मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः १५१
अथवा किमयं तपस्वी करिष्यति । यो हि—
पादेनैकेन गगने द्वितीयेन च भूतले ।
तिष्ठाम्युल्लम्बितस्तावद् यावत्तिष्ठति भास्करः ॥ ११ ॥
शब्दार्थ— अयम्=यह (मेरा), पटः=कपड़ा, सूत्रदरिद्रताम्=सूतों की जीर्णता को, गतः=प्राप्त हो चुका है, अयम्=यह, पटः=कपड़ा, छिद्रशतैः=सैकड़ों छेदों से, अलङ्कृतः=सजा हुआ, युक्त है, अयं पटः = यह कपड़ा, प्रावरितुम्=शरीर ढकने के लिये, न शक्यते=नहीं सम्भव है, अयं पटः=यह कपड़ा, हि=निश्चितरूप से, संवृतः= लपेटा, घरी किया हुआ, एव=ही, शोभते=अच्छा लगता है ॥ १० ॥
अर्थ — यह कपड़ा (मेरा दुपट्टा) जीर्ण शीर्ण सूतों वाला हो चुका है। यह कपड़ा सैकड़ों छिद्रों से युक्त है। यह कपड़ा (शरीर) ढकने में समर्थ नहीं है। यह कपड़ा, निश्चित रूप से, लपेटा हुआ ही अच्छा लगता है ॥ १० ॥
टीका— अयम् = हस्तस्थितः, मदीयः, पटः = उत्तरीयम्, सूत्रदरिद्रताम् = सूत्राणाम्=तन्तूनाम्, दरिद्रताम्=जीर्णताम्, गतः=प्राप्तः, अतीव जीर्णोऽभवदिति भावः, अयं पटः=इदमूत्तरीयम्, हि=निश्चयेन, छिद्रशतैः=शताधिकविवरैः, अलङ्कृतः= विभूषितः, युक्तः, अगणितछिद्रयुक्तः इति भावः, अयं पटः = इदमूत्तरीयम्, प्रावरितुम् = आच्छादयितुम्, न=नैव, शक्यते=समर्थ्यते, अयं पट = इदमूत्तरीयम्, संवृतः = परिवेष्टितः, एव, हि = निश्चयेन, शोभते = भाति । अत्र 'अयं पटः' इत्यस्यावृत्त्या अनवीकृतत्वदोषः । वंशस्थबिलं वृत्तम् ॥ १० ॥
विमर्श — प्रावरितुम् — प्र+आङ् + √वृ + तुमुन् ।
संवृतः— सम् + √वृ + क्त । इसमें 'अयं पटः' का चार बार प्रयोग होने से अनवीकृतत्वदोष है। साधारणपात्र का कथन होने से चिन्तनीय नहीं है। इसमें वंशस्थबिल छन्द है । लक्षण— 'जतो तु वंशस्थबिलं जतौ जरौ' ॥ १० ॥
अन्वयः— एकेन, पादेन, गगने, द्वितीयेन, च, भूतले, उल्लम्बितः, तावद्, तिष्ठामि, यावत्, भास्करः, तिष्ठति ॥ ११ ॥
शब्दार्थ— एकेन = एक, पादेन = पैर से, गगने = आकाश में च = और, द्वितीयेन=दूसरे से, भूतले=पृथ्वी पर, उल्लम्बितः=ऊपर लटका हुआ, तावत्=तब तक, तिष्ठामि=रह सकता हूँ, यावत्=जब तक, भास्करः=सूरज, तिष्ठति=[आकाश में लटका] रहता है ॥ ११ ॥
अर्थ— अथवा यह बेचारा (तुच्छ) माथुर मेरा क्या कर सकता है जो मैं— एक पैर से आकाश में [अर्थात् ऊपर करके] और दूसरे से पृथ्वी पर [अर्थात् नीचे करके] तब तक लटका हुआ रह सकता हूँ जब तक कि आकाश में सूरज (लटकता हुआ) रहता है ॥ ११ ॥
टीका— यो अहम्=दर्दुरकः-इति गद्यस्थेनान्वयः—एकेन पादेन=चरणेन,