मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
८२ मृच्छकटिकम्
शकारः—भावे ! भावे ! वलिए क्खु अन्धआले माशराशिपाविट्ठा विअ मशिगुडिआ दीशन्दी ज्जेव पणट्ठा वशन्तशेणिआ । ( भाव ! भाव ! बलीयसि खल्वन्धकारे माषराशिप्रविष्टेव मसीगुटिका दृश्यमानैव प्रनष्टा वसन्तसेना ।
विटः—अहो ! बलवानन्धकारः । तथाहि—
आलोकविशाला मे सहसा तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना । उन्मीलितापि दृष्टिनिमीलितेवान्धकारेण ॥ ३३ ॥
अपि च—
लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः ।
अर्थः—शकार—भाव ! भाव ! इस घोर अन्धकार में, ( काले ) उड़द के ढेर मे गिरी हुई स्याही की टिकिया के समान, दिखाई पड़ती हुई ही वसन्तसेना गायब=अदृश्य हो गई ।
अन्वयः—आलोकविशाला, मे, दृष्टिः, सहसा, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना, (अत एव ), उन्मीलिता, अपि, अन्धकारेण, निमीलिता, इव, ( भवति ), ॥३३॥
शब्दार्थ—आलोकविशाला=प्रकाश में ( सभी कुछ देखने में ) समर्थ, मे=मेरी (=विट की), दृष्टिः = आंख, सहसा = अचानक, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=अन्धकार के आ जाने से शक्तिरहित अथवा अन्धकार में आ जाने से शक्तिरहित ( अत एव=इसीलिये ), उन्मीलिता=खुली हुई, अपि=भी, अन्धकारेण=अन्धेरे के कारण, निमीलितां इव=बन्द के समान, ( भवति=हो रही है ।) ॥ ३३ ॥
अर्थ—विट—अरे घोर अन्धकार है । क्योंकि—
प्रकाश में (सभी कुछ) देखने में समर्थ मेरी दृष्टि ( नेत्र ) अचानक अन्धेरा आ जाने से ( अथवा अन्धेरे में आ जाने से ) शक्तिहीन ( हो गई है । इसीलिये ) खुली हुई भी अन्धकार के कारण बन्द के समान हो रही है ॥ ३३ ॥
टीका—आलोकविशाला=आलोके=दर्शने विशाला अथवा, आलोके=प्रकाशे विशाला, मे=मम, विटस्येत्यर्थः, दृष्टिः = नेत्रज्योतिरित्यर्थः, सहसा=झटिति, तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=तिमिरे प्रवेशेन विच्छिन्ना, तिमिरस्य प्रवेशेन = आगमनेन विच्छिन्ना=हीनशक्तिः, अतः, उन्मीलितापि=उद्घाटितापि, अन्धकारेण=तमसा, निमीलिता=मुद्रिता इव भवतीति भावः । अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः । आर्या वृत्तम् ॥३३॥
विमर्शः—आलोकविशाला=आलोके=देखने में विशाल=अतिसमर्थ, अथवा आलोके=प्रकाश में कार्यसमर्थ । तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना=तिमिर में प्रवेश करने से हीनशक्तिवाली अथवा तिमिरं=अन्धकार के आ जाने से क्षीण शक्तिवाली । निमीलिता इव—यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है और आर्या छन्द है ॥ ३३ ॥
प्रथमोऽङ्कः ८३
असत्पुरुषसेवेव दृष्टिविफलतां गता ॥ ३४ ॥
शकारः—भावे ! भावे ! अण्णेशामि वशन्तशेणिअं ? । (भाव ? भाव ! अन्विष्यामि वसन्तसेनिकाम् ।)
विटः—काणेलीमातः ! अस्ति किञ्चिच्चिह्नं यदुपलक्षयसि ।
शकारः—भावे ! भावे ! किं बिअ ? (भाव ! भाव ! किमिव ?)
विट—भूषणशब्दं सौरव्यानुविद्धं माल्यगन्धं वा ।
**अन्वयः—**तमः, अङ्गानि, लिम्पति, इव, नभः, अञ्जनम्, वर्षति, इव, असत्पुरुषसेवा, इव, दृष्टिः, विफलताम्, गता ॥ ३४ ॥
**शब्दार्थः—**तमः = अन्धेरा, अङ्गानि = अवयवों को, लिम्पति इव = लीप सा रहा है; व्याप्त कर रहा है, नभः = आकाश, अञ्जनम् = अँजन = काजल आदि, वर्षति इव = बरसा सा कर रहा है, असत्पुरुषसेवा = दुष्टजनशुश्रूषा के, इव = समान, दृष्टिः = नेत्रज्योति, विफलताम् = विफलता को, गता = प्राप्त हो गई है ॥ ३४ ॥
**अर्थ—**और भी, अन्धेरा अवयवों को व्याप्त सा कर ले रहा है, आकाश अंजन की बरसा सी कर रहा है, दुष्ट पुरुष की सेवा के समान मेरी दृष्टि व्यर्थ हो गई है ॥ ३४ ॥
**टीका—**तमः = अन्धकारः, अङ्गानि = अवयवान्, लिम्पति इव = व्याप्नोति इव, नभः = आकाशः, अञ्जनम् = कज्जलादिकम्, वर्षति इव = पातयति इव, अत्रोभय-त्रोत्प्रेक्षा, असत्पुरुषसेवा इव = दुष्टपुरुषसमाराधना इव, दृष्टिः = नेत्रज्योतिः, विफलताम् = निष्फलत्वम्, गता = प्राप्ता । असत्पुरुषसेवेत्यनेन शकारसेवायां निष्फलत्वं ध्वनितमिति बोध्यम् । अत्र पूर्वार्द्धे उभयत्र उत्प्रेक्षा, उत्तरार्द्धे चोपमा—इत्यनयोः संसृष्टिः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ३४ ॥
**विमर्शः—**असत्पुरुषसेवा इव—यहाँ दुष्ट शकार की सेवा का संकेत है । वह व्यर्थ है । अतः वसन्तसेना उसे नहीं चाहती है, यह ठीक ही है । पूर्वार्द्ध में दोनों वाक्यों में क्रिया के साथ 'इव' का प्रयोग होने से उत्प्रेक्षा है । उत्तरार्द्ध में उपमा है । इन दोनों की संसृष्टि है । यमक और अनुप्रास ये शब्दालंकार भी हैं । इसमें अनुष्टुप् छन्द है । लक्षण—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ ३४ ॥
**अर्थ—शकार—**भाव ! भाव ! वसन्तसेना को ढूँढ़ता हूँ ।
**विट—**काणेलीपुत्र ! कोई चिह्न है जिसके माध्यम से तुम (वसन्तसेना को) खोज रहे हो ।
**शकार—**भाव ! भाव ! कैसा (चिह्न) ?
**विट—**आभूषणों की आवाज अथवा सुगन्धित फूलों की गन्ध ।
८४
मृच्छकटिकम्
शकार--शुणामि मल्लगन्धं अन्धआलपूलिदाए उण णाशिआए सुव्वत्तं, उण ण पेक्खामि भूषणशद्दं ! ( शृणोमि माल्यगन्धम्, अन्धकार-पूरितया पुनर्नासिकया सुव्यक्तं पुनर्न प्रेक्षे भूषणशब्दम् । )
विट:--( जनान्तिकम् । ) वसन्तसेने ?
कामं प्रदोषतिमिरेण न दृश्यसे त्वं
सौदामनीव जलदोदरसन्धिलौना ।
त्वां सूचयिष्यति तु माल्यसमुद्भवोऽयं
गन्धश्च भीरु ! मुखराणि च नूपुराणि ॥ ३५ ॥
श्रुतं वसन्तसेने ! ।
शकार--माला की गन्ध सुन रहा हूँ । किन्तु अन्धकार से भरी हुई नाक से आभूषणों की आवाज को साफ-साफ नहीं देख पा रहा हूँ ।
अन्वय:--हे वसन्तसेने ! ( इति गद्यांशेनान्वयः ) जलदोदरसन्धिलौना, सौदामनी, इव, त्वम्, प्रदोषतिमिरेण, कामम्, न, दृश्यसे, तु, हे भीरु ! माल्यसमुद्भवः, अयम्, गन्धः, त्वाम्, सूचयिष्यति, मुखराणि, च, नूपुराणि, च, (सूचयिष्यन्ति) ॥ ३५ ॥
शब्दार्थ:--( हे वसन्तसेने ! ), जलदोदरसन्धिलौना=मेघों के गर्भ में छिपी हुई, सौदामनी इव=बिजली के समान, त्वम्=तुम, प्रदोषतिमिरेण = सायंकालीन अन्धेरे से, कामम्=पर्याप्त, न=नहीं, दृश्यसे = दिखाई दे रही हो, तु=किन्तु, हे भीरु=भयशीले !, माल्यसमुद्भवः=मालाओं से निकलने वाला अयम्=यह अनुभूयमान, गन्धः=सुगन्ध, त्वाम्=तुमको, सूचयिष्यति = सूचित कर देगा, च=तथा, मुखराणि=शब्द करनेवाले, नूपुराणि=पैरों के आभूषण पायजेब, च=भी ( सूचित कर देंगे ) ॥ ३५ ॥
अर्थ--विट--( जनान्तिक ) हे वसन्तसेने !
