मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ७७
तरुणजनसहायश्चिन्त्यतां वेशवासो, विगणय गणिका त्वं मार्गजाता लतेव । वहसि हि धनहार्यं पण्यभूतं शरीरं, सममुपचर भद्रे ! सुप्रियं चाप्रियञ्च ॥३१॥
अन्वयः—वेशवासः, तरुणजनसहायः, चिन्त्यताम्, विगणय, मार्गजाता, लता, इव, त्वम्, गणिका, असि, हि, पण्यभूतम्, धनहार्यम्, शरीरम्, वहसि, भद्रे ! सुप्रियम्, च अप्रियम्, च, समम्, उपचर ॥३१॥
शब्दार्थः—पश्य=देखो, वेशवासः=वेश्यालय का निवास, तरुणजनसहायः=युवा जनों की सहायता पर आश्रित [ होता है, इति=ऐसा ] चिन्त्यताम्=समझ लो, विगणय=सोचों, त्वम्=तुम, मार्गजाता=सड़क पर पैदा होने वाली, लता इव=लता के समान, गणिका=वेश्या हो, हि=क्योंकि, पण्यभूतम्=बेची जानी वाली वस्तु के समान, धनहार्यम्=धन से प्राप्य=खरीदने योग्य, शरीरम्=शरीर को, वहसि=धारण करती हों, (अतः) भद्रे ! =हे भद्र वारी, सुप्रियम्=बहुत अधिक प्रिय को, च=और, अप्रियम्=अप्रिय=अनचाहे को, समम्=समान रूप से, उपचर=व्यवहार करो, उनकी सेवा करो ॥ ३१ ॥
अर्थ—देखो...
वेश्यालय का निवास युवक जनों की सहायता पर आश्रित रहने वाला होता है, यह समझ लो, (अतः युवक शकार की अवहेलना मत करो)। सोंचो, सड़क पर उत्पन्न लता के समान (सभी द्वारा उपभोग्या) तुम वेश्या हो, क्योंकि विक्रय-योग्य पदार्थ के समान धन से खरीदने योग्य शरीर को धारण कर रही हो। (अतः, हे भद्रे ! सुप्रिय अथवा अप्रिय दोनों के साथ समान रूप से व्यवहार करो ॥ ३१ ॥
टीका—पश्य=अवलोकय-इति गद्येनान्वयः। वेशवासः=वेशे=वेश्यालये, वासः=निवासः, वेश्याजनवासस्थानमित्यर्थः, तरुण-जन-सहायः=तरुणजनः सहायो यस्य तादृशः, तरुणजनप्रदत्तधनाश्रितः इति भावः, इति=इदम्, चिन्त्यताम्=अवधार्यताम्; विगणय=विशेषेण विचारय, मार्गजाता=मार्गे=पथि, जाता=उत्पन्ना, लता=वल्ली इव=यथा, त्वम्, गणिका=वेश्या, असि, यथा मार्गोत्पन्नाया लतायाः सामान्यतया सर्वैरुपभोगः क्रियते तथैव तवाप्युपभोगः सर्वसाधारण इति त्वं विचारय, हि=यतः, पण्यभूतम्=विक्रेयवस्तुतुल्यम्, धनहार्यम्=धनप्राप्यम्, शरीरम् = देहम्, वहसि=धारयसि, अतः, भद्रे ! =सुस्वभावे ! सुप्रियम्=अभीप्सितम्, अप्रियम्=अनीप्सितम् च=तथा, समम्=समानरूपेण, उपचर=श्रयस्व, सेवस्व, अत्राधिकश्चकारः । अत्रोपमा काव्यलिङ्गं च । मालिनी वृत्तम् ॥ ३१ ॥
विमर्श—तरुणजनसहायः-तरुणाश्च ते जनाः ते सहायाः=सहायकाः यस्य स तादृशः-अर्थात् वेश्यालय में रहना तभी हो पाता है जब तरुणजन उन पर आकृष्ट होकर धनादि देते रहते हैं। विगणय-वि-+-√गण-+-णिच्-+-लोट् । विशेषरूप