भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१५४ मृच्छकटिकम्

भवतु, माथुरं तावत् सान्त्वयामि । ( उपगम्य ) माथुर ! अभिवादये।
( माथुरः प्रत्यभिवादयते । )
दर्दुरकः—किमेतत् ? ।
माथुरः—अअं दशसुवण्णं घालेदि । ( अयं दशसुवर्णं धारयति । )
दर्दुरकः—ननु कल्पवर्त्तमेतत् ।
माथुरः—(दर्दुरस्य कक्षतल-लुण्ठीकृतं पटमाकृष्य ) भट्टा ! पश्शत पश्शत-
जज्जरपडप्पावुदो अअं पुलिसो दससुवण्णं कल्लवत्तं भणादि । ( भर्तारः !
पश्यत पश्यत, जर्जरपटप्रावृतोऽयं पुरुषो दशसुवर्णं कल्पवर्त्तं भणति । )
दर्दुरकः—अरे मूर्ख ! नन्वहं दशसुवर्णान् कटकराणेन प्रयच्छामि । तत्,
किं यस्यास्ति धनम्, स किं क्रोडे कृत्वा दर्शयति ? । अरे—

दुर्वर्णोऽसि विनष्टोऽसि दशस्वर्णस्य कारणात् ।
पञ्चेन्द्रियसमायुक्तो नरो व्यापाद्यते त्वया ॥ १३ ॥


क्त । अत्यायतकोमलस्य=अत्यन्तकोमलस्य, अथवा, अत्यायतः=विपुलशरीरः चासौ, कोमलश्च=मृदुश्च, तस्य । द्यूतप्रसङ्गेन किम्—दर्दुरक का तात्पर्य यह है कि जो मेरे समान कष्ट नहीं सह सकता ऐसे व्यक्ति को जुआ नहीं खेलना चाहिये। बेचारा संवाहक तो फंस गया है। यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । लक्षण—सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ १२॥

**अर्थ—**अच्छा, तो माथुर को राजी करता हूँ, ( मनाता हूँ )। ( समीप जाकर ) माथुर ! आपको प्रणाम करता हूँ ।

( माथुर प्रतिनमस्कार करता है । )

**दर्दुरक—**यह क्या ( कर रहे हो ) ?
**माथुर—**इस पर मेरे दश सुवर्ण ( खण्ड ) उधार हैं ।
**दर्दुरक—**अरे, इतना धन तो कलेवा ( के समान तुच्छ ) है ।
माथुर—( दर्दुरक के कांख=कक्ष में लपेट कर रखे हुये कपड़े को खींच कर ) सज्जनों ! देखो, देखो, फटे कपड़े से लिपटा ( आवृत ) यह आदमी सोने के दश सिक्कों को कलेवा के समान तुच्छ कहता है ।
**दर्दुरक—**अरे मूर्ख ! दश स्वर्ण सिक्के तो मैं एक कट ( दाँव ) से ही दे सकता हूँ । तो क्या, जिसके पास धन रहता है वह उसे गोद में लेकर दिखाता फिरता है ।

**अन्वयः—**अरे ! ( इति गद्यस्थम् ), त्वम्, दुर्वर्णः, असि, विनष्टः, असि, यत्, त्वया, दशस्वर्णस्य, कारणात्, पञ्चेन्द्रियसमायुक्तः, नरः, व्यापाद्यते ॥ १३ ॥

**शब्दार्थ—**अरे !=अरे !, त्वम्, दुर्वर्णः = निम्नवर्णवाले वर्णाधम, असि = हो, विनष्टः = पतित, असि = हो, यत् = जो कि, त्वया, = तुम्हारे द्वारा,