मेघों के मध्य में छिपी हुई बिजली के समान तुम सायंकालीन अन्धेरे के कारण बिलकुल नहीं दिखाई दे रही हो । परन्तु हे भीरु ! मालाओं के फूलों से निकलने वाली यह ( उत्कट ) गन्ध तुम्हारी सूचना दे देगा । और शब्द करने वाले नूपुर ( पायजेब ) भी ( तुम्हारी सूचना दे देंगे ) ॥ ३५ ॥
श्रुतं वसन्तसेने ?
टीका--जलदोदर-सन्धिलौना = जलदानाम्=मेघानाम्, उदरसन्धौ = मध्ये, आभ्यन्तरे वा, लीना=अन्तर्हिता, सौदामनी इव = सुदाम्नो मेघविशेषस्य पत्नी विद्युत् इव, कामम्=पर्याप्तं यथा स्यात् तथा. न=नैव, दृश्यसे=विलोवयसे, तु=किन्तु, हे भीरु !=हे भयशीले ! माल्यसमुद्भवः =माल्यात् समुद्भवः = उत्पत्तिर्यस्य सः,
प्रथमोऽङ्कः <span style="float:right">८५</span>
वसन्त०---( स्वगतम् । ) सुदं गहिदं अ । (नाट्येन भूषणान्युत्सार्य, माल्यानि चापनीय, किञ्चित् परिक्रम्य, हस्तेन परामृश्य ।) अम्भो ! भित्ति-परामरिससूइदं पक्खदुआरअं क्खु एदं । जाणामि अ संजोएण गेहस्स संवुदं पक्खदुआरअं । ( श्रुतं गृहीतञ्च । अहो ! भित्तिपरामर्शसूचितं पक्ष-द्वारं खल्वेतत् । जानामि च संयोगेन गेहस्य संवृतं पक्षद्वारकम् । )
चारु०---वयस्य ! समाप्तजपोऽस्मि । तत् साम्प्रतं गच्छ, मातृभ्यो बलिमुपहर ।
विदू---भो ! ण गमिस्सं । ( भोः ! न गमिष्यामि । )
माल्यविनिर्गतः, अयम्=अनुभूयमानः, गन्धः=सौरभम्, त्वाम्=वसन्तसेनाम्, सूचयिष्यति=ज्ञापयिष्यति, च=तथा, मुखराणि = शब्दायमानानि, नूपुराणि = पादयोर्भूषणानि, च=अपि, एकश्चकारोऽप्यर्थे, सूचयिष्यन्तीति वचनविपरिणामेनान्वयः । अत्रोपमा, सूचनरूपायामेकस्यामेव क्रियायां गन्धनूपुरयोरन्वयात् तुल्ययोगिता चेति बोध्यम् । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ ३५ ॥
विमर्श---जनान्तिक---यह एक पारिभाषिक शब्द है । जब रंगमंच पर अनेक पात्रों के रहने पर किसी एक पात्रविशेष से कुछ कहना इष्ट रहता है और हाथ की तीन अंगुलियाँ उठा कर तथा अनामिका अंगुलि को वक्र करके किसी पात्र से कुछ कहा जाता है तब ‘जनान्तिक’ कहा जाता है । साहित्यदर्पण में यह लक्षण कहा गया है ।
त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम् ।
अन्योन्यामन्त्रणं यत् स्यात्तज्जनान्ते जनान्तिकम् ॥
शकार आदि रंगमंच पर रहते हैं तो भी यह वाक्य उन्हें नहीं सुनना है । इसमें दो चकार हैं एक 'अपि' अर्थ में है । सौदामनी इव---यह उपमा है । सूचन-रूपी एक ही क्रिया में गन्ध तथा नूपुरशब्द रूपी दो कारकों का अन्वय होने से तुल्ययोगिता है । दोनों निरपेक्ष हैं अतः संसृष्टि है । इसमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ ३५ ॥
अर्थ---वसन्तसेना---( स्वागत ) सुना और समझ भी लिया । ( अभिनय के साथ मालाओं को हटाकर कुछ घूमकर, हाथ से स्पर्श करके ) ओह, दीवाल के स्पर्श से यह मालूम होता है कि निश्चय ही यह बगल का दरवाजा है । और ( किवाड़ों के ) संयोग ( =मिले होने से, अथवा हाथ आदि के स्पर्श से अथवा भाग्य ) से यह समझ रही हूँ कि पक्षद्वार ( दरवाजा ) बन्द है ।
चारुदत्त---मित्र ! जप समाप्त कर चुका हूँ । इसलिये इस समय जाओ, मातृदेवियों को बलि चढ़ाओ ।
विदूषक---मित्र ! मैं नहीं जाऊँगा ।
८६ मृच्छकटिकम्
चारु०--धिक् कष्टम् ।
दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न सन्तिष्ठते,
सुस्निग्धा विमुखीभवन्ति सुहृदः, स्फारीभवन्त्यापदः ।
सत्त्वं ह्रासमुपैति, शीलशशिनः कान्तिः परिम्लायते,
पापं कर्म च यत् परैरपि कृतं तत्तस्य सम्भाव्यते ॥ ३६ ॥
**विमर्श--**पाठकों को यह ध्यान होगा कि पूर्व कथा में विदूषक और चारुदत्त पूजन एवं बलि की चर्चा कर रहे थे । उसी समय चारुदत्त ने कहा था—'भवतु, तिष्ठ तावत् । अहं समाधिं निर्वर्तयामि ।' अतः रंगमञ्च पर इतनी देर तक चारुदत्त समाधि में बैठा रहता है । इस प्रकार वसन्तसेना और शकार आदि के अभिनय में कोई बाधा नहीं होती है । अतः इस स्थल पर उसके पुनः प्रवेश की शंका नहीं करनी चाहिये ।
**अन्वयः--**दारिद्र्यात्, बान्धवजनः, पुरुषस्य, वाक्ये, न, सन्तिष्ठते, सुस्निग्धाः सुहृदः, विमुखीभवन्ति, आपदः, स्फारीभवन्ति, सत्त्वम्, ह्रासम्, उपैति, शील-शशिनः, कान्तिः, परिम्लायते, परैः, अपि, च, यत्, पापम्, कर्म, कृतम्, तत्, तस्य, सम्भाव्यते ॥ ३६ ॥
**शब्दार्थ--**दारिद्र्यात्=गरीबी के कारण, बान्धवजनः=भाई बन्धु लोग, पुरुषस्य=निर्धन व्यक्ति के, वाक्ये=वचनों पर, न=नहीं, सन्तिष्ठते=रहते हैं मानते हैं, सुस्निग्धाः=अत्यन्त स्नेही, सुहृदः=मित्र, भी, विमुखीभवन्ति=मुख फेर लेते हैं, आपदः=आपत्तियाँ, स्फारीभवन्ति=बढ़ने लगती हैं, सत्त्वम्=बल, ह्रासम्=न्यूनता को, उपैति=प्राप्त करता है, शीलशशिनः=आचरणरूपी चन्द्रमा की, कान्तिः=कान्ति, परिम्लायते=मलिन होने लगती है, च=और; परैः=दूसरों के द्वारा, अपि=भी, कृतम्=किया गया; यत्=जो, पापम्=अपराध, कर्म=कर्म, तत्=वह, तस्य=उस निर्धन का, सम्भाव्यते=मान लिया जाता है ॥ ३६ ॥
अर्थ--चारुदत्त - ओह, कष्ट है—
गरीबी के कारण बन्धुबान्धव लोग उस निर्धन व्यक्ति के वचनों पर नहीं रहते हैं, नहीं मानते हैं । बहुत घनिष्ठ मित्र भी विमुख हो जाते हैं । आपत्तियाँ बढ़ जाती हैं । शक्ति क्षीण होने लगती हैं । चरित्ररूपी चन्द्रमा की कान्ति फीकी पड़ने लगती है । और दूसरों के द्वारा भी जो पाप कर्म किया गया है उसे उस गरीब का ही मान लिया जाता है ॥ ३६ ॥
**टीका--**दारिद्र्यात्=निर्धनत्वात्, बाधवजनः=स्वजनः, भ्रात्रादिरित्यर्थः, पुरुषस्य=निर्धनमनुष्यस्य, वाक्ये=वचने, आज्ञायामिति भावः, न=नैव, सन्तिष्ठते=वर्तते, वाक्यं न परिपालयतीति भावः, 'समवप्रविभ्यः स्थः' [पा. सू. १।३।२२] इत्यात्मने-
प्रथमोऽङ्कः ८७
अपि च—
सङ्गं नैव हि कश्चिदस्य कुरुते, सम्भाषते नादरात्,
सम्प्राप्तो गृहमुत्सवेषु धनिनां सावज्ञमालोक्यते ।
दूरादेव महाजनस्य विहरत्यल्पच्छदो लज्जया,
मन्ये निर्धनता प्रकाममपरं षष्ठं महापातकम् ॥ ३७ ॥
