मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३५८ | मृच्छकटिकम् |
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माथुरः— एसु पेक्खिस्सं । ( एष प्रेक्षिष्ये । ) दर्दुरकः— कथं द्रक्ष्यसि ? । माथुरः— (प्रसार्य चक्षुषी) एव्वं पेक्खिस्सं । ( एवं प्रेक्षिष्ये । ) ( दर्दुरको माथुरस्य पांशुना चक्षुषी पूरयित्वा संवाहकस्य अपक्रमितुं संज्ञां ददाति । माथुरोऽक्षिणी निगृह्य भूमौ पतति । संवाहकोऽपक्रामति । ) दर्दुरकः— ( स्वगतम् ) प्रधानसभिको माथुरो मया विरोधितः । तन्नात्र युज्यते स्थातुम् । कथितञ्च मम प्रियवयस्येन शर्विलकेन, यथा किल, 'आर्यकनामा गोपालदारकः सिद्धादेशेन समादिष्टो राजा भविष्यति इति सर्वश्च अस्मद्विधो जनस्तमनुसरति' । तदहमपि तत्समीपमेव गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । ) संवाहकः— (सत्रासं परिक्रम्य दृष्ट्वा) एशे कस्सवि अणपावुदपक्खदुवालके गेहे । ता एत्थ पविशिश्शं । ( प्रवेशं रूपयित्वा वसन्तसेनामालोक्य ) अज्जे !
माथुर— मैं देख लूँगा । दर्दुरक— किस प्रकार देखोगे ? माथुर— (आंखें फैलाकर) इस प्रकार देखूँगा । ( दर्दुरक धूल से माथुर की आँखें भरकर=उसकी आंखों में धूल झोंक कर संवाहक को भागने का इशारा करता है । माथुर आंखें पकड़ कर जमीन पर बैठ जाता है । संवाहक भाग जाता है । ) दर्दुरक— ( अपने आप ) जुआ के प्रधान अध्यक्ष माथुर से मैंने विरोध कर लिया है अतः अब यहाँ रुकना ठीक नहीं है । मेरे प्रिय मित्र शर्विलक ने यह कहा है—'सिद्ध महात्मा के द्वारा बताया गया है कि आर्यक नामक गोपालपुत्र राजा बनेगा । मेरे जैसे सभी लोग उस (गोपालदारक) का अनुगमन (साथ) कर रहे हैं।' इस लिये मैं भी उसी के पास जा रहा हूँ । (ऐसा कह कर चला जाता है।)
टीका— खलीकर्तुम्=वञ्चितुम्, ताडयितुं वा, संशोणितम्—शोणितेन युक्तं यथा स्यात् तथा इति क्रियाविशेषणम् । विप्रतीपम्=विपरीतम् इदमपि क्रिया-विशेषणम् । पुंश्चलीपुत्र=कुलटायाः पुत्र, मार्गगतः=पथिकः सन् न तु अपराध्यन् सन्, पांशुना=धूल्यादिना, संज्ञाम्=संकेतम्, निगृह्य=गृहीत्वा अवलम्ब्य वा, विरोधितः = विरोधविषयीकृतः, शत्रुत्वं प्रापितः, युज्यते = युक्तं भवति, सिद्धा-देशेन = सिद्धिमतो महात्मनः भविष्यत्कथनेन, अस्मद्विधः = अस्मत्सदृशः निर्धनः असहायश्च लोकः।
अर्थ—संवाहक— (घबराहट के साथ घूमकर देखकर) यह किसी का घर है जिसका बगल का दरवाजा खुला है । तो इसमें प्रवेश करता हूँ । ( प्रवेश