भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

८० | मृच्छकटिकम्

शकारः—

अह्मेहि चण्डं अहिशालिअन्ती वण्णे शिआली विअ कुक्कुलेहिं ।
पलाशि शिग्घं तुलिदं शवेगं शवेण्टणं मे हलअं हलन्ती ॥२८॥
(अस्माभिश्चण्डमभिसार्यमाणा वने शृगालीव कुक्कुरैः ।
पलायसे शीघ्रं त्वरितं संवेगं सवृन्तं मे हृदयं हरन्ती ॥ २८ ॥

व्यग्रा सती धावित्वा रक्षां करोति तथैव वसन्तसेना त्वमपि धावित्वाऽत्मानं व्यर्थमेव रक्षसि। अत्र वतिप्रत्ययाश्रितां तद्धितोपमा, वसन्तसेनायां नगरदेवतात्वोत्प्रेक्षणाद् उत्प्रेक्षेति बोध्यम्। वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥२७॥

विमर्श—ताराविचित्ररुचिरम्=तारागणों के समान आश्चर्यजनकरूप से चमकनेवाली, अथवा मुक्ता आदि लगी होने से अद्भुत और मनोहर। निर्मथित-चूर्णमनः शिलेन—यह 'वकत्रेण' का विशेषण है। इसमें निर्मथित शब्द के अनेक अर्थ करके तात्पर्य निकाले जाते हैं—(१) निर्मथित=तिरस्कृत कर दिया है चूर्ण मनः शिला को जिसने, (२) निर्मथित=किसी अन्य पदार्थ में मथी गई=घोट कर मिलाई गई चूर्णीभूत मनः शिला के समान, (३) निर्मथित=लेप की गई है चूर्णमनः-शिला जिसमें, वैसे। यहाँ वसन्तसेना के क्रोधातिशय और सौन्दर्यातिशय का वर्णन है। अतः इन अर्थों की संगति सम्भव है। क्रोध मानने पर लाल और सौन्दर्य मानने पर गुलाबी मुख—यह योजना होती है। त्रस्तादद्भुतम्-इसे एक पद मानकर क्रियाविशेषण लिखा गया है। परन्तु त्रस्ता और अद्भुतम् ये दो पद मानकर अर्थयोजना अधिक संगत है। नगरदैवतवत्—देव एव देवता, स्वार्थ में तल् प्रत्यय, देवता एव दैवतम् यहाँ 'प्रज्ञादिभ्यश्च' [ सूत्र ] से स्वार्थिक अण् प्रत्यय होता है। जिस प्रकार नगर पर आयी हुई विपत्ति के समय उसकी रक्षा के लिये नगररक्षक देवता दौड़ने लगती है उसी प्रकार वसन्त-सेना दौड़ रही है। यहाँ वति प्रत्यय मानकर उपमा है। यदि वसन्तसेना में देवतात्व की उत्प्रेक्षा करें तो उत्प्रेक्षा अलंकार भी है। वसन्ततिलका छन्द है ॥ २७ ॥

**अन्वयः—**वने, कुक्कुरैः, (अभिसार्यमाणा) शृगाली, इव, (अत्र), अस्माभिः, चण्डम्, अभिसार्यमाणा, (त्वम्), मम, हृदयम्, सवृन्तम्, हरन्ती, शीघ्रम्, त्वरितम्, संवेगम्, पलायसे ॥ २८ ॥

**शब्दार्थ—**वने=जंगल में, कुक्कुरैः=कुत्तों द्वारा, (अभिसार्यमाणा=पीछा की जाती हुई), शृगाली इव=शृगाली के समान, (अत्र=यहाँ), अस्माभिः=हम लोगों द्वारा, चण्डम्=भीषणरूप से, अभिसार्यमाणा=पीछा की जाती हुई, (त्वम्=तुम), मम=मेरे (शकार के), हृदयम्=हृदय को, सवृन्तम्=मूल के सहित, हरन्ती=ले जाती हुई, शीघ्रम्, त्वरितम्, संवेगं=बहुत शीघ्रतापूर्वक, पलायसे=भाग रही हो ॥ २८ ॥