पदम्, सुस्निग्धाः=अत्यन्तस्नेहयुक्ताः, प्रगाढाः इति यावत्, सुहृदः=सखायः, विमुखी-भवन्ति=पराङ्मुखा भवन्ति, मैत्रीं परित्यजन्तीति भावः, आपदः=विपत्तयः, स्फारी-भवन्ति=एकीभवन्ति ततो वृद्धिं गच्छन्तीत्यर्थः, सत्त्वम्=बलम्, ह्रासम्=क्षीणताम्, उपैति=प्राप्नोति, शीलशशिनः=शीलम्=आचरणम् एव शशी, तस्य, चारित्र्यचन्द्रस्य, कान्तिः=प्रभा, दीप्तिर्वा, परिम्लायते=परितो मालिन्यं गच्छति, परैः=अन्यैः, अपि, च, यत्, पापम्=निन्दितम्, अधर्मादिजनकम्, कर्म=कार्यम्, कृतम्=विहितम्, तत्=अन्यजनविहितं निन्दितं कर्म, तस्य = निर्धनपुरुषस्य, सम्भाव्यते = अनुमीयते, सर्वैरिति शेषः। दरिद्रतयाऽनेनैव धनादिलोभेनेदमकार्यं कृतमिति झटिति सर्वैरनुमीयते इति भावः। अत्र शीले शशित्त्वारोपात् रूपकालंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम्। तल्लक्षणम्—सूर्याश्वैर्याद मः सजौ, सततगाः, शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ३६ ॥
विमर्श—विदूषक चारुदत्त का गहरा मित्र है किन्तु इस समय वह भी आज्ञा-पालन नहीं कर रहा है, इसका कारण, चारुदत्त अपनी निर्धनता ही समझता है। अतः यहाँ से तीन श्लोकों में निर्धनता के विषय में ही कहता है।
शीलशशिनः—शीलम्=आचरणम् एव शशी=चन्द्रः तस्य-यहाँ रूपक अलंकार है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। सन्तिष्ठते-सम् + √स्था + लट् प्र. पु. ए.व.-इसमें 'समवप्रविभ्यः स्थः' [ पा. सू. १।३।२२ ] सूत्र से आत्मनेपद होता है। विमुखीभवन्ति और स्फारीभवन्ति-ये नामधातु के रूप हैं। इनमें च्वि प्रत्यय आदि होता है। परिम्लायते -परि + √म्लै + लट् प्र० पु० ए० व०। सम्भाव्यते - भाववाच्य लट्लकार का रूप है ॥ ३६ ॥
अन्वयः—हि, कश्चित्, अस्य, सङ्गम्, नैव, कुरुते, ( अतः ), आदरात्, न, सम्भाषते, उत्सवेषु, धनिनाम्, गृहम्, सम्प्राप्तः, सावज्ञम्, अवलोक्यते, अल्पच्छदः, ( निर्धनः ), लज्जया, महाजनस्य, दूरात्, एव, विहरति, ( अतः अहम् इदम् ) मन्ये, निर्धनता, अपरम्, प्रकामम्, षष्ठम्, महापातकम् ॥ ३७ ॥
शब्दार्थ—हि=चूँकि, कश्चित्=कोई भी, अस्य=इस दरिद्र का, सङ्गम्=साथ, नैव=नहीं, कुरुते=करता है, अतः=इसलिये, ( कोई भी ) आदरात्=आदर से, न=नहीं, सम्भाषते=बोलता है, उत्सवेषु=उत्सवों, जलसों में, धनिनाम्=धनवानों के, गृहम्=घर को, सम्प्राप्तः=प्राप्त करने वाला, पहुँचने वाला, सावज्ञम्=अपमान के
८८ मृच्छकटिकम्
साथ, अवलोक्यते=देखा जाता है, अल्पच्छदः=अपर्याप्त वस्त्र धारण करने वाला ( दरिद्र ), लज्जया=लाज के कारण, महाजनस्य=बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति के, दूरात्=दूर से, एव=ही, विहरति=चलता है, साथ में नहीं चलता है, ( इसलिये मैं यही ), मन्ये=मानता हूँ, कि, निर्धनता=गरीबी, अपरम्=दूसरा, ( पाँच महापातकों से भिन्न ), प्रकामम्=बड़ा प्रबल, षष्ठम्=छठा, महापातकम्=महापातक, है ।। ३७ ।।
अर्थ-- और भी--
चूँकि कोई भी व्यक्ति निर्धन का साथ नहीं करता है, अतः कोई भी ( इससे ) आदरपूर्वक नहीं बोलता है । उत्सवों में, धनवानों के घर पर पहुँचने वाला निर्धन पुरुष अपमान के साथ देखा जाता है । अपर्याप्त वस्त्रों वाला निर्धन व्यक्ति लज्जा के कारण बड़े लोगों से दूर दूर ही चलता है, रहता है । अतः ( मैं चारुदत्त यही ) मानता हूँ कि निर्धनता ( पाँच महापातकों से ) भिन्न छठा प्रबल महापातक है ।। ३७ ।।
टीका-- हि=यतः, कश्चित्=कश्चनापि जनः, अस्य=दरिद्रस्य, सङ्गम्=सङ्गतिम्, नैव कुरुते नैव करोति, अतः कश्चिदपि, आदरात्=सम्मानात्, न=नैव, सम्भाषते=सम्यक् वदति, उत्सवेषु=विवाहादिमहोत्सवेषु, धनिनाम्=धनिकानाम्, गृहम्=आवासम्, सम्प्राप्तः=समागतः, उपस्थितः, सावज्ञम्=अवज्ञया=अपमानेन सह, अवलोक्यते=दृश्यते, सर्वैरिति शेषः, अल्पच्छदः=स्वल्पः, छदः=वस्त्रं यस्य सः तादृशः अपर्याप्तवस्त्रयुतः, दरिद्रः, लज्जया=व्रीडया, महाजनस्य=धनिकस्य, उत्तमवस्त्रादिसमलङ्कृतस्य; दूरात्=विप्रकृष्टात्, एव, विहरति=चलति, तादृशवस्त्राभावात् जुगुप्सयात्मानं गोपयन् दूरे दूरे एव प्रचलति न तु तैः सहेति भावः, ( अतः अहं चारुदत्तः इदम् ) मन्ये=चिन्तयामि, निर्धनता=दरिद्रता, अपरम्=धर्मशास्त्रादौ प्रसिद्धातिरिक्तम्, प्रकामम्=प्रबलम्, षष्ठम्=षष्ठसंख्याकम्, महापातकम्=महापापम्, पञ्चमहापातकानि चैवं मनुना प्रतिपादितानि--
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ।। [ मनु. ११।५४ ]
अत्रोत्प्रेक्षालङ्कारः शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। ३७ ।।
विमर्श-- षष्ठं महापातकम्-- मनु आदि महर्षियों ने पाँच महापातक माने हैं—(१) ब्रह्महत्या, (२) सुरापान, (३) चोरी, (४) गुरुपत्नी-गमन, (५) इनमें किसी भी पातकी के साथ वर्ष भर रहना । दरिद्रता को इन्हीं की कोटि में छठा महापातक माना गया है । कुरुते-- √डुकृञ् + लट् लकार प्र. पु. ए. व आत्मनेपद । सावज्ञम्-- अवज्ञया सहितम् । महाजनः-- महांश्चासौ जनः—यहाँ महत्त्व धनादि के आधार पर समझना चाहिये । यदि 'कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव' नियम से 'महाजनस्य' में षष्ठी मान लें और 'विहरति' का अर्थ छोड़ता है, यह मान लें
प्रथमोऽङ्कः (८६)
अपि च--
दारिद्र्य ! शोचामि भवन्तमेवमस्मच्छरीरे सुहृदित्युषित्वा ।
विपन्नदेहे मयि मन्दभाग्ये, ममेति चिन्ता क्व गमिष्यसि त्वम् ॥ ३८ ॥
तो—अपर्याप्त वस्त्रों वाला दरिद्र लज्जा के कारण महाजनों को दूर से ही छोड़े रहता है, उनसे नहीं मिलता है—यह अर्थ हो जाता है। अल्पच्छदः—अल्पः=अपर्याप्तः छदः=वस्त्रं यस्य सः—थोड़े वस्त्रों वाला—बहुव्रीहि है। 'मन्ये' के प्रयोग के कारण उत्प्रेक्षा अलङ्कार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ ३७ ॥
