भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

द्वितीयोऽङ्कः १५३


शब्दार्थः-—यः= जो पुरुष [ अहम् इव = मेरे समान ], समुल्लम्बितः=ऊपर लटका हुआ, आनतशिराः=शिर को नीचे झुकाये हुये, दिवसान्तम्=दिन के अन्त=सायंकाल तक, स्तब्धम्=निश्चल रूप से, न=नहीं, आस्ते=रह सकता है, यस्य=जिसकी, पृष्ठे=पीठ पर, उद्घर्षणलोष्ठकैः=नुकीले ढेलों से, अपि=भी, किणः=चिह्न=ढट्ठा, न=नहीं, जातः=बना है, च=और, यस्य=जिसके, जंघान्तरम्=जाँघों के भीतरी भाग [ के मांस ] को, कुक्कुरैः=कुत्ते, अहरहः=रोज, न=नहीं, चर्व्यते=चबाते हैं, काटते हैं, अत्यायतकोमलस्य=बहुत अधिक कोमल, तस्य=उस व्यक्ति का, सततम्=निरन्तर, द्यूतप्रसङ्गेन=जुआ खेलने से, किम्=क्या लाभ ? अर्थात् जो मेरे समान ऐसा नहीं है उसे जुआ नहीं खेलना चाहिये ।। १२ ।।

अर्थ-—[ मेरे समान ] जो व्यक्ति ऊपर लटका हुआ नीचे शिरवाला होते हुये सायंकाल तक अर्थात् दिन भर निश्चल रूप से नहीं रह सकता है। जिसकी पीठ पर [हारा हुआ धनादि न देने के कारण] सदैव नुकीले ढेलों [ पर घसीटने ] के कारण चिह्न=ढट्ठे नहीं पड़े हैं। और [ हार कर या जीत कर भागते समय ] जिसकी जांघों के मध्य भाग [ के मांस ] को रोज कुत्ते नहीं चबाते हैं, ऐसे अत्यन्त कोमल [ शरीर वाले ] व्यक्ति को रोज जुआ खेलने से क्या लाभ ? [ अर्थात् मेरे समान जो उक्त स्थितियों को सह सकता है उसे ही जुआ खेलना चाहिये न कि सरल कोमल पुरुष को ] ।। १२ ।।

टीका-—यः=जनः, ( अहम् इव=दर्दुरक इव ), समुल्लम्बितः=ऊर्ध्वभागादधो-देशे लम्बमानः, अत एव, आनतशिराः=आनतम्=अधःकृतम्, शिरः=मस्तकम् यस्य सः तादृशः, अधोमुख इत्यर्थः, सन्, दिवसान्तम्=दिवसस्यान्तम्=सायङ्कालं यावत्, स्तब्धम्=निश्चलं यथा स्यात् तथा, न आस्ते=स्थातुं न शक्नोतीति भावः, यस्य=जनस्य, मम, इव, पृष्ठे=पृष्ठभागे, उद्घर्षणलोष्ठकैः=उद्घृष्यते एभिरिति ( करणे घञ् ) उद्घर्षणानि, तानि च=लोष्टकानि=इष्टिकादिखण्डानि, तैः, 'ढेला' इति नाम्ना हिन्द्यां प्रसिद्धैरिति भावः सदा=प्रतिदिनम्, किणः=घर्षणादिचिह्नम्, न=नैव, जातः=समुत्पन्नः, पराजितत्वात् धनादि-प्रतिदानेऽसमर्थतया सभिकादिभिःकृतेन घर्षणेन यस्य पृष्ठं किणाङ्कितं न जातमिति भावः, यस्य=जनस्य, च मम इव, एतत्, इदम्, जङ्घान्तरम् = जघनमध्यदेशः, कुक्कुरैः = श्वभिः, अहरहः=प्रतिदिनम्, न=नैव, चर्व्यते=भक्ष्यते, तस्य=पुरोवर्त्तिसंवाहकस्य, अत्यायतकोमलस्य=अतिशयकोमलस्य, यद्वा, अत्यायतः=विपुलशरीरश्चासौ, कोमलश्च, तस्य, सततम्=निरन्तरम्, द्यूतप्रसङ्गेन=द्यूतक्रीडानुरागेण, किम्=न किमपि प्रयोजनम् । एवञ्च संवाहकेन द्यूतं न क्रीडितव्यम् । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालंकारः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। १२ ।।

विमर्श-स्तब्धम्—√ स्तभ् + क्त । समुल्लम्बितः—सम् + उत् + लम्ब् +

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक) · पृष्ठ 241, कुल 760 में से · BharatKosha