मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० मृच्छकटिकम्
( अग्रतोऽवलोक्य ) अयमस्माकं पूर्वसभिको माथुर इत एवाभिवर्त्तते । भवतु, अपक्रमितुं न शक्यते । तदवगुण्ठयाम्यात्मानम् । ( बहुविधं नाट्यं कृत्वा स्थितः । उत्तरीय निरीक्ष्य )
अयं पटः सूत्रदरिद्रतां गतो ह्ययं पटश्छिद्रशतैरलङ्कृतः । अयं पटः प्रावरितुं न शक्यते ह्ययं पटः संवृत एव शोभते ॥ १० ॥
नामक खास चाल से ( हारने के कारण ) दिखाई गयी रास्ता वाला, कटेन=पूरा नामक चाल से, विनिपातितः=गिराया गया, ( मैं ), यामि=जा रहा हूँ ॥ ६ ॥
अर्थ— और भी,
तीया ( नाम की एक खास चाल ) से जिसका सारा धन हरण हो गया, दुआ ( नाम की खास चाल ) के चलने=गिरने से जिसका सारा शरीर सूखा = सुन्न=निश्चेष्ट हो गया, नक्का ( नाम की चाल ) से ( हारने के कारण भागने के लिये जिसे) रास्ता दिखा दिया गया, और पूरा (नामक चाल) से जो गिरा दिया गया, वैसा मैं ( दुःखी ) जा रहा हूँ ॥ ६ ॥
टीका— त्रेताहृत-सर्वस्वः त्रेताख्य-क्रीडा-प्रकार-विशेषेण 'तीया' इति प्रसिद्धेन, हृतम्=गतम् सर्वस्वम् = निखिलं धनं यस्य सः, पावरपतनात् = पावरस्य 'दुआ' इति प्रसिद्धस्य क्रीडनप्रकारस्य, पतनात् = भ्रंशात्, शोषित-शरीरः = शोषितम्=शुष्कताम् = निश्चेष्टतां नीतम्, शरीरम्=देहो यस्य सः तादृशः, नर्दित-दर्शितमार्गः = 'नक्का' इति क्रीडन-प्रकारेण पराजितत्वात् गृहगमनाय दर्शितः=प्रदर्शितः, मार्गः = पन्थाः, यस्य सः, कटेन = 'पूरा' इति ख्यातेन क्रीडनप्रकारेण, विनिपातितः = पराजयात् भूमौ प्रपातितः, यामि = असहायो भूत्वा व्रजामि । प्राचीनकाले द्यूतक्रीडायां त्रेता-पावर-नर्दित-कट-शब्दाः प्रचलिता आसन् तेषां कृतेऽधुना तीया-दुआ-नक्का-पूरा-शब्दाः प्रयुज्यन्ते । आर्यावृत्तम् ॥ ९ ॥
विमर्श— द्यूतक्रीडा में प्रयुक्त होने वाले चार पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग इसमें किया गया—( १ ) त्रेता=तीया ( आजकल तीन, सात, ग्यारह, पन्द्रह ) ( २ ) पावर=दुआ ( दो, छह, दश चौदह वगैरह ) ( ३ ) नर्दित=नक्का ( एक पाँच नौ तेरह ) ( ४ ) कट=पूरा ( चार, आठ, बारह, सोलह ) । इन चारों दावों ने उसे धोखा दिया है, यह उसका भाव है । इसमें आर्या छन्द है ॥ ६ ॥
अर्थ— ( आगे देखकर ) यह हमारा पुराना द्यूत-क्रीडाध्यक्ष माथुर इधर ही आ रहा है । अच्छा, भागना तो सम्भव नहीं है । अतः अपने को छिपा लेता हूँ । ( कई प्रकार से शरीर को ढकने का अभिनय करके खड़ा होता है । उस उत्तरीय वस्त्र को देखकर— )
अन्वयः— अयम्, पटः, सूत्रदरिद्रताम्, गतः, अयम्, पटः, छिद्रशतैः, अलङ्कृतः, अयम्, पटः, प्रावरितुम्, न, शक्यते, अयम्, पटः, संवृतः, एव, शोभते ॥१०॥