**अन्वयः—**हे दारिद्र्य ! भवन्तम्, एवम्, शोचामि, अस्मच्छरीरे, सुहृद्, इति, उषित्वा, मन्दभाग्ये, मयि, विपन्नदेहे (सति), त्वम्, क्व, गमिष्यसि, इति, मम, चिन्ता, अस्ति ॥ ३८ ॥
**शब्दार्थ—**हे दारिद्र्य ! हे निर्धनते ! (गरीबी), भवन्तम्=आपको अर्थात् आपके विषय में, एवम्=इस प्रकार, शोचामि=दुःख का अनुभव कर रहा हूँ, अस्मच्छरीरे=मेरे शरीर में, सुहृद्=मित्र, इति=इस रूप से, उषित्वा=रह कर, मन्दभाग्ये=अभागे, मयि=मेरे, विपन्नदेहे=शरीरत्याग कर देने पर अर्थात् मर जाने पर, त्वम्=तुम दारिद्र्य, क्व=कहाँ, गमिष्यसि=जाओगे, इति=इस प्रकार की, मम=मुझ चारुदत्त की, चिन्ता=चिन्ता, अस्ति=है ॥ ३८ ॥
**अर्थ—**और भी—
हे निर्धनते ! (गरीबी) आपके विषय में मैं इस प्रकार दुःख कर रहा हूँ कि मेरे शरीर में मित्र इस रूप से रह कर मुझ अभागे के शरीर छोड़ देने पर अर्थात् मर जाने पर तुम (निराधार होकर) कहाँ जाओगे—यह मुझे (चारुदत्तको) चिन्ता है ॥ ३८ ॥
**टीका—**हे दारिद्र्य !=हे निर्धनत्व !, भवन्तम्=त्वाम्, एवम्=अनेन रूपेण, शोचामि=दुःखमनुचिन्तयामि, अस्मच्छरीरे=मम देहे, सुहृद् इति=सखा इति रूपेण, उषित्वा=स्थित्वा, निवासं कृत्वा, मन्दभाग्ये=हतभाग्ये, मयि=चारुदत्ते, विपन्नदेहे=त्यक्तशरीरे, मृते, सति त्वम्=दारिद्र्य ! निराधारो भूत्वा, क्व=कुत्र, गमिष्यसि=यास्यसि, आश्रयं ग्रहीष्यसि, इति=इत्येवं प्रकारेण, मम=चारुदत्तस्य, चिन्ता=मानसिकी व्यथा अस्ति=वर्तते। काव्यलिङ्गमलङ्कारः। इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रयोः सम्मेलनादुपजातिर्वृत्तम् ॥ ३८ ॥
**विमर्श—**दारिद्र्य—दरिद्र + ष्यञ्=य भाव अर्थ में। उषित्वा—√वस् + इट् + क्त्वा सम्प्रसारण होने से 'व' का उ और-षत्व करने से उष् + इ + त्वा। सुहृद्—शोभनं हृदयं यस्य सः—'सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः' (पा० सू० ५।४।१५०) इससे हृदय को हृद् आदेश। विपन्नदेहे—विपन्नः=विनष्टः, देहः=शरीरम् यस्य सः—
| ६० | मृच्छकटिकम् |
|---|
विदू०---( सवैलक्ष्यम् ।) भो वअस्स ! जइ मए गन्तव्वं, ता एसा वि से सहाइणी रदणिआ भोदु । ( भो वयस्य ! यदि मया गन्तव्यम्, तदेषापि मम सहायिनी रदनिका भवतु । )
चारु०--रदनिके ! मैत्रेयमनुगच्छ ।
चेटी--जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )
विदू०--भोदि ! रदणिए । गेण्ह बलिं पदीवं अ । अहं अवावुदं पक्खदुआरअं करेमि । ( तथा करोति । ) ( भवति रदनिके ! गृहाण बलिं प्रदीपञ्च । अहमपावृतं पक्षद्वारकं करोमि । )
वसन्त०--मम अब्भुववत्तिणिमित्तं विअ अवावुदं पक्खदुआरअं, ता जाव पविसामि । ( दृष्ट्वा ) हद्धी ! हद्धी ! कथं पदीवो । ( पटान्तेन निर्वाप्य प्रविष्टा । ) ( मम अभ्युपपत्तिनिमित्तमिव अपावृतं पक्षद्वारकम्, तद्यावत् प्रविशामि । हा धिक् ! हा धिक् ! कथं प्रदीपः ! । )
चारु०--मैत्रेय ! किमेतत् ? ।
विदू०--अवावुदपक्खदुआरएण पिण्डीकिदेण वादेण णिव्वाविदो पदीवो । भोदि ! रदणिए ! णिक्कम तुमं पक्खदुआरएण । अहंपि अब्भन्तरचदुस्सालादो पदीवं पज्जालिअ आअच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । ) ( अपावृतपक्षद्वारेण पिण्डीकृतेन वातेन निर्वापितः प्रदीपः । भवति रदनिके ! निष्क्राम त्वं पक्षद्वारकेण । अहमपि अभ्यन्तरचतुःशालातः प्रदीपं प्रज्वाल्य आगच्छामि । )
ब० व्री० । मयि यहाँ सतिसप्तमी है। इसमें इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के संयोग के कारण उपजाति छन्द है। प्राचीन संस्कृत में युष्मत् और भवत् के प्रयोग में बहुत भेद नहीं माना जाता था। अतः यहाँ 'भवन्तम्' और 'त्वम्' दोनों का प्रयोग ठीक है ॥३८॥
अर्थ--विदूषक--( लज्जा के साथ ) हे मित्र ! यदि मुझे जाना है तो यह रदनिका भी मेरे साथ चले ।
**चारुदत्त--**रदनिके ! मैत्रेय के साथ जाओ ।
**चेटी--**आपकी जो आज्ञा !
**विदूषक--**हे रदनिके ! बलि और दीपक लो । मैं बगल का दरवाजा खोलता हूँ । ( दरवाजा खोलता है । )
**वसन्तसेना--**मुझ पर अनुग्रह करने के लिये ही मानों बगल के दरवाजा के किवाड़ खुले हैं । तो इसमें प्रवेश करती हूँ । ( देख कर ) हाय ! हाय ! ( अब ) क्या ? यहाँ दीप ( जल रहा है । ) ( आँचल से दीपक को बुझा कर प्रवेश करती है । )
**चारुदत्त--**मैत्रेय ! यह क्या ?
**विदूषक--**बगल के दरवाजे के खुलने से एकत्रित वायु के झोंके ने यह दीपक
६१ प्रथमोऽङ्कः
शकारः—भावे ! भावे ! अण्णेशामि वशन्तशणिअं ? ( भाव ? भाव ! अन्विष्यामि वसन्तसेनिकाम् । ) विटः—अन्विष्यताम् अन्विष्यताम् । शकारः—(तथा कृत्वा) भावे ! भावे ! गहिदा गहिदा ( भाव ! भाव ! गृहीता गृहीता । ) विटः—मूर्ख ! नन्वहम् । शकारः—इदो दाव पाच्छन्नो भविअ एअन्ते भावे चिट्ठदु । ( पुनरन्विष्य चेट गृहीत्वा । ) भावे ! भावे ! गहिदा गहिदा । ( इतस्तावत् प्रच्छन्नो भूत्वा एकान्ते भावस्तिष्ठतु । भाव ! भाव ! गृहीता गृहीता । ) चेटः—भट्टके ! चेडो हगे । ( भट्टारक ! चेटोऽहम् । ) शकारः—इदो भावे, इदो चेड़े, भावे चेड़े, चेड़े भावे । तुम्हे दाव एअन्ते चिट्ठ । ( पुनरन्विष्य रदनिकां केशेषु गृहीत्वा ) भावे ! भावे ! शंपदं गहिदा गहिदा वसंतशेणिआ । ( इतो भावः, इतश्चेटः, भावश्चेटः, चेटो भावः, युवां तावत् एकान्ते तिष्ठतम् । भाव ! भाव ! सांप्रतं गृहीता गृहीता वसन्तसेनिका । )
अन्धआले पलाअन्ती मल्लगन्धेण शूइदा ।
केशविन्दे पलामिश्टा चाणक्केणेव दोव्वदी ॥ ३६ ॥
बुझा दिया । रदनिके ! तुम बगल के दरवाजे से निकल जाओ। मैं भी भीतरी चौशाल से दीपक जला कर आता हूँ । ( इस प्रकार निकल जाता है ।)
शकार—भाव ! भाव ! वसन्तसेना को खोजूँगा ।
विट—खोजिये, खोजिये ।
शकार—( वैसा करके=खोज करके ) भाव ! भाव ! पकड़ ली, पकड़ ली ।
विट—मूर्ख ! यह तो मैं हूँ ।
शकार—इधर होकर आप तब तक एकान्त में रहिये । ( फिर खोज कर चेट को पकड़ कर ) भाव ! भाव ! पकड़ ली, पकड़ ली ।
चेट—स्वामिन् ! यह तो मैं ( चेट ) हूँ ।
शकार—इधर भाव ( विट ), उधर चेट, भाव, चेट, चेट, भाव । आप दोनों तब तक एकान्त में ही बैठिये । ( फिर खोज कर रदनिका को बालों में पकड़ कर ) भाव ! भाव ! इस समय वसन्तसेना पकड़ ली, पकड़ ली ।
अन्वयः—अन्धकारे, पलायमाना, माल्यगन्धेन, सूचिता, ( वसन्तसेना ), चाणक्येन, द्रौपदी, इव, केशवृन्दे, परामृष्टा ॥ ३६ ॥
६२ मृच्छकटिकम्
( अन्धकारे पलायमाना माल्यगन्धेन सूचिता ।
केशवृन्दे परामृष्टा चाणक्येनेव द्रौपदी ॥ २६ ॥
विट:--
एषासि वयसो दर्पात् कुलपुत्रानुसारिणी ।
केशेषु कुसुमाढ्येषु सेवितव्येषु कर्षिता ॥ ४० ॥
