नाम्यति, हि, यथा, नावा, ब्रह्मक्षत्रविशः, तरन्ति, तया, एव, इतरे, च, (तरन्ति), त्वम्, वेश्या, असि, अतः, वापी, इव, लता, इव, नौः, इव, सर्वम्, जनम् भज ॥ ३२ ॥
शब्दार्थ—विचक्षणः=अतिशय विद्वान्, द्विजवरः=ब्राह्मण, (और) मूर्खः=मूर्ख, अशिक्षित, वर्णाधमः=नीच जाति वाला शूद्र, अपि=भी, (एकस्यामेव=एक ही) वाप्याम्=बावड़ी में, स्नाति=स्नान करता है, या=जो लता, बर्हिणा=मोर द्वारा (बैठनेसे) नामिता=झुकाई गई थी, फुल्लाम्=फूली हुई, खिली हुई, ताम्=उस, लताम्=लता को (ही), वायसः=कौआ, अपि=भी, नाम्यति=झुका देता है, हि=प्रसिद्ध ही है कि, यथा=जिस, नावा=नौका से, ब्रह्मक्षत्रविशः=ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, तरन्ति=(गंगादि नदियां) पार करते है, तया एव=उसी नौका से, इतरे=इन तीनों से भिन्न=शूद्र, च=भी, (पार करते हैं,) त्वम्=तुम, वेश्या=वेश्या, असि=हो, (अतः=इसलिये) वापी इव=बावड़ी के समान, लता इव=लता के समान, (और), नौः इव=नौका के समान, सर्वम्=सभी, जनम्=लोगों की, भज=सेवा करो, सन्तुष्ट करो ॥ ३२ ॥
अर्थ—और भी, अतिशय विद्वान् ब्राह्मण (और) मूर्ख वर्णाधम=शूद्रादि (एक ही) बावड़ी में स्नान करता है। जो लता (ऊपर बैठकर) मोर द्वारा झुकाई गयी थी, उसी फूली हुई लता पर (बैठकर) कौआ झुका देता है। जिस नौका से ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य (गंगादि नदियाँ) पार करते हैं उसी से शूद्र भी। तुम (वसन्त-