मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ मृच्छकटिकम्
शकारः—भावे ! भावे ! वलिए क्खु अन्धआले माशराशिपाविट्ठा विअ मशिगुडिआ दीशन्दी ज्जेव पणट्ठा वशन्तशेणिआ । ( भाव ! भाव ! बलीयसि खल्वन्धकारे माषराशिप्रविष्टेव मसीगुटिका दृश्यमानैव प्रनष्टा वसन्तसेना ।
विटः—अहो ! बलवानन्धकारः । तथाहि—
आलोकविशाला मे सहसा तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना । उन्मीलितापि दृष्टिनिमीलितेवान्धकारेण ॥ ३३ ॥
अपि च—
लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः ।
अर्थः—शकार—भाव ! भाव ! इस घोर अन्धकार में, ( काले ) उड़द के ढेर मे गिरी हुई स्याही की टिकिया के समान, दिखाई पड़ती हुई ही वसन्तसेना गायब=अदृश्य हो गई ।
अन्वयः—आलोकविशाला, मे, दृष्टिः, सहसा, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना, (अत एव ), उन्मीलिता, अपि, अन्धकारेण, निमीलिता, इव, ( भवति ), ॥३३॥
शब्दार्थ—आलोकविशाला=प्रकाश में ( सभी कुछ देखने में ) समर्थ, मे=मेरी (=विट की), दृष्टिः = आंख, सहसा = अचानक, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=अन्धकार के आ जाने से शक्तिरहित अथवा अन्धकार में आ जाने से शक्तिरहित ( अत एव=इसीलिये ), उन्मीलिता=खुली हुई, अपि=भी, अन्धकारेण=अन्धेरे के कारण, निमीलितां इव=बन्द के समान, ( भवति=हो रही है ।) ॥ ३३ ॥
अर्थ—विट—अरे घोर अन्धकार है । क्योंकि—
प्रकाश में (सभी कुछ) देखने में समर्थ मेरी दृष्टि ( नेत्र ) अचानक अन्धेरा आ जाने से ( अथवा अन्धेरे में आ जाने से ) शक्तिहीन ( हो गई है । इसीलिये ) खुली हुई भी अन्धकार के कारण बन्द के समान हो रही है ॥ ३३ ॥
टीका—आलोकविशाला=आलोके=दर्शने विशाला अथवा, आलोके=प्रकाशे विशाला, मे=मम, विटस्येत्यर्थः, दृष्टिः = नेत्रज्योतिरित्यर्थः, सहसा=झटिति, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=तिमिरे प्रवेशेन विच्छिन्ना, तिमिरस्य प्रवेशेन = आगमनेन विच्छिन्ना=हीनशक्तिः, अतः, उन्मीलितापि=उद्घाटितापि, अन्धकारेण=तमसा, निमीलिता=मुद्रिता इव भवतीति भावः । अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः । आर्या वृत्तम् ॥३३॥
विमर्शः—आलोकविशाला=आलोके=देखने में विशाल=अतिसमर्थ, अथवा आलोके=प्रकाश में कार्यसमर्थ । तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=तिमिर में प्रवेश करने से हीनशक्तिवाली अथवा तिमिरं=अन्धकार के आ जाने से क्षीण शक्तिवाली । निमीलिता इव—यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है और आर्या छन्द है ॥ ३३ ॥