शब्दार्थ—अन्धकारे=अन्धेरे में, पलायमाना=भागनेवाली, किन्तु माल्यगन्धेन=माला के पुष्पों की गन्ध से, सूचिता=सूचित=ज्ञात हो जाने वाली, (वसन्तसेना को), चाणक्येन=चाणक्य द्वारा, द्रौपदी इव=पाण्डवों की पत्नी के समान, केशवृन्दे=केशसमूहमें, परामृष्टा=पकड़ ली गई, अर्थात् बालों में पकड़ ली गई ॥ ३९ ॥
अर्थ—अन्धेरे में भागती हुई (किन्तु) माला की गन्ध से सूचित (ज्ञात) हो जाने वाली (वसन्तसेना) को उसी प्रकार बालों में पकड़ लिया है जैसे चाणक्य ने द्रौपदी को (पकड़ा था) अर्थात् वसन्तसेना का केशसमूह मैंने पकड़ लिया है ॥ ३६ ॥
टीका—अन्धकारे=तमसि, पलायमाना=धावन्ती, किन्तु, माल्यगन्धेन=माल्यस्य=मालागुम्फितपुष्पसमुदायस्य, गन्धेन=सौरभेण, सूचिता=संकेतिता, ज्ञापिता, (वसन्तसेना), चाणक्येन=कौटिल्येन, द्रौपदी इव=पाण्डवपत्नी इव, केशवृन्दे=कचसमुदाये, अवच्छेदकत्वं सप्तम्यर्थः केशवृन्दावच्छेदेनेत्यर्थः, परामृष्टा=गृहीता, धृता वा, मयेति शेषः। अत्रापि प्रसिद्धिविरुद्धत्वात् हतोपमा । अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ३६ ॥
विमर्श—चाणक्येन द्रौपदी इव—यह कथन सर्वथा असंगत है। किन्तु शकार की बातें मूर्खतापूर्ण ही होती हैं अतः अविचारणीय हैं। केशवृन्दे–यहाँ सप्तमी का अर्थ अवच्छेदकता है–केशवृन्दावच्छेदेन गृहीता–इसका तात्पर्य है–बालों से पकड़ ली गई। हतोपमा है। अनुष्टुप् छन्द है। लक्षण—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ ३६ ॥
अन्वयः—एषा, (त्वम्) वयसः, दर्पात्, कुलपुत्रानुसारिणी, सेवितव्येषु, पुष्पाढ्येषु, केशेषु, कर्षिता, असि ॥ ४० ॥
शब्दार्थ—एषा=यह (तुम वसन्तसेने !) वयसः=अवस्था=यौवन के, दर्पात्=घमण्ड से, कुलपुत्रानुसारिणी=कुलीन चारुदत्त का अनुसरण करने वाली, उससे मिलने के लिये जाने वाली, सेवितव्येषु=सेवा करने के योग्य, कुसुमाढ्येषु=फूलों से खूब सजे हुये, केशेषु=बालों में, कर्षिता=खींची गई, असि=हो, अर्थात् बालों को पकड़ कर तुम्हें खींचा गया है ॥ ४० ॥
प्रथमोऽङ्कः ६३
शकारः--
एशाशि वाशू ! शिलशि ग्गहोदा केशेशु बालेशु शिलोलुहेशु ।
अक्कोश विक्कोश लवाहिचण्डं शम्भुं शिवं शंकलमीशलं वा ॥४१॥
( एषासि वासु ! शिरसि गृहीता केशेषु बालेषु शिरोरुहेषु ।
आक्रोश विक्रोश लपाधिचण्डं शम्भुं शिवं शंकरमीश्वरं वा ॥ ४१ ॥
**अर्थ--**यह ( वसन्तसेना ! तुम ) अपने यौवन के दर्प से कुलपुत्र चारुदत्त से मिलने जा रही हो, किन्तु सेवा करने योग्य, खूब फूलों से सजे हुये तुम्हारे केशों को पकड़ कर खींचा जा रहा है ॥ ४० ॥
**टीका--**एषा=अन्धकारे विलीनापि शकारेण गृहीता त्वम्, वसन्तसेना, वयसः=यौवनस्य, दर्पात्=अभिमानात्, कुलपुत्रानुसारिणी=कुलपुत्रस्य चारुदत्तस्य अनुगमनशीला, असि, किन्तु, सेवितव्येषु=सेवायोग्येषु कुसुमाढ्येषु=कुसुमैः=पुष्पैः आढ्येषु=युक्तेषु केशेषु अत्राप्यवच्छेदकत्व सप्तम्यर्थः, केशावच्छेदेनेत्यर्थः, कर्षिता=आकृष्टा असि, शकारेणेति शेषः। अतः शकारमुपसेवस्वेति भावः। अनुष्टुप् छन्दः ॥ ४० ॥
**विमर्श--**दर्पात्-अपने यौवन के दर्प के कारण हम लोगों की उपेक्षा करके तुम चारुदत्त के पास जाना चाहती हो, परन्तु नहीं जा सकती हो। सेवितव्येषु √सेव् + तव्यत् । पुष्पाढ्येषु=जिनमें बहुत फूल गुथे हैं। केशेषु-सप्तमी का अर्थ-अवच्छेदकता है-केशावच्छेदेन कर्षिता। अनुष्टुप् छन्द है ॥ ४० ॥
**अन्वयः--**हे वासु !, शिरसि, केशेषु, बालेषु शिरोरुहेषु, गृहीता, त्वम्, (अधुना), आक्रोश, विक्रोश, वा, शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम्, वा, अधिचण्डम्, लप ॥ ४१ ॥
**शब्दार्थ--**हे वासु ! हे बालिके !, शिरसि=सिर में, केशेषु=केशों में, बालेषु=बालों में, शिरोरुहेषु=शिर के बालों में, गृहीता=पकड़ ली गई, त्वम्=तुम, ( अधुना=अब ) आक्रोश=गाली दो, नाराज हो जाओ, वा=अथवा, विक्रोश=चिल्लाओ, शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम् वा=शम्भु, शिव, शंकर और ईश्वर को, अधिचण्डम्=खूब जोर जोर से, लप=पुकारो ॥ ४१ ॥
**अर्थ--शकार--**हे बालिके ! ( अरी छोकरी ), शिरमें, बालों में पकड़ी गई तुम अब चाहे चिल्लाओ अथवा ( नाराज हो जाओ ), गाली दो, और शिव शम्भु, शंकर, ईश्वर को जोर जोर से पुकारो । ( मैं किसी से डरनेवाला नहीं हूँ ) ॥ ४१ ॥
**टीका--**हे वासु !=अयि बालिके ! शिरसि=केशेषु, बालेषु, शिरोरुहेषु=शिरोभागे स्थितेषु कचेष्वित्यर्थः, गृहीता=धृता, त्वम्=वसन्तसेना, अधुना आक्रोश=शापं
६४ मृच्छकटिकम्
रदनिका--(सभयम् ।) किं अज्जमिस्सेहिं ववसिदं । (किमार्य-मिश्रैर्व्यवसितम् ?)
विटः--काणेलीमातः ! अन्य एवैष स्वरसंयोगः ।
शकारः--भावे ! भावे ! जधा दहिच्छल्लि-पलिंलूद्धाए मज्जलीआ शल-पलिवत्ते होदि, तधा दाशीएधीए शलपलिवत्ते कडे (भाव ! भाव ! यथा दधिशरपरिलुब्धाया मार्जार्याः स्वरपरिवर्त्तो भवति, तथा दास्याः पुत्र्या स्वरपरिवर्त्तः कृतः ।)
गालिं वा देहि, वा=अथवा, वक्रोश=रक्षार्थं कमपि आह्वय, अथवा शम्भुम्=शिवम्=शङ्करम्=ईश्वरम्=महादेवमित्यर्थः, अधिचण्डम्=अत्युच्चैः, क्रियाविशेषणमिदम्, लप=रक्षार्थम् आकारय, अहं शकारो न कस्मादपि बिभेमीति भावः । अत्र पूर्वार्धे उत्तरार्द्धे च पुनरुक्तिः शकारवचनत्वात् सोढव्या । इन्द्रवज्रा वृत्तम् ।। ४१ ।।
**विमर्श--**शिरसि, केशेषु, बालेषु, शिरोरुहेषु--इन सभी का एक ही तात्पर्य है । इसी प्रकार--शम्भुम्, शिवम्, शङ्करम्, ईश्वरम्=इनका भी एक ही अर्थ है । शकार की मूर्खता के कारण ये दोष नहीं हैं । 'अधिचण्डम्' इसे कुछ विद्वान् 'लप' क्रिया का विशेषण मानते हैं और कुछ इसे भी महादेव का पर्याय मानते हैं--'चण्डम्=महादेवं च'--पृथ्वीधर । आक्रोश--√आङ् + क्रुश + लोट् म. पु. ए. व. । क्रुश=आह्वाने रोदने च । परन्तु उपसर्ग के कारण शाप देना अथवा गाली देना अर्थ हो जाता है । इसी प्रकार वि + √क्रुश + लोट् म. पु. ए. व. में बुलाना अर्थ है । यहाँ इन्द्रवज्रा छन्द है ।। ४१ ।।
अर्थ--रदनिका-- (भय के साथ) आप महानुभावों ने यह क्या किया ? (अथवा कर रहे हैं ?)
