भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः १५७

दर्दुरकः—मूर्ख ! परोक्षे खलीकर्त्तुं शक्यते, न ममाग्रतः खलीकर्तुम्। (माथुरः संवाहकमाकृष्य घोणायां मुष्टिप्रहारं ददाति। संवाहकः सशोणितं मूर्च्छां नाटयन् भूमौ पतति। दर्दुरक उपसृत्य अन्तरयति। माथुरो दर्दुरकं ताडयति। दर्दुरको विप्रतीपं ताडयति।)

माथुरः—अले अले दुट्ट ! छिण्णालिआपूत्तअ ! फलं पि पाविहिसि। (अरे अरे दुष्ट ! पुंश्चलीपुत्रक ! फलमपि प्राप्स्यसि।)

दर्दुरकः—अरे मूर्ख ! अहं त्वया मार्गगत एव ताडितः; श्वो यदि राजकुले ताडयिष्यसि, तदा द्रक्ष्यसि।


संकेतम्, एवमेव = अनेनैव प्रकारेण ऋणं दत्त्वा हानिलाभौ परित्यज्येति भावः, आसेवितम् = क्रीडितम्।

विमर्श—भर्त्तः । (प्राकृतभट्टा) यह माथुर का व्यङ्ग्यभरा सम्बोधन है। अस्य = यहाँ सम्बन्धसामान्य मानकर षष्ठी है। अहमपि नाम माथुरो धूर्तः द्यूतं मिथ्याऽऽदर्शयामि ?—इसमें काकु का प्रयोग है। माथुर का यह तात्पर्य है कि मैं भी परमधूर्त जुआरी माथुर हूँ, बिना किसी लाभ के जुआ की प्रदर्शनी नहीं करता हूँ। कुछ लोगों ने दो वाक्यखण्ड माने हैं। और ‘जुआ को छल से खेलता हूँ’ तथा कुछ ने ‘अपने को व्यर्थ प्रधान माने फिरता हूँ’—यह अर्थ किया है। परन्तु ये परम्पराप्राप्त नहीं हैं। इस विषय में काले द्वारा उद्धृत वक्तव्य ध्यान देने योग्य है— “श्रीनिवासाचार्य—अहमपि नाम माथुरो धूर्तो द्यूतं मिथ्याऽऽदर्शयामिति काकुः। पणमप्रतियातितं त्यजन् हि द्यूतमेव वितथयति। नाहमेवं द्यूतस्य व्यपदेशं दूषयामीत्यर्थः। नेदं धनस्पृहया पीडनम्, किं तर्हि ? द्यूतधर्मरक्षार्थमिति भावः।” खण्डितवृत्त—जुआ में जो नियम निर्धारित हैं, उनका पालन न करने वाला।

अर्थ—दर्दुरक—मूर्ख ! मेरे पीठ पीछे (न होने पर) ही सता सकते हो। मेरे सामने नहीं सता सकते हो।

(माथुर संवाहक को खींच कर उसकी नाक पर घूंसा जमाता है। संवाहक खून से लथपथ होकर मूर्च्छा (बेहोशी) का अभिनय करता हुआ पृथ्वी पर गिर जाता है। दर्दुरक समीप पहुँच कर बीच-बचाव कर देता है, दोनों को अलग-२ कर देता है। माथुर दर्दुरक को (भी) पीटने लगता है। दर्दुरक भी जवाब में पीटने लगता है।)

माथुर—अरे अरे दुष्ट ! पुंश्चली=छिनार के बच्चे ! इसका मजा चखोगे (फल भी पाओगे)।

दर्दुरक—अरे मूर्ख ! तुमने सड़क पर जाते हुये (निरपराध) मुझे पीटा है। कल यदि राजदरवार में पीटोगे, तब देखना (उसका फल भोगना)।