भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ६६

विटः—भवति वसन्तसेने !

किं त्वं कटीतटनिवेशितमुद्वहन्ती ताराविचित्ररुचिरं रशनाकलापम्।
वक्त्रेण निर्मथितचूर्णमनः शिलेन त्रस्ताऽद्भुतं नगरदैवतवत् प्रयासि ॥२७॥

एओकारौ हलन्तस्थौ शुद्धौ वाप्यपदान्वितौ।
दीर्घात् परौ लघू स्यातां छन्दोविचितभाषया ॥

पूर्वार्द्ध वाक्य द्वारा जो अर्थ कहा गया है उसकी सिद्धि उत्तरार्द्ध वाक्य से की जा रही है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है।॥ २६ ॥

अन्वयः—कटी-तट-निवेशितम्, तारा-विचित्ररुचिरम्, रशना-कलापम्, उद्वहन्ती, निर्मथितचूर्ण-मनःशिलेन, वक्त्रेण, (उपलक्षिता सती) त्रस्ता, त्वम्, नगरदैवतवत्, अद्भुतम्, किम्, प्रयासि ॥ २७ ॥

शब्दार्थ—कटीतटनिवेशितम्=कमर में बांधी हुई, ताराविचित्ररुचिरम्=तारों के तुल्य अथवा मोतियों से अद्भुत एवं मनोहर, रशनाकलापम्=करधनी को, उद्वहन्ती=धारण करती हुई, निर्मथित-चूर्णमनः शिलेन=चूर्ण किये गये मनःशिल (लालवर्ण के पत्थर-विशेष) को तिरस्कृत कर देने वाले (अर्थात् उससे भी अधिक लाल), वक्त्रेण=मुख से, (उपलक्षिता सती=उपलक्षित होती हुई), त्रस्ता=भयभीत, (त्वम्=तुम) नगरदैवतवत्=नगर-रक्षक देवता के समान अद्भुतम्=आश्चर्यजनक रूप से, किम्=क्यों, प्रयासि=भागी जा रही हो ॥ २७ ॥

अर्थ विट—आदरणीय वसन्तसेने !

कमर में बन्धी हुई, ताराओं के समान अथवा मोतियों से अद्भुत और मनोहर करधनी को धारण करती हुई, (अपने मुख की लालिमा द्वारा) चूर्ण किये गये मेनसिल की लालिमा को तिरस्कृत करने वाले मुख से युक्त (अर्थात् क्रोध के कारण अत्यन्त लाल मुख वाली अथवा मैनसिल को लगाने से लाल=गुलाबी रंग के मुखवाली), डरी हुई तुम नगररक्षक देवता के समान, आश्चर्यजनक रूप से क्यों भागी जा रही हो ॥ २७ ॥

टीका— कटीतटनिवेशितम्=श्रोणिप्रदेशे उपनिबद्धम्, ताराविचित्र-रुचिरम्=ताराभिः=तारागणैः इव विचित्रं मुक्ताभिर्वा विचित्रम्, मनोहरञ्च, रशनाकलापम्=मेखलाख्यभूषण-विशेषम्, उद्वहन्ती=धारयन्ती, निर्मथित-चूर्ण-मनः शिलेन=निर्मथिता=तिरस्कृता चूर्ण-मनः शिला येन तादृशेन, यद्वा निर्मंथिता चूर्णशिला यंत्र तेन, यद्वा निर्मथित-चूर्णमनः शिलातुल्येन, वक्त्रेण=मुखेन, (उपलक्षिता सती) त्रस्ता=भयभीता, भयवशात् मुखस्य विवर्णता सञ्जातेति भावः, त्वम् = वसन्तसेना, नगर-दैवतवत्=नगररक्षक-देवता-तुल्यम् अद्भुतम्=आश्चर्यकरम्, किम्=किमर्थम्, प्रयासि=प्रधावसि । यत्र नगरे जायमानं भाविनं वानिष्टं विलोक्य नगर-रक्षकदेवता