**विट--**काणेलीपुत्र ! यह तो दूसरी ही आवाज (लगती) है !
**शकार--**भाव ! भाव ! जैसे दही के ऊपर की मलाई खाने की इच्छुक बिल्ली की आवाज बदल जाती है उसी प्रकार इस दासी की पुत्री ने (अपनी) आवाज बदल ली है ।
**टीका--आर्यमिश्रैः=**आर्याश्च ते मिश्राश्च=पूजनीयैर्महानुभावैरिति भावः, **व्यवसितम्=**कृतम् क्रियते वा, **दधिशरपरिलुब्धाया=**शरः=दध्नः उपरिभागः, हिन्द्यां मलाई इति प्रसिद्धम्, तस्य **लुब्धाया=**अभिलाषिण्याः क्वचित् **दधिभक्तलुब्धायाः=**इत्यपि पाठः, **स्वरपरिवर्त्तः=**ध्वनेः परिवर्त्तनं मार्जारिकायाः भवति तथैवानया वसन्तसेनयापि स्वस्वरस्य परिवर्त्तनं कृतम् ।
**विमर्श--दधि-शर-परिलुब्धायाः--**शर=दही के ऊपरी भाग=मलाई को कहते हैं । दही के ऊपर की मलाई खाने की इच्छुक बिल्ली जैसे अपनी स्वाभाविक आवाज बदल लेती है वैसे ही वसन्तसेना ने अपनी आवाज बदल ली है । कहीं कहीं
४५
प्रथमोऽङ्कः
विट :--कथं स्वरपरिवर्त्तः कृतः । अहो चित्रम् । अथवा किमत्र चित्रम् ?
इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया ।
वञ्चनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ॥ ४२ ॥
( प्रविश्य )
विदूषकः-- ही ही भो ! पदोसमन्दमारुदेण पसुबन्धोवणीदस्स विअ छाअलस्स हिअअं, फुरफुराअदि पदीवो ( उपसृत्य रदनिकां दृष्ट्वा ) भो ! रदणिए । ( आश्चर्यम् ! भोः ! प्रदोषमन्दमारुतेन पशुबन्धोपनीतस्येव छागलस्य हृदयं फुरफुरायते प्रदीपः । भो रदनिके ! । )
दधिभक्तलुब्धायाः=-यह भी पाठ है । दही भात खाने की इच्छुक--यह अर्थ है । परन्तु प्रथम पाठ ही तर्कसंगत है ।
अन्वयः--रङ्गप्रवेशेन, कलानाम्, उपशिक्षया, च, वञ्चनापण्डितत्वेन, च, इयम्, स्वरनैपुण्यम्, आश्रिता ॥ ४२ ॥
शब्दार्थ--रङ्ग-प्रवेशन= नाट्यशाला में प्रवेश= कार्य करने से, च= और, कलानाम्= संगीत आदि ६४ कलाओं की, उपशिक्षया= शिक्षा अथवा अभ्यास के कारण, तथा, वञ्चनापण्डितत्वेन= ठगने की चतुरता के कारण, इयम्= इस वसन्तसेना ने, स्वरनैपुण्यम= अपनी आवाज ( बदलने ) की निपुणता, आश्रिता= प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
अर्थ--विट - क्या स्वर बदल लिया ? बड़ा आश्चर्य है । अथवा इसमें आश्चर्य क्या है ?
रंगशाला में ( अभिनयादि करने के लिये ) प्रवेश करने से और [संगीत आदि] कलाओं की शिक्षा [ या अभ्यास ] से तथा ठगने में चतुर होनेसे इसने स्वर [ परिवर्तन आदि ] में निपुणता प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
टीका--रङ्गप्रवेशन=रङ्गः= नाट्यशाला तत्र अभिनयाद्यर्थं गमनेन, कलानाम्= सङ्गीतशास्त्रादिप्रसिद्धकलानाम्, उपशिक्षया= अभ्यासेन, शिक्षणाद्वा, वञ्चनापण्डितत्वेन-वञ्चना= प्रतारणा, तस्यां पण्डितत्वेन-चातुर्येण, इयम्= वसन्तसेना, स्वरनैपुण्यम्= स्वध्वनेः परिवर्त्तनादिविषयकं कौशलम्, आश्रिता= प्राप्तवती । एवञ्च वसन्तसेनेवेयमिति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ४२ ॥
विमर्श--वञ्चनापण्डितत्वेन=-वञ्चना= ठगना, उसमें पण्डितत्व-- पण्डित होने से-- पण्डित शब्द से भाव में त्वल् प्रत्यय है । स्वरनैपुण्यम्-- यहाँ स्वर का नैपुण्य-निपुण शब्द से भाव में ष्यञ्=य प्रत्यय होता है । स्वरनैपुण्य का अभिप्राय इच्छानुसार स्वर कर लेना है । तीन हेतुओं से स्वरनैपुण्य का आश्रयण कार्य हो रहा है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । और अनुष्टुप् छन्द है ॥४२॥
[ प्रवेश करके ]
अर्थ--विदूषक-- अरे आश्चर्य है ! प्रदोष=सन्ध्या-कालीन हवा से यह दीपक, यज्ञीय पशु को बांधने के लिये बने खूंटे के पास ले जाये गये पशु
प्रथमोऽङ्कः । ६५
विट :--कथं स्वरपरिवर्त्तः कृतः । अहो चित्रम् । अथवा किमत्र चित्रम् ?
इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया ।
वञ्चनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ॥ ४२ ॥
( प्रविश्य )
विदूषकः-- ही ही भो ! पदोसमन्दमारुदेण पसुबन्धोवणीदस्स विअ छाअलस्स हिअअं, फुरफुराअदि पदीवो ( उपसृत्य रदनिकां दृष्ट्वा ) भो ! रदणिए । ( आश्चर्यम् ! भोः ! प्रदोषमन्दमारुतेन पशुबन्धोपनीतस्येव छागलस्य हृदयं फुरफुरायते प्रदीपः । भो रदनिके ! । )
दधिभक्तलुब्धायाः=यह भी पाठ है । दही भात खाने की इच्छुक—यह अर्थ है । परन्तु प्रथम पाठ ही तर्कसंगत है ।
अन्वयः--रङ्गप्रवेशेन, कलानाम्, उपशिक्षया, च, वञ्चनापण्डितत्वेन, च, इयम्, स्वग्नैपुण्यम्, आश्रिता ॥ ४२ ॥
**शब्दार्थ--रङ्ग-प्रवेशेन=**नाट्यशाला में प्रवेश=कार्य करने से, **च=**और, **कलानाम्=**संगीत आदि ६४ कलाओं की, **उपशिक्षया=**शिक्षा अथवा अभ्यास के कारण, तथा, **वञ्चनापण्डितत्वेन=**ठगने की चतुरता के कारण, **इयम्=**इस वसन्तसेना ने, **स्वरनैपुण्यम्=**अपनी आवाज ( बदलने ) की निपुणता, **आश्रिता=**प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
अर्थ--विट—क्या स्वर बदल लिया ? बड़ा आश्चर्य है। अथवा इसमें आश्चर्य क्या है ?
