मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः १५९
शलगणागदे म्हि। (एतत् कस्यापि अनपावृतपक्षद्वारकं गेहम्। तदत्र प्रविशामि। आर्ये ! शरणागतोऽस्मि।)
वसन्तसेना—अभअं सरणागदस्स। हज्जे ! ढक्केहि पक्खदुआरं। (अभयं शरणागतस्य। हञ्जे ! पिधेहि पक्षद्वारकम्।)
(चेटी तथा करोति।)
वसन्तसेना—कुदो दे भअं ? (कुतस्ते भयम् ?)
संवाहकः—अज्जे धणिकादो। (आर्ये ! धनिकात्।)
वसन्तसेना—हज्जे ! संपदं अवावुणु पक्खदुआरं। (हञ्जे ! साम्प्रतमपावृणु पक्षद्वारकम्।)
संवाहकः—(आत्मगतम्) कधं धणिकादो तुलिदं शे भअकारणं। शुट्ठु क्खु एवं वुच्चदि—(कथं धनिकात् तुलितमस्या भयकारणम्। सुष्ठु खल्वेवमुच्यते)
जे अत्तबलं जाणिअ भारं तुलिदं वहेइ माणुस्से।
ताह खलणं ण जायदि णअ कान्तालगदो विविज्जदि ॥ १४ ॥
य आत्मबलं ज्ञात्वा भारं तुलितं वहति मनुष्यः।
तस्य स्खलनं न जायते न च कान्तारगतो विपद्यते ॥ १४ ॥
एत्थ लक्खिदो म्हि। (अत्र लक्षितोऽस्मि।)
करने का अभिनय करके, वसन्तसेना को देख कर) आर्ये ! आपकी शरण में आया हूँ।
वसन्तसेना—शरण में आये तुमको अभयदान है। चेटी ! दरवाजा बन्द कर दो।
(चेटी दरवाज़ा बन्द करती है।)
वसन्तसेना—तुम्हें किससे भय है ?
संवाहक—आर्ये ! धनी आदमी से।
वसन्तसेना—चेटी ! अब दरवाजा खोल दो।
संवाहक—(अपने आप) क्यों, धनिक से होने वाले भय को हल्का (साधारण) समझ रही है ? यह ठीक ही कहा जाता है —
अन्वयः—यः, मनुष्यः, आत्मबलम्, ज्ञात्वा, तुलितम्, भारम्, वहति, तस्य, स्खलनम्, न, जायते, कान्तारगतः, च, सः, न, विपद्यते ॥ १४ ॥
शब्दार्थ—यः = जो, मनुष्यः = आदमी, आत्मबलम् = अपने बल को, सामर्थ्य को ज्ञात्वा = समझ कर, तुलितम् = तौले हुये, भारम् = बोझा को, वहति = ढोता है, तस्य = उसका, स्खलनम् = पतन, गिरना, न = नहीं, जायते = होता है, च = और, कान्तारगतः = वन अथवा दुर्गम मार्ग में फँसा हुआ, सः = वह व्यक्ति, न = नहीं, विपद्यते = नष्ट होता है, मरता है ॥ १४ ॥