रंगशाला में ( अभिनयादि करने के लिये ) प्रवेश करने से और [संगीत आदि] कलाओं की शिक्षा [ या अभ्यास ] से तथा ठगने में चतुर होनेसे इसने स्वर [ परिवर्तन आदि ] में निपुणता प्राप्त कर ली है ॥ ४२ ॥
**टीका--रङ्गप्रवेशेन=रङ्गः=**नाट्यशाला तत्र अभिनयाद्यर्थं गमनेन, कलानाम्= सङ्गीतशास्त्रादिप्रसिद्धकलानाम्, **उपशिक्षया=**अभ्यासेन, शिक्षणाद्वा, **वञ्चनापण्डितत्वेन—वञ्चना=**प्रतारणा, तस्यां **पण्डितत्वेन=**चातुर्येण, **इयम्=**वसन्तसेना, **स्वरनैपुण्यम्=**स्वध्वनेः परिवर्तनादिविषयकं **कौशलम्, आश्रिता=**प्राप्तवती । एवञ्च वसन्तसेनॆवेयपिति भावः । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ ४२ ॥
**विमर्श--वञ्चनापण्डितत्वेन-=वञ्चना=**ठगना, उसमें पण्डितत्व—पण्डित होने से—पण्डित शब्द से भाव में त्वल् प्रत्यय है। **स्वरनैपुण्यम्—**यहाँ स्वर का नैपुण्य—निपुण शब्द से भाव में ष्यञ्=य प्रत्यय होता है । स्वरनैपुण्य का अभिप्राय इच्छानुसार स्वर कर लेना है । तीन हेतुओं से स्वरनैपुण्य का आश्रयण कार्य हो रहा है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । और अनुष्टुप् छन्द है ॥४२॥
[ प्रवेश करके ]
अर्थ--विदूषक--अरे आश्चर्य है ! **प्रदोष=**सन्ध्या-कालीन हवा से यह दीपक, यज्ञीय पशु को बांधने के लिये बने खूंटे के पास ले जाये गये पशु
६६ मृच्छकटिकम्
शकारः—भावे ! भावे ! मणुश्शे मणुश्शे । ( भाव ! भाव ! मनुष्यो मनुष्यः । )
विदूषकः—जुत्तं णेदं, सरिसं णेदं, जं अज्जचारुदत्तस्स दलिद्ददाए सम्पंदं परपुरिसा गेहं पविसन्ति । ( युक्तं नेदम्, सदृशं नेदम्, यदार्यचारुदत्तस्य दरिद्रतया साम्प्रतं परपुरुषा गेहं प्रविशन्ति । )
रद०--अज्ज मित्तेअ ! पेक्ख मे परिहवं । ( आर्य्य ! मैत्रेय ! प्रेक्षस्व मे परिभवम् ? )
विदूषकः—किं तव परिहवो ? आदु अम्हाणं ? ( किं तव परिभवः ? अथवा अस्माकम् ? )
रद०—णं तुम्हाणं ज्जेव । ( ननु युष्माकमेव । )
विदूषकः—किं एसो बलक्कारो ? । ( किमेष बलात्कारः ? । )
रद०—अध इं । ( अथ किम् । )
विदूषकः--सच्चं ? ( सत्यम् ? । )
रद०—सच्चं ? ( सत्यम् । )
विदू०--(सक्रोध दण्डकाष्ठमुद्यम्य) मा दाव । भो ! सके गेहे कुक्कुरोऽवि
के हृदय के समान, फुर फुर कर रहा है । (पास जाकर रदनिका को देख कर) अरी ! रदनिके ।
विमर्श—प्रदोषमन्दमारुतेन = प्रदोष = सायंकालीन मन्द हवा से, पशुबन्धोपनीतस्य--पशुः बध्यते अत्र-इस विग्रह में अधिकरण अर्थ में घञ्=अ प्रत्यय होता है--पशुबन्धः, तत्र उपनीतस्य=बलिप्रदानार्थं बद्धस्य, छागलस्य=बकरे के, फुरफुरायते=फुर-फुर इस प्रकार के अव्यक्त शब्द को कर रहा है, अथवा हिल रहा है।
अर्थ—शकार—भाव ! भाव ! पुरुष है पुरुष ।
विदूषक—यह उचित नहीं है, शोभनीय नहीं है कि आर्य चारुदत्त के दरिद्र होने के कारण इस समय दूसरे लोग घर में घुस रहे हैं ।
रदनिका—आर्य मैत्रेय ! मेरा अपमान तो देखो ।
विदूषक—क्या तेरा अपमान अथवा हम लोगों का ?
रदनिका—हाँ, आप लोंगों का ही ।
विदूषक—क्या यह बलात्कार (बलपूर्वक अपमान) है ?
रदनिका—हाँ, और क्या ।
विदूषक—सच ?
रदनिका—सच ।
विदूषक—(क्रोधपूर्वक लकड़ी का डण्डा उठाकर) ऐसा नहीं (हो सकता) । अरे ! अपने घर में तो कुत्ता भी बहादुर बन जाता है और मैं तो भला
प्रथमोऽङ्कः ६७
दाव चण्डो भोदि, किं उण अहं बम्हणो ! ता एदिणा अम्हादिस-जण-भाअधेअ-कुड़िलेण दण्डकट्ठेण दुट्ठस्स विअ सुक्खाण-वेणुअस्स मत्थअं दे पहारेहिं कुट्टइस्सं । ( मा तावत् । भोः ! स्वके गेहे कुक्कुरोऽपि तावत् चण्डो भवति, किं पुनरहं ब्राह्मणः । तदेतेन अस्मादृश-जन-भागधेय-कुटिलेन दण्डकाष्ठेन दुष्टस्येव शुष्कवेणुकस्य मस्तकं ते प्रहारैः कुट्टयिष्यामि । )
विटः—महाब्राह्मण ! मर्षय मर्षय ।
विदू०—( विटं दृष्ट्वा । ) ण एत्थ एसो अवरज्झदि । ( शकारं दृष्ट्वा ) एसो क्खु एत्थ अवरज्झदि । अरे रे राजसालअ । संट्ठाणअ । दुज्जण । दुम्मणुस्स । जुत्तं णेदं ? जहवि णाम तत्तभवं अज्जचारुदत्तो दलिद्दो संवृत्तो, ता किं तस्स गुणेहिं ण अलङ्किदा उज्जइणी जेण तस्स गेहं पबिसिअ परिअणस्स ईदिसो उवमद्दो करीअदि । ( नात्र एषोऽपराध्यति । एष खल्वत्र अपराध्यति ! अरे रे राजश्यालक ! संस्थानक ! दुर्जन ! दुर्मनुष्य ! युक्तं नेदम् । यद्यपि नाम तत्रभवान् आर्य्यचारुदत्तो दरिद्रः संवृत्तः, तत् किं तस्य गुणैर्नालङ्कृता उज्जयिनी येन तस्य गृहं प्रविश्य परिजनस्य ईदृश उपमर्दः क्रियते । )
ब्राह्मण (पुरुष) हूँ । इस लिये हम लोगों के (टेढ़े) भाग्य के समान टेढ़े इस लकड़ी के डण्डे से प्रहारों के द्वारा, सूखे बाँस के समान दुष्ट तेरे शिर को कूट (तोड़) डालता हूँ ।
विट—महाब्राह्मण ! क्षमा करो । क्षमा करो ।
विदूषक—(विट को देख कर) यहाँ यह अपराध=बलात्कार नहीं कर रहा है । (शकार को देखकर) अरे रे राजश्यालक (राजा के साले) संस्थानक, दुष्ट ! नीच मनुष्य ! यह ठीक नहीं है । यद्यपि आर्य चारुदत्त (इस समय) दरिद्र हो गये हैं, तो तो भी क्या उनके गुणों से उज्जयिनी नगरी अलंकृत नहीं है जो उनके घर में घुसकर परिजन (नोकरानी) को इस प्रकार अपमानित किया जा रहा है ।
विमर्श— चण्ड = शूर, बलशाली । भागधेय- यहाँ 'भागरूपनामभ्यो धेयः, वार्त्तिक से स्वाथिक धेय प्रत्यय है और भाग = भाग्यवाची है । वेणुकस्येव दुष्टस्य ते मस्तकं कुट्टयिष्यामि - यह योजना है । महाब्राह्मण- निकृष्ट ब्राह्मण । नौ शब्दों के साथ 'महत्' शब्द का योग निन्दित अर्थ व्यक्त करता है—
शङ्खे, तैले, तथा मांसे, वैद्ये, ज्योतिषिके, द्विजे ।
यात्रायां, पथि, निद्रायां महच्छब्दो न दीयते ॥
विदूषक निकृष्ट ब्राह्मण होता है । अतः महाब्राह्मण सम्बोधन ठीक है । संस्थानक- यह शकार का नाम है । उपमर्दः- निग्रह, अपमान ।
७ मृ०
६८ | मृच्छकटिकम्
मा दुग्गदोत्ति परिहवो णत्थि कअन्तस्स दुग्गदो णाम ।
चारित्तेण विहीणो अड्ढो विअ दुग्गदो होइ ॥ ४३ ॥( मा दुर्गत इति परिभवो नास्ति कृतान्तस्य दुर्गतो नाम ।
चारित्र्येण विहीन आढ्योऽपि च दुर्गतो भवति ॥ ४३ ॥ )
अन्वयः— (अयं, जनः ), दुर्गतः, 'इति, परिभवः, मा, (कार्षीः ), कृतान्तस्य, (समक्षम्), दुर्गतः, न, अस्ति, नाम, च, चारित्र्येण, विहीनः, आढ्यः, अपि, दुर्गतः, भवति ॥ ४३ ॥
शब्दार्थ— (अयं जनः=यह व्यक्ति), दुर्गतः=दरिद्र (है), इति=इसलिये, परिभवः=अपमान, मा=मत, (कार्षीः=करो); कृतान्तस्य=यमराज के (समक्षम्=सामने) दुर्गतः=दरिद्र, न=नहीं, अस्ति=है, नाम च=प्रत्युत, चारित्र्येण=सदाचरण से, विहीनः=रहित, आढ्यः=धनी, अपि=भी, दुर्गतः=दरिद्र, भवति=होता है ॥४३॥
अर्थ— (यह) दरिद्र है इसलिये (किसी का) अपमान मत करो, क्योंकि यमराज के सामने कोई दरिद्र नहीं है। धनी भी चरित्र से विहीन निर्धन ही होता है। अतः दरिद्र समझ कर चारुदत्त अथवा उसके सम्बन्धियों का अपमान करना अनुचित है ॥ ४३ ॥
टीका— (अयम्) दुर्गतः=दुखं प्राप्तः दरिद्रः, इति=हेतोः, (तस्य) परिभवः=अवमानना, मा=नैव, (कार्षीः) हि, कृतान्तस्य=यमराजस्य, (समक्षम्) दुर्गतः=दरिद्रः, न=नैव, अस्ति=भवति, नाम, इदं सम्भावनायाम् । यमस्य समक्षम् निश्चयेन कश्चिदपि दरिद्रो धनी वा न भवति । चारित्र्येण=सदाचारेण, शास्त्र-सम्मताचारेण, विहीनः=रहितः, आढ्यः=धनवान्, अपि दुर्गतः=दरिद्रो, भवति=वर्तते। एवञ्च धनेन अस्य धनिकत्वं नैव द्रष्टव्यम्, प्रत्युत शिष्टाचारेणेति भावः। प्रथमवाक्यार्थस्य द्वितीयवाक्यार्थेन समर्थनात् काव्यलिङ्गम् । अप्रस्तुतप्रशंसा चेत्यनयोः संसृष्टिः। गाथा छन्दः । तल्लक्षणम्—
विषमाक्षरपादत्वात्, पादौ रसमञ्जस धर्मवत् ।
यश्छन्दसि नोक्तमत्र, गायेति तत् कथितं सूरिभिः ॥४३॥
विमर्श— दुर्गतः—दुर्=कष्टं गतः=प्राप्तः अर्थात् दरिद्रः । परिभवः=तिरस्कार । चारित्र्येण—चरित्र शब्द से स्वार्थिक ष्यञ् प्रत्यय हैं अतः चरित्र, चारित्र और चारित्र्य सभी समानार्थक ही हैं । कृतान्तः=कृतः अन्तः येन सः—सभी का अन्त करनेवाला यमराज । इसमें काव्यलिङ्ग और अप्रस्तुतप्रशंसा की निरपेक्षरूपेण स्थिति होने से संसृष्टि है। गाथा छन्द है। लक्षण संस्कृत टीका में देखिये ॥४२॥
प्रथमोऽङ्कः ६६
विटः—( सवैलक्ष्यम् ) महाब्राह्मण ! मर्षय मर्षय । अन्यजनशङ्कया खल्विदमनुष्ठितम्, न दर्पात् । पश्य—
सकामाऽन्विष्यतेऽस्माभिः.............
विदू०—किं इमं ? । ( किमियम् ? )
विटः—शान्तं पापम् ।
..................काचित् स्वाधीनयौवना ।
सा नष्टा शङ्कया तस्याः प्राप्तेयं शीलवञ्चना ॥ ४४ ॥
अर्थ—विट—( लज्जा के साथ ) महाब्राह्मण ! क्षमा करो, क्षमा करो । किसी अन्य व्यक्ति ( वसन्तसेना ) की शंका से यह हो गया, न कि घमण्ड से । देखो—
हम लोग एक कामिनी ( वेश्या ) की खोज कर रहे हैं········· ।
विदूषक—क्या इस की ?
विट—अनिष्ट शान्त हो !
**अन्वयः—**स्वाधीनयौवना, सकामा, काचित्, अस्माभिः, अन्विष्यते, (किन्तु), सा, नष्टा, तस्याः, शङ्कया, इयम्, शीलवञ्चना, प्राप्ता ॥ ४४ ॥
**शब्दार्थ—**स्वाधीनयौवना=अपनी जवानी पर अधिकार रखने वाली, सकामा=कामवासनायुक्त, काचित्=कोई ( वसन्तसेना ), अस्माभिः=हम लोगों-द्वारा, अन्विष्यते=खोजी जा रही है ( किन्तु ) सा=वह ( वसन्तसेना ), नष्टा=गायब हो गई है, यस्याः=उसी स्त्री की शङ्कया=भ्रम से, इयम्=यह (रदनिका का केशग्रहणरूपी) शीलवञ्चना=सदाचार का उल्लङ्घन, प्राप्ता=हो गया ॥ ४४ ॥
**अर्थ—**अपनी जवानी की मालकिन कामातुर किसी ( वेश्या ) की खोज हम लोग कर रहे हैं, परन्तु वह तो गायब ( अदृश्य ) हो गई, उसी के भ्रम के कारण यह शिष्टाचार की हानि ( उल्लङ्घन ) हो गई ( अर्थात् चारुदत्त की निर्धनता के कारण ऐसा अपराध नहीं हुआ है ) ॥ ४४ ॥
**टीका—**स्वाधीनम्=स्वायत्तम्, यौवनम्=युवावस्था यस्याः सा, स्वेच्छया यौवनोपभोगसमर्थेति भावः, सकामा=कामातुरा, काचित्=कापि, वेश्या, वसन्त-सेनेत्यर्थः, अस्माभिः=शकारादिभिः अन्विष्यते=अनुसन्धीयते, किन्तु सा=स्त्री, वसन्तसेना, नष्टा=अदृष्टा, तस्याः=अदृष्टरमण्याः, वेश्यायाः, शङ्कया=भ्रमात्, इयम्=साम्प्रतं रदनिकया सह घटिता, शीलवञ्चना=शिष्टाचारस्य प्रतारणा, परस्त्रीस्पर्शः इत्यर्थः, प्राप्ता=सञ्जाता, अस्माभिरिदमत्रापि योजनीयम् । एवञ्च चारुदत्तस्य दारिद्र्यं नात्र हेतुः, किन्तु वेश्याभ्रम एवेति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ४४ ॥
| १०० | मृच्छकटिकम् |
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सर्वथा इदमदुनयसर्वस्वं गृह्यताम् । (इति खड्गमुत्सृज्य कृताञ्जलिः पादयोः पतति ।)
**विदू०—**सप्पुरिस । उट्ठेहि उट्ठेहि । अआणन्तेण मए तुमं उवालद्धे, सम्पद्ं उण जाणन्तो अणुणेमि । (सत्पुरुष ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ । अजानता मया त्वमुपालब्धः, साम्प्रतं पुनर्जानन् अनुनयामि ।)
**विटः—**ननु भवानेवात्रानुनयेः । तदुत्तिष्ठामि समयतः ।
**विदू०—**भणादु भवं (भणतु भवान् ।)
**विटः—**यदीमं वृत्तान्तमार्यचारुदत्तस्य नाख्यास्यसि ।
**विदू०—**ण कधइस्सं । (न कथयिष्यामि ।)
**विटः—**एष ते प्रणयो विप्र ! शिरसा धार्यते मया ।
गुणशस्त्रैर्वयं येन शस्त्रवन्तोऽपि निर्जिताः ॥ ४५ ॥
**विमर्श—**यहाँ सकामा तथा स्वाधीनयौवना इन दो विशेषणों से वेश्या की प्रतीति हो जाती है। सकामा=कामेन=मदनावेगेन सहिता सकामा=कामातुरा। स्वाधीनयौवना=स्व अपने ही (न कि पति आदि किसी अन्य के) अधीन है यौवन=यौवन का प्रभाव जिसके वह। नष्टा—√णश् अदर्शने धातु का निष्ठा-क्त प्रत्यय के साथ रूप है। इसलिये इसका अर्थ हैं—अदृष्टा। शीलवञ्चना=शील=शिष्टचार की वञ्चना=प्रतारणा, हानि, उल्लंघन। पथ्यावक्त्र छन्द है। लक्षण—
युजोर्जेन सरिद्भर्तुः पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ॥ ४४ ॥
**अर्थ—**किसी अपने यौवन की स्वामिनी (खोज कर रहें।) किन्तु वह अदृश्य हो गयी, उसी के भ्रम के कारण (रदनिका का केश ग्रहण रूपी) शिष्टाचारो-ल्लंघन हो गया ॥ ४४ ॥
सब प्रकार से बड़ी मेरी बिनती को मान लें। (ऐसा कह कर तलवार छोड़-कर, हाथ जोड़ कर पैरों पर गिर जाता है।)
**अर्थ—विदूषक—**हे सदाचारी पुरुष ! उठो, उठो। बिना जाने हुये ही मैंने तुम्हारी निन्दा कर डाली, (उलाहना दे डाला), अब जान लेने पर तो मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ।
**विट—**इस विषय में तो आप ही प्रार्थना के पात्र हैं। तो एक शर्त पर उठ सकता हूँ।
**विदूषक—**आप कहिये।
**विट—**यदि यह घटना आर्य चारुदत्त से नहीं कहोगे (तो मैं उठता हूँ)।
**विदूषक—**नहीं कहूँगा।
**अन्वयः—**हे विप्र ! एषः, ते, प्रणयः, मया, शिरसा, धार्यते, येन, शस्त्रवन्तः अपि, वयम्, गुणशस्त्रैः, निर्जिताः ॥ ४५ ॥